गोपाल दोहे

                       [यथार्थ रस ]
                            [१ ]
            बिन अपराध सतावहीं ,     जीव जंतू     नर नारि ।
            अधम घने पापी महा   ,      धरनी के  महा  भार  ।
अर्थ :– जो लोग बिना अपराध किये ही संसार के जीव जंतु नर ,
            तथा नारी को सताते हैं ।  वे संसार मैं अधम हैं ,महा पापी
           हैं ।   वे इस धरती माँ के सबसे बड़े भार हैं   ।
                          [  २  ]
 सदां  बाँह   न  प्रिय कंधन ,   सदां न रहै बसंत।
सदां न यौवन थिर रहै       ,  सदां न भावै कंत  ।
अर्थ :– प्रिय के कन्धों पर बांह हमेशा नहीं रहती है।
           और बसंत का महीना भी सदां नहीं रहता है ।
            यौवन भी हमेशा नही रहता है ।  पति भी हमेशा
            अच्छा नहीं लगता है।
                          [३ ]
जिनकी चिंता कर रहे    , जिनकौ आदि  ना  अंत   ।
ते नर कैसे हारहिं           ,सदां   विजय  कहें   संत  ।
अर्थ :-जिनकी चिंता श्री श्याम सुन्दर प्रभु करते हों ।
          जो आदि अंत से रहित हैं।  वो मनुष्य हार नहीं
         सकते हैं।    साधु कहते हैं कि जगत मैं उनकी
        विजय  ही होती है ।
                                             [४ ]
 उत्सव   सोहत नर   नहीं            ,      करज मरज   भयौ    लीन।
   होंय  ख़ुशी  सब लोग जब            , गुपाल              रहै    दीन ।
अर्थ – उस मनुष्य को कोई भी उत्सव  सोभा नहीं देता है ।
जो कर्ज की बीमारी में  लीन  है जहाँ सभी लोग ख़ुशी होते हों ।
उनके बीच अकेला कर्जवान  दीनता का प्रतीक बन जाता है ।
                                [ ५ ]
       करज नाम बड़  ब्याधि जग       ,      लौटावे     परै जोर  ।
        निश दिन बढतौ  जात है         ,    ब्याज मूल परै  होर     ।
अर्थ –  कर्ज   नाम  जगत की बहुत बड़ी  बीमारी का है। यह  बीमारी
बढ़ती जाती है ।  इस को लौटाने मैं बहुत जोर पड़ता है।   यह ब्याज
 प्रत्येक दिन रात  ही बढ़ता जाता  है । ब्याज हमेशा बढ़कर मूलधन
से भी  आगे निकलने की होड़ में रहता   है ।
                              [ ६ ]
गुपाल मूरख घने जग          ,        व्याप रहे   सब   ओर।
बानख  हँसी   मजाक सब     ,       मानत सब   सिर मौर    ।
अर्थ  –
गोपाल संसार में  अज्ञानियों की कमी नहीं है  । वे पूरे  जगत
 में व्याप्त है।   हँसी का यह एक अच्छा कारण है   ।  कि वे
सब अपने आप को ही सिरमौर मानते हैं ।  जानकार मानते हैं
               [ ७ ]
सभी  कहैं  ज्ञानी हमीं     ,और      जगत मैं मूढ़ ।
गुपाल बात परख कही     , ग्यान जगत कौ गूढ़ ।
अर्थ –  संसार मै सभी अपने आप आपको ज्ञानी कहते है।
औरो को संसार में मूर्ख  समझते है ।  गोपाल परखने के
बाद जगत के इस गहरे रहस्य को बताते है।
                                                 [   ८  ]
                     समरथ की वाणी फलै  , असमरथ कौ न  मोल ।
                     वारी जग असमर्थता    , बजै पोल कौ       ढोल।
अर्थ :– समर्थवान पुरुष की वाणी हमेशा फल दायिनी होती है ।
           जो पुरुष सामर्थ हीन हैं । उनका संसार मैं कोई मूल्य नहीं है ।
             असमर्थता तुम्हारा धन्यवाद है तुम्हारा ढोल संसार में
             बिना बजाये बजता है । पूरे संसार मैं अपने आप असमर्थ
             व्यक्ति का प्रचार होता है ।
                                  [ ९ ]
 स्वारथ सब  जग मैं बसै         , स्वारथ कौ    संसार   ।
जनक ,जननि ,भाई बहिन      , स्वारथ की     पतवार  ।
अर्थ :– स्वारथ सारे संसार मैं बसता है ।  स्वारथ का चारों
 ओर ,प्रभाव है । सभी रिश्ते नाते स्वार्थ के वशीभूत हैं।
  माँ ,पिता , भाई ,बहिन सभी स्वारथ से भरे हुए हैं ।
                            [ १ ० ]
भार्या स्वारथरूपणी             ,  स्वारथ सब  परिवार  ।
स्वारथ बस संतति सकल     ,  स्वारथ जग व्यवहार  ।
अर्थ :– पत्नी भी स्वार्थ की प्रति मूर्ति है ।  सारा परिवार भी
           स्वार्थ का बना है।   बच्चे भी स्वार्थ से बंधे हैं इस जगत
           का व्यवहार स्वारथ से भरा है ।
      [  १ १   ]
बहस बुरी हर बात जग         ,    उलझत     हानी    होय  ।
निज मारग चलते रहो         ,   बहस     न    जीती कोय ।
अर्थ :– बहस करना मनुष्य का  बहुत बुरा लक्षण है।  इसमें ,
          उलझने से बहुत नुकसान है । मानव को अपने उचित रास्ते ,
          उचित जीवन मार्ग पर चलते रहना चाहिए । बहस मैं कोई
         नहीं जीतता है।
                                       [१ २ ]
जीत जाओ यदि बहस मैं        ,  कुंठा     हांरे          होय।
करे  बहस  न लाभ कछू          , बीज बैर         के  बोय ।
अर्थ :— अगर बहस मैं जीत भी जाओ तो भी ,इसका परिणाम ,
              गलत निकलता है ।  हारने वाले को बहुत ही जलन होती ,
            है ।  बहस से कोई लाभ नहीं होता है।   इससे बैर के बीज
           उत्पन्न  जाती है ।
                      [ १ ३ ]
अनिल बुरी अपमान  जग           , बहस        आहुती   जान  ।
अंतर मैं विष दायिनी               , खैंचत           धीरे     प्रान   ।
अर्थ :–
बहस मैं हुए अपमान की अग्नि बहुत बुरी होती है।   और
बहस करने से इसमें आहुति पड़ती है ।  यह मनुष्य के अंदर
  जहर पैदा कर देती है ।  धीरे धीरे प्राणों को खींचती है ।
                                   [ १ ४  ]
बहस युद्ध बहुतक   भये            ,     अति अदभुत    परिणाम  ।
मूरख  परिणय      विदूषी         , विद्योत्तमा   सी       वांम    ।
अर्थ :—
इस बहस युद्ध के बहुत बुरे अत्यंत अदभुत परिणाम देखे हैं ।
 इसी बहस के कारण विद्योत्तमा जैसी विद्वान ,   नारी को
 एक मुर्ख पति प्राप्त हुआ ।
                    [ १ ५ ]
गहो सरन  गोपाल  हरी      , व्यापत नाहीं ताप   ।
चिंता पग अरपन करो   ,सुरझेंगे प्रभु   आप  ।
अर्थ :–भगवान कृष्ण की शरण ले लो । जिससे आपको ,
          संसार के कार्यों से उत्पन्न गर्मी नहीं व्यापेगी ।
          अपनी चिंता को प्रभु के चरणों मैं रख दो । श्री गोपाल ,
          अपने आप ही तेरे रास्ते खोल देंगे ।
                                   [ १ ६ ]
बुद्धि विवेक दोनों तजे          ,           गुपाल भये मन रूप  ।
अकरम अधरम सब करै      ,           त्यागो प्रभु स्वरुप    ।
अर्थ :- गोपाल कहते हैं कि जब मनुष्य अपंने बुद्धि ,विवेक
को छोड़ देता है तब वह अपने मन के अनुसार कार्य करता है
और वह न करने योग्य कर्म करता है अधर्म भी करता है।
वह ईश्वर के स्वरूप व शिक्षा सब भूल जाता है ।
                     [ १ ७ ]

कुंती सुत लीनी शरण महाभारत कथि गाय
दूत बने सारथि बने , कृपा सिंधु हरषाय

अर्थ :— कुंती पुत्रों ने श्री कृष्ण की शरण ली थी
जो महाभारत मैं वर्णित है उन महा भाग्य शाली
पांडवों के लिए मेरे दया सिंधु प्रभु उनके दूत बन
गये उनके रथवान बन गये

 

[ १ ८  ]

बिगड़े कारज सरत जग होइ कृपा ब्रजराज
गुपाल मोहन एक प्रभू , प्रतिपल राखत लाज

अर्थ ;– गोपाल कहते हैं अगर कृष्ण की कृपा
मनुष्य पर है तो उसके बिगड़ने वाले कार्य भी
बनते हैं मेरे मोहन हर क्षण मनुष्य की लाज
बचाने को तत्पर रहते हैं जीवन उनके समर्पित

[ १ ९  ]

गुपाल कृपा यदुनाथ होंत अनौखे खेल
दुर्दिन मंगल करत जग बैरी राखत मेल

अर्थ :– गोपाल कहते अगर प्राणी जीव मनुष्य
पर श्रीकृष्ण की कृपा है तो संसार अनोखी
घटनाएँ जीवन मैं घटने लगती हैं ज्योंतिषी
द्वारा बताये बुरे दिनों मैं मंगल होता है और मनुष्य
के शत्रु भी मित्र बन जाते हैं

[ २ ० ]
धन खरचौ तन राखियौ , खो तन राखौ लाज
लाज मरियाद छाँड़ि सब धर्म राष्ट्र हित काज
अर्थ :– गोपाल कहते हैं शरीर रक्षा के लिए
मनुष्य को धन खर्च करना चाहिए एवं
अपनी इज्जत आबरू के लिए शरीर को
भी नष्ट करना चाहिए राष्ट्र के लिए एवं
धर्म लिए मनुष्य को अपनी आ न बान
लज्जा ,शील छोड़ देना चाहिए
[ २ १ ]
ईर्ष्या द्वेष घुन कृपणता ,क्रोध गुणन कूँ खाय
दुर्व्यसन जबड़े जबर , गुपाल भोग पीस जाय
अर्थ :–ईर्ष्या घृणा करना क्रोध करना मनुष्य के गुणों खा जाता है अगर
कोई मनुष्य किसी दुर्व्यसन मैं पड़ता है वहमनुष्य इन भयंकर
जबड़ों मैं फँसकर समाप्त हो जाता है

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