गोपाल महादेव शंकर

     ऊॅ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
 उव्र्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।
  1. स्तुति
कैलाशी  कैलाश  गिरि           ,   आसन दीन  जमाय    ।
डमरू      बजै    त्रिशूल पै      , बैठे      ध्यान    लगाय    ।
बैठे ध्यान लगाय सामने   बैठे      ,           नंदी बाबा  ।
मात भवानी वाम विराजी  गोदी     , गण पति   बाबा  ।
कार्तिके पित मात बीच मैं       ,महा   ग्रहस्थी  बाबा   ।
भैरों  जोगिन  भूत प्रेत  सब   , घेरौ   डालो        बाबा   ।
आनंद अवस्था ताता थैया     ,    गण नायक गण बाबा।
महादेव जय अवढरदानी       , जयजय  अदभुत बाबा ।
जय जय अलबेले   शंकर  ।     हटा दो   काँटे   कंकर   ।
सकल गुण खान प्रभू तुम।     गुपाल के राम प्रभू तुम  ।
अर्थ:—-
 भगवान शंकर कैलाश  पर्वत पर ध्यान मग्न अवस्था में
आसन लगाए बैठे है। उन्होंने त्रिशूल अपने निकट गाढ़
रखा है उस त्रिशूल के ऊपर शंकर का डमरू मंद धवनि से
 बज रहा है। शंकर  भगवान ध्यान  अवस्था मैं है उनके
सामने नंदीश्वर  विराजमान  है।  भगवान शंकर के वाम
अंग में माँ  भवानी  पार्वती  विराजमान है उनकी गोद में
गणेश जी विराजित है।  और कार्तिकेय जी अपनी माता
पिता के मध्य विराजित है।  यह उनके दृश्य उनके महा
गृहस्थी  होने का प्रमाण है । भैरव  योगिनियां भूतप्रेत
सबने महादेव को घेर रखा है। वे सभी आनंद अवस्था में
नृत्य कर रहे हैं।ऐसे महादेव सदा दान देने के तत्पर रहने
वाले अद्भुत बाबा शंकर की जयजयकार  हो।
हे शंकर भगवन आपकी जय जयकार हो। मेरे जीवन के सभी
अवरोध समाप्त कीजिये। आप समस्त गुणों की खान है ,
 और गोपाल के स्वामी राम तुम्ही हो।
  1. कीर्तन    
मस्त  मस्त   तू     महामस्त ,  ओ    मस्तेश्वर   बाबा  ।
डेरा निर्जन  सदां   तुम्हारा        , ओ   मेरे भोले   बाबा  ।
सदां समाधी महा ध्यान की      , महाध्यानेश्वर   बाबा  ।
अम्बर छतरी धरन बिछौना     , ओ    अलबेले    बाबा  ।
फूल  धतूरे  आख सुहाबै     ,  पारिजात नहिं       भाबा ।
रत्न   समुन्दर  सबने    छांटें, विष पीओ  मेरे    बाबा  ।
गिरिजाभामिन ,तनय   कार्तिक , गणपतिबापा बाबा ।
  जय जय  तेरी  अबढर दानी ,  दया सिंधू महा बाबा  ।
  पात्र  कुपात्र  न नाथ विचारौ  ,सुमरै  सोहि   सुहाबा  ।
  अल्प तपस्या हिलै सिंहासन जो ,   मांगे सो   पाबा  ।                                                               ,
 भागत  डोलो  दै  वर  स्वामी ,संकट विष्णु   फँसावा  ।
 भोले  भोला पन  नहीं   छोड़ा, बम बम बम बम बाबा ।
सुरसरि   धार जटान  मैं रोकी ,  भगत सहारे    बाबा  ।
सदां   लोक हित  नाथ ध्यान मैं , लोकेश्वर मन भावा ।
कोई  देव  जो देहि सके नहिं   शिव भक्ति मिल जावा।
”गुपाल ”कांक्षा,पूरी  ,कीजै,शिवगण,दास,दास मोहिभाबा।
 मस्त,मस्त,तू ,महामस्त ,ओ,   मस्तेश्वर     ,     बाबा  ।
 
अर्थ  :——
हे महादेव , हे शंकर आप बहुत ही बिना चिंता के रहने वाले
हो एवं रहने वालो के प्रभु हो। आपका निवास हे भोले बाबा
एकांतमें रहता है। आप हमेशा  महा ध्यान की समाधी में
रहते हो अतः आपको ध्यानियों  का ईश्वर भी माना गया है।
  आपके ऊपर  आकाश  रूपी  छत है , एवं  धरती माँ आपका
बिछौना है। आपको धतूरे के  फूल ,आख  को फूल पसंद है।
  आपको पारिजात  के  फूल  अच्छे  नहीं लगते। माता पार्वती
आपकी  पत्नी   है , एवं  गणेश  व    कार्तिकेय आपके  पुत्र है
हे सबपर करुणा बरसाने वाले महेश , आपकी जय जयकार
है। आप भक्तो मैं भेद नहीं है,  , जो आपका स्मरण ,करता
है, वो  आपकी कृपा को पा लेता है। आप छोटी सी तपस्या
से प्रसन्न  होकर बड़ा फल  देते हैं  । आप अपने भोलेपन
से ऐसे भी वरदान दे  देते हो , जो आपके स्वयं के     लिए
परेशानीबन जाता है जिसके निवारण के लिए   भगवान
विष्णु को  आना पड़ता है। ये आपकी महानता है की आप
फिर भी आपने भोलापन नहीं त्यागते। इसलिए आपके भक्त
आपको  भोले बाबा  कहकर पुकारते हैं। आपने अपने भक्तो
के लिए गंगाजी की प्रबल धार को अपने जटाओ में स्थान
दिया है,एवंलोक कल्याण हेतु पृथ्वी पर प्रवाहमान किया है।
समुद्र मंथन के दौरान सभी ने बहुमूल्य रत्नो प्राप्त किये,
और आपने लोक कल्याण के लिए समस्त विष को पी  गए।
 आपके ध्यान  में समस्त संसार का कल्याण ही रहता है।
शिव भगति से सभी कुछ  मिल जाता है जिसे कोई देवता
 नहीं दे सकता हे भगवन आशुतोष इस गोपाल की जो भी
इच्छाएं हैं पूरा कर दीजिये मैं आपके   दासों का भी का दास
हूँ । हे महादेव ,     हे शंकर आप बहुत ही बिना चिंता के रहने
वाले हो , एवं रहने वालो के प्रभु हो ।
3- . स्तुति
महादेव जय    जय त्रिपुरारी ।
भस्म भभूत     बघंबर धारी ।
 आख फूल माला गल डारी  ।
निर्जन शैल     कंदरा प्यारी ।
धरनि बिछौना गगन छतारी।
भूतेश्वर शमशान बिहारी     ।
क़र  त्रिशूल डम  डमरू धारी ।
आदि अनादी   तूम्बा धारी  ।
शक्ति  भवानी  लागै प्यारी ।
नंदी बाबा    करौ     सवारी ।
गणेश कार्तिक प्राण विहारी ।
 सिर त्रिपुण्ड   श्रीगंगा धारी ।
नागराज गल शोभा  न्यारी ।
पात्र कुपात्र न नाथ  विचारी ।
भोले भोले    गिरा   उचारी  ।
पामत इच्छा सब   संसारी  ।
जटा जूट गंगाजल धारी   ।
भागीरथ पूर्वज        उद्धारी ।
नीलकंठ विष बचे    संसारी ।
कृपा सिंधु शिव लोक बिहारी।
मोहिन मोहित  बुद्धि बिगारी।
धरा प्रदक्षिणा हर कर डारी  ।
पाशुपतस्त्र पिनाक धनु धारी   ।
भस्मासुर  भगवान      सुरारी  ।
वर कर धर सिर जर    संसारी।
भस्मासुर  कीनीं शिव ख्वारी ।
  शिव  आगे  पीछे   असुरारी  ।
 विष्णु मोहिनी  रूप अधारी  ।
स्वयं शीश कर असुर पजारी   ।
महादेव   वर  देउ    विचारी     ।
गुपाल जय जय करै तुमारी    ।
अर्थ :—–
हे महादेव जी हे त्रिपुरारी हे तन  पर
भस्म लगाने बाघ की छाल के वस्त्र
पहनने वाले आपकी जय हो आपको
पहाड़ों की कंदराएँ बहुत प्यारी लगती
हैं ।आप हाथ मैं त्रिशूल व् डमरू धारण
करते हैं  ।प्रभु आप अनादि अदि हो
आपका तूम्बा सन्यास का प्रतीक है।
आपको शक्ति  की देवी मां पार्वती
प्यारी लगती है  नंदीश्वर भगवान
आपकी सवारी हैं। आप गणेश जी
और कार्तिकेय के पिता हैं। आपके
सिर पर त्रिपुण्ड  जटाओं मैं श्रीगंगा
जी  विराजमान हैं ।    और गले मैं
 नागों की शोभा मनोहारी अलग है।
आप कभी भी अपने सेवकों   मैं भेद
नहीं करते हैं।जो भोले शंकर बोलता है
उसका इच्छापूर्ति दरवाजा अपने आप
खुल जाता है । आपने महाराज भगीरथ
के पूर्वजों का गंगा   जी के माध्यम से
कल्याण     कर दिया। समुद्र मंथन के
अवसर पर आपने निकले विष जहर से
संसार को बचा दिया। आप उसे पी गए
आप  लोक कल्याणकारी कृपा के सागर
हैं । जब विष्णु के मोहिनी रूप से आप
  मोहित हो गए।आपने उसके पीछे भागते
हुए धरती मां   की परिक्रमा कर डाली हे
                         पाशुपत अश्त्रतथा पिनाक धनुष धारण
करने वाले है । भस्मासुर को  सिर पर
हाथ रखते हिये जल  जाने का वरदान
 दे दिया । असुर भष्मासुर ने वह प्रयोग
 आपके ऊपर किया ।आप आगे आगे
भागने लगे भगवन विष्णु ने असुर को
बहकाया । उसका  हाथ  उसी  के ऊपर
रखवाया। और उसे मरवा दिया। तथा
आपको सोच समझकर वरदान देने
को कहा ।

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