मुखपृष्ठ

 

——-     ऊँ    गणपतये   नमः      ——-

 

ऊँ वक्रतुण्ड़ महाकाय    सूर्य कोटि समप्रभ।

निर्विघ्नं कुरू मे देव,       सर्व कार्येषु सर्वदा।            

श्री कृष्ण शरणम ममः श्रीराधे सर्वेश्वरी विजयते”     

            ” वन्दे कृष्णम जगत गुरू “

  अखण्डमण्डलाकारं  व्याप्तं येन चराचरम् 
  तत्पदं दर्शितं येन      तस्मै श्रीगुरवे नमः  

  अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया

   चक्षुरुन्मीलितं येन   तस्मै श्रीगुरवे नमः 

   गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः    गुरुर्देवो महेश्वरः 

   गुरु साक्षात्  परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।

तेरा कर्म में ही अधिकार है ज्ञाननिष्ठामें नहीं।

वहाँ ( कर्ममार्गमें ) कर्म करते हुए तेरा फलमें

कभी अधिकार न हो अर्थात् तुझे किसी भी

अवस्थामें कर्मफलकी इच्छा नहीं होनी चाहिये।
यदि कर्मफलमें तेरी तृष्णा होगी तो तू कर्मफल

प्राप्ति का कारण होगा। अतः इस प्रकार कर्मफल

प्राप्ति का कारण तू मत बन ।
क्योंकि जब मनुष्य कर्मफल की कामना से

प्रेरित होकर कर्म में प्रवृत्त होता है तब वह

कर्मफलरूप पुनर्जन्मका हेतु बन ही जाता है।
यदि कर्मफलकी इच्छा न करें तो दुःखरूप

कर्म करनेकी क्या आवश्यकता है इस प्रकार

कर्म न करने में भी तेरी आसक्ति प्रीति

नहीं होनी चाहिये।

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने l
प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः ll

हे श्री कृष्ण, हे वासुदेव (वसुदेवके पुत्र ) हे हरि,

हे परमात्मन, हे गोविंद, आपको नमन है , मेरे

सारो क्लेश का नाश करें, हम आपके शरणागत हैं l

सर्वधर्मान्परित्यज्य   मामेकं        शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।

सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही

शरण में आओ , मैं तुम्हें समस्त पापों से

मुक्त कर दूँगा ।  तुम शोक मत करो।।

योगेश्वर श्री कृष्ण द्वारा अपने मित्र एवं भक्त

अर्जुन को सब कुछ छोड़ कर अपने शरणागत

होना , कितना विश्वास व अपनेपन का प्रतिक

है। उन्ही परिपूर्णतम   परमात्मा श्री कृष्ण एवं

वृषभानुनंदिनी श्री राधिके युगल स्वरुप चरणों

में नतमस्तक होकर उनकी कृपा मानकर मैं

इस राधा कृष्ण रूपी महासागर में कुछ मोती

प्राप्त कर आपको समर्पित करने की चेष्टा कर

रहा हूँ ।

समस्त संसार के गुणीजनो, विद्वानों , मुनियो

एवं संतो के आशीर्वाद का आकांक्षी हूँ। और विनती

करता हूँ । इस गूढ़ विषय में लेखन के दौरान

भूलवश हुई   त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ।

हे मातेश्वरी    ज्ञान की देवी सरस्वती  मेरी 

आपसे करबद्ध विनम्र              विनती   है  

कि नन्दनदन परिपूर्णतम ब्रह्म  श्री कृष्ण 

के गुण  वर्णन का   जो  संकल्प मैंने  लिया है

 पूर्ण करने के लिए मेरे   मन ज्ञान को निर्मल 

करें  । आपकी अनुकम्पा से मैं इस  पुनीत  

कार्य को  पूरा कर सकूँ ऐसी विनती  है   ये   

परमगूढ़  विषय  है जिसे परम ज्ञानी महिर्षि

 वेदव्यास ,महा मुनि गर्गाचार्य ,परम भागवत

 श्री सुकदेव जी ,महा कवि सूरदास तथा 

अन्यान्य असंख्य  महापुरुषों ने लिखा है   

उनके लिखे को ,  अपने अराध्य श्री कृष्ण 

का अमृत संदेश मानकर मैं   गद गद हूँ  

  जो उन्होंने लिखा कहा वह मानव जीवन

 का अमृत कलश है ,जिसकी एक बून्द भी 

आत्मसात करने से जीव मात्र का कल्याण

 हो जाता है । उनकी चरण रज को अपने

सिर रखकर उनसे विनती करता हूँ ,कि

वे मेरा मार्गदर्शन करें।

           

महा मुनि गर्ग की मैं प्रथम वंदना करता हूँ   

 कृष्ण शब्द को उन्होंने महामंत्र  माना  है  

  उनके अनुसार    से कमलाकांत  ,   से  

 राम,   से षड ऐश्वर्य के स्वामी , नरसिंह 

का प्रतीक   है    अकार अग्नि तत्व के रक्षक

  ,विसर्ग न्र नारायण का बोध है   कृष्ण नाम 

मैं सारा परमात्व तत्व ,जगत तत्व  एकीकर 

हो गया है     


कृष्ण सारे संसार को अंदर समाये हैं    संसार 

 भी उनके अंदर है  संसार का अस्तित्व उन्हीं

  से है      जिसने कृष्ण को गह लिया ,उन्हें

 किसी अबलंबन  की आवश्यकता नहीं    

 यह अकाट्य सत्य है , परम अनुभूती है     

जन्म के समय से उनके गोलोक गमन 

तक अनेकानेक बार परलक्षित हुई है       

  कारागर के ताले खुलना ,जमुना जी का 

रास्ता देना ,पूतना तथा महा बली राक्षसों 

का संहार , कालिय नाग प्रसंग जमुना से 

सकुशल निकलना      द्रोपदी के चीर को 

बढ़ाना ,जयद्रथ बध के समय भगवान सूर्य 

को छुपाना तथा प्रगट करना ,असम्भव 

महाभारत युद्ध मैं धर्मराज की विजय ,गुरु

 संदीपनी के मरे हुए पुत्र को जीवित  करना 

,अपने भाइयों को जिन्हें कंस ने मार दिया 

था      यमराज से वापिस लाकर  अपनी 

जननी   देवकी को दे   देना , कुबडी दासी  

को सुंदर नारी बना देना  ,  समुद्र मैं द्धारिका  

का निर्माण सब अलौकिक       उदाहरण  हैं    


अनीश्वरवादी  व  अपने को स्वयं महाज्ञानी

मानने वाले ,अपने को स्वयम्भू महा विद्वान

 मानने वाले उनकी तुलना एक साधारण मानव

 से करते हैं     उन्हें जीवन के हर क्षेत्र मैं छोडी

 कर्म की सुगंध उन्हें नहीं भाती    वे कृष्ण को

 नटखट माखन चोर का अपराधी मानते हैं   

 वे इसके पीछे प्रेम भरा आमंत्रण दिखाई नहीं 

देता ,  गोपियों के साथ उनका प्रेम उन्हें वासना

 मय दिखाई देता है  वे उनकी वय को नहीं 

समझते हैं , सात साल के बच्चे का 

रास रंग उन्हें बदरंग दिखाई देता है      

उनके संदेश को समझने के लिए उपर

 उठना पड़ेगा     छुपे प्रेम के आमन्त्रन को

वे अनुभव नहीं   करते   हैं ।    उन्हें कृष्ण

 के घर माखन के भंडार दिखाई  नहीं देते हैं   


कृष्ण परमात्मा हैं , उनका सम्पूर्ण जीवन

 उल्लास हर्ष से भरा हुआ है  ,भयंकर 

विपत्ति को झेलते हुए वे कभी दुखी 

नहीं  हैं        कृष्ण भगतों के लिए  

सोलह कलावतार पूरण ब्रहम हैं    धर्म

 स्थापना कार्य मैं वे कभी भयभीत नहीं हैं 

  वे  प्रेम रहित ग्यानहीन, बलहीन नहीं

दिखाई  देते हैं  चाहे कंस बध ,जरासन्ध

 बध ,महाभारत का महा नर संहार सभी 

को वे प्रेम से आत्मसात कर लेते हैं

उन्हें  राज्य का लोभ है न सत्ता का 

दम्भ ,उनकी दृष्टि  मैं नर नारी मैं 

 भेद नहीं है,  और तो क्या त्रिलोकी के

 जीव जंतुओ मैं भी वे कोई भेद नहीं

करते हैं       उनकी दया ,करुना ,प्रेम

 सबके लिए उपलब्ध है   वे जन साधारण

 से और  गायों से किस प्रकार जुड़े हैं       

मथुरा गमन पर गायों व् ब्रज बासियों  का

 अधीर होना उनके उत्कट  प्रेम को प्रदर्शित

 करता है   रुकमनी हरण को वे स्वीकार

 करते हैं ,  भौमासुर के कारागार से मुक्त 

सोलह हजार कन्या बंदियों को पत्नी का

 दर्जा देना उनकी नारी स्वीकार्यता है   

 समाज का भय उन्हें नहीं है अपनी सखी 

द्रोपदी की पुकार सुन  उनने चीर बढ़ाकर 

उसकी लाज बचाई  कोई उन्हें कैसे

पुकारता है वह भावना महत्त्व पूर्ण है    


आप अहिंसक हैं ,परन्तु धर्म हेतु वे 

उसके समर्थक हैं  दुर्योधन द्धारा  

पांडवों के लिए पाच गाँव देने से भी

 मना करने पर  धृतराष्ट्र की राज 

मैं सभा मैं उनकी सिंह घोषणा 

आज भी सत्य कहने वाली ,तथा

 दुष्टों को भयभीत करने वाली है     

 अब सम्राट युधिसठर याचना नहीं

 करेंगे     बल्कि अपने राज्य को 

लडकर लेंगे       आप हिंसा की 

अप्रहारिता के बारे मैं सजग हैं    

 रुकमनी स्वयम्बर के लिए अकेले

 जाना      कालयवन से युद्ध हेतु 

अकेले प्रस्थान  ,बार बार जरासंध से      

     ब्रज बासियों को बचाने के लिए    

   मथुरा तज द्धारिका को राजधानी

 बनाना सब रक्त पात से बचने के लिए है     

अमोघ अस्त्र सुदर्शन चक्र का प्रयोग बहुत 

कम करना उनकी    अहिंसक होने की  

सजगता है    जब सभी रास्ते  बंद हों 

तो युद्ध की घोषणा वह भी जन कल्याण 

के  लिए , अपने लिए नहीं  , स्तुत्य है, 

प्रशंसनीय  है वंदनीय है    

कंस को मारकर , उग्रसेन का राज 

तिलक करना , जरासंध को मरवाकर 

उसके पुत्र को राज्य श्री कृष्ण के 

स्वार्थी  होने को दर्शाता है      

 

वे व्यवस्था की सोचते हर हाल मैं वे 

वंशीधर  हैं उल्लास पूर्ण हैं वे दुखी 

नहीं हैं हंसते हुए रास्ता तलाशते हैं 

   उनका कोई बंधन नहीं हैं    ,बंधन 

तोड़ने मैं वे सक्षम हैं      प्रण के 

बंधन को वे धर्मं के लिए तोड़ते हैं 

    

रथ चक्र निकाल कर भीष्म पितामह

 का वध करने को उद्यत होना बन्धनों

 मैं नहीं बंधना है     

वे प्रेमी हैं पर उनके प्रेम मैं वासना

 नहीं है , माँ से प्रेम ,बाबा से प्रेम, 

भाई प्रेम ,श्री राधा प्रेम ,ब्रजवासियों

 का प्रेम तथा जिससे भी प्रेम है  

 वह  दिखावा नहीं है प्रेम की पराकाष्ठा 

  है  तभी तो जीवन का हर मोड़ जहाँ 

से श्री कृष्णा गुजरे हैं  जन मानस के 

लिए श्रद्दा व् विश्वास की अमूल्य धरोहर 

बन गया    लोगों ने  उनके दिव्य कर्मों

 का अनुसरण उनके साथ किया    तथा 

आज भी देख कर उनका अनुसरण करते हैं  

  अन्य अवतारों की तरह वे गम्भीर नहीं हैं    

    उदास रोते भी नहीं हैं श्रीकृष्ण , संसार के

 समस्त   बन्धनों को धर्म के लिए तोड़ देते हैं   

प्रण  मैं होते हुए की मैं महाभारत मैं शस्त्र नहीं 

उठाऊंगा    भीष्म के बध करने के लिए उद्यत 

हो जाते हैं    क्योंकि   उन्हें धर्म स्थापना    

करनी है   वे भीष्म की तरह किसी सिंहासन

 से नहीं बंधे हैं उनका कार्य जन  जग का

 कल्याण करना है        इसलिए    वे  

   आदरणीय    वंदनीय  हैं                                                          

 जीवन का हर मोड़ जहाँ से मधुसुदन गुजरे हैं    

  वह स्थान जनसाधार के लिए तीर्थ बन गया   

 बालकपन मैं असुरों का संहार ,माखन ग्रहण  

,दूध व् दही दान लीला  , गौ चारण ,वंशी वादन , 

गोपी ग्वालों के संग रास ,ब्रज के कृष्ण ,मथुरा मैं 

श्रीकृष्ण ,युधिसठर के दूत श्रीकृष्ण ,विदुर के श्रीकृष्ण 

 ,राजसूय के श्रीकृष्ण  ,  द्धारिकाधीश श्रीकृष्ण  ,

 द्रुपद के श्रीकृष्ण  ,सारथी  श्रीकृष्ण, गीताउपदेशक 

श्रीकृष्ण    


अपहरण करता नारी उद्धारक श्रीकृष्ण  

सभी कार्य इतनी तत्परता आनन्द निडरता

 से किये गये हैं     पांच  हजार साल से भी 

अधिक समय निकल गया है     आज भी 

जन मानस  पर छाये हुए हैं  उनके व्यक्तित्त्व 

की यही विशेषता है      कि वे सर्व मान्य हैं 

वे बलवान हैं ,महाज्ञानी हैं  

नीत वेत्तक ,युद्ध विशेषग्य  , अहिंसक

 धर्म प्रेमी ,महामल्ल ,कालजयी उपदेशक 

,नारी कल्याणक ,धर्म प्रेमी लोगों के कष्ट 

हरने को तत्पर ,अधर्मियों को मिटाने को 

तत्पर उन्हें कृष्ण से श्रीकृष्ण बना देता है  

वे व्यापक हैं अनंत हैं मनुष्य की सीमाएं 

होती हैं कृष्ण  की सीमाँए नहीं हैं     

बचपन के माखन चोर तथा राजा रहते हुए

 साधारण प्रजाजन के आरोप के अलग मायने

 हैं    माखन चोरी करवाने वाले उनके चेले  हैं,

 भगत हैं , प्रेमी हैं जो उनकी बाल  लीलाओं मैं 

परम सुख की अनुभूति करते हैं  लेकिन

सत्यजीत  के आरोप पर वे अकेले ही निकलते

 हैं     तथा मणि के लिए  श्री जाम्बवन्त से 

युद्ध कर, स्यमनतक मणि  सत्रजीत को  

लाकर  देते हैं    आज के नेताओं को सबक 

है प्रेरणा दाई है   उनका सारा जीवन 

जनता जनार्दन व् संसार के कल्याण के

 लिए है    निजी उपयोग के लिए नहीं है    

 

उनकी सुधर्मा सभा मैं सभासदों के 

अतिरिक्त सामान्य जन को भी बोलने 

का अधिकार जनता की सहभागिता 

शासन मैं सुनिश्चित करना है  वे कब

 कृष्णा से श्रीकृष्ण बनते हैं, पता नहीं 

चलता है साधारण  से विराट  रूप हो 

जाना कितना अदुभुत है  बाल कृष्णा ,

रासेस्वर  कृष्ण  ,गौ भक्त कृष्ण ,

ग्वाल कृष्णा ,योगेश्वर कृष्णा ,प्रकति 

प्रेमी  कृष्ण ,पुत्र कृष्ण,भाई कृष्ण ,पती 

 कृष्ण ,पिता कृष्ण ,नारी समर्थक कृष्ण,

धर्म के लिए बंधू बांधव सबको त्यागने 

वाले कृष्ण,द्वारिकाधीश  श्री कृष्ण 

सब अतुलनीय है    


     उनका सर्वोतकृष्ट  प्रदर्शन है       

    कृष्ण अनंत रूप हैं     

 वे ही जीवन के ध्येह  सार  ,

राह बताने वाले परिपूर्णतम 

 परमात्मा हैं  

  प्राणी मात्र के अमर सहारे  हैं    

 

कृष्ण कृष्ण कह सदां श्री कृष्ण ही जग सार  है      

कृष्ण प्यार कृष्ण रार कृष्ण  जग आधार है     

 कृष्ण सौ  देव कोई जाहे पूतना से प्यार है     

  धर्म धुरंधर महाबल शाली कंस का संहार  है     

संदीपनी गुरू के शिष्य सब और जय जय कार  है     

जमुना संग वृन्दावन वन्दोंपवित्र जल की धार है      

फल पर  अधिकार तेरो कर्म पर अधिकार है    

 कृष्ण सुमरन जीत   ,   तेरी और प्राणी हार  है     

धर्म के पथ पर चलौ और सब       ही   बेकार है    

गुण बरनन होय  तेरे ,     तू गुनहू के पार     है    
 गोपाल के गोपाल ही भव  नैया के पतवार है      
  छोड़   सभी धर्म तू , भज  गोपाल बेडा पार  है 
                                         
 “भगवान   श्री कृष्ण के चरणों मैं    कोटिश   नमन   “

 



 

 

 

 

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