गोपाल गणेश वंदना

महामहेश्वर गणेश्वर  , बिघ्न बिनाशन हार 
सेवक सेवा चरन प्रभु  , लीनी शरण तुमार   
 
लीनी शरण तुमार सुरेश्वर , भंजन दुःख   सुखदाता     ।
एकदंत प्रथमेश कवीश्वर     ,        बुद्धि ज्ञान परिचाता    ।
लम्बोदरकुंजर मुख झाँकी ,      मोहक दरश बिधाता       ।
पृथ्वी प्रदक्षिन प्रथम जयेता ,     जय शिव गौरी माता    ।
                                                    रिद्धि सिद्धि समृद्धि स्वामी      ,  कार्तिके  प्रभु भ्राता      ।
                                                    शुभ और लाभ पुत्र कल्याणक सुता संतोषि माता          ।
                                                     पुष्टि तुष्टि दोउ पुत्र संगिनी जीवन रस बरसाता         ।
                                                          नाती आनंद प्रमोद  प्रभू   रस सिंधू रस दाता          ।
                                                   गौरस  मोदक महाप्रसादी       , भोग प्रभु मन भाता   ।
                                                     परम दयालू परम कृपालू    ,   मन बांछी नर   पाता ।
    विनय दोऊ कर जोरी।
लखौ ना गुपाल ओरी।
करौ अब नाथ करारे ।
भक्तन प्राणनप्यारे ।
       
 
 
अर्थ  :—–
हे महामहेश्वर गणेश जी आप मनुष्य के  सभी बिघ्नों   को
मिटाने  वाले  हो मैं आपके चरणों का सेवक हूँ ।मैंने आपकी
शरण ली  है ।  हे  सुरेश्वर देवताओं के ईश्वर तुम दुःख नष्ट
करने वाले  हो  और  सुख    देने   वाले  हो  ।  हे  गणेश जी
आप  एकदन्त हो , प्रथम  पूज्य  ईश्वर  हो ,आप कवियों के
भी  ईश्वर  हो  ।   हे  हाथी  जैसे  मुख  वाले  बड़े पेट वाले
आपका दर्शन ख़ुशी प्रदान  करने  वाला है।आपका रूप अनुपम है।
 गऊ के घी  के लड्डुओं   का  भोग आपकी  प्रसादी है महा प्रसाद है ।
जो महाप्रसाद लेता है खाता है शक्तिशाली हो जाता है
हे भगतों  को  पालने  वाले  आपकी जय जैकार हो । चूहों
के  राजा  के  प्रतीक  वाली सवारी जिसकी उपमा नहीं है ।
हे    पार्वती   शिवशंकर के  पुत्र  आपकी  जय  जय   हो ।
हे   गणेश  जी  आप   सभी  याचकों  की   याचनाएं पूर्ण
करने  वाले  हैं  आप  परम  दयालू  हैं   परम कृपालू  हो ।
आप  मनुष्य  को  रिद्धि  सिद्धि  और   समृद्धि  देने   हो।
हम  सब  आपकी   वंदना  करते  है।   हे  गणेशजी  मैं
ध्यान  लगाकर  आपका  स्मरण  करता  हूँ   ,   और
प्रार्थना   करता   हूँ,    कि     आप  अपनी  कृपा दृष्टि
मेरी  ओर  कीजिये ।   मुझे  सारी   सम्पदा , सम्पति
प्राप्त  हो  जावेगी ,  और  मैं  आप  का      यशोगान
सदा  करता   रहूँगा।

 

 

 

 

 

 

[ 2 ]
गजानंद गणपति गणनायक स्वागत वंदन स्वामी।
 एकदन्ता  लम्बोदर   सुन्दर प्रथमपूज्य  जगस्वामी।
धरा  परिक्रमा मूषक वाहन  शिव गौरा पद गामी।
बुद्धीसागर ग्यान प्रदाता   प्रथम कविसरनामी ।
स्वागत आगत धरा धाम जग .चौदश शुक्ली नामी।
ढोल नगाड़े नृत्य करत नर  सुखपाते सुख कामी।
स्थापन गिरिजानंदन जग , रूप अनेकन हामी  । .
नाना भाँती करें आरती        ,  भगती पूरण कामी।
भाँति भॉँति लड्डू बंटबामें     भोग लगामें स्वामी।
बिबिध अर्चना उत्सव अदभुत  गणेश अंतर्यामी।
प्रभु विसर्जन जल मैं करहिं      , उत्सव पूरण स्वामी।
गुपाल चरणण शीश लगावै      ,कीरत गान  नमामी । .   .
रिद्धि सिद्धि जग नर पावत       , जय जय बापा रामी । .

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अर्थ —–
हे शिव गणों के स्वामी गणों के नायक आपका धरा पर आने पर
स्वागत है। आपका वंदन है। हे एकदन्त लम्बोदर प्रभु तुम प्रथम
पूज्य जग के स्वामी है अपने वाहन से पृथ्वी परिक्रमा करने वाले
तुम्हारी बुद्धि अदभुत है अपने माता पिता की परिक्रमा कर अपने
अपने भ्राता श्री से धरती की परिक्रमा करने की प्रतियोगिता जीत
 ली। आपका शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी पर स्वागत है। भक्त लोग
ढोल नगाड़ों से नृत्य करते हुए सुख पते हैं। आज के दिन हे माता
पार्वती के पुत्र आप के अनेक प्रकार रूपों की भक्त जन स्थापना करते हैं।
आरती उतारते हैं लड्ड़ओं का भोग प्रसाद चढ़ाते हैं नाना प्रकार से
उत्सव मनाते हैं। दस दिनों चलने वाले इस आनंद उत्सव का अंत
आपके शरीर को जल मैं विसर्जन करने से होता है। हे गणपति बापा
आप सभी भक्तों को रिद्धि सीधी प्रदान कर ख़ुशी करते हो।
ये गोपाल आपके चरणों मैं शीश झुकाता है। आपकी कीर्ति गाता है
आपको नमन करता हूँ। पूरा जग को रिद्धि सिद्धि हे बापू आप प्रदान
करते हो ।

 

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