गोपाल माता दुर्गा देवी स्तुति

माला   सोहै     केहरी  ,      ठाड़ी पृष्ठ सहार     ।    
अदभुत मुद्रा मोहनी  ,      महिमा   अपरम्पार    ।    
 
महिमा अपरम्पार शक्ति मां ,     प्रभापुंज   मन   मोहे     ।   
अष्ट भुजा धारी छबि निरखौ      सुख सागर  जग भोहे       
धनुष बाण गद खडग त्रिशूला       आयुध   अति संहारक  । 
  शँख चकृ  परिधी   कर डमरू       ,  मुद्रा शांति प्रदायक     
निरजन वन खग कलरव भारी ,    गर्जन   केहरि शावक    
  शंख धुनी बाजत असरारी    ,    दूजन हिरदय विदारक   । 
भगतन हिरदय सुखद अनुभूति ,सुखद भाव सुख कारक  । 
”गुपाल” शरण लीन  महतारी ,करहु किरपा  निज बालक ।  
नारी शक्ति परिचायक                अनूठे तेरे  शायक  । 
अदुभुत माँ शक्ति स्वरू            सभी भूपन तू  भूप   ।  
 
 
अर्थ :————-

 

शेर  के गले में फूलो की ;माला शोभायमान हो   रही है ,
उसकी कमर परमाँ दुर्गे का  सिहासन तैयार है। लेकिन
माँ शिला के आसान पर विराजमान है ,    उनका यश
अपरम्पार  है ।     जिसको  कोई  नहीं  जान  सकता।
शक्तिशाली माँ दुर्गा दीप्ती से मन मोहित  हो रहा है।
आठ भुजाओं वाली माँ की छबि  देखकर  संसार सुख
से  भर जाता है । उनके  हाथों  में  धनुष  बाण , गदा ,
तलवार,  त्रिशूल  आदि  संहार   शस्त्र  है । शंख चक्र
 परिधी   हाथों  मैं  शोभा  दे  रहे  हैं । माता  की मुद्रा
शांति  प्रदायक  है  निर्जन  वन  मैं  पक्षियों का भरी
कोलाहल  है  सिंहों  के बच्चे  खेलते  हुए गर्जना कर
 रहे हैं ।  उनकी  शंख ध्वनि जब लगातार बजती है।
 तो  दुष्टों के ह्रदय घबरा जाते हैं । , भक्तो के ह्रदय
 में  आपके  होने  की  सुखद  अनुभूति  होती है एक
प्रकार  का  सुखद  भाव   लेता है ।  और वे सुख को
धारण  कर  सुखी  हो जाते    हैं  हे  माँ  इस गोपाल
ने  आपकी  शरण ली  है आप अपने बालक पर कृपा
कीजिये ।
हे  माँ  दुर्गे  शक्ति स्वरूपा  आप  नारी शक्ति   का
जीवंत   उदाहरण  हो   तुम्हारे  बाण    अनोखे  हैं ।
हे  माँ  तुम  शक्तिशाली  हो  और  समस्त राजाओं
 की  राजा  हो  ।

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