— गोपाल माँ सरस्व्ती वन्दना :——

         [   स्तुति १ ]
अनुकंपा  मातेस्वरी        ,    धरौं   तुम्हारौ        ध्यान  । 
 
सदविचार   सदभावना   ,   हो     हिरदय     सदग्यान   । 
 
हिरदय में सद्ज्ञान सरन जग      , लीनी मात      तुम्हारी  । 
वीणावादिन हंसवाहिनी              , तू    ग्यानीं  महतारी    ।   
मुठठी भर भर बांटे मैया           ,  दै    गुपाल सुत बारी     ।  
निरमल मनदात्री दृष्टी अब       ,  हार  चरन पै  डारी  । 
मंद मूढ़ मती जानूं  नहीं           ,  के      विधि  कीरत गाऊँ ।  
बालक जान देउ  महतारी        ,    श्रद्धा प्यार      मनाऊँ    । 
 लै पकर  बाँह अब  तू  मेरी ।  कृपा सों भर दे ना झोरी       ।  
सदाहि ध्यान धरों मैं तेरौ  । अक्षर अक्षर कर गुपाल फेरौ   
 
अर्थ  :—–
  हे सरसवती  माँ तुम्हारा  ध्यान लगाता हूँ  ।  तुम्हारी ,
कृपा सदां मुझ पर बनी रहे  ।   मेरे मन मैं अच्छे भाव  ,
 जागृत हों ,अच्छे ही विचार आवें  ।  तथा सद्ज्ञान का 
उजाला हो ।  हिये मैं सच्चा ग्यान जगत मैं सदा  हो ।   
मैंने आपकी  ,शरण   ली है  ।   हे बीणा   बजाने वाली ,
हंस पर सवारी करने वाली , तू  ही  सारे  संसार   के
ज्ञानियों की माँ है ।   हे माँ मुठ्ठी  भर भर ,कर सबको
ज्ञान बांटती है ।  अब मेरी बारी  आई है ।   हे निरमल ,
मन वाली मैंने नज़र तेरे चरनों पर डाली है ।   हे मन 
मैं मंदबुद्धि   , अज्ञानी ,तुम्हारे गुणगान    कैसे करूँ । 
 समझ मैं नहीं आता   ।  हे माँ  मुझे अपना बालक
 जानकर दे दो  ।   मैं प्यार से  तुझे      मनाता हूँ   । 
 हे   माँ तू मेरी बांह पकर ले  ।  मेरे सिर  के ऊपर अपने
 ज्ञान क़ी कृपा कर दे छान ,तान दे  ।   मैं तेरी जय 
बोलता हूँ ।   सदा   मैं तेरा ही         ध्यान रखूँ   ।  
जो ,अक्षर मैं   लिखूँ  ।       उसको एक बार 
आप  परख लो   ।  
        [     स्तुति २   ]
 हाथ जोड़ विनती करूं ,    हंस वाहिनी मात ।
खोलौ मेरे ज्ञान पट ,    जानौ सेवक    तात ।
जानौ सेवक तात जगत मां  ,  ज्ञानमूर्ति  को  तोसो ।
बहुतक ग्यानी सुमरें तोही,  न याचक कोइ  मोसौ ।
ज्ञान और विज्ञानं बसे हिये,   सुनले  विनती मेरी ।
शब्द शब्द हो गूढ़ ज्ञानअति   जननि दया हो तेरी ।
शांत चित्त सों लिखूँ जो देउ , पठक अंगीकार करें  ।
ज्ञानेश्वरी गुपाल लेखनी ,     बाधायें सब पार करें ।
 
मात परसूं चरण तुम्हारे ।   खोल किरपा के द्वारे ।
 
 अर्थ :—
– हे सरस्वती मां , हे हंस की सवारी करने वाली
तुम मेरे अज्ञान के बंद दरवाजे को खोल दो जिससे
मैं ज्ञान के प्रकाश से आलोकित हो जाऊँ मेरी
आपसे हाथ जोड़कर विनती है ।ऐसा मुझे अपना
पुत्र समझ कर कर दो । तू संसार के ज्ञान की मातृ
स्वरूपा हो । मेरे हिरदय मैं ज्ञान और विज्ञानं का
वास हो । आप मेरी विनती सुन लो ।  मेरे   शब्द
शब्द मैं अत्यंत गूढ़ ज्ञान छुपा हो।    हे माता मेरे
ऊपर दया करो मैं जो कुछ भी लिखूँ वह शांत चित्त
से लिखूँ । वह ऐसा हो जिससे उसे     विद्धान लोग
स्वीकार कर सकें । हे ज्ञान की ईश्वर गोपाल की
लेखनी की  जो   भी समस्याएं हैं उन्हें दूर कर दो
मैं तुम्हारे चरणों को  पकड़ता हूँ ।आप अपनी
कृपा का दरवाजा मेरी
 ओर खुला रखो।

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