गोपाल खाटू श्याम  वंदना

 गोपाल खाटू श्याम  वंदन
        [ १ ]
        महादानी  महादयालु     आन बान पहचान।
      खड़ा  द्वार तेरे प्रभू      आशा मैं  वरदान  ।
आशा मैं  वरदान    हार कर    ,     स्मृति प्रभू यदुवर की ।
सभा सन्न महाराज  युधिष्ठर,     शीश दान अप्रतिम की    ।
 जगत भयो ना दान  दिवैया   ,  खाटू    नरपति    तोसौ ।
याचक ,भिक्षुक   बहू मिल जावें   , हारौ  मिलै  न  मोसौ ।
टूट गयी सब आस सहारौ          लीनों तो   चरनन कौ  ।
हिले न मन विस्वास हमारौ      ज्यों  चातक मेघन कौ ।
मैंने सरन लई है तेरी                 भरदे     मेरी  झोरी   ।
  जन्म जन्म ऋण मुक्ति पाऊँ  ,  गुपाल   धन  हो ढेरी  ।
  सदां अब  ओर निहारूं    ।   चरन   हरि   आशा डारूं ।
दान मोहि देउ   स्वामी     ।   कहाँ     तोसौ आसामी ।
गद्यार्थ :–

 

 

हे महान दान देने वाले , बड़े दयालु और अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहना ही जिनकी पहचान ऐसे प्रभु यह गोपाल आपके दरवाजे पर कुछ माँगने हेतु उपस्थित हुआ हूँ। पूरी तरह हारकर भगवन श्रीकृष्ण एवं आपके दान की याद मुझे है। आपने जब अपना सिर काटकर उन्हें दे दिया था तो महाराज
युधिष्ठिर की सभा एकदम सन्न हो गयी थी।

 

आप जैसादान देने वाला मैंने कोई नही देखा।  तुम्हे बहुत से भिखारी , मिलते है । पर मेरा जैसा हारा हुआ आपको नही मिलेगा ।जिसका कोई ,सहारा नहीं है। जिसकी सभी आशाएं टूट गयीं हैं। मैंने आपके चरणों का , सहारा लिया है ।  मेरा विश्वास नहीं टूटना चाहिए । जैसे चातको .को ,मेघों का रहता है  ।
हे प्रभु मैंने आपकी शरण ली है ।  मेरी   खाली    झोली ,
 भर दो। माता पिता गुरु पत्नी पुत्री पुत्र मित्र अमित्र समाज
संसार सबका कर्ज  चुका दूँ । और मेरे पास ढेर सारा
आनंद धन  बच जाये।
हमेशा मैं आपकी ओर देखता रहूँ । आपकी शरण आया मैं
आपके चरणों की ,ओर देखता हूँ ।आप मेरे को अवश्य देना।
 आप जैसा देने वाला मैने कोई नहीं ,देखा ।  आप ही देने मैं
समर्थ हो ।………….
    [   खाटू श्याम वंदना २  ]
हारा   मैं   लीनी , शरण           हे  खाटू      प्रभु  ,  श्याम    ।
प्रणपाली प्रण सुमर लो                 हारे    दाता       राम    ।
हारे    दाता   राम घिरीं  जग                 सारी  गैल   हमारी।
   हित चिंतक  दुनियाँ सब झूंठे       छोड़ी      मोर    पिछारी   ।
कारज   सरै   न  बिना   आपके,     विपत   शीश पै ,  भारी   ।
हारे  को    तुम विजय  प्रदायी        असरन   सरन     मुरारी ।
  घटोत्कच्छ  मौर्वी नन्दन              पांडू    वंश      अधारी    ।
 मात हिडिम्बा भीम बली बल       कुन्ती तनय     बिहारी     ।
दान प्रभू  किसब     पुरानौ
गुपाल  जग जीता जानौ
 सुनौ मेरी  टेर  स्याम जी।
      हारे  जय तुमही राम  जी ।
 

अर्थ  ;—————-

 

 

हे खाटू के श्याम मैं संसार से हार गया हूँ,निराश हो गया हूँ  ।
  और मैंने आपकी शरण ली है ।   हे   प्रभु  हारे व्यक्ति को
 जीत दिला देने के प्रण की अमरता चाहता हूँ ।  ताकि मेरी
भी जीत हो जाये ।
हे जीवन के हारे हुए ,निराश हुए मनुष्यों के जिताने वाले श्रीराम मेरी आशा के   सारे  रास्ते बंद हो गए हैं । संसार मैं अपने सभी शुभ चिंतक झूंठे सिद्ध हो गए हैं ।    सबने मेरे से पीछा छूटा लिया है ।
मेरे को ऐसा लगता है मेरा कोई कार्य बिना आपके सिद्ध नहीं होगा ।  मेरे ऊपर इतनी बड़ी विपत्ति आ गयी है ।हे प्रभु आप उन मनुष्यों को भी शरण दे देते हैं ।  जो संसार से पूरी तरह निराश हो गए हैं । उनको आप विजयी बना देते हैं  ।
हे घटोत्कच्छ मोर्वी माता
के पुत्र तुम पृसिद्ध पांडव वंश के आधार हो । तुम कुंती के पुत्र
भीम की वंश वेल अपने दादा दादी भीम और हिडिम्बा की
संतान हो । निराश और हारे हुए पर दया दिखाना आपका
 स्वभाव है । असहाय लोग आपकी कृपा से जीता ही जान लो ।
 तुम मेरी पुकार क्यों नहीं सुनते हो।  निराश और हारे मनुष्य
की विजय के राम तुम हो ।
          [  खाटू श्याम भजन १   ]
मैं तो    जीतूँगा    प्रभू स्याम ,   जय श्री बरने     आया  हूँ ।
  हारी बाजी जीती  होगी          छत्र छाया    प्रभु     पाया  हूँ ।
  पकर बाँह लो नाथ हमारी     स्वार्थी    जग ठकुराया      हूँ ।
हे हारे के अमर सहारे                 सुयश  तेरा सुन  आया   हूँ ।
सारे जग मैं घूम घूमकर           प्रभू   दान     वीर  पाया  हूँ  ।
निशिचित हार जीत  बदलेगी   अटल   आभास  फुलाया  हूँ  ।
परख कीन भारत श्री माधव      कीर्ति   वही   चितलाया   ,हूँ  ।
  मन क्रम वचन  हेतु न्यौछावर   शीश  प्रभू दान  लुभाया  हूँ  ।
मात  हिडम्बा भीम  सुनाती          पंडान   वंश  ,लुभाया   हूँ   ।
घटोत्कच्छ मौर्बी सुत ,प्यारे       जय जय करने आया     हूँ  ।
अमर अटल प्रण पालक स्वामी  ,  द्वारे हारा       आया  हूँ      ।
 गुपाल  दाता   श्याम   बिधाता  ,     खाटू ,आ   हरषाया हूँ   ।
अर्थ  ;—————-
हे खाटू नरेश मैं आपके पास आगया हूँ सो विजय निश्चित है ।मेरी संसार मैं होने वाली पराजय हार अब  निश्चित ही जीत मैं बदल  जाएगी  क्योंकि   मुझे आपकी  कृपा  प्राप्त  हो  गयी  है ।
हे श्याम,जी मेरा हाथ कसकर पकड़ लेना मैं संसार की ठोकरें खा चुका हूँ । हे हारने वाले मनुष्य के सहायक मैं आपकी
कीर्ति बड़ाई सुनकर आया हूँ।
मैं सारे संसार मैं घूम चुका हूँ। तब आप दान दाताओं के स्वामी श्याम जी मिले हो । मेरी निश्चित होने वाली हार विजय मैं बदलेगी ।  इस आभास के कारण  मैं फूला नहीं समा रहा हूँ ।
आपकी परीक्षा महाभारत   काल मैं योगेश्वर श्रीकृष्ण ने ली थी । मुझे आपका वही यश  याद है । आपके मन शरीर सबआपके प्रण हेतु समर्पित हैं। आप द्वाराकिया गया  शीश का  दान  मुझे लुभा  देता  है ।
   घटोत्कच्छ और     मौरवी माता  के यशस्वी     पुत्र हे श्याम जी मैं आपकापूजन करने आया हूँ ।       हे अटल अमर प्रण पालने  हे खाटू नरेश मैं आपके द्वार पर आया हूँ ।  हे  गोपाल     के दाता  हे श्याम जी मैं आपके अदभुत दान से हरषाया है ।

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