गोपाल बजरंग वंदना

 
अष्ट सिद्धि नवनिध  जग दाता   जय हो जय हो तेरी          
फाल्गुन सखा गुपाल  सहारे      भर दो  झोली  मेरी          
 
गद्य अर्थ :—-
 
हे मनुष्य को सभी आठ   सिद्धियां अणिमा  महिमा
गरिमा लघिमा  प्राप्ति पराक्रम्य  इसतव  वसित्व
तथा नौनिधियों हादी कादी वायुमन सिद्धि मदलसा
कनकधर  प्रक्य साधना  सूर्यविज्ञान  विद्या प्रदान
करने      वाले आपकी जय जयकार  हो  ।
हे महा धनुर्धर  अर्जुन के परम मित्र सहायता करने
  वाले श्री हनुमानजी मेरी रिक्त झोली को आप पूर्ण कर   दीजिये    ।
 
बचपन खेलत मुख रवि लीने   जनजीवन  सुखदाई     ।
अंधकार युत सृष्टि  भई सब      मनुज जीव   घबराई    ।
देवन विनती मुक्त दिवाकर       प्रभा पुंज उजियाई     ।
उछल कूद बन क्रीड़ा शापित     बिघ्न तपस मुनिराई ।
राम भक्त हनु जान मुदितमन      ऋषि  संत समुदाई  ।
गद्य अर्थ :—-
आपने संसार को सुख देने वाले भगवान सूर्यनारायण
को बचपन मैं अपने    मुख मैं ले लिया । जिससे  सृष्टि
की चिंता करने वाले देव मनुष्य घबरा गये देवताओं के
प्रार्थना करने पर आपने  ज्योतिपुंज  भगवान भाष्कर
को छोड़  दिया ।  उनके प्रकाश
से सृष्टि पुन प्रकाशित  हो गयी अंधकार का नाश हो
गया।  बचपन मैं अत्यधिक   बलशाली होने कारण
जंगलों मैं उछल कूद खेलने के कारण  तपस्वियों
संतों मुनियों के क्रोध से आप शापित हो गये ।
 मुनियों ने भगवान श्रीराम का भक्तजानकर   सभी
संत   मुनि  प्रसन्न    हुऐ ।
आयुष कौशल स्मृति दीनों  ,      बिधना मुनि मति फेरी    ।  १   
गद्य अर्थ :—-
और आपको अपना पराक्रम बल  स्मरण  दिलाने      पर  
पुनः  याद आने का आशीर्वाद दे  दिया 
अमित विक्रमा अंजनी नंदन    महावीर  भयहारी   ।
वायुपुत्र रामेष्ट श्रेष्ठ्तम            संतन मीत सुखारी।
हनुमान पिंगाक्ष उदधिक्रम      गुणवन्ता गुणधारी ।
पवनपुत्र दसग्रीव दर्पहा            मात अंजना प्यारी ।
प्रतिउपकार करों का महाबल     श्री रघुवीर उचारी  ।
गद्य अर्थ :
-हे माता अंजनी के पुत्र हनुमान जी आपकी कोई सीमायें
नहीं हैं आपअसीमित पराक्रम के धनी  हो आप वीरों मैं
शिरोमणि तथा मनुष्य के प्रकार के भय को दूर करने हो।
हनुमान जी आप वायुपुत्र हो रामेष्ट  हो ।
 आपसे   कोई भी श्रेष्ट नहीं  है आप सर्वश्रेष्ठ हैं आप संतों
के मित्र हो और उन्हें सुख देने वाले हो । हे  हनुमान जी हे
 पिंगाक्ष [ भूरे लालिमा लिए नेत्रों वाले ] आप क्षणभर मैं
विशाल समुद्र को भी लांघने मैं समर्थ हो आप बहुत ही
गुणी  गुणवान हो तथा गुणों को धारण करने वाले हो।
हे पवन पुत्र  हे प्यारी माँ अंजनी के पुत्र आप विश्वविजयी
रावण के घमंड को तोड़ने वाले हो ।  आप द्वारा  किये गए
कार्यों के ही  कारण श्रीरामचंद्र भगवान कहते हैं कि
हनुमान हे महाबली मैं तुम्हारा उपकार कैसे करूँ मुझे
ऐसा मार्ग  भी  नज़र नहीं आता है ।
माता सीता शोक विनाशक     मेरी  चिंता   तेरी        २  
गद्य अर्थ :—- 
श्री जानकी माता के   शोक   को     नष्ट करने वाले     शोक
विनाशक  चिंता निवारण हनुमान जी   अब  मेरी  समस्त
चिन्ताएँ आपकी हैं ।
हितपालक हितसाधक ज्ञानी        जग प्रसद्धि  चतुराई       ।
अनुपम अदभुत बुद्धि   कौशल    सुग्रीव   राम   मिलाई       ।
बालीशत्रू      मीत सुग्रीवा              रघुनायक  रघुराई         ।
सुग्रीव राज तिलक  लक्ष्मण कर     जनता जय जय गाई   ।
बजरंगी हनु काज अनूपा                जनजन   देत  बधाई    ।
गद्य अर्थ :—- 
हे हनुमान जी आप संसार के कार्यों मैं  दक्ष  चतुर हो  । आप अपने
 मित्रो के हितों को साधने वाले हो । हितों को पालने मैं समर्थ हो
आप अदभुत ज्ञानी हो  । श्री राम व श्री सुग्रीव की मित्रता आपकी
अदभुत     बुद्धि  कौशल का परिणाम थी जिसके  परिणामस्वरूप
  श्रीरामचन्द्र   जी सुग्रीव  के   मित्र  बन  गए  एवं उनके बड़े भाई
वानर राज बाली    उनके शत्रु  बन गए  ।सुग्रीव जी का राजतिलक
श्री लक्ष्मण के द्वारा हो गया ।     जनता ने सुग्रीव जी लक्ष्मण जी
 हनुमानजी की जय जयकार की ।  हे हनुमान बजरंगवली तुम्हारे
कार्य बहुत ही अनोखे हैं   सारी जनता तुम्हें बधाई देती है 
किष्किन्धा घर घर करवाई          कौशलेन्द्र जय भेरी       । ३ 
गद्य अर्थ :—-
 हे   हनुमान   जी   आपने    किष्किंधा   की  राजधानी मैं
अयोध्यापति  श्री  रामचंद्र  की  जयजयकार  करवाई  थी    ।
राज कुटुंब एक कर  दीनों       कीने     सभी सुखारी        ।
तारा पटरानी पटरानी           शोक नाश  अपढारी          ।
श्री अंगद युवराज बनाये       आपद समय विचारी         ।
शांति परम नगर हनु कीनी     उत्सव  हों मनहारी          ।
राजकाज सुग्रीव मगनमती     सेवा  हनु स्वीकारी           ।
गद्य अर्थ :—-
हे हनुमान जी आपने पूरे  किष्किंधा के राजपरिवार को एक कर
दिया और पूरे परिवार को सुखी कर दिया । तारा को सुग्रीव की
पटरानी बनाकर बालीबध से उत्पन्न राजशोक को ख़ुशी मैं बदल
दिया  आपदा    आपत्ति  के निराकरण हेतु आपने श्री अंगद को
युवराज बनबा  दिया हे  हनुमान जी आपने  नगर मैं परम
शांति  कर दी है ।  और शहर मैं मनोहारी उत्सव करबा
दिया होने श्री सुग्रीव राज काज  मैं मगनमति हो गये।
 और अपने अपने प्रभु श्री राम की  सेवा
स्वीकार कर ली ।
 
 
तत्पर स्वयं प्रभू निज सेवा            सेवक काजा देरी      ४ ।
गद्य अर्थ :—
-हनुमान जी आप  अपने प्रभु की सेवा मैं तल्लीन तैयार रहते
हैं तो आप अपने सेवक गुपाल के कार्यों मैं देरी क्यों करते हैं  ।
 
 
क्रोधित लछमन विनती  राघव         सुग्रीव काज विसारी      ।
टेरौ जावौ  प्रिय        बजरंगी            खोजै जनक दुलारी         ।
करी प्राथना    प्राथनीय हरि           बुद्धिमान सुविचारी          ।
लीन साथ  अंगद युवराजा                   सुग्रीव बात सँवारी     ।
जामबंत बलबान तिलक कर                    बीड़ा दीन गहाई।
गद्य अर्थ :—-
श्री सुग्रीव के माता सीता की खोज का कार्य को भुला देने के
कारण श्री लक्ष्मण जी क्रोधित हो गए ।और उन्होंने सुग्रीव के
कार्य भूल जाने के  बारे मैं श्री रामचंद्र जी को बताया  ।
और हनुमान जी को बोला की आप जाकर श्रीसुग्रीव जी को
यह कहो की वे जनक नंदिनीसीता जी की तलाश शुरू तुरंत
करें ।  आपने प्रार्थना करने योग्य अपने प्रभु को विनती कर
मना लिया ।   आप बहुत ही बुद्धिमान हो   आपने अंगद को
को साथ लिया ।  और सुग्रीव की बिगड़ी बात को बना दिया
और जांबवंत जी ने आपको खोज का नेतृत्व प्रदान किया ।
महाबल सुभट वीर बजरंगी        जय श्रीराम  हुंकेरी  । ५ ।
गद्य अर्थ :—-
 हे महाबलेश्वर हनुमान जी बजरंग बली आपने जय श्रीराम
की उदघोषणा की  हुंकार की  अपने लक्ष्य की और चल दिए ।
सुरसा लीन   परीक्षा हनुमत           बुद्धि ज्ञान  हरषाई       ।
लंकिन विकल घनी   हनु बोली       मृत्यु निशाचर आई     ।
भेंट बिभीषण भेंट जानकी             प्रभु सन्देश    सुनाई     ।
देउ जानकी  प्रभु रामजी               हनुमत   नीति बताई     ।
दशकंधर हठ   काल  आगमन          कंचन   लंक जराई     ।
गद्य अर्थ :—-
सर्पों    की   माता   सुरसा   ने  आपकी  कड़ी  परीक्षा  ली
बुद्धि बल व्यवहार से प्रभावित होकर ख़ुशी हो गयी ।लंकिन
ने     विकल होकर आपको राक्षसों का नाश निकट होने की
बात बताई ।आपने विभीषण से भेंट की और आपने  जगत
जननी जानकी कोप्रभु  सन्देश दिया ।हनुमानजी आपने
रावण को श्री सीताजी रामचन्द्रजी को लौटाने को बोला
उसे सही मार्ग  बताया । लेकिन राक्षसराज रावण अपने
हठ के कारण काल को बुला लिया और    हनुमान जी ने    स्वर्ण
आवृत लंका को जलाया ।
छोड़ौ घर प्रभु भक्त विभीषण    जले  सदन  सब  बैरी   ६ ।
गद्य अर्थ :—
-आपने धर्म पर चलने वाले विभीषण के घर को छोड़कर
सभी  के घर जला दिये ।
अहिरावण निज माया   घेरा         रामादल    फैलाई       ।
रूप विभीषण धार निशाचर        लछ्मण राम उठाई       ।
कुलदेवी नर बलि पाताला    ,       रावण भय मिट जाई    ।
प्रगटे महावीर बजरंगी         ,    अहिरावण घबराई          ।
मुक़्त कीन निज प्रभु महावीरा ,   देवी मन हरषाई           ।
गद्य अर्थ :—-
 अहिरावण ने विभीषण का वेश बदल कर  अपनी माया
घेरा भगवान राम की सैना पर फैला दिया । और सोते
दोनों भाइयों को पाताल लोक ले गया  । वहाँ पर उनकी
नरबलि अपनी कुल देवी पर     चढ़ाने की तैयारी करने
लगा।  जिससे उसके पिताजी रावण की जीत हो जाये
और उनका डर समाप्त हो जाये ।
जब देवी की जगह श्री हनुमान जी प्रगट हो गए तो
अहिरावण घबरा गया । हे महावीर अपने अपने स्वामी
राम लछमन को मुक्त कर  दिया जिससे देवी मां ख़ुशी
हो गयी ।
नाश निशाचर अहिरावण      बजी विजय रण  भेरी      । ७ ।
गद्य अर्थ :–
आपने  निशाचर अहिरावण का नाश कर दिया और
विजय की रणभेरी  बज गयी विजयपताका फहराई ।
दुरगम अगम काज हनु कीने      पहुंचे लंका   जाई    ।
जै जै कार हो कौशलेश  प्रभु       रामादल    हरषाई    ।
प्राण प्रदाता   लक्ष्मण भ्राता      सुषेण संजीवन लाई  ।
वानर सैना जोश बाढ़ अति          नायक प्रभु रघुराई    ।
रावण संग फिर युद्ध शुरू कर       जीती  शेष लड़ाई     ।
गद्य अर्थ :-
आपने पाताल मैं  बहुत ही कठिन कार्य कर दिए ।
पाताल लोक से लंका पहुँच गये वहाँ भगवान राम को
देखकर  सारी  सेना जय जयकार करने लगी। आपने
सुषेण  वैद्य  और  संजीवनी औषधि  लाकर  लक्ष्मण
जी के प्राण बचा लिये  ।   श्री रामचंद्र जी को देखकर
बन्दर सेना मैं अपूर्व      साहस का संचार हो गया ।
रावण के साथ फिर लड़ाई शुरू कर युद्ध को जीत
लिया ।
श्री हनुमान महा फलदायक   काज सरत   देरी    ८ ।
गद्य अर्थ :-
श्री हनुमान जी आप तुरंत फल देने वाले हैं आपकी
कृपा से  कार्य होते देर नहीं लगती 
राजाराम बने कौशलपुर          सबकी करी  विदाई         ।
भांति भांति धन  भेट सप्रेमा   बंटबाई       रघुराई         ।
जांबवंत सुग्रीव विभीषण        अंगद नलनिल भाई       ।
अपने अपने पुर सब गबने      हनुमत लीन रुकाई       ।
रामराज कौशलपुर परखौ          मेरे मन हनु भाई        ।
गद्य अर्थ :-
अयोध्या पहुँच कर श्री रामचंद्र कौशलपुर के राजा बन
गये उन्होंने अपने सभी सहायकों विभीषण  सुग्रीव जांबवंत
अंगद नल नील सबको भांति भांति की भेंट देकर सप्रेम से
विदा किया  लेकिन आपको निज शासन को देखने के लिए
अयोध्या रुकने को कहा  ।
रतनमाल निज उर प्रभु  दीनी   हनुमत माला फेरी   ९ ।
गद्य अर्थ :-
श्री रामचंद्र जी ने अपने गले की रत्नो की माला आपको
प्रदान की जो आपको अच्छी नहीं लगी आप उसे अपने
दोनों हाथों मैं निकालने लगे  हे हनुमान जी आप माला
के रत्नों को बदल बदलकर देखने लगे कहीं आपको अपने
प्रभु श्रीराम सीता के दर्शन उन रत्नों मैं नहीं हुऐ ।
नहीं राम प्रभु  नाम   अमोलक     वस्तु न   साधौ    भावै     ।
राम जानकी    सूरत   प्यारी          हनुमत हिये बसावै          ।
राज सभासद हास्य करें हनु             झूँठे   गाल  बजाबै        ।
सीता   राघव हीये     राजें                 काह न हमें दिखाबै       ।
सत्यमूर्ति   सच बोलन हारे            हनुमत जग पतियावै      ।
गद्य अर्थ :-
जिस वस्तु मैं राम प्रभु का नाम न  हो वह वस्तु हे साधु
पुरुषो मेरे  हनुमान जी को अच्छी  नहीं लगती है ।
श्री राम जानकी माता की छबि श्री हनुमान जी को
प्यारी लगती है भगवन राम की सभा के पार्षदों हे
हनुमानजी तुम झूँठ न बोलो  ये बताओ। तुम्हारे
हिरदय मैं क्या प्रभु  राम सीता  विराजते हैं । अगर
ऐसा है तो हमें क्यों न दिखाते  हो
हमेशा सच बोलने वाले सच की साक्षात् मूर्ति हनुमान
जी  की  यह झूंठा  संसार परीक्षा लेना चाहता है।
चीर हिरदय दियौ बीच सभा      जय हरि सेवक  तेरी     १०    ।
गद्य अर्थ :-
अपने प्रभु से अपने प्रेम की परीक्षा देने को श्री बजरंग वली आप
तैयार हो गये और अपने हिरदय को भरी सभा मैं चीर दिया  
लवकुश प्रभु अंश पहचाने          बंधन फिर स्वीकारा      ।
आश्रम निरख जानकी  माता     बही अश्रु दृग    धारा      ।
धीरज धारौ सुत बजरंगी            धीरज जग रखवारा     ।
होनी प्रबल टरै ना  टारे              बिधि गति अपरम्पारा  ।
खोलो बंधन  लवकुश नंदन        हनुमत प्राणन प्यारा    ।
गद्य अर्थ :-
अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को छुड़ाने गये श्री हनुमान जी लव कुश
बनवासी बच्चों को पहचान गये। और तुरंत बंधन युक्त हो गये
आश्रम मैं जगतजननी जानकी को देखकर उनके नेत्रों से अश्रु
धार बंध गयी ।सीताजी आपको देखकर कहने लगी  कि पुत्र
हनुमान जी धैर्य धारण    करिये क्योंकि धैर्य ही संसार का
रखवाली करने वाला है ।संसार मैं जो  होना है वह  बहुत ही
प्रबल है और बिधाता की गति अपरम्पार है ।जिसका पार कोई
नहीं पा सकता वे लवकुश से बोलीं हे पुत्रो ये हनुमान जी मुझे
प्राणों से भी प्रिय है इसके तुम बंधन खोल दो  ।
समय चक्र गति मनुज नचावत               टरै काउ टेरी       १ १ ।
गद्य अर्थ :- 
 समय चक्र की गति मनुष्य को नचाती  है यह किसी के
टारने  से नहीं टरती  है ।
वन अंचल रघुराज आगमन        मर्यादा   जग स्वामी   
त्याग तपस्या राज लक्ष्मी          पगअनुचर अनुगामी 
वाल्मीक हनुमत जग साक्षी       सीता राघव   स्वामी   
राजाराम जनक  लवकुशसुत       अश्वजीत  सरनामी      
जनकनन्दिनी भूदेवी मां                 सब  संसारी  सामी   
गद्य अर्थ :-
निरंतर मिल रहे हार से व्यथित श्री राम जी वन मैं स्वयं आ
गये त्यागतपस्या राजसम्पदा  जिनके पग पग की अनुचर
है दास है सेवक है।      इस घटना के साक्षी ऋषि वाल्मीकि
हनुमान जी माता सीता एवं मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी हैं 
  वाल्मीक जी बोले हे अयोध्या नरेश ये लव    कुश आपके दो
पुत्र हैं जिन्होंने आपके यज्ञ के अश्व [ घोड़े  ]  को जीता है
ये संसार सुने इनकी माता जनकनन्दिनी सीता है 
लवकुश सौंपे कौशलराजा             सीता द्रष्टी     फेरी            १ २ ।
गद्य अर्थ :-  
वाल्मीकि गुरु के कहने पर लव कुश को सीता जी ने श्री राम
को सौंप दिया और अपनी दृष्टि फेर ली ।
पकरि कुँवर रघुनन्दन लीने        स्तुति बाल्मीकि मुनि कीनी    ।
नेह उडेलत पुरुषोत्तमप्रभु               दृष्टि  सीता ओरी     कींनी    ।
सीता सीता राघव टेरत              भूमाता     भूमाता     लींनीं     ।
हाहाकार पिता सुत भारी          अग्नि     परीक्षा दै चल दींनी     ।
अमर भई विदेह कुमारी              बजरंगी जय  माता  कीनी      ।
गद्य अर्थ :-  
दोनों पुत्र लवकुश को हाथ से पकड़ कर वाल्मीक मुनि की स्तुति
कीनी  ।  प्रभु ने दोनों पुत्रों पर प्रेम उंडेल दिया और फिर अपनी
दृष्ट सीता जी की और किया  ।   सीता जी को सिंहासन पर बैठे
भूमि मैं जाते देख श्री रामचंद्र सीता सीता चिल्लाये  । पृथ्वी
माता ने वैदेही को    अपने अंदर स्थान दिया ।  श्री राम जी
लवकुश तथा अन्य उपस्थित लोगों ने रुदन किया  ।  परन्तु
सीता माता तो एक और परीक्षा देकर चल दीं विदेह जनक जी
की पुत्री शरीर को त्याग कर अमर हो गयीं । श्री हनुमानजी ने
माता का उच्च स्वर से जय जयकार किया  ।
भू सों प्रकटी  भू मैं सिमटी    अमर कीर्ति  जग तेरी     १  ३ ।
गद्य अर्थ :- 
सीता जी पृथ्वी से प्रकट हुईं और पृथ्वी मैं विलीन हो गयीं
और अपनी अमर कीर्ति संसार मैं छोड़ गयीं ।
राज़ दीन     युवराजा लव कुश              मुक्त  हुए    रघुराई      ।
त्रेता युग उद्धार धर्म हरी                     सरयू  सुरत  लगाई        ।
तीनों भ्राता सब   दरबारी                    हनुमत चले पिछाई       ।
भगतन सेवा  मेरी सेवा              .       महा पुण्य पुण्याई          ।
धरमी पालन         धरमी   रक्षा          रामकाज बतलाई         ।
गद्य अर्थ :-
लवकुश राजकुमारों को उन्होंने अपना राज्य दे दिया। और वे
राजकाज से मुक्त हो गए त्रेता युग मैं धर्म का उद्धार करके
श्रीराम सरयू के लिए चल दिये। तीनों भाई समस्त दरबारी
                                                           और हनुमान जी उनके पीछे चले भगवन राम बोले
हे हनुमान जी  भक्तों की सेवा  मेरी सेवा है।    और इससे बड़ा पुण्य और
कोई दूसरा नहीं है।  ये   महा  पुण्य है सभी धर्म वालों का
पालन उनकी रक्षा करना मेरा ही कार्य है वह अब तुम्हें करना है ।
हनुमत  ऋणी  अंश   रघुवंशी        ऋणी धरनि रहे तेरी     १ ४ ।
गद्य अर्थ :-
श्री रामचंद्र जी बोले हे हनुमान यह धरती एवं रघुकुल
तुम्हारे  ऋण से मुक्त नहीं हो सकता    ।
पर उपकार तात तुम जीवन     निजहित कबहु  न जानै   ।
बल विवेक युत बुद्धि प्रवीना      हार  न हनुमत   मानै      ।
भूत प्रेत सब   पानी माँगत       हनू     हनू      घबराने     ।
रटो राम प्रभु  नाम  बेधड़क      बजरंगी सुख    मानै       ।
सत्संगी सत्संग सुहामत         परम भक्त पहचाने          ।
गद्य अर्थ :-
हे बजरंगबली हे हनुमान जी आपका पूरा जीवन परोपकार
से भरा हुआ है। आप अपना हित नहीं जानते हैं ।सच्चे
परोपकारी हैं ।
हे हनुमान जी आप परम बलशाली हो परम विवेकी हो आप
परम् बुद्धिमान हो और कभी भी हार मानने वाले नहीं हो   ।
  सभी भूत प्रेत आपके डर से  थर थर कांपते हैँ  हमेशा आप
राम चंद्र जी का नाम लेते हो और हिरदय मैं सच्चे सुख का
अनुभव करते हो   ।
रामचरित मानस लिखवाई              राम नाम प्रभु  लैरी     १ ५ ।
गद्य अर्थ :-  
  आपने  तुलसी दास जी की    सहायता कर
उनसे श्री रामचरित लिखवाई  आपसे अच्छा
रामनाम   रस लहरी कोई और नहीं हो
सकता ।
कलियुग राम नाम रस प्रेमी        राम     नाम   संवाहक        ।
कीर्तन घोर सरस मन  प्यारी        भगतन कष्ट निवारक        ।
संत सहारे  पथ प्रदर्शक               संतन साधक  कारक         ।
तुलसीदास कृपा हनु कींनीं           दरश दीन  रघुनायक         ।
गुपाल” स्तवन हनु बजरंगी          जगतजीत   सुखदायक    ।
 
 
गद्य अर्थ :-
कलियुग मैं रामचंद्र के नाम रस प्रेमी और आप ही रामनाम
को फ़ैलाने वाले हैं । रस प्रदान करती कीर्तन की घोर आपके
मन को बड़ी  प्यारी लगती है और भक्तों के कष्ट हटाने वाले हैं ।
श्री हनुमान जी  है जगत मैं जीत दिलाने वाला है आप    संतों
की साधना के साधक हैं और तपस्या करवाने वाले हैं । आपने
गोस्वामी तुलसीदास पर कृपा की और उन्हें श्री राम लक्ष्मण
के दर्शन करा दिए  गोपाल द्वारा निवेदित हनुमान जी का यह
स्तुतिगान   संसार मैं सुखदायक है जगत मैं संकट नाशक
विजय  दिलाने वाला है ।
गद्य अर्थ :-
गुपाल काज कठिन कछु नांही    पकड़ बाँह तू मेरी    ।१ ६।
गद्य अर्थ :-
हे हनुमान जी मुझ गोपाल का कार्य आपके लिये कुछ
कठिन नहीं हैआप मेरी भुजा थाम लो । आपके सहारा
देते ही मेरे समस्त कार्य हो जायेंगे ।

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