गोपाल – दोहे

इष्ट शोभा रस माधुरी
    गोपाल दोहे से साभार
  [ १   ]
कनक बैनु मेंहदी रची     , अरुण तिलक प्रभु  भाल  ।
बसन बसंती सुघड़ दिपै  ,    मोरमुकुट  वनमाल  ।
अर्थ :–
सोने की वंशी है ,मेंहदी रची है । मस्तक पर
लाल तिलक  लगा है । परिधान बसंती रंग के हैं ।
गले मैं वनमाला पहनी है।    मोर की पँख का मकुट
है । उनकी शोभा अदभुत अनूप है ।
  [   २  ]
जय राधे जय राधिका     , जय राधे घनश्याम     ।
गुपाल निरख लजावहिं   ,कोटि कोटि रति  काम ।
अर्थ :–
        श्री राधे की जय हो ,श्री राधिका की जय हो ।
           श्री राधे घनश्याम की भी जय हो।   गोपाल
           कहते हैं इस प्रिय जोड़ी को देख कर करोड़ों
           रति ,और रति के पति कामदेव भी मिलकर
          युगल श्री राधे व घनश्याम का मुकाबला नहीं
           कर सकते हैं ।  मकुट है ।
            उनकी शोभा अदभुत अनूप है।
         [  ३   ]
 
सदां कृपा      गोपाल    पै  ,   एक  ही मन   अरदास   ।
प्रभू चरनन मनुआ   लगै  ,पुरवौ मेरी           आस     ।
अर्थ :-
हे भगवान तुम्हारी कृपा इस गोपाल पर हमेशा
ही बनी रहे, ऐसी  मन मैं विनती है ।   मेरा मन प्रभु के
चरणों मैं हमेशा लगा रहे ।  आप मेरी इस  आसा  को
पूरा कर दो ।
          [  ४   ]
कृपा वृष्टि करियौ सदां   ,भगतन की सिरमौर ।
गोपाल के अंतर मैं  बसौ ,न देखे कछु       और।
अर्थ :—
-हे भक्तों सबसे बड़ी शक्ति हे राधिके
तुम मुझ पर  अपनी किरपा हमेशा      बनाये
रखना ।   गोपाल  के हिरदय मैं तुम वास करो
।   और ये गोपाल किसी को भी इस संसार मैं
न देखे ।
     [  ५   ]

 

केंद्र बिंदु श्री कृष्ण   जग     , चाल चक्र सोही जान ।
 क्यों भरमत  गोपाल तू      ,   दीन बंधू  भगवान  ।
अर्थ :-
संसार का केवल एक ही केंद्र श्री कृष्ण है ।
समय की चाल चक्र भी वो ही हैं।   गोपाल तू क्यों
भरम मैं पड़ता है ।  दीन बंधू भगवन हैं न ।
        [   ६ ]
सिर सोहहि चाँदी मुकुट       ,  चादर सों भये  ऐक  ।
प्रमुदित मन गोपाल  कौ      ,  बहै प्रेम तजि   टेक  ।
अर्थ :–
राधिका रानी व श्री कृष्ण के शीश पर चांदी का
           मुकुट पहना हुआ है ।  एक ही चादर ओढ़ने से
           ऐसा लगता है ।  कि दोनों एक हो गये हैं ।
           गोपाल मन ख़ुशी से भर गया है ।  उसके हिरदय
            मैं प्रेम उमड़ रहा है ।  सारी बाधाएं दूर हो गयीं हैं ।
  [ ७ ]
पुष्पमालिका ,बैणु कर        , हरि होठंन  सों दूर ।
मनमोहन छबि निरख कर   , मोहित श्री ,भरपूर    ।
अर्थ :–

 

श्री प्रभु ने पुष्पों की माला गले मैं पहनी हुई
है ।      थ मैं वंशी है ।  जिसे मोहन ने मुख से नहीं
लगा रखा है ।  मोहन की मन को मोहने वाली छबि
को ,  देख कर श्री राधिके सम्पूर्ण रूप से मोह गयीं
हैं।
               [  ८ ]
          बाल रूप नीलौ बरन        ,सघन वनी      के     माँहि ।
           कर पकरी शाखा रुचिर   ,    राधे     दीखत        नांहि ।
  अर्थ :—

 

भगवान श्याम सुन्दर का नीला रंग है । वे घने
जंगल मैं हैं।  उन्होंने पीले पत्तों से युक्त सुन्दर शाखा पकड़
रखी है।  श्री राधे  शाखा की ओट मैं होने से उन्हें नहीं दिख
रही है ।
    [ ९ ]
पीत पर्ण पहरे धरा          ,      मनहु     पीत   श्रृंगार  ।
मोहन ,राधे मोहिनी        ,     लखें डार   के    पार      ।
अर्थ :—
– पीले पत्तों से धरती ढकी हुई है ।   मानो धरती ने ,
    पीला श्रृंगार किया हुआ है ।   मोहन श्री कृष्ण व्
  मोहिनी श्री राधिके बृक्ष की डाली के उस पार
          देखने की कोशिश कर रहे हैं ।
      [ १० ]
धारा जमुना की प्रबल     ,       लखि  लखि ले आनंद ।
प्रकति मैं प्रकति पुरूष    ,          राधे        परमानन्द ।
अर्थ :–
जमुना जी की धारा बहुत ही प्रबल है ।   जो युगल ,
  स्वरूप को देख देख कर ,आनंद ले रही है ।   प्रकति
      पुरुष श्री स्याम सुन्दर प्रकृति का पूरा आनंद ले
     रहे हैं ।   परम आनंद प्रदान करने वाली श्री राधे
          उनके  साथ हैं ।
[ १ १ ]

 

चंद्र लजामत देख मुख  ,   कालजयी मुस्कान।
नख शिख शोभा को कहै , लाली इहि ब्रषभानु ।
अर्थ :—-
जिनके मुख चंद्र देखकर चन्द्रमा
भी सरमाता है लाज से भर जाता है। श्री
ब्रषभानु की लाड़ली बेटी के नाख़ून से
लेकर शिखा तक सौंदर्य का बर्णन कोई
नहीं कर सकता है।
[ १ २  ]

 

 

वशीकरण श्री श्याम प्रभु , विनती मम पुरजोर।
युगल रूप हिये बसत      ,  नाचै मो मन मोर ।
अर्थ :—-

 

हे राधिके स्वामिनी तुम मेरे श्याम सुन्दर को
वश मैं करने वाली हो आपसे मेरी पुरजोर प्रार्थना
है । विनती है आप दोनों की जुगल जोड़ी मेरे
हिरदय मैं स्थान ग्रहण कर ले।  जिससे मेरे मन
रूपी मोर नाचता रहे ।

 

 

[ १ ३  ]

 

 

बरखा होइ हरिकृपा ब्रज   , गोवेर्धन के माँहि।
गोपाल मूरख प्राणि वे      , वहाँ पहुँचत नांहि।
अर्थ :—-

 

 बृजगोवेर्धन मैं गोविन्द की कृपा की
वर्षा होती रहती है गोपाल कहते हैं  वे प्राणी
मूर्ख हैं जो वहाँ परिक्रमा करने नहीं जाते हैं ।
[ १ ४  ]
सुन्दर अदभुत धरनि ब्रज, अदभुत   रज घास।
कालिंदी जलधार सों    , अविरल जीवन आस।
अर्थ :—-
बृज की धरती रेत घास बहुत ही अनौखी
अनुपम है और वृज मैं बहने वाली यमुना जी की
धारा बृज मैं जीवन की आशा जगाये रखती है
[ १ ५  ]

 

सहन  शीलता शिला सी , पग पग ज्यों पाषाण।
नारी सृष्टि शक्ती गति ,   नारी सृष्टि जान   ।

 

अर्थ :–
-नारी सहनशीलता की मूर्ति है जैसे पत्थर
की शिला होती है उसके पैर पत्थर की तरह मजबूत हैं
नारी संसार मैं शक्ति रूपिणी है और नारी ही संसार
]की गति है नारी संसार की प्राणस्वरूपा है प्राण हैं ।
[ १ ६  ]

 

 

हारी कबहू न पुरुष सों ,      हारी  याते   हार    ।
प्राण जगत गुपाल एहि , शक्ति सिरजनहार  ।
 अर्थ :—- 

 

यह पुरुष से कभी भी नहीं हारी है।
उससे खुद हार भी हार गयी गोपाल कहते हैं।
यह नारी ही संसार की शक्ति है ।वह ही इसकी
उत्पन्न करने वाली है ।

 

 

 

[ १ ७  ]

 

 

                                                    चिंता चिंतक व्यर्थ सब युगल नाम जग सार।
                                                      हरि सुमरन जीवन सदा प्रिया जीवनी धार  ।

 

                                                                                    अर्थ :-
                                    चिंता करने वाले तेरी सभी चिंताएं अर्थहीन है बिना मतलब की हैं।
                                   संसार मैं श्री राधेकृष्ण का नाम ही सार  है। श्रीकृष्ण जी का स्मरण
                                       अगर जीवन है तो प्रिय राधिके जीवन की  जीवनी  हैं  ।

 

[ १ ८   ]
                                                        गुपाल ‘ ओट गोपी खड़ीं  चितवत नंदकिशोर।
                                                             श्री राधे अपलक लखत   नैना रुचिर चकोर  ।
                                                        अर्थ :–कदम्ब की आड़ मैं खड़ी गोपी भगवान
                                                      की  सूरत निरख रही हैं श्री राधिके बिना पलक
                                                     मारे अपने प्रियतम को देख रहीं है अपने सुन्दर
                                                          नेत्रों से अपने चकोर को देख रहीं हैं।
[ १ ९    ]
                                                     वनमाली ब्रजराजप्रभु  नटनागर श्रृंगार       ।
                                                      कालिंदी तट कदम्ब तरु ढूँढ़त ब्रज सुकमारि।
                                                अर्थ :– बृजराज श्री गोविन्द वनवासी नटनागर
                                                रूप मैं सजे हैं। श्रृंगार किया हुआ है। वे ब्रजमंडल
                                                    के बृक्ष कदम्ब के नीचे श्री यमुना जी के किनारे
                                                    खड़े हैं और ब्रज की सुकमारियों की राह देख रहे हैं।

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