गोपाल दोहे साधु संत महिमा

[ १ ]
ज्यों पावस ऋतू होंत , जग नदी नाल स्नान।
अपढारे संतन चरण  ,     मान प्रभू  वरदान।
अर्थ :——
जैसे वर्षा ऋतू आने पर संसार के सभी
नदी नाले अपने आप पानी से भर जाते हैं ।उनका
स्नान अपने आप ही हो जाता है ।अपने आप मिलने
संत पुरुषों के चरण पड़ना भगवान के आशीर्वाद
वरदान जैसा ही है।
[ २ ]
कृपा वृष्टि जानों वचन , शब्द शब्द गह लेउ।
सेवा निज कर करऊ    ,  सब तीरथ कर लेउ।
अर्थ :——संतो की वाणी से निकले वचनों ,
को आदमी को आत्मसात कर लेना चाहिए।
हर शब्द को सुनना चाहिये ,संतों की सेवा
करने से सारे तीर्थ करने के समान है।
संतों की सेवा करने से सारे तीर्थ करने
के समान है।

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