गोपाल दोहै सफलता मूल मंत्र साहस

[ १ ]
साहस उन्नति मूल जग         , साहस विजय अधार।
बिन साहस का जीवनों           ,      बिन  हारेहू  हार ।
अर्थ :—–
साहस उन्नति की जड़ है ।और साहस ही
विजय प्राप्त करने का रास्ता है।  बिना साहस के
मनुष्य का जीवन नहीं है ।साहस न होने पर मनुष्य
को हार न होते हुऐ भी हार का अंदेशा होता है  ।
[ २ ]
साहस जिन नर कर लियौ     ,कीने  दुष्कर काज।
साहस हीनंन नें जगत           ,   पाई  भारी  लाज ।
अर्थ :—-
जिन मनुष्यों ने साहस किया । उनने संसार के कठिन
कार्य कर डाले जिनने साहस नहीं किया। उनको हमेशा
शर्मिंदगी उठानी पड़ी ।
[ ३ ]
साहस सों श्री राम प्रभु        , तोडा    धनुष प्रचंड।
सीता वरण सुमंगलम        , पायौ सुयश अखंड ।
अर्थ :—-
साहस के कारण श्री राम प्रभु ने श्री शंकर
भगवान का धनुष तोड़ दिया। और जनक नंदिनी
सीता से विवाह कर मंगल किया ।    कभी भी न
समाप्त होने वाला यश प्राप्त किया ।
[ ४ ]
साहस सों श्रीराम प्रभु ,       ,  सागर दीनों  बाँध।
वानर सेना सैनानायक       ,   तोरी   लंका  मांद।
अर्थ :—-
वानरों की सेना के सेनापति श्री राम ने
सागर पर पुल बनाकर लंका दुर्ग को फ़तेह क़र
लिया जीत लिया ।
[ ५ ]
केवल साहस सों लड़त,     ,  संग भालु कपि वीर।
त्रिभुवन विजयी हु मरयौ  ,  रावण सौ   रणधीर।
अर्थ :-
केवल साहस बन्दर भालुओं के साथ लड़ते
हुए उन्होंने संसार जीतने वाले योद्धा रावण को
मार डाला ।
[ ६ ]
साहस औ संकल्प दृढ          ,मानव जग   वरदान।
जिन जीवन मैं उतारे         ,   कीने काज   महान।
अर्थ :—-
साहस और मनुष्य द्वारा लिया गया संकल्प संसार
हेतु वरदान हैं जिन्होंने अपने जीवन मैं आत्मसात
किया उन्ही लोगों ने संसार मैं महान कार्य किये  ।
[ ७ ]
यश प्रशस्ति साहसी       ,             भारी  दुनियाँ  बीच।
लवकुश साहस निरख हरि,              लीनी ऑंखें मींच।
अर्थ :—-
साहसी लोगों की दुनियां मैं बहुत बड़ाई है लव
कुश का साहस देखकर स्वयं श्री रामचंद्र ने अपने नेत्र
बंद कर दिए ।
[   ८   ]
साहस श्रम संकल्प नर    , दीनों तन जिन होम,।
धरती सागर मथ दियौ   ,    हारयौ उनते व्यौम।
अर्थ :—-
जिस मनुष्य ने मेहनत साहस संकल्प
अपना लिया और अपना शरीर झोंक दिया । और
उसने इस पृथ्वी समुद्र अंतरिक्ष को भी जीत लिया ।
[ ९ ]
लगी लगन  नर हिये बिच ,   साहस   है पतवार।
क्यों डूबे नैया भँवर          , जब खुद  खेवनहार ।
अर्थ :—-
जिस मनुष्य के लगन लगी है  और जिसे
साहस रूपी पतवार का सहारा है । उसकी नाव भंवर
मैं क्यों डूबेगा ।
[ १० ]
बालापन साहस विकट     , मारे   दनुज तमाम।
योगेश्वर श्रीकृष्ण प्रभु     , अजहु धरा पै नाम ।
अर्थ :—
-भगवन श्रीकृष्ण ने साहस  के बल पर
बहुत से दुष्टों को मार दिया । उन योगेश्वर
श्रीकृष्ण का धरती पर अभी तक नाम है ।
[११ ]
अटलनिष्ठ संकल्प प्रिय , साहस धनु   तूणीर।
लक्ष्य भेद अति सुगम नर  धरनीधर जग  वीर।
अर्थ :—
-जो अपने संकल्प पर दृढ हैं तथा जिनके
पास साहस के धनुष बाण हैं ऐसे लोगों के लिए
अपना लक्ष्य प्राप्त करना अत्यंत आसान है।
उनके सहारे ये धरा टिकी है वे इस धरती के वीर
हैं ।
[ १२ ]
कछु नहिं    अप्राप्त जग , रचना तो हित लाग।
कर्मण कुंजी खोल दे       ,  फूटें    तेरे      भाग।
अर्थ :—
-पूरे संसार की रचना तेरे ही लिए की गई है।
संसार सब वस्तुएं प्राप्त होने योग्य हैं। तेरे कर्मों की
चाबी से तेरे भाग्य का दरवाजा खुल जायेगा ।
[ १३ ]
भाग बनाये बनत जग ,       साहस गारौ डार ।
इच्छा शक्ती ईंट चिन , गढत उन्नति द्वार ।
अर्थ :—-
साहस से भाग्य बनता है इच्छा शक्ति
से बनी ईंटों से साहस का गारा कीचड़ से मनुष्य
की उन्नति का द्वार का निर्माण होगा  ।साहस से
भाग्य बनता है ।इच्छा शक्ति से बनी ईंटों से साहस
का गारा कीचड़ से मनुष्य की उन्नति का द्वार का
निर्माण होगा ।
[ १ ४ ]
करम युद्ध अविरल करो    , लक्ष्य न ओझल होय।
असफलता हो सफलता       , काज अवश जग होय।
अर्थ :—
– कर्म रूपी युद्ध को लगातार करते रहना
चाहिए ।और लक्ष्य को आँखों से ओझल नहीं होना
चाहिए ।

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