गोपाल ‘कृष्ण सौंदर्य बर्णन

                                          [ १ ]
शोभा श्री ब्रज राज प्रभु  ,           अनुपम ललित अनूप ।
मोर चंदवा मुकुट सिर  ,          सब जग भूपन      भूप ।
सब   भूपन जग भूप   कहै को          , झांकी  मोहन       प्यारी   ।
बिहरत फूलन बीच जमुन जल         ,   पीताम्बर पट     धारी     ।
रूप  अनूप रंग स्याह  कारॉ             ,   मोटे नैन  सुखारी            ।
लम्बी    बांह      केसरी काँधे         ,      बाजूबंद कनक मनहारी  ।
                                 चन्द्रानन उन्नत ललाट अति           ,               ग्रीवा लपकारी   ।
                                कोटन      काम    पसंग  लगें  न      ,   सोहत        मदन  मुरारी  ।
                                कहै  को  रूप  अनूठौ                      ,     लगै  मोहै   जग     झूँठौ ।
                                भजे बिन नांय सरैगी                      ,        गुपाल काहे  बिगरैगी ।
भावार्थ :—-
श्री कृष्ण की शोभा बहुत ही अनौखी अदभुत है ।
मोर पाँख का चँद्रमा उनके सिर पर शोभायमान है वह सारे
संसार के राजाओं के राजा के सिर पर मुकुट के रूप मैं
शोभायमान है ।
प्रभु के स्वरुप की जो छटा है ।वह मन को अत्यंत प्यारी लगने
वाली है। पीताम्बर पटुका शरीर पर धारण किये हुए श्री बृजेन्द्र
यमुना जी के पानी मैं विहार कर रहे हैं ।उनका रंग एकदम काला
है ।उनके मोटे २ नैनों की दृष्टि सुख बरसाने वाली है  । उनका
चन्द्रमा जैसा तेजस्वी मुख तथा ऊँचा ललाट मस्तक है करोड़ों
कामदेव भी मिलकर उनके पासंग भर भी नहीं हैं अंशमात्र भी
नहीं है उनकी बांहें लम्बी हैं और कंधे सिंह के समान पुष्ट हैं ।
उनकी गर्दन लम्बी है।       करोड़ों कामदेव भी मिलकर उनके
पासंग भर भी नहीं  हैं । अंशमात्र भी नहीं  हैं । उनके सौंदर्य का
बर्णन कौन कर सकता है । उनके   दर्शन कर  मुझे सारा संसार
झूंठा प्रतीत होता है।   गोपाल कहते हैं उनके  भजन    करने के
सिवाय    कोई  और  उपाय नहीं है। फिर कोई कुछ नहीं बिगाड़
सकता है ।  इसलिये हे  प्राणीमात्र तू  कृपासिंधु कृष्ण का भजन
कर ।

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