गोपाल युगलकृष्ण श्रृंगार भाव भंगिमा

                         [  १  ]
अपलक निरखत लाड़ली             ,   जसुदा नन्द कुमार  ।
रूप लखै   रूपेश्वरी                     ,   राधे कीर्ति कुमारि     ।
राधे कीर्तिकुमारि   करै अति लाढ,   कुंवरि बृज मुस्काइ रइ है    ।
द्युति  दामिन सी दमकै  राधे    ,    रति कोटन लजाइ  रई   है  ।
जुगल रूप  प्रभु सोभा भगतौ     .  मो    मन  ललचाइ  रई है    ।
ब्रज  ठाकुर ठकुरानी   गाथा      ,    भक्त मंडली गाइ रइ है     ।
‘गुपाल ‘  मूढ़ भाग  ना तेरे         ,  माया तोइ लुभाइ रइ      है   ।
सदां   हिये  बिच   धारौ          ,           एक  गोरी एक    कारौ।
कृपा श्री राधे   होगी               ,           हर गैल उजारी    होगी ।
भावार्थ :—–
श्री राधिके बिना पलक मारे हुऐ श्री जसोदा व श्री
नन्दबाबा के पुत्र श्री श्यामसुन्दर को लगातार देख रही है ।    वो
रूपेश्वरी कीर्ति नंदिनी राधिके श्री कृष्ण के रूप रस पान कर रही
है ।बृज की बेटी श्री कृष्ण को अत्यंत प्रेम कर रहीं हैं और मंद मंद
मुसकरा रहीं हैं । मेघों के बीच तड़कने वाली बिजली सी राधिके
करोड़ों रतियों को लजा रहीं हैं ।श्री मनमोहन कृष्ण और मनमोहिनी
श्री राधिके की जोड़ी की अप्रतिम सुंदरता मेरे मन को ललचा रही है ।
ऐसा लगता है कि मैं उन्हें ही देखता रहूँ । बृज के ठाकुर जी श्री कृष्ण
एवं ठकुरानी श्री ब्रजेश्वरी राधिके की गाथा सभी भक्त मण्डली गाती
हैं । गोपाल मुर्ख तेरे भाग्य नहीं हैं । तुझे तो यह दुनियाँ अच्छी लग
रही है ।अरे इस युगल स्वरूप को हिरदय के अंदर मैं बसा ले एक तरफ
गोरी गोरी राधिके तथा दूसरी तरफ काले रंग वाले श्यामसुन्दर ।
तुम पर श्री राधिके की कृपा हो जाएगी और जीवन के अँधेरे
मार्ग प्रकाशवान हो जायेंगे
   [  २ ]
रतनारी  बेंदी  लगी   ,       अति रतनारे होठ ।
चंद्रमुखी बृषभानुजा ,    कछु मन आयौ खोट।
कछु मन आयौ खोट नज़र भर   ,  देखे कलुआ कारौ ।
बंशी कर मैं लगै न श्रीमुख   हा  ,  कैसौ         सैंकारौ ।
भूले नाथ जगत सबरे कूँ  नेह    ,  स्वामिनी      भारौ  ।
साँस रुकी रह गयी त्रिलोकी       ,प्राण जाँय कोई तारौ ।
गुपाल साँस रुके ते   भैया          ,   होय प्रलय  हैकारौ ।
छोड   ये  सबके साझी           ।   जगत नौका प्रभु  माँझी ।
”’ गुपाल ”  गोपाल  कहैंगे     ।   राधे    माधव      सुमरेंगे।

 

 

भावार्थ :—
 श्री राधिके के सुर्ख लाल बिंदिया लगी है और उनके ओठ भी सुर्ख लाल हैं
 गुपाल कहते हैं ऐ सा लगता है जैसे चन्द्रमा जैसे सुन्दर मुख वाली बृषभानुः
 बाबा की पुत्री के मन कुछ शंका उत्पन्न हुई है
ऐसा लगता है कि उनके मन प्रभु के प्रति कोई भेद उपज गया है  ऐसा लगता
 है कि उनके मन प्रभु के प्रति कोई भेद उपज गया है वह नजर टिका कर काले
 रंग वाले प्रभु को देख रही है /प्रभु की वंशी उनके हाथ मैं है उनके मुख से नहीं
लग पा रही है  यह कैसा गजब संयोग है
श्री कृष्णा मेरे स्वामी सारे जगत को भूल गये हैं क्यों स्वामिनी श्री राधिके का प्रेम
 उन पर भारी पड़ रहा है दोनों एक दुसरे को देख रहे हैं श्री कृष्ण के  साँस रोकने
सारी  दुनियां की साँस रुक गई है ऐसा लगता है जैसे प्रलय होने वाली है गोपाल
कहते हैं स्वामिनी श्री राधिके इनको छोड़ दो मुक्त कर  दो क्योंकि इनमें सबका
हिस्सा है ये सबके हैं ये सारे संसार को चलने वाले सदन तेरे ही रहेंगे हम तो
 युगल स्वरूप के दास हैं दास सेवक ही रहेंगे

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