श्रीगोपाल गोकुल नन्द भवन आगमन कीर्तन रस माधुरी

गोकुल आगमन नंदभवन कीर्तन रस माधुरी
खुले किबारे पौरी बाबा  पौढ़ी  बेसुध   जसुदा      बाम    ।
पौढ रही  नवजात  ललनिआ  सुंदर  रूप  राशि  अभिराम।
गौ ग्वाले सब बेसुध सोमें   नन्दभवन  शान्ती  सुखधाम ।
बाबा  नन्द अचेतननिद्रा  चकित वसू लख  दृश्य तमाम  ।
लला पुढ़ाय  लली  लै   लीनी  मंजूसा  रख  कियौ  पयाम  ।
लीला लख लख हिय हुलसामें  बरनन करों  देवकी    बाम ।
लगी उतावल  मन  मधुपुर  वसु   परत  रहे  अपढारे पाम ।
उत गोकुल मैं बजे बधाये      बेटा  भयो  नन्द  जू   बाम    ।
देवन रूप धरे  ब्रजबासी        दरशन  करें  नैन  सुखधाम   ।
शंकर बाबा   साधु  बन गये    संग अंजनी सुत   बलधाम   ।
‘गुपाल  आ गोकुल मैं पहुँचे    निरखुं बाल रूप घनस्याम  ।
                               जय  राधे जय  राधे   राधे           जय राधे    जय   जय घनस्याम    
                               जयकृष्णा जयकृष्णा  कृष्णा    जय ‘गुपाल’ प्रभु  राधेस्याम 
भावार्थ :—–

नन्द जी  की  पौरी  [ घर ] का दरवाजा  खुला
हुआ है । यशोदा  जी गम्भीर  निद्रा  मैं हैं ।   उनके साथ
अभी   जन्म लेने वाली बालिका सो रही है ।   जो सोंदर्य
की मूर्ति  है।    गायें तथा  उनके चराने खिलाने वाले
ग्वाले  बेसुध सो रहे हैं।    क्यों कि नंद घर सुख देने वाला
है ।      श्रीनंद  भी  गम्भीर रूप  से  सो रहे हैं ।   और
वासुदेव  जी वहाँ  की नींद   को देख कर चकित हो  रहे
हैं।   उन्होंने   श्री    कृष्ण  को सुला  कर  बच्ची को उठा
लिया । और  उसे  देखते  हुए  जा  रहे     हैं ।    मन मैं
कंस का  भय है । यात्रा    मैं हुए अलौकिक अनुभवों को
याद कर   देवकी  जी  को बताने  की उत्सुकता मैं  जल्दी
  जल्दी जा रहे हैं।    उनके   पैर  शीघ्रता  से  पड   रहे हैं ।
उधर   गोकुल मैं       बधाये    बज रहे हैं  कि नन्द जु के
बेटा     हुआ है ।  देवता    ब्रजबासियों     का  रूप रख
  उनके दर्शन करने   आरहे   हैं ।  महादेव  शंकर जोगी
[साधू ]बनकर संग  मैं  माता  अंजनी  के  पुत्र हनुमान
जी को    साथ   लेकर   चले   हैं ।     गुपाल  कहते  हैं ।
त्रिपुरारी     महादेव   अपने बाल रूप  प्रभु को  देखने
की जिद  मैं  कैलाश   छोड़कर   गोकुल   मैं   हनुमान
जी को   लेकर  पहुँच   गये ।

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