श्रीगोपाल शिव बजरंग कीर्तन रस माधुरी

श्रीगोपाल शिव बजरंग कीर्तन रस
    [ १ ]
 
नाग  गले   बाघम्बर डारे   हनुमत       संग वीर बलधाम ।
डमरू  बाजे घोर  शोर ब्रज   चमकत  धेनू  लाल    ललाम ।
बाबा  तेरे  पाम  परों हौं     जावो तुम  निज प्यारे     धाम ।
बारो  लाला  देख     डरैगौ   नाजुक  सुंदर     मेरौ    स्याम ।
त्रिशूल  रोप  दीन  द्वारे पर   धूनी  रमों   न       जावों धाम ।
प्रिय हनुमत नाचैगो जननि   सुमरत  हरि गोविंदा   नाम ।
समरथसाली पुत्र     तुम्हारौ   अरी होय  न  एहि   जुकाम ।
हाल चाल  पूछे  खुश     होंवे   कैसे   हो       कैलाशी   राम ।
सेवक महावीर     बजरंगी   प्रिय अतीब मोहन घनस्याम ।
दरस   करा दो तुरतइ  जावों   दूर    घनो    कैलाशी  धाम ।
’ गुपाल’’ गाढ़ी प्रीत   पुरानी   . तेरौ      लाला   मेरौ   राम ।
 
जय राधे  जय राधे   राधे        जय राधे   जय     जय घनस्याम  
जय कृष्णा जय कृष्णा  कृष्णा   जय ‘गुपाल’प्रभु राधेस्याम
 
भावार्थ :—-
 
 
बाघ का चरम  ओढ़कर  नाग  गले मैं डाले
हुए साधू जिसके संग बलवान बंदर है। डमरू को जोर
से बजा  रहा है   जिससे पूरे बृज मैं भारी शोर हो रहा है  ।
जिससे गाये व मेरा  सुंदर बालक  डर रहा है। जसोदा
माँ   बोली  हे  बाबा  मैं  तेरे  पांव  मैं  पड़ती हूँ । तुम
अपने  प्रिय  स्थान को चले  जाओ । मेरा     छोटा
बालक तुम्हे देखकर डर जायेगा । वह बहुत ही नाजुक
  है । हे  माता  मैंने  तेरे  दरवाजे  पर  डमरू  गाढ़कर  मैंने
धूनी   रमा  दी । तेरे  लाला  को  देखे  बिना  मैं  नहीं  जाउंगा ।
मेरा  कैलाश   बहुत   दूर है। अरी   माता  सुनो  तेरे  पुत्र   से
मेरा  और बजरंगवली का बहुत  पुराना  प्यार है। इसको
दिखादे  इसके दर्शन करा दे  इसे  जुकाम  भी  नहीं  होगा ।
और वह  मेरे हाल  चाल  पूछेगा। मेरे  संग  मैं   उनका
 प्रिय सेवक  हनुमान है । अरी  मैया  इसका [ तुम्हारे
मोहन से  अत्यंत   गहरा प्रेम है ।शंकर भगवान बोले
तुम्हारा पुत्र से हमारी अत्यंत गाढ़ी प्रीती है  गोपाल कहते हैं
शंकर भगवन बोले है मैया तुम्हारा ये पुत्र सुख का समुद्र है
सुख रूप है। दरसन  करा देगी  तो ही मैं तुरंत चला   जाउंगा ।
मेरा  कैलाश बहुत   दूर है। तेरे लाला  को  देखे  बिना मैं  नहीं
जाउंगा
 
 
 
   [ २ ]

त्रिलोकी   गोविन्द  तेरे  घर   कीनों   तैने   पुण्य   तमाम ।
जब  जब  नाथ  धरन  पै  आवै   मैं   तौ   जावों   वाही  गाँव ।
मैया बोली अमृत बोली   बाबा  निरखौ   तुम   तौ  स्याम ।
बंदर   तेरौ   बाहर   राखौ   छन   छन घुंघरू   बाजें  पाम ।
हनुमत   दर्शन करही मैया   अचक  अचक   धरिहैगो   पाम ।
बाबा  तुमहि  अकेले  आबौ   जिद   छोड़ो   मोहे   कछु   काम ।
शंकर   बोले  बजरंगी  सुन   तुम कोउ   जुगती  लेउ   काम ।
महावीर हनु   टेर   लगाई   द्वारे   ठाडे   दूखत   पाम ।
पच पच हारे शंकर शम्भू   अटल   आसरौ राजा   राम ।
मैया   जोर   कछु   नहिं चालै   किरपा   प्रभु की   चाहूँ   राम ।
जोर   जोर  सों रोये  मोहन   ‘’ गुपाल ‘’   गिरधारी घनस्याम ।

जय राधे   जय राधे   राधे           जय राधे   जय   जय घनस्याम  
जयकृष्णा  जयकृष्णा  कृष्णा   जय ‘’ गुपाल’’ प्रभु  राधेस्याम
 
भावार्थ :—
 
हे  माता  तेरे  घर  तीनों  लोकों के  नाथ  आये हैं।
तुमने  बहुत ही  पुन्य  किये हैं।और  माँ  जब  जब  मेरे  प्रभु
धरती पर  आते  हैं।    मैं  उन्हें  देखने  उसी  गांव  जाता हूँ ।
मैया ने  बोली में      अमृत  भरकर  कहा  बाबा  तुम  कृष्ण
को  देख  लो।   पर  तुम्हारा  बंदर  जिसके  घुंघरू  छनक
 छनक  बजते हैं।   उसको  नहीं  ले  जाना। शंकर जी बोले मैया
मेरा बंदर धीरे धीरे पांव रखेगा   यह भी उनके दर्शन करना
चाहता है। श्री शंकर  बोले    हे  हनुमान जी  माता  तौ  तुम्हारी
मना  कर   रही है।   मैं  तो  दर्शन  कर  लूँ ।   मेरी  सारी    युक्ति
 फेल  हो  गयीं हैं ।  अब  तू    ही   अपनी  जुगती [ युक्ति ] काम
  मैं   लो ।  श्री  हनुमान जी    ने    टेर       लगाई  आपके  द्वार
पर  खड़ा हूँ ।  मैया  का  पहरा  तोड़  नहीं  पा  रहा हूँ ।  मुझे
किरपा  कर     दर्शन दो ।  मोहन  जोर  जोर से  रोने  लगे ।
माँ   बोली  हे  गोपाल  तू  कह  तू  बता मेरा  गिरधारी श्याम
  क्यों  रो    रहा     है ।
[ ३ ]
 
जुर मिल   सब  इकठौरी  बोलीं    जसुदा   काहे   रोवे  स्याम ।
रोहणी कहै पतौ  न बहना दुखी       भयौ  कृष्ण   घनस्याम ।
एक  बोली  साधू  कब  आये        संग   महा   बंदर  बलधाम ।
डमरू  वारे  कूँ   सखि   पूछो         गले  विराजें   नागा   राम ।
हाँ  वाही की कहूँ सयानी           देखन आयौ  तज  निज धाम ।
भूखे   प्यासे   साधू   बैठे                भोजन  देऊ   करौ   प्रनाम।
जसुदा   बोली   जीमो   बाबा      माखनमिसरी अदुभुत जाम ।
रोवे  लाल  भयौ   कहा  मैया            शंकर  बोले   साधू   राम ।
दरस   करा  देऊ  पीरा नाशों           औघड़नाथ   हमारौ   नाम ।
लीने संग भवन महतारी               किलकारी दीनीं घनस्याम ।
देख ‘’ गुपाल ‘’मगन  दौनन  कूँ  हनूमान शिव करत प्रनाम ।
भावार्थ :—:–
सभी  सखी  इकठ्ठी  होकर  बोलीं । जसोदा  स्याम
सुन्दर  क्यों  रो  रहे हैं । रोहणी जी  बोली पता नहीं  बहिन  कृष्ण
 क्यों  दुखी  हो  रहे हैं। एक   बोली  ये  साधु  कब  आया है । जिसके
 साथ  बलवान  बंदर  भी है । जिसके   गले मैं  नाग है जो  डमरू
लिए हैं । जसोदा  बोली हाँ  मैं उसी साधु की  कह रही हूँ  वह अपना
निवास छोड़कर कृष्णा को देखने आया है यशोदा  बोली बाबा  तुम
 अपने  गांव  चले  जाओ । मेरा छोटा बालक तुम्हें देखकर   डर
जायेगा । सखी बोलीं  हे यसोदा  भूखा प्यासा  साधु तुम्हारे  दरवाजे
पर बैठा है । इन्हे   भोजन कराओ । इनसे  क्षमा  मांगो । जसुदा
बोली  माखन  मिस्री का बढ़िया  भोजन  करो। मेरे  बालक   क्या
को क्या हो गया है । भगवान  शंकर  बोले  तुम्हारे  बेटे   को  दिखा
  दे। माँ   मैं   अपने  बंदर   को  बुला  लेता हूँ । गोपाल  के  प्रभु  उन
दोनों को  देख कर  खुश  हो  गए। और  हंस  हंस कर   प्रणाम   लेने
लगे ।

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