श्री गोपाल बाल चरित कीर्तन रस माधुरी

श्री गोपाल बाल चरित कीर्तन रस माधुरी
|| गोपाल कीर्तन ||
श्रीकृष्ण  भजौ  श्रीकृष्ण कहो    श्रीकृष्ण   माधव    सार      है   
श्रीकृष्ण    कृपासागर  जगत        कृष्ण       कृपा        संसार  है      
श्रीकृष्ण     करुणा दयासागर         दयालू     दयावतार           है     
कृष्णा मानव जीत ‘’गुपाला ‘’         श्रीकृष्ण बिन सब      हार  है   
श्रीकृष्ण राधे भजौ  निश दिन        गोपाल    बेड़ा           पार   है          
 
श्रीकृष्णा  महायोगी    मही           योगी     जनन      श्रृंगार        है   
श्रीकृष्ण ध्यानी  श्रीकृष्ण ग्यानी  उपदेशक         सद विचार   है       
श्रीकृष्ण  मानवता सहारे            मानव   धर्म       आधार        है     
कृष्णा   मानव जीत ‘’गुपाला ‘’       श्रीकृष्ण  बिन  सब  हार   है     
श्रीकृष्ण राधे  भजौ  निश दिन       गोपाल    बेड़ा        पार     है           
 
श्रीकृष्ण  अनुपम  इष्ट प्राणी     बिन इष्ट जीवन   ख्वार     है       
श्रीकृष्ण पूरण बृह्म  प्यारे             सोलह   कला      अवतार   है     
श्रीकृष्ण ध्यावत रहत जे   नर        आवै   नहीं  दुख     ब्यार  है     
कृष्णा  मानव  जीत ‘’गुपाला ‘’        श्रीकृष्ण  बिन सब   हार  है   
श्रीकृष्ण  राधे  भजौ  निश दिन        गोपाल   बेड़ा        पार     है         
 
श्रीकृष्ण साँचे  मीत  प्राणी       जगत     मीत   व्यहवहार है   
श्रीकृष्ण  द्रोपद सखि  सहारे  सारथ्य  पार्थ    स्वीकार   है  
दरिद्रता  दावाग्नी  सुदामा   चुप    भर     दिये    भंडार   है
कृष्णा  मानव  जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण बिन सब हार है।
   श्रीकृष्ण  राधे भजौ  निश दिन         गोपाल  बेड़ा  पार     है       
 
कृष्णा    आनंदकंद   माधव           आनन्द   प्रेम  विस्तार  है
श्रीकृष्ण    पावन  प्रेम गंगा         पवित्र    यमुनोत्री  धार  है 
श्रीकृष्ण प्यार श्रीकृष्ण प्रेमि      श्रीकृष्ण प्रेमावतार        है  
 कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण बिन सब हार है  
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन        गोपाल   बेड़ा  पार     है        
 
सेवा   कृष्ण  श्रृंगार जीवन           नित अरचना   संस्कार    है  
जप तप  सुमरन  हवन यग्य व्रत    अमृतदायिनी       धार   है   
श्रीकृष्ण   साधुसंत तपस्या             ऋषि मुनीन       तप धार  है
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है  
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन        गोपाल   बेड़ा  पार     है   
 
 
अमर सत्य  जग  कृष्ण  नाम धन  माया   जगत  बेकार     है   
मुठ्ठी बंद ‘’गुपाल’’  आगमन             खोले  कर  गमन यार  है   
पाप करम   सब   ब्यर्थ कर्म हैं        रौरव    नर्क   का   द्वार   है  
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है  
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन        गोपाल   बेड़ा  पार     है   
  
नश्वर सुख दुख नश्वर  चिंता         नश्वर      काया   यार  है    
चिंता केवल  कृष्ण  नाम जप          चिंता  धर्म    अधिकार  हैं  
चिंता   चिंतन मुक्त कृष्ण प्रभु      श्रीकृष्ण       चिंतनहार   है   
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है  
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन        गोपाल   बेड़ा  पार     है   
    
पर पीड़ा अति घृणित चिंता     परहित  परम उपकार    है   
सेवा प्रानिन काज  पुनीता          हिंसा प्रानीन हार        है  
पुण्यकर्म  जीवन  उद्धारक     सहज  वैतरणी    पार    है   
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है  
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन        गोपाल   बेड़ा  पार     है   
 
करुण  पुकार  सुनी  करुणाकर       भगतन कीने   उद्धार  है 
उग्रसेन    वसूदेव  देवकी          विनती  हिरदय  स्वीकार  है
कुंती पुकार  द्रोपदपुकार           रुक्मिन पुकार सों प्यार  है
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण बिन सब हार है  
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन   गोपाल   बेड़ा  पार     है   
 
धर्मपाथ  जीवन पथ  उत्तम  स्वधर्म  जीवनी धार   है
श्रीकृष्णा  धर्मी  धर्म धारक     धर्म पाल  धर्म धार   है 
धर्मधुरंधर  धर्म सहारे          श्रीकृष्ण  धर्मावतार   है   
कृष्णा मानव जीत ‘’गुपाला ‘’ श्रीकृष्ण बिन सब हार है 
   श्रीकृष्ण राधे भजौ निश दिन    गोपाल   बेड़ा  पार   है 
 
परमतत्व   श्रीकृष्ण गुपाला आत्मतत्व  निर्विकार   है  
तत्व दरशी  जग  तत्वमूलक   तत्व ग्यान  तत्वसार  है 
तत्वेश्वर प्रभू  कृष्ण कन्हाई   तत्वराम  तत्व  द्वार है   
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’ श्रीकृष्ण बिन सब हार है 
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन  गोपाल  बेड़ा  पार   है   
 
 
अर्थ :—
 
हे  मनुष्य तू सदां कृष्ण कृष्ण कहता रह   क्योंकि कृष्ण
जगत का सार है  इस जगत मै श्री कृष्ण ही प्रेम हैं।
श्रीकृष्ण ही  संसार का  जग का आधार   हैं।  श्री कृष्ण
जैसा कृपालु देवता दूसरा  नहीं    है  उनके बिना
जीवन प्रयोजन विहीन  हैं  जो मनुष्य श्रीकृष्ण का भजन
करते हैं   उन मनुष्यों को दुःख की हवा भी नहीं आती है।
श्री कृष्ण  की याद करने से मनुष्य जगत  सागर से
तर जाते हैं  संसार मैं   श्रीकृष्ण का नाम अमर धन है
 बाकी संसार का धन साथ जाने वाला नहीं है   अत
बेकार है   जग मैं प्रभु का नाम ही  सच्चा है    और
जगत माया का स्वरूप है एक व्यवहार है    भगवान
श्रीकृष्ण की सेवा  जीवन का श्रृंगार है तथा उनकी
नित्य पूजा जीवन का संस्कार है जीवन का अच्छा कार्य
है ।श्रीकृष्ण का जप करना तपस्या करना उनका हवन
यज्ञ करना  जीवन को अमृत से भर देने वाली अमृत
धारा है ।श्रीकृष्ण निर्विकार आत्मतत्व् आत्मज्ञानी  हैं
तथा वे ही परमात्मा  हैं    श्रीकृष्ण कीर्तिस्वरूप हैं वे ही
कीर्ति  हैं    वे तीर्थ के राजा हैं वे स्वयं तीर्थ हैं ऐसा ऋषि
मुनियों का विचार है कथन है  सब दुख सुख चिंता नष्ट
होने वाले हैं  तथा यह शरीर भी नष्ट होने वाला   है 
श्रीकृष्ण सभी चिंताओं से तथा  व्यर्थ चिंतन से मुक्त हैं
तथा श्रीकृष्ण ही संसार  में चिन्तनयोग  है मनुष्य को
उन्ही की याद करनी चाहिए  जिस दिन तुम संसार में
आए थे तुम्हारे हाथ खाली थी तुम उस पार संसार के
पार जब जाओगे तब भी खाली  हाथ जाओगे  पाप
कर्म सब व्यर्थ ही   हैं   तथा  यही रौरव नर्कों में
ले जाते हैं   हे गोपाल सब कुछ छोड़ तू श्रीकृष्ण का भजन
कर इस संसार से प्यार छोड़ दे  श्रीकृष्ण गोविंद ही सच्चे
मित्र   हैं संसार के सभी नाते झूंठे हैं   मेरे माधव श्री कृष्ण
महायोगेश्वरहैं   वे  योगियों  में श्रेष्ठ हैं  शास्त्रों का गम्भीर
विचार   है  कि श्रीकृष्ण मानवता के सहारे  हैं   मानवता के
प्रेमी हैं  श्रीकृष्ण धर्मवान तथा कर्मशील हैं  तथा सोलह
कला परिपूर्ण  है  गुपाल कहते है   श्रीकृष्ण   ही मनुष्य
की जीत है  गोपाल के गोपाल के अतिरिक्त अन्य सभी
संसारी उपलब्धियॉ  सम्पदा सभी बेकार हैं और मनुष्य
की हार है।
 
 
 ]
 
 
धरा अवतरण  धरा बचावन    कारागार  खुलइया   स्याम   
बेरी खुलीं दौन अपढारी       विस्मय वासुदेव       संग बाम  
रूप चतुरभुज  दीने  दरशन   तात  मात मन     पूरन काम  
भगतन बन्ध निबारन हारे   मुकती मुक्त करैया     स्याम 
गोकुल जावों नन्द भवन मैं    जनक  इसारो  दीनों  स्याम   
बरसै नीर भदरवा बदरा          चमके  चपला   मेरे   स्याम  
घबरामें  मन वासुदेव प्रभू       कैसें    जावों   गोकुल  गाँव   
जमुना जोर चढ़ी पग परसन      चरन बढ़ायौ बनिहौं  काम
पान्झ भई जमुना महारानी        सहज पार कर गोकुल धाम।
अचरज मन मै जोस हिये मैं    निरखत गोकुल गली तमाम
त्रिलोकी पति कृष्ण कन्हैया   ‘’ गुपाल’’ सुंदर मोहन स्याम
 
जय राधे जय राधे राधे     जय  राधे  जय  जय घनस्याम   
जय कृष्णा जय कृष्णा कृष्णा जय ‘’ गुपाल’’प्रभु राधेस्याम 
 
अर्थ     :—
 
 
मुरली धारण करने वाले प्रेम लुटाने वाले हे    प्रिय मनमोहन
घनश्याम आपने जन्म लिया कारागार के लगे ताले अपने आप
खुल  गये  आप जैसा जेल खुलवाने वाला    दूसरा नहीं  हुआ 
श्री वासुदेव और देवकी क़ी  हथकड़ी     बिना खोले खुल  गयीं 
वासुदेव जी  अपनी धर्मपत्नी देवकी  के  साथ आशचर्य चकित
  हो गये  भक्तों के सभी बंधनों के काटने वाले    मुक्ति प्रदान
करने  वाले के लिए हथकड़ी खुलना बड़ी बात था।     आपने
अपने पिता को  आपको गोकुल ले जाने  को कहा    पानी बरस
रहा है भादों का महीना है   बिजली कड़क रही है वासुदेव जी मन
मैं घबरा रहे हैं मैं गोकुल कैसे   जावों  हरी को छूने को यमुना जी
चढती जा रही है  भगवान ने अपना चरण बढ़ाया   छूकर जमुना
जी उतर  कर तले मैं बैठ गयी। वासुदेव जु सहज ही पार क़र
अपनी ठौर  गोकुल   पहुंच गये हैं   उनके मन   मैं आश्चर्य है
 तथा वे जोश से  भरे हुए हैं  गोकुल अति सुंदर गांव है।  वे
गोकुल की गलियों को देख  रहे हैं वे  बड़ी सुंदर हैं     गोपाल
कहते है  वसुदेव जी सोच रहे हैं     कि  यह  बालक तीनो लोकों
का    स्वामी है यह    सुख प्रदान करने     वाला  तथा मन को
मोहित करने वाला  अत्यन्त सुन्दर  है  
 
 
[      ]
खुले किबारे पौरी बाबा     बेसुध     पौढ़ी     जसुदा      बाम   
पौढ रही नवजात  ललनिआ      सुंदर  रूप  राशि   अभिराम
गौ  ग्वाले सब बेसुध सोमें        नन्द भवन शान्ती सुखधाम  
बाबा  नन्द अचेतन  निद्रा      चकित  वसू लख दृश्य तमाम 
लला पुढ़ाय  लली  लै  लीनी  मंजूसा   रख   कियौ  पयाम 
लीला लख  लख  हिय  हुलसामें    बरनन  करों देवकी बाम
लगी उतावल मन   मधुपुर की      परत  रहे   अपढारे  पाम
उत  गोकुल मैं बजे बधाये         बेटा  भयो  नन्द  जू   बाम  
देवन रूप धरे ब्रजबासी             दरशन करें   नैन सुखधाम  
शंकरबाबा  साधु बन  गये         संग अंजनी सुत बलधाम   
 गुपाल   गोकुल मैं पहुँचे    निरखुं बाल रूप घनस्याम          
जयराधे   जयराधे  राधे   जयराधे   जय   जय घनस्याम    
जयकृष्णा  जयकृष्णा कृष्णा  जयगुपालप्रभु  राधेस्याम 
 
 
भावार्थ :—–
नन्दजी की पौरी  [ घर ] का  दरवाजा  खुला  हुआ है 
यशोदा  जी गम्भीर  निद्रा मैं हैं   उनके साथ अभी
जन्म लेने वाली बालिका सो रही है   जो सोंदर्य की
मूर्ति है।  गायें तथा उनके चराने खिलाने वाले  ग्वाले
बेसुध सो  रहे हैं। क्यों कि नंद घर सुखदेने वाला है 
श्रीनंद भी गम्भीर रूप से सो रहे हैं  और  वासुदेवजी
वहाँ की नींद   को देखकर  चकित हो  रहे हैं। उन्होंने
श्रीकृष्ण को सुलाकर बच्ची को उठा लिया   और उसे
देखते  जा रहे हैं   मन मैं कंस का भय है  यात्रा मैं हुए
अलौकिक अनुभवों को याद कर देवकी जी को बताने की
उत्सुकता मैं   जल्दी जल्दी जारहे हैं।  उनके पैर  जल्दी से
पड  रहे हैं ।उधर गोकुल मैं बधाये बज रहे हैं कि  नन्द जु
के बेटा हुआ है  देवता ब्रजबासियों का रूप रख उनके दर्शन
करने आरहे हैं महादेव शंकर जोगी [साधूबनकर संग मैं
माता अंजनी के पुत्र हनुमान जी को साथ   लेकर हैं  गुपाल
कहते  हैं ।त्रिपुरारी महादेव अपने बाल रूप प्रभु को  देखने
की जिद  मैं  कैलाश छोड़ कर गोकुल मैं हनुमान जी को
लेकर पहुँच   गये
    
 
 
[     ]
नाग  गले बाघम्बर  अदुभुत       हनुमत  संग वीर  बलधाम
डमरू बाजे घोर शोर ब्रज      चमकत     धेनू  लाल ललाम
बाबा तेरे पाँय  परों हौं            जावो तुम  निज    प्यारधाम
बारो लाला देख डरैगौ         नाजुक   सुंदर मेरौ     स्याम  
त्रिशूल रोप दीन  द्वारे पर      धूनी रमों     जावों  धाम 
प्रिय हनुमत नाचैगो जननि   सुमरत हरि  गोविंदा नाम   
समरथसाली पुत्र  तुम्हारौ     अरी होय एहि  जुकाम  
हाल चाल पूछे खुश होंवे        कैसे  हो  कैलाशी     राम   
सेवक  महावीर  बजरंगी      प्रिय अतीब मोहन घनस्याम।
  दरस करा दो तुरतइ जावों     दूर  घनो   कैलाशी     धाम  
’  गुपाल’’ गाढ़ी प्रीत पुरानी       तेरौ   लाला  मेरौ       राम
 
जयराधे  जयराधे   राधे         जयराधे    जय   जय घनस्याम  
जय कृष्णा जयकृष्णा   कृष्णा    जयगुपालप्रभु राधेस्याम 
 
 
भावार्थ :—-
बाघ का  चरम  ओढ़कर  नाग  गले मैं  डाले हुए
 साधू    जिसके  संग  बलवान  बंदर है।   डमरू को  जोर से
बजा     रहा है   जिससे पूरे बृज मैं  भारी  शोर  हो रहा है   
जिससे  गाये  मेरा  सुंदर  बालक  डर  रहा है।    जसोदा
माँ   बोली  हे  बाबा  मैं  तेरे  पांव  मैं  पड़ती हूँ    तुम  अपने
 प्रिय  स्थान   को  चले  जाओ   मेरा  छोटा  बालक  तुम्हे
 देखकर  डर  जायेगा   वह  बहुत  ही  नाजुक    है   हे
माता  मैंने  तेरे  दरवाजे  पर  डमरू  गाढ़कर  मैंने  धूनी
  रमा  दी   तेरे  लाला  को  देखे  बिना  मैं  नहीं  जाउंगा 
मेरा   कैलाश   बहुत    दूर  है।   अरी     माता   सुनो  तेरे
पुत्र   से  मेरा  और बजरंगवली का  बहुत  पुराना  प्यार है।
इसको      दिखादे    इसके दर्शन करा दे    इसे  जुकाम
भी  नहीं  होगा   और  वह  मेरे  हाल  चाल    पूछेगा।   मेरे
संग  मैं  उनका  प्रिय सेवक  हनुमान  है     अरी  मैया
इसका  [ तुम्हारे मोहन से    अत्यंत   गहरा  प्रेम है 
शंकर भगवान बोले तुम्हारा पुत्र से हमारी अत्यंत गाढ़ी
प्रीती है   गोपाल कहता है मैया तुम्हारा ये पुत्र  सुख का
समुद्र है   सुख रूप है। दरसन      करा  देगी  तो  ही  मैं
तुरंत चला    जाउंगा    मेरा   कैलाश   बहुत    दूर  है।
तेरे  लाला  को  देखे  बिना  मैं  नहीं  जाउंगा 
 
 
 
[        ]
त्रिलोकी  गोविन्द तेरे घर     कीनों   तैने  पुण्य तमाम
जब जब नाथ धरन पै आवै   मैं तौ  जावों  वाही  गाँव 
मैया बोली अमृत बोली    बाबा  निरखौ तुम  तौ स्याम 
बंदर तेरौ बाहर   राखौ     छन  छन घुंघरू बाजें पाम 
 हनुमत दर्शन करही मैया अचक अचक  धरिहैगो पाम
बाबा तुमहि अकेले आबौ  जिद  छोड़ो मोहे कछु  काम 
शंकर  बोले बजरंगी  सुन  तुम  कोउ  जुगती लेउ काम 
महावीर हनु टेर    लगाई   द्वारे   ठाडे   दूखत      पाम 
पच पच  हारे शंकरशम्भू    अटल  आसरौ राजा    राम
मैया जोर कछु  नहिं  चालै किरपा  प्रभु की चाहूँ   राम  
जोर  जोर सों  रोये मोहन ‘ गुपाल ‘गिरधारी घनस्याम   
 
जयराधे  जयराधे राधे     जय   राधे  जय     जय घनस्याम    
जयकृष्णा जयकृष्णाकृष्णा जय गुपालप्रभु राधेस्याम 
 
 
भावार्थ :–
हे  माता  तेरे  घर  तीनों  लोकों के  नाथ  आये हैं।
तुमने  बहुत ही  पुन्य  किये हैं।और  माँ  जब  जब  मेरे
प्रभु  धरती पर  आते  हैं।    मैं  उन्हें  देखने  उसी  गांव  जाता
हूँ  मैया ने  बोली में  अमृत  भरकर  कहा  बाबा  तुम  कृष्ण
को  देख  लो।   पर  तुम्हारा  बंदर  जिसके  घुंघरू  छनक
छनक  बजते हैं।   उसको  नहीं  ले  जाना। शंकर जी बोले
मैया मेरा बंदर धीरे धीरे पांव रखेगा   यह भी उनके दर्शन
करना चाहता है। श्री शंकर  बोले    हे  हनुमान जी  माता
तौ  तुम्हारी  मना  कर   रही है।   मैं  तो  दर्शन  कर  लूँ 
मेरी  सारी    युक्ति  फेल  हो  गयीं हैं   अब  तू    ही
अपनी  जुगती [ युक्ति ] काम   मैं   लो   श्री  हनुमान
जी    ने    टेर       लगाई  आपके  द्वार  पर  खड़ा हूँ 
मैया  का  पहरा  तोड़  नहीं  पा  रहा हूँ   मुझे  किरपा
कर     दर्शन दो   मोहन  जोर  जोर से  रोने  लगे 
माँ   बोली  हे  गोपाल  तू  कह  तू  बता मेरा  गिरधारी
श्याम   क्यों  रो    रहा     है
 
[      ]
जुर मिल सब इकठौरी बोलीं   जसुदा  काहे          रोवे  स्याम
रोहणी कहै पतौ       बहना   दुखी  भयौ कृष्ण    घनस्याम
 इक बोली साधू कब आये     संग   महा       बंदर    बलधाम
डमरू धारी नाग गले जिन ,  अनुपम अदभुत नागा राम

 

 

हाँ वाही की  कहूँ   सयानी     देखन  आयौ तज     निज धाम 
भूखे    प्यासे   साधू  द्वारे     भोजन देऊ   करौ          प्रनाम।
जसुदा   बोली जीमो बाबा   माखन मिसरी   अदुभुत   जाम  
रोवे लाल  भयौ  कहा मैया    शंकर बोले      साधू         राम 
दरस करा देऊ पीरा नाशों       औघड़नाथ    हमारौ       नाम
लीने संग भवन   महतारी      किलकारी    दीनीं  घनस्याम  
देखगुपाल ‘ मगन दौनन कूँ  हनूमान  शिव करत प्रनाम   
जय राधे जयराधे  राधे    जय राधे जय     जय घनस्याम    
जयकृष्णा जयकृष्णा कृष्णा  जयगुपालप्रभु  राधेस्याम 
 
 
भावार्थ :—:-
सभी  सखी  इकठ्ठी  होकर  बोलीं   जसोदा
स्याम सुन्दर  क्यों  रो  रहे हैं ।रोहणी जी बोली पता नहीं
बहिन  कृष्ण  क्यों  दुखी  हो  रहे हैं। एक  बोली  ये  साधु
कब आया है  जिसके  साथ  बलवान बंदर भी है जिसके
गले मैं  नाग है जो  डमरू  लिए हैं   जसोदा  बोली हाँ
मैं उसी साधु की कह रही हूँ वह अपना निवास छोड़कर
कृष्णा को देखने आया है यशोदा बोली बाबा तुम अपने
 गांव  चले  जाओ  मेरा छोटा बालक  तुम्हें देखकर
डर  जायेगा     सखी बोलीं  हे यसोदा  भूखा   प्यासा
साधु    तुम्हारे  दरवाजे पर बैठा है    इन्हे    भोजन
कराओ   इनसे  क्षमा  मांगो   जसुदा  बोली  माखन
मिस्री का बढ़िया  भोजन   करो।   मेरे  बालक   क्या
को क्या हो गया है    भगवान  शंकर  बोले  तुम्हारे
बेटे     को  दिखा    दे।   माँ    मैं    अपने  बंदर   को
बुला  लेता  हूँ    गोपाल  के  प्रभु  उन  दोनों को देख
कर खुश हो गए। और हँस  हँस   कर प्रणाम लेने लगे।
 
 
 
 
  [   ]
लीला    करत  दुष्ट  संहारे कंस अनुचरी  अनुचर स्याम
खेल खेल  प्रभु  खेल  खिलैया   पूतन दूध  पिवैया  स्याम
पीयो जहर जनिन गति दीनी  तो सो कौन  कृपालु स्याम
दूध दान दधि लूटन हारे       माखन बांटत हाथन  स्याम
खामें नांय  खिलावे  बारे          सबके ध्यान रखैया स्याम
गेंद खिलैया  गेंद फिकैया       गेंद   ढुढैया  यमुना  स्याम
नीर  शुद्ध  करवैया कान्हा         काली नाग नथैया स्याम
शरनागत बत्सल मनमोहन अभयदान  कालि  संग  वाम
अदुभुत कालीदह लीला  प्रभु      जीव जंतु उपकारी स्याम
गऊ संग गिरिराज  पुजैया      प्रकति  मानदिवैया  स्याम
इन्दर कोप उबार दियो  ब्रज  गुपाल  गिरधारी घन स्याम
 
 
जय राधे  जय राधे  राधे   जय राधे  जय  जय घनस्याम  
जय कृष्णा जय कृष्ण कृष्णा  जयगुपालप्रभु राधे स्याम
 
 
 
भावार्थ :—-
दुष्टों को मारना  जिनने  खेल  बना  लिया वे  सभी
कंस के  दास और दासी थे जहर पीकर  पूतना को माँ की
गति प्रदान की तुम  जैसा कृपालु  कोई दूसरा नहीं है
दूध और  दही लूटकर  दान  करने  वाले  आप अपने हाथों
से माखन   बाँटने वाले हो खुद खाकर  दूसरे को खिलाने
वाले  तुम सबका  ध्यान रखने वाले हो। गऊ को चराने ले
जाने वाले जमुना  मैं गेंद फेंकने वाले काली का अभिमान
चूर करने वाले तुम  ही  हो। श्री जमुना के जल को शुद्ध
करने वाले श्रीदामा के  प्यारे तुम ही हो। हे जीवों पर दया
करने वाले आपने अपराधी  कालिय को क्षमा कर
दिया ।आपने अनौखी कालीदह लीला की  आपने कालिय
की स्त्रियों के कहने से  सब को  अभय कर दिया गायों
के साथ गिरिराज की पूजा करवाने वाले  आप  प्रकृति
को मान देने वाले हो। इंद्र के क्रोध को  आपने श्री गिर्राज
को .अपने  हाथ से उठाकर शांत कर दिया। बंशी बजाने
वाले प्रेम बाँटने वाले  मनमोहन श्री कृष्ण हो हे
गिर्राज उठाने वाले गिरधारी आपने और बलराम
जी ने  ब्रज के वासियों का राक्षसों का डर [ कंस का भय ]
निकाल  दिया।
 
 
 
 
[ ]
 
 
ब्रजनन्दन  ब्रजभूषन  ब्रजबर   ब्रजसेवक ब्रजस्वामी स्याम
ब्रजपालक  ब्रज तारक  बालक  ब्रजबसुधा  रखवारे    स्याम
ब्रज बन बन बिहिरित  बनबारी  ब्रजललिना ब्रजस्वामिनस्याम
डार डार अरु पात  पात  ब्रज    बिरखन बातें   राधे स्याम
सुरभि चलत लै जुगल नाम प्रभु   राधे राधे कृष्ण  प्रणाम
बारि  बहत धुनि कलकल कारी   कारी जमुना   कारे स्याम
कुण्डी  कुंडा तीरथ  ब्रज बन  दीप दान  अदुभुत छबि शाम
ब्रजबासी सब  बिरन बिहारी      ज्यों बलदाऊ और श्रीदाम
कीर्तिनंदिनी स्वामिन ब्रज बन   सेवक गोपी  सेवक स्याम
नाना यौनि जीव तपधारी        भजत स्याम  सलौनी नाम
भूमंडल  ब्रजमंडल   पाबन  ” गुपालब्रज गोबिंद  प्रनाम
 
जय राधे   जय राधे    राधे  जय राधे  जय जय घनस्याम  
जय कृष्णा जय कृष्णा  कृष्णा जयगुपालप्रभु  राधे स्याम
 
 
भावार्थ :—–
हे मधुसूदन श्रीकृष्ण आप बृज के बेटे हो  आप बृज मैं
श्रेष्ठ हो आप बृज की सेवा करने सेवक हो आप बृज के स्वामी हो
आप ही बृज के पालने वाले हो हैं और बृज के तारने वाले हो।आप
ब्रजमंडल के रखवाले हो बृज के प्रत्येक वनों मैं बनवारीश्रीकृष्ण
ने बृज गोपियों और बृज स्वामिनी के साथ विहार किया। वहाँ के
वृक्षों की डाली डाली और पत्ते पत्ते पर श्रीकृष्ण राधिके की बातें
होती हैं ।यहाँ हवा भी युगल प्रभु का नाम लेके चलती है राधे राधे
और कृष्ण जी को प्रणाम करती है यहाँ पानी कल कल बहती है
जमुना का पानी भी काला है ।और श्याम सुन्दर का भी रंग भी काला
है ।नाना प्रकार के जीव यहाँ तपस्या करती है। वे दोनों श्याम व्
सलौनी का नाम लेते हैं भूमण्डल मैं ब्रजमंडल बहुत ही पवित्र
जगह है  गोपाल बृज गोविन्द दोनों को प्रणाम करता हूँ
 
[      ]
बैनु बजैया     धैनु चरैया          प्रेम  लुटैया प्यारे  स्याम
गोपी माधव  रास रचैया           चीर  चुरैया ग्यानी स्याम
आत्म ग्यान दीनों प्रिय गोपिन  सखी बातसुन लो अविराम।
गूढ़ तत्व   सब शास्त्र बताऊं जल थल नभ  रह सबको राम
सखी सयानी  बसन तजे तुम  लाज नहीं मन ललित ललाम
तुम हरि  अंश   परम सुखदाई         भेद भावना  देउ  विराम
दूरी घटा   मिलो  परमात्मा        तत्व जगत हरि पूरन काम
आत्मा परमात्मा सखि जोड़ो       मिल जांयेंगे मोहन स्याम
आत्मा परमात्मा        जानें        तू  ही  ईश्वर तूहि  राम
उलझावै मत आत्मज्ञान मै      प्रेम   प्रीत  जग सीधौ काम
दै        दै चीर हमारे मोहन     ” गुपालछैला छलिया स्याम
 
जय राधे  जय राधे  राधे             जय राधे  जय  जय घनस्याम  
जयकृष्णा  जयकृष्णा कृष्णा   जयगुपालप्रभु राधेस्याम
 
 
भावार्थ :– –
गोपिन के स्वामी रास रचाने वाले उनके वस्त्रों को
चुराने वाले  स्याम आप ही हो। हे सखियौ हे मेरी  मित्रो मेरी
बात को लगातार सुनो  मैं तुम्हें आत्म ज्ञान दे  रहा हूँ। मानव
जीवन का गूढ़ रहस्य  जल मैं धरती मै आकाश मैं  हर जगह
परमात्मा का  निवास है ईश्वर हर  जगह है फिर आपको
नंगे नहीं नहाना चाहिए। मुझे अचरज हो रहा है तुम पानी मै
नंगी  नहा रही हो और  मुझसे  अपना  शरीर  छुपा  रही हो
मुझसे क्या  छुपाती हो।मैं तो परमात्मा हूँ। मुझसे दूरियां घटा
लो मुझ मैं मिल जाओ परमात्मा जगत का सुंदर सत्य है।
तुम सब मेरा ही अंश हो  हे परम सुख दैनी वाली  सखियो सब
भेद मिटा लो। आत्मा कभी नंगी  नहीं होती है इस स्थूल शरीर
को ढकने का क्या प्रयोजन केवल सांसारिक है। एक परमात्मा
का ध्यान करो। सखी  क़ुछ भी भेद मत रखो। मैं तुम्हारे वस्त्र दे
दूंगा। आत्म तत्व को प्रनाम करो। सखियाँ बोली हे गोपाल  तुम
में बहकाओ हमारे  तो तुम्ही राम हो तुम्ही ईश्वर हो। श्रीकृष्ण
बोले तुम आत्म तत्व को प्रणाम करो मैं तुम्हारे वस्त्र अभी दे दूंगा।
हे कृष्ण तुम ही सब कुछ हो  तुम्ही ईश्वर हो तुम्ही राम हो हमें मत
बहकाओ और तुमसे विनती है कि तुम आत्मा परमात्मा के भेदों मैं
हमें मत उलझाओ
    
 
[      ]
ब्रज मन्डल श्रिंगार बढ़ावन    तो सो रसिया भयो  स्याम
फाग खिलारी गोपि ग्वाल संग रसिक बिहारी रसिक प्रणाम
उडत गुलाल अबीर रेत रज     रंग  बिरंगो  रसमय धाम
अवनि लाल पीरी बासन्ती       कारी  धौरी  नीली स्याम
कारे पीरे मुख सों टेरत             राधे  राधे  माधव स्याम
अलबेली रंगीली   रांधे                अलबेले गोपाला स्याम
फ़ाग मास  अजहु रंग बरसै                भेद  मिटैया अंतरस्याम
ब्रजमंडल  मोहित कर दीनों         मोहक  मोहिन मोहक  स्याम
अपढार मन लगै कृष्ण मैं             हवन ज़ोग व्रत  होइ  विराम
बजै बांसुरी छन छन नाचें             बड़े बाल  सब ग्वाल  तमाम
गोपी कीन  प्रेम रस पागल       ” गुपालप्यारे नटखट स्याम
 
जय राधे  जय राधे राधे               जय राधे  जय  जय घनस्याम  
जय कृष्णा जय कृष्णा      कृष्णा जयगुपालप्रभु राधे स्याम
 
भावार्थ :–
 
हे गोपियों के संग फाग खेलने वाले आप के  समान
रसिया  दूसरा आज तक नहीं हुआ बृज मै श्रृंगार रस को
बढ़ाने वाले  सभी रसिकों मैं श्रेष्ठ हे गोपालबिहारी तुम बृज
को बहुत प्रिय हो  धरती लाल पीली बसंती काली नीली और
धौरी हो रही है। गुलाल उड़ रहा है। साथ मैं अबीर और बृज
की अलौकिक रेत उड़ रही है यह ब्रज का पवित्र धाम रंग
बिरंगा है काले पीले  मुंह से रसिक श्रीराधे श्री कृष्णा बोल
रहे हैं हे कृष्ण आप हमेशा राधे राधे गाते रहते है कृष्ण
आप  जसुदा नन्द के प्रियपुत्र हो वंशी बजाने वाले प्रेमरस
लुटा देने वाले ऊँच नीच का भेद मिटा देने वाले मेरे प्रिय
स्याम तुम अलौकिक हो हे गोपाल तुमने  मोहिनी श्रीराधे
के साथ सारे बृज को मोहित कर दिया आपकी बाँसुरी बजते
ही गौएँ  बृज की स्त्रियां   अपनी सुध खो बैठतीं हैं मन
अपने आप ही तुम्हारी तरफ खिंचता है हे कृष्णगोपाल
सब भजन   योग सबको भूलकर तुम्हारी ओर खिंचते हैं।
गुपाल कहते बांसुरी के प्रेम मैं उन्मत लोग छोटे बड़े
सभी नाचने लगते हैं
 
 
 
 
 
[      ]
ब्रह्मा पथ भटकावन वारे           गौधन चोर बनैया स्याम
मायापति मायावर स्वामी           माया जग नचवैया स्याम
नई सृष्टि कर ग्वालबाल ब्रज   वन वन खेल खिलैया स्याम
निजजन पै किरपा करवैया    विधिना अहम मिटैया स्याम
भूल भुलाबौ भयौ प्रभू जी             चंचल माया व्यापी स्याम
कोउ भयो जगत हरि तोसो        नटनागर गोपाला स्याम
हो हूँ दास पुरातन माधव             कृपा सिंधु कृपालु स्याम
छमहु मोहि जानौ निज सेवक       स्वामी बारम्बार प्रणाम
कहें ग्वाल बूढों बाबा                 लाला   तोकुं करै प्रणाम
गुपालतू तो बडों जगत कौ    हम जानत ना प्यारे स्याम
ब्रजबासी सब बड़े हमारे ‘       ’ गुपाल’’ भ्रात बड़ौ बलराम
 
जय राधे जय राधे राधे                   जय राधे जय जय घनस्याम  
जय कृष्णा जय कृष्णा कृष्णा   जय ‘’ गुपाल’’ प्रभु राधेस्याम
 
भावार्थ :–
ब्रह्मा को गौ ग्वालबाल का चोर बना पथ से डिगा
दिया हे प्रभु आपही माया के पति स्वामी हो माया जग को
नचाती है आप माया को नचाते हो आपने नये गोप बाल
गौधन बनाकर ब्रज को खेल खिलाते रहे ।किसी को भी पता
नहीं चलने दिया ।फिर ब्रह्माजी को अपना जानकर कृपा की
और उनका भ्रम मिटा दिया मुझसे गलती हुई मुझे क्षमा
कर दो। मेरा प्रणाम स्वीकार करो आज्ञा दो जिससे मै
अपने लोक को चला जाऊँ ग्वाल बालक बोले हे गोपाल ये
बूढ़ा तुझे प्रणाम कर रहा है संसार मैं तू सबसे बड़ा है क्या
श्रीकृष्ण बोले सब बृज के रहने वाले हमारे बड़े हैं।
गुपाल कहते हैं यह सुंदर धाम श्री कृष्णा को अत्यन्त
प्रिय है
 
 
 
[    ]
नतमस्तक कर  ढोक दिवाई     वरुन गहे  श्रीनन्द  जु  पाम
नर कूबर  मुक्ती  कर दीनीं       घुटअन खेल खेल मैं स्याम।
इंद्र मान मरदन हरि कीनों           हार मान आने ब्रज धाम
सरनागत  हो स्तुति  कीनी       देवराज ब्रज  श्री घनस्याम
दोष क्षमा  कर दीनों  माधव     सरनागत वत्सल  श्री स्याम
ब्रज कौ मान बढ़ायौ केशव       अजहु पुजै  प्यारौ ब्रज धाम
नर सों  देव  झुके    धरनी  काज  अलौकिक  तेरे  स्याम
राह दिखाई ब्रजबासिन         हरि  तोर दई ब्रज प्रथा तमाम
कुश्ती कला जोर अजमावत      दूध  दही  माखन खा स्याम
दाऊ कहें कान्ह बलधामा         गिनगिन मारे  असुर तमाम
चिंतातुर सब चिंता छोड़ौ       ‘’ गुपाल’’ छोटो  दीखै  स्याम
 
जय राधे  जय राधे  राधे                जय राधे  जय  जय घनस्याम  
जय कृष्णा जय कृष्णा कृष्णा    जयगुपालप्रभु राधेस्याम
 
 
भावार्थ :—-
वरुणजी जब नन्द जी को  रात्रि मैं स्नान करने
के अपराध मैं पकड़ ले गये तो आपने जल के देवता को
समर्पण करा कर नन्दबाबा की ढोक लगवा दी वरुण
जी ने बाबा के पैर पकड़ लिए श्रीकृष्ण ने घुटनों से
चलते हुए नल कू बर नाम के यक्षों की जो नन्द भवन
के बाहर खड़े थे  गिरा दिया  और उन्हें मुक्ति प्रदान
कर दी उन्होंने श्री इंद्र का मान मर्दन किया हार
मानकर वे ब्रज मैं गये  उन्होंने श्रीकृष्ण की शरण
ली स्तुति की ।और दीनों को शरण देने वाले शरणागत
वत्सल श्रीकृष्ण ने क्षमा कर दिया और उनको सुरलोक
भेज दिया श्रीकृष्ण ने बृज मंडल के यश को इतना
बढ़ा दिया  कि देवता  देवताओं के राजा भी उनसे
मिलने पृथ्वी पर आये श्रीकृष्ण ने सभी रूढ़ियों को
तोड़कर ब्रजबासियों को नई राह दिखा दी और  दूध
दही का भोजन करके कुश्ती को ऊँचे आयाम दिए ।श्री
बलराम जी बोले कि श्रीकृष्ण बहुत     ही बलशाली हैं
तुम लोग अपनी  चिंताएं छोड़ दो।
 
 
]
सबके  बल  गिरिराज उठायो     मथुरा  हलकौ हलकौ  काम
रिनी रहूँ  अब  जान दो  मोहि   बृज  भूमि  कूं  कोटि  प्रनाम
मोय   आन मैया   बाबा की     अपने   मन   राखूं  ब्रज धाम
कोई  भाव  मोहि  नर   सुमरै   बन   जांयेंगे    सारे      काम
भूमंडल  बृज भूमि  सुपावन        वास  करे  सों  मुक्ताराम
यमुना जू  गिरराज तलहटी      भगत रटैं जँह मोहन  नाम
प्रेमपास डारयो बृज जनजन   प्रेमपियासी    ब्रज की  वाम
बुद्धि चातुरी लखि अचरज अति   नरनारी  सब पीछे स्याम
अक्रूर मन श्रद्धा उपजानी      अदभुत जान  कृष्ण  बलराम
ग्वाल बाल सब संग चलिंगे    घेरा घेर           रखिंगे स्याम
बहु माखन ’’गुपालहम खायौ  तन बलशाली जोर  तमाम
 
 
जय राधे  जय       राधे  राधे          जय राधे  जय  जय घनस्याम  
जय कृष्णा जय कृष्णा कृष्णा   जयगुपालप्रभु राधे स्याम
 
 
भावार्थ:—
 
श्री कृष्ण बोले हे राधिके तेरे बल से मैंने  गिर्राज उठा
लिया वही बल मथुरा जी मैं काम करेगा ।बृज का यह क्षेत्र
धरती पर  अलग है इस मैं रहने से मनुष्य मुक्त हो जाता है
भगवान का नाम श्रवण भगवान का नाम सुनाना गुणों का
बखान करना भजन करना  सब अच्छे  लगते हैं मैं आपका
कर्जवान रहूंगा मुझे जाने की आज्ञा   दे दो मैं तुम्हें प्रणाम
करता हूँ कंस मामा के राज काअंत जरूरी है अधर्म  तभी
बंद होगा। ब्रजवासियों ने  समझ लिया कि कृष्ण अब जायेगा
सब  ब्रजबासी बोले हे केशव हम तो तेरे पीछे हैं हमें तू बहुत
प्यारा लगता है हम सब  तेरे संग मैं चलिंगे और  तुझे घेरे मैं
रखेंगे हमने तेरे साथ माखन बहुत खाया है हम सबके
शरीर मैं बहुत जोर है
 
 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *