श्री गोपाल अलौकिक काज कीर्तन रस माधुरी

श्री गोपाल अलौकिक काज कीर्तन रस माधुरी             
नतमस्तक कर ढोक दिवाई  वरुन गहे  श्रीनन्द जु पाम ।
नर कूबर  मुक्ती  कर दीनीं    घुटअन खेल खेल मैं स्याम।
इंद्र मान मरदन हरि कीनों      हार मान आने ब्रज धाम ।
सरनागत  हो स्तुति  कीनी  देवराज ब्रज  श्री घनस्याम ।
दोष क्षमा कर दीनों  माधव  सरनागतवत्सल  श्रीस्याम ।
ब्रज कौ मान बढ़ायौ केशव  अजहु पुजै  प्यारौ ब्रज धाम ।
नर सों  देव  झुके  आ  धरनी  काज अलौकिक तेरे स्याम ।
राह दिखाई ब्रजबासिन      हरि  तोर दई ब्रज प्रथा तमाम ।
कुश्ती कला जोर अजमावत   दूध  दही माखन खा स्याम ।
दाऊ कहें कान्ह बलधामा      गिनगिन मारे  असुर तमाम ।
चिंतातुर सब चिंता छोड़ौ    ‘’ गुपाल’’ छोटो  दीखै  स्याम ।
जय राधे  जय राधे  राधे     जय राधे  जय  जय घनस्याम  
जयकृष्णा जयकृष्णाकृष्णा  जय‘गुपाल’प्रभु राधेस्याम
भावार्थ :—-
वरुणजी जब नन्द जी को  रात्रि मैं स्नान करने के अपराध मैं
पकड़ ले गये । तो आपने जल के देवता कोसमर्पण करा कर
नन्द    बाबा की ढोक लगवा दी । वरुण     जी ने बाबा के पैर
पकड़ लिए । श्रीकृष्ण ने घुटनों से चलते हुए नल कू बर नाम
के यक्षों की जो नन्द भवन के बाहर खड़े थे  गिरा दिया  और
उन्हें मुक्ति प्रदानकर दी । उन्होंने श्री इंद्र का मान मर्दन किया ।
हार  मानकर  वे  ब्रज  मैं  आ  गये   उन्होंने श्रीकृष्ण की शरण
ली स्तुति की ।और दीनों को शरण देने वाले शरणागतवत्सल
श्रीकृष्ण  ने  क्षमा  कर  दिया । और उनको सुरलोक भेज दिया ।
श्रीकृष्ण  ने  बृज मंडल  यश   को  इतना  बढ़ा दिया  कि देवता
देवताओं के राजा भी उनसे मिलने पृथ्वी पर आये । श्रीकृष्ण ने
सभी रूढ़ियों को तोड़कर ब्रजबासियों को  नई राह दिखा दी। और
दूध दही का भोजन करके कुश्ती को ऊँचे आयाम दिए।श्री बलराम
जी बोलेकि श्रीकृष्ण बहुत ही बलशाली हैं तुम लोग अपनीचिंताएं
छोड़ दो।

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