श्री गोपाल गुरु ज्ञान कीर्तन रस माधुरी

श्री गोपाल गुरु ज्ञान कीर्तन रस माधुरी
बैनु बजैया  धैनु चरैया           ,     प्रेम  लुटैया प्यारे  स्याम ।
गोपी माधव  रास रचैया         ,     चीर  चुरैया ग्यानी स्याम ।
आत्म ग्यान दीनों प्रिय गोपिन , सखी बात सुन लो अविराम ।
गूढ़ तत्व   सब शास्त्र बताऊं     , जल थल नभ रहसबको राम ।
सखी सयानी  बसन तजे तुम    लाज नहीं मन ललित ललाम ।
तुम हरि  अंश   परम सुखदाई   ,       भेद भावना  देउ  विराम ।
दूरी घटा   मिलो  परमात्मा      ,   तत्व जगत हरि पूरन काम ।
आत्मा परमात्मा सखि जोड़ो    ,    मिल जांयेंगे मोहन स्याम ।
आत्मा परमात्मा  न      जानें    ,        तू  ही  ईश्वर तूहि  राम ।
उलझावै मत आत्मज्ञान मै       , प्रेम   प्रीत  जग सीधौ काम ।
दै        दै चीर हमारे मोहन ,    ” गुपाल ” छैला छलिया स्याम ।
जय राधे   जय राधे राधे      ।   जयराधे जय सीता   राम।
जयकृष्णा जयकृष्णाकृष्णा जय ‘गुपाल’प्रभु  राधेस्याम।     
 भावार्थ :– –
गोपिन के स्वामी रास रचाने वाले उनके वस्त्रों को चुराने वाले
स्याम आप ही हो। हे सखियौ हे मेरी मित्रो मेरी बात को सुनो
  मैं तुम्हें आत्म ज्ञान दे  रहा हूँ। मानव जीवन का गूढ़ रहस्य
जल मैं धरती मै आकाश मैं  हर जगह परमात्मा का निवास है
। ईश्वर हर, जगह है फिर आपकोनंगे नहीं नहाना चाहिए। मुझे
अचरज हो रहा है तुम पानी मै नंगी  नहा रही हो । और मुझसे
अपना शरीर छुपा रही हो मुझसे क्या छुपाती हो।मैं तो परमात्मा
हूँ। मुझसे दूरियां घटा लो । मुझ मैं मिल जाओ । परमात्मा जगत
का सुंदर सत्य है। तुम सब मेरा ही अंश हो   परम सुखदैनी वाली
सखियो सब भेद मिटा लो। आत्मा कभी नंगी  नहीं होती है । इस
स्थूल, शरीर को ढकने का क्या प्रयोजन केवलसांसारिक है। एक
परमात्मा का ध्यान ,करो। सखी  क़ुछ भी भेद मत रखो।मैं तुम्हारे
वस्त्र दे दूंगा। आत्म तत्व को प्रनाम करो। सखियाँ बोली हे गोपाल
तुम में बहकाओ न हमारे  तो तुम्ही राम हो तुम्ही ईश्वर हो। श्री कृष्ण
बोले तुम आत्म तत्वको प्रणाम करो , मैं तुम्हारे   वस्त्र अभी दे दूंगा।
हे कृष्ण तुम ही सब कुछ हो ,तुम्ही ईश्वर हो तुम्ही राम हो हमें मत
बहकाओ और तुमसे विनती है कि तुम आत्मा परमात्मा के भेदों
मैं हमें मत उलझाओ ।

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