श्री गोपाल गोकुल तजन नमन कीर्तन रस माधुरी

   
श्री गोपाल गोकुल तजन नमन कीर्तन रस माधुरी
सबके  बल  गिरिराज उठायो   मथुरा  हलकौ हलकौ  काम ।
रिनी रहूँ  अब  जान दो  मोहि  बृज  भूमि  कूं  कोटि  प्रनाम ।
मोय   आन प्रिय मैया   बाबा    अपने   मन   राखूं  ब्रज धाम ।
कोई  भाव  मोहि  नर   सुमरै   बन   जांयेंगे    सारे      काम ।
भूमंडल  बृज भूमि  सुपावन         वास  करे  सों  मुक्ताराम ।
यमुना जू  गिरराज त लहटी       भगत रटैं जँह मोहन  नाम ।
प्रेमपास डारयो बृज जनजन    प्रेमपियासी  मंडल    वाम ।
बुद्धि चातुरी लखि अति   अचरज    नरनारी  सब पीछे स्याम ।
अक्रूर मन श्रद्धा उपजानी       अदभुत जान  कृष्ण  बलराम ।
ग्वाल बाल सब संग चलिंगे    घेरा घेर           रखिंगे स्याम ।
बहु माखन ’’गुपाल’ हम खायौ  तन बलशाली जोर  तमाम ।
जय राधे  जय       राधे  राधे          जय राधे  जय  जय घनस्याम  
जय कृष्णा जय कृष्णा कृष्णा   जय ‘गुपाल’ प्रभु राधे स्याम
भावार्थ:—
श्री कृष्ण बोले हे राधिके तेरे   बल से    मैंने  गिर्राज उठा  लिया ।
वही बल मथुरा जी मैं काम  करेगा ।   बृज का यह क्षेत्रधरती पर
अलग है । इस मैं रहने से मनुष्य मुक्त हो जाता है। भगवान का
नाम श्रवण भगवान का नाम सुनाना गुणों का बखान करना भजन
करना  सब अच्छे  लगते हैं । मैं आपका कर्जवान रहूंगा। मुझे जाने
की आज्ञा   दे दो । मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ ।कंस मामा के राज का
अंतजरूरी है । अधर्म  तभीबंद होगा। ब्रजवासियों ने समझ लिया
कि कृष्ण अब जायेगा । सब  ब्रजबासी बोले हे केशव हम तो तेरे पीछे
हैं हमें तू बहुत प्यारा लगता है हम सब  तेरे संग मैं चलिंगे और तुझे
घेरे मैं  रखेंगे । हमने तेरे साथ माखन बहुत खाया है । हम सबके
शरीर मैं बहुत जोर है ।

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