श्री गोपाल बृज फाग कीर्तन रस माधुरी

श्री गोपाल बृज फाग कीर्तन रस माधुरी
ब्रजमन्डल श्रिंगार बढ़ावन    तो सो रसिया भयो  न स्याम ।
फाग खिलारी गोपि ग्वाल संग  रसिक बिहारी रसिक प्रणाम ।
उडत गुलाल अबीर रेत रज       रंग    बिरंगो   रसमय  धाम ।
अवनि लाल पीरी बासन्ती             कारी   धौरी  नीली स्याम ।
कारे पीरे मुख सों टेरत                    राधे  राधे  माधव स्याम ।
अलबेली रंगीली , रांधे                     अलबेले गोपाला स्याम ।
फ़ाग मास  अजहु रंग बरसै            भेद  मिटैया अंतरस्याम ।
ब्रजमंडल  मोहित कर दीनों      मोहक मोहिन मोहक स्याम ।
अपढार मन लगै कृष्ण मैं        हवन ज़ोग व्रत  होइ  विराम  ।
बजै बांसुरी छन छन नाचें          बड़े बाल  सब ग्वाल  तमाम।
गोपी कीन  प्रेम रस पागल ,    ” गुपाल ”प्यारे नटखट स्याम ।
जय राधे  जय राधे राधे          जय राधे  जय  जय घनस्याम  
जयकृष्णा जयकृष्णाकृष्णा     जय ‘गुपाल’प्रभु राधेस्याम
भावार्थ :–
हे गोपियों के संग फाग खेलने वाले आपके समान रसिया दूसरा
आज तक नहीं हुआ।बृज मै श्रृंगाररस कोबढ़ाने वाले सभी रसिकों
मैं श्रेष्ठ हे गोपाल  बिहारी तुम बृज को बहुत प्रिय हो  धरती लाल
पीली बसंती काली नीली और धौरी हो रही है। गुलाल उड़ रहा है।
साथ मैं अबीर और बृज की अलौकिक रेत उड़ रही है।यह ब्रज का
पवित्र धाम रंगबिरंगा है।काले पीले मुंह से रसिक श्रीराधे श्रीकृष्णा
बोलरहे हैं । हे कृष्ण आप हमेशा राधे     राधे गाते रहते है । कृष्ण
आप जसुदानन्द के प्रियपुत्र हो । वंशी बजानेवाले प्रेमरस लुटा देने
वाले ऊँच नीच का भेद मिटा देने वाले मेरे प्रियस्याम तुमअलौकिक
हो।हे गोपाल तुमने मोहिनी श्रीराधेके साथ सारे बृज को मोहित कर
दियाआपकी  बाँसुरी बजते  ही  गौएँ बृज की स्त्रियां अपनी सुध खो
बैठतीं हैं।मनअपने आप ही तुम्हारी तरफ खिंचता है हे कृष्णगोपाल
सब भजन योग सबको भूलकर तुम्हारी ओर खिंचते हैं। गुपाल कहते
बांसुरी के प्रेम मैं उन्मत लोग छोटे बड़ेसभी नाचने लगते हैं ।

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