श्री गोपाल ब्रह्मा भ्रम उद्धार कीर्तन रस माधुरी

श्री गोपाल बृह्मा  भ्रम उद्धार कीर्तन रस माधुरी
ब्रह्मापथ  भटकावन वारे             गौधन चोर बनैया स्याम ।
मायापति मायावर स्वामी        माया जग नचवैया स्याम ।
नई सृष्टि कर ग्वालबाल ब्रज वन वन खेल खिलैया स्याम ।
निजजन पै किरपा करवैया  विधिना अहम मिटैया स्याम ।
भूल भुलाबौ भयौ  प्रभू जी   चंचल   माया  व्यापी    स्याम ।
कोउ  न भयो जगत हरि तोसो    नटनागर गोपाला स्याम ।
हो  हूँ  दास  पुरातन  माधव           कृपा सिंधु कृपालु स्याम।
छमहु मोहि जानौ   निज सेवक   स्वामी  बारम्बार प्रणाम ।
कहें  ग्वाल ई बूढों  बाबा   लाला   तोकुं      करै         प्रणाम ।
‘गुपाल’ तू तो बडों जगत कौ   हम जानत   ना प्यारे स्याम ।
ब्रजबासी  सब बड़े हमारे  ‘’     गुपाल’’ भ्रात बड़ौ  बलराम ।
जय राधे  जय राधे  राधे     जय राधे  जय  जय घनस्याम  
जयकृष्णा जयकृष्णाकृष्णा जय ‘गुपाल’प्रभु राधेस्याम
भावार्थ :–

ब्रह्मा को गौ ग्वालबाल का   चोर बना  पथ से  डिगा दिया ।
हे  प्रभु आपही  माया के पति स्वामी हो ।    माया जग को
नचाती है आप माया को नचाते हो । आपने नये गोप बाल
गौधन बनाकर ब्रज को खेलखिलातेरहे।किसी को भी पता
नहीं चलने दिया।फिर ब्रह्माजी को अपना जानकर कृपा की।
और उनका भ्रम मिटा दिया । मुझसे गलती हुई मुझे  क्षमा
कर दो। मेरा प्रणाम स्वीकार करो।आज्ञा दो जिससे मै अपने
लोक को चला जाऊँ।ग्वाल बालक बोले हे गोपाल ये बूढ़ा तुझे
प्रणाम कर रहा है संसार मैं तू सबसे बड़ा है क्या।श्रीकृष्णबोले
  सब बृज के रहने वाले हमारे बड़े हैं। गुपाल कहते हैं यह सुंदर
धाम  श्री कृष्णा को   प्रिय है ।

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