गुपाल उद्धार रस ,माधुरी

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[    गुपाल  उद्धार  रस  माधुरी ]
 
धैनुका निरखत     रूप   सुहानों    ।
गौरस्याम  सुन्दर  अति जोरी           मनही         मन  मुस्कानों।
दाऊ   गुपाल ग्वाल मित  बिहरत          बृन्दाबन           ललचानों।
कंस नृसंस काल एइ केइ बिधि          सोच      सोच        बौरानों ।
धैनुक मन बिचार कर लीनों          हनो       मधुपुरी       जानों।
गरजत    ऐंड  दुलत्ती  मारी               दाऊ     सीना           तानों।
द्युति दामिन सी चमक स्याम हिय    ’गुपाल ‘   रूप       लखानों।
 
हिंदी अर्थ  ;——
धैनुक नाम का राक्षस कृष्ण को देखकर देखे जा रहा है।
बलराम व श्याम सुंदर  की जोरी देखकर मन ही मन मुस्कारने
लगे।  दुष्ट कंस का काल यह सुंदर जोरी  कैसे हो सकती है।
सोच सोच कर  पागल होने लगा।  पर कंस  के आदेश को
याद कर  क्रोधित होकर फुफकारने  लगा। धेनुक ने मन मैं
विचार कर लिया   कि अब तो इन्हें मारकर  मथुरा जाना
है।  अपनी दोंनो लाते उसने बलदाऊ  के सीनेमैं  मारी बलदाऊजी
ने उसके दोनो पैर पकड कर घुमाया  तथा धरती परजोर से
पटका। उसके प्रान पखेरू उड   गये   । उसके शरीर से चमक
निकलगयी।   भगवान कृष्ण  मैं समा गयी।
 
 
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[   गुपाल  लोक उद्धार रस  माधुरी  ]
 
 
सूरसुता दुख      सोचहिं  स्याम ।
काली  बिस  ब्यापौ जमुना जल      बृदांबन   हरी     धाम  ।
पंछी  जीब घनेरे  अगिनित         सुरपुर  करहिं  पयाम   ।
रुदन होत कालीदह  गह जल      मृत्यू  नित्य  कौ  काम  ।
पीरा ब्रज  सुनि मेंटन धाये      सखान संग    घनस्याम  ।
रौर मच्यौ अति   कंदुक क्रीड़ा  फेंकी   जमुन     बिराम   ।
जगत  उद्धारक  चरित अनूठौ      गायौ  कबीन   प्रनाम    ।
‘’गुपाल ‘’ टेर सुनी कालिंदी        कालीअ  आपुन    गाम   ।
 
हिंदी अर्थ  ;——
स्यामसुंदर श्री कृष्ण देख रहे हैं यमुना जी बहुत     दुखीं हैं ।
मोहक प्रभु के धाम वृन्दावन मैं जमुना जी का जल कालीनाग
के कारण  विषैला हो गया है।   पानी पीकर  अगिनित   पशु
पक्षी मनुष्य नित्य  मर जाते हैं । जमुना के तट पर अपनों
के मरने का विलाप होता है नित्य विलाप होता है।ब्रजवासियों
की पीरा मिटाने  श्री प्रभु अपने मित्रों को लेकर वहां पुँहचे हैं ।
उन्होनें वहाँ गेंद का खेल जमाकर गेंद को जमुना जी की देह
में फेंक दिया ।    जग का उद्धार करने वाला यह सुन्दर प्रसंग
कवियो ने  अनेकानेक प्रकार से बखाना हैं। उन सबको मैं
प्रणाम करता हूँ । भगवान ने यमुना जी व ब्रज वासियों की
पीरा को   सुन इस लीला को जन्म दिया। यह गूढ़ बात है
।    काली अपने द्वीप चला गया।
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[    गुपाल  काली उद्धार रस माधुरी ]
 
कूदे     जमुना   हरी    सैकारौ ।
जनमन लगन पुरी कालिंदी       आयौ       मोहन   प्यारौ ।
सूर सुता सुख को अस बरनै      खोल्यौ  निज ग्रह द्वारौ ।
आरति करत भगनि जम देबा   काली       जाय    सुकारौ ।
बचा बचा कौ सोर  अबनी  पै  .   ब्रज मंडल            हैकारौ ।
दौरि परै सब कालीदह  कौ       सूनौं          ब्रज ग्रह द्वारौ ।
‘’गुपाल’कृपा तृप्त कालिंदी गोपन  दुखः करारौ      ।
 
हिंदी अर्थ   ; ——
 
काली नाग को तारने  गेंद   लाने के बहाने श्रीकृष्ण भगवान
जमुना जी  में   कूदे । बृज मैं   हाहाकार  मच गया ।   उधर
जमुना  जी  के  हर्ष  का पाराबार न रहा। क्योकि उनकी जन्म
जन्म की  इच्छा पूरी हो गयी ।यमराज कीबहिनश्यामसुंदर
की आरतीकरने लगी। पृथ्वी पर      बचाओ बचाओ का  शोर
हो रहा है । सबके  सब  कालीदह  बृन्दाबन की ओर  दौड़  पडे है ।
सभी ब्रज के रहने वाले कालीदह  की   ओर दौड़ गए  हैं उनके  घरों
के दरवाजे भी  खुले पड़े हैं। श्री गोपाल  कृपासे जमुना जी  भीग
गई। खुश हो रहीं हैं  जबकि ब्रज मैं दुखों का पहाड़ टूट गया है
 ब्रजबासियों को   श्रीकृष्ण का  जमुना  में कूदना   अत्यन्त घोर
दुखी कर  गया  ।
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[   गुपाल  काली उद्धार रस   माधुरी  ]
 
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[   गुपाल  काली उद्धार रस   माधुरी  ] 
थूकत सहस्त्र मुखी फनधारी।
तन सौं लिपटत थाक रहयौ  नाचत फन  बनबारी।
मारि मुष्टिका होस भुलाने फेंकत बिस  बिसधारी।
कूदत भाल नृत्य अति मन्थर  गंधर्ब न  मनहारी।
नटबर बेस सुरीली बैनू  भगतन हिअ     भयहारी।
क्षत बिक्षत फन भये चरण हरी अमरत चितब मुरारी।
दुंदभि बजहिं हरस ब्रजभूमि  जै जै प्रभू     बिहारी ।
सुमन बृष्टि नभ करें  देबगन कीरत कृष्ण  सुरारी।
‘’गुपाल’’ चरन धारे    मस्तक काली सुकरत भारी।
हिंदी अर्थ  ;——
 सहस्त्र मुखों पर   वाले कालिय  नाग के थूक निकल रहा है।भगवान को वह दंसनकर रहा है। उनके  शरीर से लिपट रहा है लिपटने की कोशिश करके हार गया है। भगवान की भारीमुष्टिका के लगने से विषधारी  के मुख से विष निकल  रहा है । श्री कृष्ण गोविन्द काली के मस्तक पर धीमी गति से कूदकूद कर नृत्य कर रहे हैं वह इतना सुन्दर है कि गन्दर्भ के मन को हरने वाला है गोविन्द का भेष नटवर है भक्तों  के मन से भय से भय हारी  हो। कालिय के  फन क्षत बिक्षत होगए हैं मुरारी अमृत भरी नज़र से देख रहे हैं । दुंदभी बजरही हैं बृज भूमि मैं हर्ष का वातावरण है बाँके बिहारी कीजय जय कार हो रही है।
 
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[   गुपाल  काली उद्धार रस   माधुरी  ]
 
 
छमौ    न    कंत      दोस        हरी  राई।
बारि बाढ पुरबै दो  नैना                काली  धनि  जुरि  आई।
भाबुक घनी निरख निज कंता       मुख   सौं बोल  न  आई।
असरन सरन लीन    हम तोई       जसुदा    चंद        गुंसाई ।
गहेऊ  चरन निज कर गोपाला         नीर नयन झड       आई।
चूरन गरब कंत  मेरे कौ                अब  प्रभू       प्रान बचाई।
दया नाग ‘’गुपाल’’ काली पै           अमर   रहै       ठकुराई।
 
हिंदी अर्थ  ;——
कालिय नाग की  पत्नियाँ  बोली हे हरि मेरे पति के दोष
क्षमा कर  दो । नाग राज की सभी पत्नियाँ दोनो नैनों मैं
अश्रुओं की बाढ लिए आ गयी । अपने पति के दुख देखकर
 भावुकता वश बोल नहीं निकल रहे थे । प्राणिमात्र को सरन
 देने वाले गोलोक के नाथ   जसोदा के पुत्र हम     आपकी
सरन मैं आई हैं । नैंनों मै आँसुओं की धारा लिए  सबने
भगवान श्यामसुन्दर के चरणों को अपने हाथों से पकड़
लिया मेरे पति का समस्त घमंड चूर चूर हो गया है। अब
इनके  जीवन को प्रभु बक्श दो  इन्हें क्षमा कर दो ।
गोपाल
कहते हैं हे प्रभु कालीय नाग पर दया करना जिससे तुम्हारी
ठकुराई अमर रहै। कीर्ति अमर रहे।
 
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[   गुपाल काली उद्धार रस  माधुरी  ]
 
 
कालिअ  गरब नस्यौ हरि चरनन।
त्रिलोकी कौ  भार सीस पै                   नृत्य  भंगिमा    हरि  फन  फन  ।
थाके बल  ग्लानी   अति भारी           नतमस्तक  काली          तन मन ।
सरन देउ अब मोइ  मुरारी                 अभअ   दान         दै  अभअवचन।
तजौं बास   मोहन जमुना    जल         द्वीप  रमन   हौं   गऊं    सरन ।
बोले माधब गरुन ना तासै                     धारे  फन   फन    मोर  चरन ।
अटल प्रतिग्या  प्रभू     हमारी                  गुपाल ‘’हिऐ     लगी     लगन।
 
हिंदी अर्थ  ;——
 
 
प्रभु के चरणों  की  मार्  से काली का अहंकार चूर चूर हो गया।भगवान
 का  भार  जो   समस्त संसार के भार के बराबर है  तथा वे फन फन पर
नृत्य कर रहे हैं    । वह बलबान बल हार गया  बुरी तरह थक गया है  ।
अपराध बोध के कारण तन व मन से वह नत मस्तक हो गया है। हे नाथ
अब मुझे सरन देकर  मुझे अभय कर दो  । हे मोहन में जमुना जी  का
वास छोडकर रमनक द्वीप चला जाऊँगा । भगवान कृष्ण बोले मेरेचरणो
के निशान तुम्हारे मस्तक पर देख गरुण कुछ न बोलेंगे  । गोपाल कहते
हैं कालीय बोला यह हमारी अटल प्रतिज्ञा है पूरा करने की मेरे मन मंदिर
 मैं लगन लगी है ।
 
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[   गुपाल     काली    उद्धार रस  माधुरी  ]
 
 
बऊ   जनमन  अती  पुन्य  तिआरे ।
मुक्ति  प्रदायक  भक्ति प्रदायक         चरन  सीस सो      धारे ।
तरसैं  जिन  चरनन    जोगीजन        जपतप करकर        हारे।
सुभ    चरनन  सुभ    चरन पादुका    भरत    राज सिर  धारे ।
एइ चरनन  सुभ  छुअन अहिल्या      मुक्ति   दिबाबन   बारे
चरन   निरख फटकै न गरूना          जग अस    कौन डरा रे ।
‘’ गुपाल’’ चरन अती  अनुपम  हरि      इनहिं       काज करारे  ।
हिंदी अर्थ  ;——–
 
 
हे कालीय  हे   नागराज  तुम्हारे पूर्व जन्मों के अर्जित पुन्यो
के कारण भगवान ने मस्तक पर पैर रखे है।समस्त जीवधारियों
 के मुक्ति प्रदाता भगती देने वाले इन चरणों के लिए योगी
जन भी तरसते है। इन्हीं  पावन चरणों के पादुका भरत जी ने
सिंहासन पर अपने सिर  पर रखे थें। इनके स्पर्श करने मात्र
 से अहिल्या जी की मुक्ति हो गयी है। इन चरनों को देखकर
गरूड आप से कुछ नहीं कहेगा। अत उसका भय मन से निकाल
दो । एसा  कौन है जो तुझे डरा दे  गोपाल जी कहते है इन चरनों
का महात्यम प्रभाब कौन गासकता कौन समझा सकता है ।
इनके  कार्य अवर्णनीय  है   इनका  गुण गान नहीं  किया  जा
 सकता  है
 
 
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[    गुपाल नारी उद्धार रस माधुरी ]
 
चऊं   दिस सैन हरी  हिअ  प्यारी।
बरजत राज बधू कुण्डलपुर          लीन      अंक   गिरधारी।
इच्छा तुरग पयान  द्वारिका      भय    मन  सौं  भयहारी।
मनऊं  सिंअ  लै भाग आपनौ    चालत     जीत    खुमारी।
रूक्मी सिसूपाल सब रोकहिं      बरजै   कौन          मुरारी।
कर दौनन गह लई  भुजा हरि    छमऊ  आन       हमारी ।
बिरन तिहारौ सारो   लागै         गुपाल ‘’ भूल      बिसारी।
हिंदी अर्थ  ;——
 
चारौं  दिशा में सैना होते हुए भी श्रीकृष्ण जी ने रूक्मणी जी
को हर लिया। समस्त राजबधुए उन्हें रोक रही थी।लेकिन
भगवान ने उन्हे अंक में भर लिया। इच्छा केअनुरूप् चलने
को कहा । ऐसा लग रहा था मानो सिंह अपना हिस्सा लेकर
चला गया हो । तथा सिंह अपनी विजय की खुमारी मैं धीरे
धीरे चलने लगा। रूकमी तथा सिसूपाल सब रोक रहे है।मुरारी
को कौन रोक सकता है।रूक्मणी जी ने भगवान की भुजा पकरि कर रूकमी को छुडवा दिया। भगवान बोले वह अगर तुम्हारा भाई है।तो मेरा साला भी है। गोपाल कहते है।  द्वारिकाधीस बोले इसीलिये    उन्होनें उसे क्षमा कर दिया है ।
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[  गुपाल     लोकउद्धार रस  माधुरी ]
 
 
 
धरहिं  पाद  नापत हरी  धरनी।
बख्य  कबच भूसा   रन योद्धा    निरखत      प्रमुदित    होंअ   अनी।
मोरमुकुट  लहरत   पीतांबर        अदभुत     अती      यदुबंस  मनी ।
जन्म सुफल सैनिक  सब जाने मुस्काबहिं              श्रीकृष्ण   धनी।
कालजबन निज  काल न दीसै   क्रोधित         धाबत   हरी  पिछनी।
निर अपराधी  मरें  न   कोऊ            रणछोड़        बने             धरनी।
पीसत दांतन  मींडत कर दोऊ       समझत      नांहिं  प्रभू      करनी।
निरजन बन हेरइ    जगपालक      मूरख          मृत्यु  नांहिं  टरनी।
माया को’’ गुपाल’’ पहचानें             सारद        सेस  कोटि न बरनी।
 
हिंदी अर्थ  ;——
 
भगवान श्रीकृष्ण अपने पैर रखते हैं  तो ऐसा लगता है वे धरती को नाप
रहे हैं । उनकेवक्ष पर कवच  है। वह लडाई केलिए तैयार हैं। पक्ष और
विपक्षी सैना उन्है देखकर खुश  हो रही है। मोर मुकुट पीतांबर धारी
यदुवंश  मनी अति अदभुत है। लोगो के जन्म  भगवान श्रीकृष्ण के
दरशन सफल कर दिये। श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए दौर रहे हैं । कालयवन
को अपना काल नहीं दीख रहा है। वह क्रोधित  होकर हरि की ओर
पीछे  पीछे दौड रहा है।भगवान दोनों सेनाओं मैं उपस्थित निरपराधी
सैनिक को बचाने हरी ने दौड़ने का मार्ग चुना  । वह अपने दाँत
पीस रहा है। हाथो को मींड रहा है। पर प्रभु की करनी को नहीं समझ
रहा है। कोई निरजन वन की तलाश  में प्रभु उसे दौडाते जा रहे
हैं । अरे मूर्ख आज तेरी  मृत्यु नहीं  टलेगी।  प्रभु की माया को
कोई नही जानता।  करोड़ों शेष तथा करोड़ों सरस्वती भी   वर्णन
नहीं कर सकते।
      ]
 
[  गुपाल     उद्धार रस  माधुरी ]
 
 
 
नृप पै कृष्ण दुपटटा   डारयौ।
निद्रा मगन काल बहू बीतौ                   युद्वाश्रम सौं  हारयौ।
गही नीदं जिन देब इन्द्र   सों                देबन कारज सारयौ ।
निरख दोपटा   लाल बरन दिरग          यबन   काल उधारयौ ।
चख्यु      बंद  मींडत   मुच कंदा              घोर गुफा अधियारौ।
कौन मूढ जेइ  मति बौरायी                  मोऐ आन .    सतायौ।
चक्षु खुले दिरग  अगनी   निकसी          घोर लपट हरि तारयौ।
कीनउद्धार  ’’ गुपाल’’ यबन हरि        बिस्मय   रूप्निहारयो।
 
हिंदी अर्थ  ;——
 
 
राजा मुचकन्द के उपर श्रीकृष्ण ने अपना पीला वस्त्र उढ़ा दिया।
युद्व करने  के उपरांत सूर्यवंशी राजा मुचकन्द  इंद्र से वरदान में
नींद प्राप्त कर आराम से सो रहा था । कालयवन ने जब उनके
ऊपर श्रीकृष्ण   का  वस्त्र देखा तो वह  क्रोध से  लाल हो गया।
और उसने राजा को उघार दिया । मुचकंद के नेत्र खुल रहे है।वे
 उन्है खोलने की कोशिश कर  रहे है।गुफा में अत्यंत घोर अंधकार
हैं। ऐसा मूर्ख कौन है। जिसकी बुद्वि बौरा गयीहै।जिसने मुझे आकर
तंग किया । मुचकन्द की आँख खुलते ही अग्नि प्रकट हुई। उसकी
घोर लपटो से कालयवन जल गया जिसे भगवान ने मुक्तिप्रदान
की। उसका उद्धार होते ही  गुफा में भगवान श्रीकृष्ण  प्रकट हो गये
और   और वह  गुफा प्रकाश से आलोकित हो गयी  ।
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[  गुपाल     उद्धार रस  माधुरी ]
 
 
चितबत एक टक कृष्ण मुरारी।
सुन्दर चितबन रूप      रसाला         भय मन सौ   मन हारी।
बिना जान पहचान मगन मन         सोचहि   गिरा   उचारी।
अद्रभुत रूप   महा        तेजस्वी        कौन जनक    महतारी।
तात मात बसुदेब देबकी                 नाम   निरप    गिरधारी।
यादब वंशी  मथुराबासी                  यदुकुल तिलक    बिहारी।
लीने चरन पकर यदुबर के                नृप मन भयौ   सुखारी।
‘’गुपाल’ मुचकंद भाग अनूठे                 दया     भई असुरारी।
 
हिंदी अर्थ  ;——
राजा सामने आये मन मोहक श्रीकृष्ण  को देखने लगा। सुन्दर
 आकृति दिखने  में सुन्दर रूप वाले वे भय के मन से भी भय
निकालने वाले है।उनका रूप महा तेजस्वी है। आपके माता
पिता कौन है।मेंरे पिता वसुदेव जी हैं। तथा माता देवकी है।  मेरा
नाम गिरराज उठाने से गिरधारी है। राजा  ने यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण
के चरण पकड लीये। तथा मन मे खुश  हो गया। हे गोपाल राजा
मुचकंद के भाग्य अनौखे है। जो उन पर असुरो के नाश  करने
वाले भगवान श्रीकृष्ण की कृपा हुई।
[  गुपाल     उद्धार रस  माधुरी
 
[    ]
बीते  जुग अब कोऊ न  तोई।
निरप वय अब न  कोऊ  धरनि पै          काल चक्र दिऎ    खोई।
स्बत बिनास    कुटुंब      सुतनारि         नांय      तिहारौ  कोई  ।
त्याग मोह माया भ्रम सगरे                जो होनों       सो     होई।
राज पाट सब नष्ट भ्रष्ट   जग             द्वापर       रचना बोई।
सुकरत करे   निरप अति पाबन          निर्मल    भगत   संजोई।
‘’गुपाल’’ कह भजौ  हरी  ना मा            प्रेम       भाबना    भोई 
 
 
हिंदी अर्थ  ;——
     हे राजन अब तुम्हारी अवस्था का इस संसार मैं  इस धरती पर कोई
  नहीं है युग बीत चुका है   सबको काल खा गया   है तुम्हारे   पुत्र नारी
         परिवार  सबका  विनाश हो गया है। अत सब मोह माया  भ्रम को
छोड  दो  । जो घटना था वह घट गया है आपका राज्य
नष्ट हो गया है। तथा द्वापर ने अपनी रचना जमा ली है । मुचुकंद
राजा ने अतीव पुण्य किये थे उन्हें निर्मल भगती प्राप्त हो गयी
।गोपाल कहते हैं कि  हे न्रपश्रेष्ठ आप प्रेम सहित भगवान का
नाम भजिये।
  
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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