गुपाल , परम सांच    ,रसमाधुरी

    [      ]
           
   [  गुपाल  परम सांच    रसमाधुरी ]
 
       । मोहन निजजन  जग पत राखहिं ।
कर मन अरपन कर सोंधीजन      निरमल तन मन पावहिं।
फल कल आस मूढ़जन करहीं       जीवन   दुक्ख  बढाबहिं ।
छन छन जेइ  कृष्ण हरि ध्यामें      सहज पार जग  पाबहिं
 अहं भूत मनुआ बिसराबहि             मूढ़ न  हरी गुण गावहिं।
 ‘’ गुपाल ‘’ गूढ़ ग्यान जग भासै       ,  गीतासार   बताबहिं।
 
 
हिंदी भावार्थ :—
मोहन समस्त अपने प्राणियों की टेक[ प्रन ] अवश्य रखते हैं।
घमंड के कारण मन तुम्हें भूल जाता हैं।आपकें गुणगान नहीं
करता हैं। ज्ञानी पुरूष करमो को तुझमें अरपन करते हैं। तथा
निष्काम भाव को प्राप्त करते हैं।और अपना पीछा छुड़ा लेते है।
उनका तन मन निर्मल हो जाता है। मूरख लोग फल की आशा
करते है। जिससे उन्हैं चिंता होती हैं। जो प्रत्येक क्षण भगवान
कृष्ण का ध्यान करते हैं ।वे आराम से मुक्त हो जाते हैं। संसार
से पार पा लेते हैं।  गोपाल यह गूढ़ ज्ञान बताते हैं। कहते है कि
गीतासार यही हे। कर्म करतें रहो उसी का ध्यान करो तथा
फल की इच्छा न करो।
           
  [ ]
         
            [  गुपाल  परम सांच    रसमाधुरी ]
        
                   ।। प्रानी मूढ़ बिरथा घबराबै ।।
तोमें मोमें  अंतर नांईं                 गीता   ग्यान  सुझाबै।
सबकौ कारन सबकौ हेतू               मोई   बेद  बुझाबै।
आदि अंत कारन धारन जग         माया   मोह   भुलाबै।
सबहि करम कर दे तू अरपन       काहे   मन   भरमाबै।
अग्यानी  काहे  फल  चाहत    असफल   हो   दुख   पाबै।
अमर सिद्व एहि पंथ अमोलक    गुपाल ‘  याद  दिबाबै ।
 
हिंदी भावार्थ :—
प्रानी मन में तू क्यों घबरा रहा ।   तुझमे मुझमें बिल्कुल
भी अंतर नहीं है। गीता यह कह रही है मेंहीसबका कारन
हूँ वेद व उपनिषद ऐसा ही कहते हैं में ही सबका आदि अंत
करता धरता हूँ। फिर भी मेरी झूंठी माया मुझे झुठला देती
है।अज्ञानी पुरूष फल की चाह करते है।प्राप्त न होंने पर दुख
पाते है। अपने समस्त कर्मों को मुझे समर्पितकर दो कर्ता
होने का झूँठा भ्रम  छोड़दो आनंद हो जायेगा यह पथ अमर
सिद्व है। गोपाल तो केवल याद दिला रहे स्मरण करा रहे
हैं।
  [          ]
   
 [  गुपाल   परम सांच    रसमाधुरी ]
     
  ।। महारन    सारथि  कृष्ण  कन्हाई ।।
 धरम युद्ध घनघोर रौर  जग    लेंत   नास  अंगडाई  ।
अनी धरम अधरम  कुरूखेता  भिरबैं   रहीं  अकुलाईं ।
कम्पत काया बाढी माया           सुत गुरू पारथ भाई  ।
लीनें पकरि चरन योगेश्वर      दिरग संसय   कह जांईं ।
नाथ विनय सुन  भ्रांती नासौ  किन किन करऊं  लराई।
समरांगन जिज्ञासु अर्जुन     ‘’गुपाल’’ प्रभू  मुस्काई ।
हिंदी भावार्थ :—
भगवान श्यामसुन्दर पार्थ के रथ को सारिथि बनाकर
चला रहे हैं।महासमर का शोर चारों दिशा मैं व्याप्त हो
गया है।  महा विनाश अंगड़ाई ले रहा है।सेनाएं कुरूक्षेत्र
में भिडने के लिए अकुला रही  है। उनका शरीर काँप रहा
है। लेकिन महावीर महाज्ञानी महातपस्वी श्री अर्जुन को
माया प्रभावित कर रही है।  अर्जुन देख रहे हैं कि युद्ध मैं
चारों ओर उनके भाई, पुत्र, गुरु, गुरुपुत्र, उनके बड़े खड़े हैं।
 उनका शरीर काँप रहा है।  मुँह से बोल नहीं निकल रहे है।
 उनके नेत्र  श्रीकृष्ण से अपना सारा संसय कह रहे हैं     ।
भगवान के चरन पकड कर श्री अर्जुन ने कहा हे  यदुपति
मुझे बताओ में किससे लडाई करुं।  गोपाल कहते हैं।
 युद्ध क्षेत्र में अर्जुन के जानने की इच्छा सुन कर    श्री
गोपाल हॅसे। ज्ञानी जिज्ञासु व्यक्ति समय स्थान नहीं
देखता है।
 
      [     
               
             [  गुपाल  परम सांच  रसमाधुरी ]
 ।। क्यों नांइ चरन गहत गिरिधर हरि ।।
 रज चरनन ललाट लिपटाबहिं संत भगत  इहि ब्रजकर।
गहे चरन अकुलाइ  प्रथासुत     , बूझै    संसय  मनघर   ।
गीता ग्यान ’गुपाल’अमर जग , गोबिंद बचन सुखकर  ।
भ्रान्ति मिटी  क्रांती उगिआनी  ,   धर्मबान   योधानर    ।
जिन  ध्याऐ  उनई फल  पाऐ    ,  गाबैं   ग्रन्थ  धरम धर ।
  
     हिंदी भावार्थ :—
प्राणी तू क्यों गिरधारी श्रीकृष्ण के चरन नहीं पकडता  है।
संशय पूछ डाले अदुभुत सारथी ने    उन्हें गीता का अमर
अटल ज्ञान दिया।उस  महावीर  योधा   के कानों में गीता
का अमर ज्ञान पडने से सअरे इन चरनों की रज  को ब्रज
के संत अपने ललाट पर   लगाते हैं।फिर प्रसन्न होते हैं।
इन्ही चरणों को अकुलाकर  संशय ग्रस्त होकर कुंती पुत्र
 अर्जुन ने इन्ही चरनों को पकडा  था । फिर उन्होंने अपने
मन के सारे री भ्रांतियाँ  मिट    गयी। जिसने भी  गोपाल
 का  भजन किया। उसी    को  प्रसाद रूपी फल मिला है।
 ऐसा सभी धर्म को धारण   करने  वाले धर्मग्रन्थ गाते हैं
कहते  ।
 
 [     ]
 
           [  गुपाल , परम सांच    ,रसमाधुरी ]
   
       ।। प्रानी  तजऊ    बृथा अभिमान ।।
रुप  रंग सब       भूल भुलैआ           , झूंठी  तेरी उडान।
बहुत बली मांटी मैं मिल गऐ          , ढूंढे  नांई  निसान।
परमारथ रत करलै निज मति      सहज तोर कल्यान।
अंसमात्र सों तू इतराबै                   दयासिंधू   पहचान।
मद  तज भजौ  ‘’गुपाल’’ निरंतर   होंय  पूरे अरमान।
 
हिंदी भावार्थ :— –
प्राणी अपने झूंठे अभिमान को छोड दो।ये रूप ये रंग
ये जवानी सब तेरी भूल है  तेरे पैर क्यों धरती पर नहीं
पड़ते हैं बडे बलबानों का कहीं नामोनिशान नहीं है।
सबके  सब  मिटटी में  मिल गये । अपनी बुद्धि को
परमारथ में लगा दो इसी से  इस जगत  मैं  तुम्हारा
 कल्याण हो जायेगा । अरे गोपाल एक अंश  मात्र
मिलने से  तू अंहकारी  हो गया है।  अरे दया के सागर
को पहचान लो  अहंकार घमंड को   छोडकर तू प्रभू
गोपाल का भजन कर ले ।  तेरे  सारे कार्य पूरे हो
जांयेगे ।
 
   [     ]
               
    [  गुपाल , परम सांच    ,रसमाधुरी ]
 
            ।। छन छन धरउ  संबरीआ  ध्यान ।।
सुमरन नाम सुकारज साधौ      संतन  करयौ  बखान।
ध्यान धरत मति निखरै प्रानी    प्रभू  गुपाल  पहचान।
सांस  सांस    लै सुमर कन्हैआ   अपढर होइ  कल्यान।
बिरथा जीवन जाइ अकारथ    कर  लेउ करम  महान।
लख चौरासी मुकती पाबै         पुरजांइ  सब अरमान ।
तनमन धन अरपन कर चरनन   सांचे गुरूबर ग्यान ।
 
हिंदी भावार्थ :—
हे मनुष्य हर क्षण श्रीकृष्ण  का ध्यान  करिये। हे  साधु
पुरूषो सज्जनों  संतो ने  इसे  सुकारज  [ अच्छा कार्य ]
 बताया है। इसका  उल्लेख किया है ।    ध्यान धरने से
बुद्धि   निर्मल होती  है  गोपाल कहते हैं तू अपने स्वामी
आनंद कंद     गोपाल   गोविन्द को पहचान ले ।  इसके
प्रत्येक    साँस मैं  सुमरने से आप    ही      कल्यान हो
जायेगा ।    बेकार  में  महान जीवन को नष्ट न करो ।
 भगवान    के भजन का महान कार्य कर लो । तथा तू
चैरासी लाख    यौनियो के चक्कर से बच जायेगा ऐसा
गुरू का मत है।   और हे प्राणी तेरे सब अरमान पूरे हो
जायेंगे सब     इच्छायें पूरी हो जांयेंगी ।  तनमन धन
प्रभू को अरपन कर दो ।       ऐसा ही गुरू का मत है ।
यही गुरु का ज्ञान है।
                           
   [   ७   ]
           
[  गुपाल , परम सांच    ,रसमाधुरी ]
 
            ।। काहे तू चिन्ता करत ‘’गुपाल’’ ।।
 चिन्ता करे घटै सब तन मन    ब्याधी बढ़ें बिकराल  ।
चिन्ताहरन नाम नटनागर       कालउ हरि महाकाल ।
नंगौ आयौ   नंगौ  जाबै              कीनों काहे   मलाल  ।
बोल हरीहर एक सुख सांचों         महा  झूंठौ   जंजाल।
याहै रटे ते चित्त सांत हो              मिटइ  जबर बबाल ।
भबसागर सों   तरनों चाहै        भजौ  गोबिंद   गुपाल ।
 
 हिंदी भावार्थ :—-
हे गोपाल तू क्यों चिन्ता करता है।चिन्ता करने से तन
तथा मन दोनों घटते हैं  तथा बीमारियाँ भयंकर रूप ले
लेतीं  हैं।  श्रीभगवान नाम समस्त चिंताओं को हरने
वाला  है और फिर प्रभू कालों के भी काल  है। तू नंगा
आया था मरने के बाद  भी नंगा जाना है फिर तूने दुःख
क्यों किया है केवल हरीहर तू बोले जा यही सच्चा सुख
है। और सब झूंठे संसार का  झूंठा जंजाल है। भगवान
का नाम लेने से सब व्यर्थ के विवाद शांत हो जाते हैं
गोपाल का नाम भजकर तू चिन्ता तथा संसार सागर
से भी मुक्त हो  जायेगा।
 
                           
    [       ]
 
      [  गुपाल  परम सांच    रसमाधुरी ]
।। जयति  जै राधे कृष्ण सुहाबनी ।।
     रस राज रस आनंद धारा        पीबनी और  प्यायबनी ।
     भगती स्वरूपा  आनंदी  मां     कृपा  कटाक्ष  प्रदायिनी।
     भगतन पहुंचत टीस जब जग   निबारनी   ब्रसभानुनी।
     जयत जय श्रीबृन्दाबिहारन   ब्रजबल्लभे ब्रजस्वामिनी।
     गहो ‘’गुपाल ‘सरन श्रीराधे     श्री लाड़ली  भब   तारनी ।
 
  हिंदी भावार्थ :—
हे कृष्ण भगती की आराधिनी देवी श्री राधिके तुम्हारी जय
हो जय हो । कृष्ण रस की आनंद धार तथा स्वयं कृष्ण रस
पीने वाली तथा पिलाने वाली तुम सत्य हो तुम्हारी जय हो
। श्याम सुन्दर की कृपा बांटने की अखण्ड श्रोत तथा भगतो
पर दुख् आते ही टारने वाली वृन्दावनेश्वरी  बृषभानु की पुत्री
आपकी बारंम्बार जय हो। ब्रज भूमि जगत को लुभाने वाली
वृन्दावन मैं विहार करने वाली आपकी जय हो। श्रीराधे आप
ब्रजभूमि मैं श्रेष्ट हो तथा ब्रज की स्वामिनी हो । हे गोपाल तू
सब छोड़कर श्री स्वामिनी राधे की शरण ले ले । श्री राधे
स्वामिनी तुझे भवसागर से पार कर  देंगी
 
   [      ] 
 
      [  गुपाल  परम सांच    रसमाधुरी ]
           
।। भगती बरसै गिरी  गोबरधन ।।
 योगासन  कहूं  ध्यान भंगिमा    कहूं दुपरीआ अगन तपन   ।
कहूं अरचना कहूं  बन्दना            कहूं  साधना और   साधन ।
कहूं  हरी बोल धुनी निकसत    धन्य  भूमी ब्रज   बैसनबजन ।
बिधा अनूठी दंड  परिक्रमा          गोबरधन  सासटांग  नमन ।
कोटन प्रानी   भगती पूजा        गिरराज धरन जग आराधन  ।
 ब्रजबासी ‘’गुपाल ‘हो फिरसों जन्मभूमि   हरी भजै  मगन  ।
         
हिंदी भावार्थ :— –
भगवान की सगुण भक्ति की बर्षा गोवरधन में होती है।  कहीं योगी
जन आसन लगाये हैं। कहीं पर ध्यान करने वाले ध्यान कर रहे हैं।
  कहीं पर साधक अग्नि के पास बैठकर दोपहर मैं तपस्या कर रहे
हैं। कहीं पूजा तथा कहीं स्तुतियाँ कहीं निवृत मार्गी साधक साधना
कर रहे हैं।तथा कहीं हरी बोल हरी बोल धुनि से कीर्तन कर रहे हैं।
गोपाल कहते है।  ब्रज के वैष्नव धन्य है। दंडवत परिक्रमा भगवान
गिर्राज के नमन का तथा तन मन को  चरणों मैं समर्पित करने का
अनौखा तरीका है।  करोड़ों प्राणियों की भगती गोपाल के पूज्य
श्री कृष्ण की पूजा ही है।  बृजवासी गोपाल आशा करता है।
उसकी जन्मभूमि का वास फिर से उसे मिल जाये। जिससे वह
प्रसन्न   होकर भगवान का भजन कर सके।
                       
   [        ] 
                 
  [  गुपाल , परम सांच    ,रसमाधुरी ]
                   
      ।। हौं तोर चरनन दास   संबरिआ ।।
 स्याम कलेबर स्याम लटेबर   स्यामहि नाथ  कंबरिआ ।
बंसीरस बरसाबन  बारूं             कोटिन बरस  उमरीआ ।
नेह  उडेलत  भर भर झोरी    पोसत  हिरदय  खिरकिआ ।
पीताम्बर नटनागर  चितबन   मन  हरी  बसी  मुरलिआ।
खेलत खेलत दूजन प्रानी             धरनी    भार   घटईआ ।
सदां कृपा ‘’गुपाल ‘’हरि राखौ     गह  लई प्रेम डगरिआ ।
 
हिंदी भावार्थ :—
हे श्रीकृष्ण में आपके चरणों का दास हूँ  सेवक हूँ । काला रंग
काले बाल तथा काला कंबल ओढने वाले वंशी रस बरसाने
वाले श्री श्याम सुन्दर इस  वंशी की एक क्षण की बरसामन
पर मैं करोड़ों साल की अपनी   उम्र को न्यौछावर कर सकता
 हूँ । यह झोरी भर भर कर रस निकालती है जिससे मेरे
हिरदय की खिड़की अपने आप खुल जाती  है पीताम्बर धारी
ग्वाल वेषधारी मेरे मन मैं तेरी वंशी बस गई है। तथा खेल
खेल में दुष्टों का  नाश कर तुम धरती का भार घटाते हो । हे
गोविन्द मेंने तुम्हारी  डगर  अपना ली   है । तुम हमेशा  प्रभू
मुझ गोपाल पर कृपा बनाये  रखना।
 
 
             [        ] 
                 
                [  गुपाल परम सांच    रसमाधुरी ]
             
              ।। नश्वर देही मूढ़ इतराबंइ ।।
   ब्याधि घुन रहयौ कुतर निरंतर       मृत्यू  ग्रास  बनाबंइ ।
    लता पता  जडजंगम  प्रानी              मतना  इनैं सताबंइ ।
       सार तत्व इन  सबई सेबा         कर  नहिं तु  पछताबंइ ।
   प्रभु सेबा सरवोपरि जग में          क्यों    ना एहि मत भाबंइ।
पंचतत्व निरमित’’गुपाल’’ तन,  आप  धरन  मिल जाबंइ  ।
हिंदी भावार्थ :—-
शरीर पर हे मनुष्य क्यों खुश होता है।प्रशन्न होता है।इसको
रोजना बीमारी सता रही हैं। जैसे लकडी को घुन खा जाता है।
 मृत्यु इसे ग्रास बना लेगी। लता पता जंगल तथा संसार के
प्राणी को तू कभी मत सताना । जीवन का सार इनकी सेवा
। जो अप्रत्यक्ष रूप से प्रभू की सेवा हैं। पाँच तत्वों से ये शरीर
बना है। गोपाल कहते है एक दिन अपने आप मिटटी में मिल
जायेगा।
 
   [        ] 
   
[  गुपाल परम सांच    रसमाधुरी ]
 
     ।। प्रानी सोचत हौं निरधन भारी ।।
 परिजन निजजन त्याग दीन सब      विपदा कीनीं यारी ।
महा समुंदर दुक्ख जगत बिच             डूबन   आई   बारी ।
सपन जगत मैं मोकूं  लागै                 होबै  आपुन  ख्बारी ।
मुंदी गैल मुंद गये महल                   फाटक  कीलन  बारी ।
एक आस बिस्बास नाथ तूहि       जग तम  किरन उजारी ।
‘’गुपाल ‘’ सदां दृष्टि चरनन  पै,     ध्याबौ   कृष्ण   मुरारी ।
 
हिंदी भावार्थ :—
हे प्राणी क्यों सोच रहे हो । कि में भारी निरधन हूँ ।परिवारी
जन व निजजन सब साथ छोड गये। मुझ पर भारी मुसीबत
पड गयी । दुखों के समुंदर में नाव डूबने की अपनी वारी आई
लगती है। इस स्वप्न रूपी में अब अपनी ख्वारी होने वाली
लगती है। सारे रास्ते सारे महलों के दरवाजे बंद हो गये हैं ।
जिनके किबाड विशाल कीलों से युक्त हैं ।भारी अंधकार के
बीच केवल तुम ही रौशनी की एक किरन दिखाई दे रहे हो।
इसलिए हे गिरधारी मैंने तुम्हारे चरणों पर दृष्टि डाली है।
श्री कृष्ण मैं आपका ही ध्यान करूँगा। हे कृष्ण गिरिराज
धारण करने वाले    मेरी पार ल
   
       [    3    ] 
               
          [  गुपाल , परम सांच    ,रसमाधुरी ]
                                 
          ।। छन छन कृपा  करईं  नंद नंदन ।।
 सोंधी प्रानी  हिअ  हरसामत    करत स्तुति  करहिं   बंदन ।
मूढ़ प्रलाप ग्यान न तनिकऊ         करहिं  बिरथाहि  गंगन ।
पिरथक मारग खोजत फिरहिं        खोटेन खोटे अंजन ।
                                                 कूढा बीनत उमर बितानी                , छांड सुनाम सुकंचन ।
मिथ्या जग सों मोह न छोड़ें             समझत ना नंद नंदन ।
काज आन बिरथा  संसारी  ‘   ’गुपाल’’  करौ  हरी सुमरन ।
 
हिंदी भावार्थ :— –
गोपाल कहते हैं । प्रभू की कृपा हर क्षण होती है। जानकार
लोग  पहचान  कर स्तुति तथा उनका अभिंनदन करते हैं।
जो अज्ञानी पुरूष हैं  उन्हें इसकी पहचान नहीं होती है। वे
इस जग में संसार मैं दंगा करते रहते हैं।  वे लोग न्यारे
न्यारे [अलग अलग ] रास्तों  पर चलते  रहते है। बुरे मनुष्यों
के नेत्र भी बुरे होते हैंउनकी द्रष्टि भी बुरी हो जाती है वो संसार
मैं  कूड़ा [ संसारी कार्य  ] ग्रहण करते हैं। और कृष्ण रूपी
सोने को[ सच्चा सोना ] त्याग देते हैं । इस झूठे संसार से
उन्होंने मोह नहीं छोड़ा है गोपाल कहते हैं । उन लोगों ने नंद
नंदन को नहीं समझा है । संसार के सब कार्य झूंठे हैं व्यर्थ
और बीमारी हैं । हर सांस सांस में तुम  श्रीहरि का सुमरन
करों। गोपाल कहते हैं कि हर साँस मैं श्री कृष्ण का सुमरन
करना चाहिए।
       [   ४   ] 
             
   [  गुपाल , परम सांच    ,रसमाधुरी ]
       
    ।। सुख सांचौ  जबै हौं  जग पायौ ।।
निरख निरख मूरत हरि प्यारी   मनमन्दिर  उमगायौ।
जीवन रस आनंद  बढानों         निस दिन होत  सबायौ।
थोथौ थोथौ त्यागौ सबही           सार  तत्व  हरी पायौ ।
जगबंधन सब पीरादायी            गुरुजन  सांच  बतायौ ।
‘’गुपाल ‘नाम सुख                    आन  राग दुःख जायौ ।
 हिंदी भावार्थ :—
प्रभू मेंने जीवन में जब ही सुख पाया हैं।  जब मेंने तुम्हारी
ओर देखा। तुम्हारे सुंदर दर्शन किये    तुम्हारी प्रतिमा को
देखा जीवन में रस  आनंद बंढ गया ।  यह दिन रात मैं बंढ
सवाया हो जाता है।  हल्का हल्का [ जिसका कोई मतलब
नहीं ]  मेंने सब त्याग दिया ।   सारा सार ही भगवान  को
ही पाया है । सदगुरु ने सत्य     ही बताया है  ।  सुखसागर
गोपाल का नाम है ।     और यह जगत दुखों का समुद्र है ।
गुरू जनों ने इसे सत्य        ही  बताया है। सुख सागर का
निरन्तर बहने वाला       श्रोत केवल गोपाल  का नाम ही
है।   दुख का सागर  पूरा संसार है।
    [ १    
           
 [  गुपाल , परम सांच    ,रसमाधुरी ]
         
 ।। चहुं दिस ब्रज में भगती बरसै ।।
 कठिन बास ब्रज धरा पुन्यधन   , कृष्ण  नाम मुख निकसै।
देव यक्ष किन्नर सत साधू           ,        राग  बैरागि तरसै ।
कहूं परिक्रमा  जपतप पूजा           नाना बिधि हरि  परसै।
नितप्रति प्रभुजन परें  दंडबत        लगी लगन हिय  हरसै।
कानन में मिसरी सी घोरत               मधुरी  बोली  सरसै।
कालिन्दी तट ब्रज ‘’गुपाल’’ प्रभु अजउ भगतजन दरसै।
 
हिंदी भावार्थ :—
ब्रज में चारों  ओर भक्ति बरस रही है। यहाँ का वास मिलना
कठिन है। बडे भाग्य से मिलता है यह धरती पुण्य की भूमि
है यहाँ कृष्ण नाम मुँह से अपने आप  निकलता है। इससे
रहने के लिए यक्ष किन्नर जोगी  व वैरागी भी तरसते हैं ।
जप तप परिकमा दंडवती   परिकमा से भगवान की पूजा
होती है।  बृज की बोली हरि     नाम मिश्रत मीठी है कानों
में मिसरी सी घोरती है।     गोपाल के प्रभु का बृज यमुना
जी के तट स्थित है जहाँ मेरे प्रभु की छबि अब भी भक्तों
को दिखाई देती है
 
         [        
             
[  गुपाल , परम सांच    ,रसमाधुरी ]
 
       ।। क्यों घबराबै  लख काज घनेरे ।।
 करमहीन अकुलात रहत नर                 डोलत डेरे डेरे ।
जीबन सुफल भजे गोविंदा       ,        आबौ   प्रभु के   नेरे ।
सीस हाथ गोबिंद ‘’गुपाला    बिचिलित   क्यों  हरि  तेरे ।
सांस सांस अरपन कर  मोहन  ,     मिटै  सहज   नर घेरे ।
भबसागर ’’गुपाल’’ तर जाबै  ,    जुगल रूप   प्रभु    टेरे ।
 
हिंदी भावार्थ
अत्यधिक कार्य देखकर तू घबरा क्यों जा रहा है। करम
हीन पुरूष अकुलाकर द्वार द्वार पर डोलता है । हे गोपाल
तू प्रभु के और करीब आजा तेरा जीवन सफल हो जायेगा
। तेरे सिर पर गोविन्द का हाथ है । फिर तू चिंता क्यों
करता है अपनी समस्त सांसों को प्रभू के अरपन कर दो
। जिससे समस्त दुखों के घेरे मिट जाएँगे ।श्रीराधेकृष्ण
के स्वरूप के ध्यान करने से तू संसार सागर को पार कर
जायेगा।
 
    [       
       
   [  गुपाल परम सांच    रसमाधुरी ]
       
   ।। चंचल मन क्यों तू बहकाबै ।।
 भुलबामत हरि चरन सदां     तू  माया  सौं  लिपटाबै।
छन में दुख सरिता में बोरत       छन  में  हास  बढाबै।
धनकुबेर करदेत छनक में          छन तू  रंक  बनाबै ।
निरगुन सगुन भेद ना  प्रानी     मत  मन मैं   भरमाबै।
दोऊरूप मंजिल इक प्रानी       सुगम  मनुज  अपनाबै।
प्रेमभगति मारग अति सोंधौं      ध्याबै    सोही    पाबै।
निरमोही ‘’गुपाल’’ सुमरि हरी  प्रभु   सों  ना  बतराबै ।
 
हिंदी भावार्थ
हे चंचल मन तू हमें क्यों बहकाता है। तू हमें भगवान के
चरनों को क्यों भुलवाता है। और हमें माया में लिपटाता
हैं। एक क्षण में दुख की नदिया में डुबाता है। तथा अगले
छन में हॅसा देता है। एक छनक में धन कुबेर बना देता है
। एक क्षण में गरीब बना देता हैं। निर्गुण व् सगुण मैं कोई
भेद नहीं है इसमें अपनी उर्जा का क्षय मत करो । दोनों
एकही मंजिल के रूप हैं। सुगम समझ कर मनुष्य चलने
लगता है । प्रेम भगती का मार्ग इतना सीधा है। जो ध्याता
है। वही पाता है। गोपाल तू भगती कर यही सही मार्ग है ।
अरे गोपाल सब कुछ छोड़कर तू प्रभु से क्यों नहीं बात
करता ।
        
  [      
         
    [   गुपाल  परम सांच    रसमाधुरी  ]
               
।। मनुआ क्यों तोहै हास सुहाबै ।।
 लागत मोइ  भलौ  न  मनुजन    मिंतर कबहु  सुहाबै ।
परमारथ चौं बृथा बतावै            स्वारथ   मैं  लिपटाबै।
सुरसा मुख सी इच्छा पूरन         छन  छन बाढी  जाबै।
मन  हैरान निरख गति चंचल     गुपाल  नाँय  थकाबै।
सुतल रसातल नभ तल जाबै       सबमें   पैठ   बनाबै।
कही  ‘’गुपाल’’ अरे  यायाबर  क्यों  निज  दास  बनाबै।
हिंदी भावार्थ
गोपाल कहते हैं । हे मन तुझ पर मुझे हँसी आती है।
ऐसा लगता है।कि मनुष्यों का भला हे मित्र मनतुझे
अच्छा नहीं लगता है। परमार्थ को व्यर्थ बताकर स्वार्थ
में मुझे लिपटाता है। और तू सुरसा मुख सी [विशाल
काय इच्छाओं को पूरी करवाता रहता है।और तू
उनको हरेक क्षण बढाता रहता है। मुझे तेरी गति
चंचलता देख हॅसी आती है विस्मय होता है गोपाल
कहते हैं पर तू कभी नहीं थकता है । धरती आकाश
पाताल सब में अपनी जगह बना लेता है। गोपाल
कहते हैं हे अनवरत यात्री मन मुझे क्यों अपना
दास बनाता है।
   [      ]
       
 [  गुपाल  परम सांच    रसमाधुरी ]
           
  । ध्याबौ क्यों नहिं रे  गिरधारी ।।
बांकी छबि  श्रीकृष्ण मुरारी     मन मोहक  अति प्यारी ।
बसहिं बाम ब्रसभानु कुंबरि       कोटि कोटि  रति  बारी ।
कोटि अनंग लजामत सूरत       बांके     रास      बिहारी ।
दरस परस जप तप अपनावौ      रीझें   कृष्ण     मुरारी ।
‘’गुपाल’सौदा इहि  जग सांचौ       बन  अनूप   ब्यौपारी।
                                              
हिंदी भावार्थ
अरे लोगो आप भगवान का भजन क्यों नहीं करते मोहन
श्री कृष्णा की छबी कितनी सुंदर है।मनमोहक है और उनके
बांये अंग मैं रा विराजमान हैं।उनके ऊपर करोड़ों रतियों को
मैं न्यौछावर कर दूँ । तब भी उनकी बराबरी नहीं हो सकती
है । करोड़ों कामदेव भी श्री मोहन की सुन्दरता की बराबरी
नहीं कर सकते हैं।जप तप दर्शन को जीवन का अंग बनालो
। श्री कृष्ण आपके ऊपर प्रसन्न हो जायेंगे। संसार मैं एक ही
साधन एक ही सहारा है गोपाल  और जगत बीमारी है।
गुपाल जगत के इस सांचे व्योपार को कर अच्छा
व्योपारी बन जा ।
     
     [      ]
       
   [  गुपाल , परम सांच    ,रसमाधुरी ]
 
            ।। कहालौं   धीर   धरऊं   गिरधारी ।।
 सांस  अकारथ  बीती जाबै             मनमोहन  भई ख्बारी।
जनम जनम कौ प्रन बिसरायौ        श्रीहरी   भूल  बिसारी।
तोसों हितू न मूरख मोसों                प्रभू हों  आज बिचारी ।
यौनी बदलत हिअरा कांपै               मोहन   देऊ    उबारी ।
अरदास ’’गुपाल’’ करै तुमसों         देऊ  न  सरन  मुरारी ।
हिंदी भावार्थ
हे गिरधर में कब तक धीरज रखूं । मेरी साँस बिना कार्य ही
बीत रही है। हे मनमोहन उम्र वैसे ही ख्वारी हो रही हैं आपसे
किया हुआ प्रण भी (में तुम्हें भजुंगा ) भूल गया हूँ । तुम्हारा
जैसा मित्र तथा मेरे जैसा मूरख और दूसरा नहीं हैं। मेने विचार
कर लिया है। यौनी बदलने में मेरा हिय कांपता हैं। अब तुम
मुझे पार कर दो। गोपाल की आपसे यही अरदास  है। मुझे
अपने चरणों मैं जगह दो ।
         
  [       ]
             
    [  गुपाल , परम सांच    ,रसमाधुरी ]
 
पन पारहिं पन पारन हारे।
दीन जनन जग  आब आबरू           स्याम   प्रभू    रखबारे ।
जगमिंतर स्वारथरत स्वामी            मूंद  लेंइ  निज   द्वारे ।
लाज रखें प्रभु निज भगतन  जग     बिगरे    काज   सॅबारे ।
गुपाल कृपा      गिनीं न जावै             कीने        बारे न्यारे ।
एक  सहारौ  मन मोहन  प्रभू           भगतन  हित  रखबारे ।
गही सरन  ‘’गुपाल’’ स्याम हरी       खोलौ    न प्रभू   किबारे ।
हिंदी भावार्थ
प्रण को पूरा श्री कृष्ण ही करवाते हैं   जो अपने लोगों की बात
रखने को अपना प्रण भी छोड़ देते हैं । हे स्याम आप गरीबों की
आव इज्जत के एक ही रखवारे हो। संसार के मित्र सब स्वार्थी हैं
। स्वार्थ पूरा होते ही अपने दरवाजे बॅद कर लेते है। मेरे गोविन्द
प्रभू अपने भगतों की लाज रखते हैं । उनके बिगड़े कार्य कर देते
हैं । भगवान की कृपा को गिन नहीं सकते । उसने अपने भक्तों के
वारे न्यारे कर उनके सारे कार्य कर दिये । भगतों की रक्षा करने
वाले मुरली धारी एकमात्र सहारे हैं । हे कृष्ण गोपाल ने आपकी
ही शरन ली है। आप आपने दरवाजे खुला रखना । इसका
कल्याण कर देना ।
[       ]
[  गुपाल , परम सांच    ,रसमाधुरी ]
मनमोहन  सौ हितू ना प्रानी ।
तात मात  सुत सखा भ्रात सब           स्वारथ   रीत   निभानी ।
सगी नारि  स्वारथ जग    भाई         स्वारथ प्रेम       कहानी ।
हांसत लोग लुगाई मिंतर                 डूबै       तरनि   सुहानी ।
साध्य एक़ मोहन हरि प्यारे         साधौ   निस  दिन  ध्यानी।
असरन सरन ‘’गुपाल ‘’ कृष्ण जी   गहौ सरन   नर  ग्यानी ।
हिंदी भावार्थ —–
कृष्ण भगवान जैसा  शुभ चिंतक कोई नही है।
पिताजी माताजी भाई मित्र सब स्वारथ से बॅधे हुए हैं । जीवन
संगिनी भी स्वारथ से परिपूर्ण है। स्वार्थ की प्रेम कहानी है। नाव
को डूवते देख सब ताली बजाकर नृत्य करते है। हे अपने को ज्ञानी
मानने वाले प्राणियों तुम उनकी शरण ले लो । हे साधक एक ही
आस है। गोपाल मोहन यही साधन है । जिनको कोई शरन नहीं
देता है। उनको श्री कृष्ण शरन देते हैं । हे अपने को ज्ञानी मानने
वाले प्राणियों तुम उनकी शरण ले लो । तनमन धन से प्रभू का
ही ध्यान करिये ।
       
  [      3  ]
 
          [  गुपाल , परम सांच    ,रसमाधुरी ]
मूरख होय न जग कोउ हानी ।
जीबन डोर सोंप दे  बिधना           क्यों भरमै अग्यानी   ।
झूंठे मिंतर  सांचौ कोऊ         स्वारथ   रत  रह    प्रानी ।
सबके दाता कृष्ण बिधाता      सोंपो  रे        जिदगानी ।
अहम आबरन त्यागौ झूँठे        भजौ हरि  नाम   सुजानी ।
भरम छांडि लै सरन गुपाला        सांची        जानौं   बानी ।
‘’ गुपाल’’  प्रभू दयालू जग में    भगतन  हितू  कहानी    ।
हिंदी भावार्थ ——- –
हे मूरख तुझे जगमें कोई भी हानि नहीं होगी। अरे  तू अपनी
जीवन डोर विधाता  को  सोंप दे । अज्ञानी मत बनै। संसार
में सब झूंठे मित्र हैं । अपने अपने स्वारथ मैं सब लिपटे . हैं
। सबको देने .वाला एक .ही विधाता .है। इस जिंदगानी .को
उन्हीं. के नाम कर .दे।  सारे अहंकार तथा परदे हटाकर सच
.रूप. से हरि .का नाम रटो। सारे भरम .छोडकर भगवान. की
शरन ले. लो। यही वाणी सच्ची है। गोपाल अपना प्रिय गोपाल
इस .जग .में भगतों .के. हितों. की निगरानी करता .है। प्रभु
श्रीकृष्ण तथा उनके भगतों की अनगिनत कहानियाँ  हैं
जिसमे उन्होंने अपने भगतों को सहारा दिया है
             
              [       ]
 
     [  गुपाल  परमसांच    रसमाधुरी ]
सांचौ मीत गोबिन्द गोपाला ।
कृपा करहिं राधे  मनमोहन          सुमरहु  कर   गह   माला ।
झूंठे जग हित बनै  भिखारी         मनुजन    करम     कराला।
मांगहु भगति सदां  हरि चरनन      राखौ    नजर      बिसाला।
नांइ  हितू  तेरौ   नटबर सौ           दया   सिंधु      ब्रज  लाला ।
नंगे चरनन दौरि परै हरि               कीनै     भगत       निहाला।
पुरबीं  साधौ साध पुकारत          आपइ      कृष्ण  ‘’ गुपाला’’ ।
हिंदी भावार्थ ———– –
मनुष्य का सच्चा मित्र सच्चा हितैषी गोविंन्द गोपाल ही है।
श्री कृष्ण राधे की कृपा अवश्य होगी बस तुम माला लेकर इनका
ही भजन करो । झूँठे जग के हेतु मनुष्य तू भिखारी बनता
अन्यान्य प्रकार की उनसे मांग करता है । तथा हे गोपाल न
करने योग्य भयानक कर्म करता है। अरे तू सदा प्रभू के चरणों
की भगती मांग और अपनी नज़र को विशाल रखो । हे मनुष्य
तेरा नटनागर कृष्ण सा कोई हितैषी नहीं है। श्री कृष्ण दया के
सागर हैं । भगवान भगतों पर कृपा करने नंगे पैर चले आते है।
उन दीनदयाल ने सदा भगतों की आस पूरी की है। उन्होंने
साधुओं साधकों भक्तों की साध पुकार हमेशा से पूरी हैं ।
                     
     [        ]
[       गुपाल परम सांच   रसमाधुरी   ]
मोहन दीन बंधु  गिरधारी ।
सदा नजर हौं दास तिहारौ       भगतन   हिअ   भयहारी ।
बृद्वि प्रदाता जीबनदाता                राखउ    खैर    हमारी ।
निरमल तनमन रहे सदां  प्रभु      ध्याबऊं  चरन  मुरारी ।
तोइ  रूप हौं निरखौं  कन कन      लाड़ली   संग  बिहारी।
सेबऊं   सदां  प्रभु  नट नागर        करौ भक्ति   असरारी।
भगती  बढै ‘’ गुपाल’’   निरंतर    नियरे  होंइ     बिहारी ।
हिंदी भावार्थ ——- –
मोहन गरीब और असहाय लोगों के सहारे तथा गिरराज उठाने
वाले हैं । हे प्रभू आपसे प्रार्थना है। कि मुझ पर नजर रहै। आप
सदा भगतों के भय हारी हैं ।आप ही बुद्वि देने वाले जीवन देने
वाले हमारी सुधि लेने वाले हो।मेरा मन तथा तन सदा निरमल
रहे में आपके चरणों का ध्यान करता रहूँ । श्री राधिका के संग
मनमोहन रूप को मैं प्रत्येक कण कण में देखूं देखता रहूँ । ऐसी
कृपा हो जावै। सदा प्रणियों में तेरे स्परूप को याद करता रहूँ ।
हे कृष्ण मैं हमेशा आपकी पूजा करता रहूँ और आप से असीमित
प्यार करूँ । गोपाल   कहते हैं ऐसा करने से भक्ति बढ जायेगी ।
लगातार भक्ति करने से  में आपके निकट आ जाउँगा
 
   [      ]
   
 [  गुपाल , परम सांच    ,रसमाधुरी ]
भजऊ जेइ भाब बसइ हिअ मांही ।
भजे सुदामा सखा भाब सौं          धोऐ   चरन  गुसांई ।
सखी भाब से भजे द्रोपदी         बिपदा   बने      सहाई ।
भातर भाब दाउ बल भ्राता       मातर     जसुदा   माई ।
बसूदेबा   देबकी  नंदन            नन्द   लाला सुखदाई ।
रिपू  भाब कंस नृप सुमरे        मुनी    दुर्लभ गति पाई ।
भज ’गुपाल’ तू दास भाब ते       जन्म सुफल होय भाई ।
                                    
हिंदी भावार्थ ——–
ग़ोपाल कहते हैं कि हे मनुष्य किसी
भी भाव से जो तुझेअच्छा लगे भगवान का भजन कर ।
सुदामा ने मित्र बनाया  प्रभु ने उनके चरन धोये । द्रोपदी
ने सखी भाव से भजा प्रभु वस्त्र  रूप हो गये ।जिसकी
अनंतता मैं दुशाशन हार   गया। बलराम  बन्धु भाव
जसुदा नन्द वसुदेव देवकी पुत्र भाव .कंस शत्रु भाव सब
मुक्त हो गये । गुपाल तू सेवक भाव से हरी को भज ले ।
तेरी भी आसानी से मुक्ति हो जाएगी ।
   
     [        ]
         
  [  गुपाल   परमसांच    रसमाधुरी ]
नर  खोलउ   दिरग  निरखौ  मोई ।
भीरपरत जग  सुमरै मोकूं          सुदिन  न सुमरहि कोई।
जप तप सुमरन पीराहारी                मोद बढ़ाबै     प्रानी ।
सांचौ  मित्र  बना लेउ मोही             भरमै मत    अज्ञानी ।
सब प्रानीन की सेबा करउ             परमारथ कर   जीवन ।
जीव अंस ’’ गुपाल ‘’कृष्ण  प्रभू    आनंदित रह हर  छन ।
 
   हिंदी भावार्थ ——–
””हे मनुष्य तुम अपने नेत्र खोलो और मेरी ओर देखो । जब
मनुष्य पर भीड पडती है । दुख होता है तो मुझे याद करता है।
तथा अच्छे दिन में कोई याद नही करता हैं। अच्छे दिनों में
भगवान का स्मरण पीडाहारी हैं। दुःख नष्ट करने वाला है ।
तथा खुशी को बढाने वाला है। मेंरे को सच्चा मित्र बनालो ।
हे अज्ञानी तू भ्रम में मत पड। समस्त प्राणियों की सेवा करो
जीवन को परमार्थ में लगा दो । कहते हैं गोपाल सब जीव ह़ी
गोपाल के अंश हैं। अपने जीवन का हर छन आनन्द लो ।
[ २  ८  ]
[  गुपाल    परम सांच      रसमाधुरी ]
उलझत       मन   तू   सुरजत   नांईं   ।
छनमें   नृप   छन में   मायापति                 छन में          रंक       बनाईं ।
अबनि     श्रेष्ठ   कह   मान   बढाबै                   छन    में       देत    फुलाईं ।
भरत   उडान   गगन पै    पल    छन          ज्ञान      ध्यान           बिसराईं।
बसीकरन   चंचल   मन   प्रानी                हरि      ‘’ गुपाल  ‘’       भगताईं।
मद   माया   दे   छोड   करो    तुम                प्रभु      चरनन          परसाईं  ।
जप   तप   सुमरन   कृष्ण   मथानी           तन        मन       करै    मथाईं  ।
हिंदी भावार्थ ——–
””हे   मन    तू    उलझता   क्यों   जा   रहा   हैं तू    क्यों   नही   सुलझता   है।
एक   क्षण   में   राजा   एक   में   मायापति   तथा   क्षण   में   गरीब   बना
देता   है। पृथ्वी    पर   सबसे   अच्छा   बताकर   मान   बढ़ा   देता   हैं।
मुझे   बहुत   खुश   कर   देता   है । कभी   कभी तू   आकाश मैं   उड़ने
लगता   है अपने   समस्त   ज्ञान   को   भूल   जाता   है।  इस    चंचल
मन को    रोकने   का   केवल   एक   उपाय   प्रभू भगति   है। सभी
अहंकार   तथा   माया   को   छोडकर    हे   प्राणी   तू   हरी के   चरणों
की   पूजा   कर ।   जप   तप तथा सुमरन   द्वारा   अपने   मन की
मथाई   करवा    कर     शुद्ध    कर   ले  । तेरा      कल्याण   हो   जाएगा।””
[    २  ९   ]
[  गुपाल    परम सांच      रसमाधुरी ]
हौं    हरी     दास   बघारत    सेखी ।
रंचमात्र   ना   नेह   प्रभू    सों                     फेरहु         देखी           लेखी ।
चाह ‘’गुपाल’’   नाम   निज   लागी               ढूंढ़त         तौर         तरीके।
पोस्टर     टी   बी    नैट      फेसबुक              स्वादू   संत           मही     के।
खांत   पीत   बैठत   उठत    करें                     नूतन   भृमित     प्रचार  ।
संन्यासी   कलि    लोग   बिगारत               रोज            बढ़ामत    रार ।
असंतन   संगत   रंगत    प्रभू                     बढ      जाय     माया      मोंह।
संशय   भरम    हिये   मैं   बाढ़त               गुपाल          बनाबै        छोह।
हिंदी अर्थ  ;——
मैं   प्रभू का   सेवक   हूं।  इसकी    वे     घोषणा   करते   रहते हैं ।   प्रशंसा
करते     रहते हैं  । जबकि   रंच मात्र भी   उन्हें   प्रभु   से   प्रेम   नहीं   है
फिर   भी   दिखावा   करते     रहते   हैं ।  ।  गोपाल   कहते   उन्हें   अपने
नाम   की   इच्छा   सदैव   लगी   रहती   है । वे   नये-नये   साधन   ढूंढ़ते
रहते   है । आजकल   के   स्वादू संत को   देखों जो दीवारों   टी.वी. इंटर
पर   रहते हैं । जो   खाते   पीते   बैठते   उठते   लोगों को   प्रवचन देते
रहते   हैं । वे   अपने   स्वार्थ   की   खातिर   लोगों   को   बहकाते   हैं ।
झूंठे   कलि सन्यासी   अब   लोगों   को   बिगारते   रहते हैं    इनके
व्यवहार से   सभी   समाज   पछतायेगा । ऐसे   संतों   की   संगत
करने   से   माया  (संसार से लगाव) मोह (ये मेरा है तथा ये तेरा है)
और   बढ़ते हैं । जबकि   इन्हें   घटना चाहिए। गोपाल   कहते हैं । ये
उल्टे   हदय   को    भरमाते   हैं । मन   में   क्षोम   पैदा   करते   हैं ।
[     3   ०   ]
[  गुपाल  परमसांच रसमाधुरी ]
वैष्णब  जन   न  सताबहिं काऊ ।
परदुख निरखत   द्रबित साधु जन          उभरत   करुना       भाऊ ।
दुरजन     संग    सदां    दुखदाई              ससि  रबि   त्रासत   राऊ।
संत रीत सब भांति   सुखारी                 दुख़   सुख  साम   स्वभाऊ ।
सूल लगै पग  पीरा दायी                .क्षोभ  न    नैक         लखाऊ ।
कहें निकार न  दोस   तिहारौ             अब  ना   और         सताऊ ।
आकांक्षा निरमूल करीं जिन             हरि चरनन     मन         लाऊ।
‘’ गुपाल ‘’सेबऊ सदां बैसनब           लोक   सुलोक            सुखाऊ।
photo
हिंदी अर्थ  ;——
भगवान के   भगत (वैष्णव)   किसी को भी   दुख   नहीं देते हैं । वे दूसरे
जीवों के दुख देखकर द्रवित हों जाते हैं।उनके हिये में दया की भावना
जन्म लेती है । दुष्टों का संग करना हमेशा दुःख का कारण है जैसे राहु
अब   भी   चन्द्रमा व्   सूर्य को   दुःख   देता   है संतों की रीत रिवाज बहुत
ही   सुन्दर   है   वे   सुख   और   दुःख   को   समान   भाव   से   रहते   हैं उनके
पैर   मैं   कांटा   चुभने   पर   भी   वे   कांटे   पर   क्रोध   नहीं   करते   है वे    तो
इसे   धीरे   से   निकाल देते    हैं   और   कहते   हैं कि तेरा   कोई   दोष   नहीं
है लेकिन   अब  किसी   प्रभु   के   जीव   को   नहीं   सताना। प्रभु के चरणो
मैं   मन   लगाकर   जिन्होंने   अपनी   इच्छाएँ   त्याग   दीं   वे हर   जग के
आनंद   से   उदासीन  हो   गए   हैं। अरे गोपाल तुम संसार   के   भगतों
वैष्णवों की   सेवाकरो   जिससे    तुम्हारा   लोक   परलोक   दोनों   सुधर
जायेगा।
[  3        ]
[  गुपाल  परमसांच  रसमाधुरी   ]
छांडऊं    जग    आबऊं    निज   ठौर ।
कृपा   चाहना    लगी    प्रभु    सौं            आस चरन    हरी   ओर ।
पूरे      पंचरूप        गोपाला                  सेबौं   निज   प्रभू  जान ।
ज्यों     लीनौं   त्यों    परै   चुकानौं         बिसरत  नांइ  जग  आन ।
ग्रहस्थ    स्वामिनी   सुभा प्रानप्रिय        बंस   कीर्ति    मगरूर    ।
‘’ गुपाल ‘’  दास     रनछोड   प्रभु कौ       लडन   जगत मजबूर  ।
जीरन   सीरन     मोहि    तन   बचै          आबौं  निज   प्रभू   पास ।
दया    सदां    राखौ   मनमोहन                हौं     हूं     दासानुदास  ।
हिंदी अर्थ  ;——
मैं      इस   संसार     को   छोड़ूंगा   तथा   मेरी जो   वास्तविक   जगह
यानि   भगवान के   चरण . मैं   आऊंगा। मुझे   प्रभु    की   कृपा की
चाह   लगी    है   तथा   मेरी   नजर प्रभु के चरणों की ओर   है। बाल
गोपाल   पूरे   पांच   हैं इनकी   सेवा   मैं   अपने   कृष्ण प्रभु   समझ
कर   ही करता हूँ। जो लिया है वह भुलाया नहीं जाता है   संसार
का   क्रम   रिवाज   तरीका   मुझे याद   है। जो   गृहस्थ जीवन   का
प्रसाद   नारि शिरोमणि शुभा [सविता ] के   रूप मैं   मिला है मुझे
मिला   है   उसका   कर्ज    जरूर    उतारुंगा ।मैं   अपने   रण छोड़ने
वाले   प्रभु   का   दास   हूँ   परन्तु   मेरे   प्रभु के   छह   रूपों की   सेवा
के   कारन   लड़ने   को   मजबूर   हो     गया   हूँ । मेरा   शरीर   जब
पुराना   हो   जायेगा   तो   मैं   अपने   स्वामी   के   पास   आऊंगा ।
हे   मन   को   मोहने वाले   श्री कृष्णा   तुम मेरे ऊपर दया करना
क्योंकि   मैं   तेरे   दासों   का   भी     दास [  सेवक] हूँ
[  3        ]
[  गुपाल    परम सांच      रसमाधुरी ]
आपहि    छुटजैंहिं   गरब   गुमान।
निरमल   तन   मन  जीबन     होबै            बिपन्न   दीन      बरदान।
आसा   कोऊ   रहै   न   मानस                   दीसत      अमर  सहारौ ।
योगीराज   योग   कर    पाबैं                      बहुजन्मन      इकद्बारौ  ।
जपतप   कर    कर   साधू    पाबत             कोटिन  कोउ      सुकारौ।
खोजत   फिरत   बहुत    हरि  ध्यानी         दुर्गम   अती      किनारौ।
भजौ   ‘’ गुपाल’’      कृष्ण   कन्हैया         दै  देइ    तोइ       सहारौ।
हिंदी अर्थ  ;——
गरीबी   असहायता   मैं सब अभिमान तथा घमंड
स्वत् ही   [ अपने आप ]   छूट   जाता है।  शरीर   तथा   मन   दोनों और
जीवन भी   निर्मल   हो   जाते   हैं    यह   गरीबी   का   वरदान   है   जब
आपको   कोई   आशा  न   हो तथा    केवल   एक   वही   प्रिय प्रभु    का
आसरा   सहारा   दिखता   है    दिखाई   देता है ।  योगी   पुरुष    इसी का
प्रयत्न   करते हैं   और   वे   योग   कर     बहुत   जन्मों   के   बाद    उन्हें
वह अकेला   द्वार   मिलता   यह   स्थिति   आती   है   । जप तप करने
वाले   करोड़ों   मैं   से      कोई   एक   संत तपस्वी   उस   एक   द्वार को
पाता   है । बहुत से संत   ध्यान   लगाकर उसे   ढूंढते रहते हैं लेकिन
उन्हें   भी   वह   कठिन   किनारा नहीं मिलता है। हे गोपाल तू कृष्ण
कन्हैया को    भजि   ले ।  वो   श्यामसुन्दर   तुझे अपने आप सहारा
देंगे।
[   3   3  ]
[  गुपाल    परम सांच      रसमाधुरी ]
बिसरामत     जग       मोहन    तोंकूं ।
लागत   भ्रमित   भयौ    चित्त    मेरौ    केइ    विधि   एहि    कूं     टोंकूं ।
मायापरत   चढी    नैनन       पै              जतन   कहा   जे इ         रोकूं।
जग के   कारन   जग के    हेतू              झुठलामत         हरी      तोकूं।
जबहि   छूटाहुं    कसन   बढै   त्यों         मंत्र     भलों      देइ       मोकूं।
पीमत   जग   रस     मनुआ   भरमत      ग्यानी    गुरु     हों     छोंकूं  ।
सांच ‘’गुपाल’’ झूंठ   जग   भैया            गूढ  ग्यान       ऐइ   तोकूं।
हिंदी अर्थ  ;——
यह    झूंठा   संसार   हे   मन   को   मोहने   वाले     प्रभु   मेरे स्वामी
तुझको    भुला   देता   है। मेरा चित्त   भ्रमित   हो   जाता     है। इसको
किस   बिधि   से   इसे   रोकूँ ।  माया   का   आवरण   आंखों पर   चढा
है। ऐसा   यत्न   क्या   हो     सकता   है     जो   इसे में   रोक   सकूँ ।
संसार   के   कारण     संसार   जिनके   लिये   बना   है। हे   हरि   यह
तेरे   को   भी   झुंठलाता है । जब   मैं   इससे   छूटने की   कोशिश
करता   हूँ   तो   ये   अपनी   पकड़   और मजबूत   कर देता है  ऐसा
मंत्र (साधन) हमें   प्रदान   कर   दो ताकि   इससे   बचाब   हो   सके ।
संसार रस   पीने   में   मन    भरमाने   लगता है। मैंअपने को बहुत
ज्ञानी   मानता   हूँ   जिसका   बखान   करता   रहता हूँ ।  गोपाल
कहते   हैं    तेरा    प्रभु भगवान   गोपाल   ही   सच्चा   है   यही   गूढ़
ज्ञान है   यह   जगत   झूठा   है।    नश्वर   है      यही   गूढ   ज्ञान है।
४  ]
[  गुपाल  परमसांच    रसमाधुरी ]
सार   तत्ब   प्रभु   कृष्ण   कन्हाई ।
अदभुत    रतन   गहौ   तुम बीरन                थोथौ     देउ    उडाई।
तात   मात   औ   बिरन   बाल   सब      नात     स्बारथी      भाग ।
नारी रुप    तरु    बरगद  माया        रस    अमरत   ज्यों    लाग ।
स्वप्न   रुप   ए  जगत   बाबरे               कर ना    जीबन   ख्बार ।
‘’गुपाल ‘’ मिथ्या   जगत    प्रपंची    श्रीकृष्ण  प्रभु  जग सार ।
सुमरन   भजन    जगत   एक सांचो    निरमल  मन निर्विकार ।
परमारथ   सौं    कटें    पाप   सब          पहुंचे    हरि    के    द्वार    ।
हिंदी अर्थ  ;——
””गोपाल   कहते हैं । संसार में   मूल तत्व     श्री कृष्ण   ही  है।
हे भाई   यह कृष्ण   अनोखा रत्न है   इसे ग्रहण   कर लो     जो
भार हीन है    अर्थात   संसार के रत्न     उसे उड़ा दो    उन्हें   मत
ग्रहण करो ।पिता   माता   भाई   सभी   नाते   स्वारथ   के है ।
नारी का   रुप   मन को   उलझाने   वाला हैं। मानो   संसार में
अमृत का   हिस्सा हो       यह   संसार   माया का   ही रुप हैं।
उलझाने   वाला है इस जगत मैं   श्रीकृष्ण   गले का हार
बनाने   लायक   हैं    ईश्वर   स्मरण   ही   सच्चा  सौदा है बाकी
सब   माया   है हिरदय   पर   परदा पड़े हुए   हैं । तुमअपने
जीवन को   व्यर्थ   मत   बिताऔं। हमेशा मन को निर्मल
रखिये दूसरे   की   सेवा   करने   से   सारे   पाप   कट जाते हैं
और   भगवान   का   दरवाजा   खुल  जाता   है।
[   3    ५     ]
[  गुपाल  परम सांच   रसमाधुरी ]
प्रानी     काहे    तू   मन    भरमाबै  ।
नस्वर  तन   माया   मैं  भोयौ           कबऊ    संग     ना      जाबै ।
अजर अमर  हरी अंस   आत्मा         सहज    सदांहि     सुखरासी।
रोम  रोम   बासै  गोबिंदा                   वृंदाबन          बृज  कासी।
परम   ब्रहम  सांचौ   बरदानी             राखत     प्रानीन      टेक ।
भांति   भाति    ते   भांत   बनाबै            परम   सनेही  प्रभू      एक।
निरभय   रह   सत्कर्म   करौ   सब       त्याग   संसारी        फेरा   ।
सहज   हरी   काटें   जम   फंदा          ‘’ गुपाल’’ तोर   जग   घेरा ।
हिंदी अर्थ  ;——
हे   प्राणी    तू   अपने मन  को    क्यों   बहकाता हैं। तेरा   शरीर तो
नाशवान हैं। तू   इस माया के   जाल में मोह क्यों करता हैं। यह
शरीर    तेरे   संग   नही   जायेगा।  शरीर   मैं    आत्मा    हमेशा
सुख प्रदान   करने वाली   हैं । प्रभु   का   अजर   अमर   अंश    हैं।
तुम्हारे   रोम   रोम और  शरीर   छोटे   छिद्रों  मैं    वृ्रंदावन
व्रज   काशी  सभी इन   छोटे छोटे   छिद्रों मैं   मेरे प्रभु   गोविन्द
का   वास   है । संसार में   तेरी   बिगाडने वाले  बहुत  हैं। परम
स्नेही   केवल   एक    श्रीकृष्ण  ही    हैं   वो   ही अपनी   बात को
रखने   बाले   हैं । निर्भय   रहकर तू सत्कर्म   कर   तथा माया
के   फेरे   को   काट   दे । हरी   सहज ही   यम   के   घेरे    को   काट
देते हैं। गोपाल   कहते हैं    तेरे   सभी घेरे कट जायेंगे । तू अपने
आनंद कद   श्रीकृष्ण को   ही   भजो
[   3   ६     ]
[  गुपाल  परम सांच    रसमाधुरी ]
काहे   तू    मनबा   गैल   भुलामत  ।
गुरू   गहायौ     ग्यान   अनूठौ               तेहि   कूं  क्यूं    बिसरामत ।
काहे   तू   नस्वर   जग में   भोयो        आयू   धुन  तोहि      रवामत।
चक्षू   बिबेक     खोल   लै   प्यारे         मंजिल     तोइ   मिलजामत ।
‘’गुपाल’मित्र मन सुमरौ हरि पग   सहज   मुकती      है   जामत।
राधे   राधे   कृष्ण   कृष्ण     कह           जग ग्रन्थीन      सुलझामत।
हिंदी अर्थ  ;——
अरे    मन   तू   मुझे   रास्ते से   क्यों    भटकाता है। गुरू से   जो   मैंने
अदभुत सत्य ज्ञान   सीखा है। उसको   तू   क्यों   भुलवा रहा है   इस
नाशवान   जगत   में   क्यों   खो    रहा   हैं। आयु   का   कीड़ा   तुझे   खा
रहा   है।मुझे   अपने   ज्ञान   नेत्रों   को     खोलने   दे   मेरे   लक्ष्य से तू
मत   भटका। अरे   मन तुम तो   गुपाल   के मित्र   हो   इसलिये प्रभु
के   चरणों   का   स्मरण   कर   ले गोपाल   को भी करने   दे।अरे राधे
राधे   कृष्ण   कृष्ण का   नाम   सभी   गांठों को      सभी   उलझनों को
सुलझा देता है ।
[  3  ७  ]
[  गुपाल परमसांच    रसमाधुरी ]
भजौ    नर     कारीकामर  बारौ।
कृष्ण निष्ठ     कुंती   सुत सबरे                राजसूअ     जैकारौ    ।
भारत   जय कर   लीनौ   जुरि  मिल    अधरम     धरम पछारौ   ।
प्रेम प्रताप   सुदामा  पांडे                    मित्र   भाब     स्वीकारौ ।
बिसरौ   ग्यान   दौन देहन    कौ            पावस   रितू   पनारौ     ।
मुठिया  धान      छीन   गह लीने           खोल्यौ   रुक्मिन   द्बारौ  ।
सुख सम्पति   जग सब   दै   दीनी      ‘गुपाल’ प्रभू अती  न्यारौ  ।
हिंदी अर्थ  ;——
हे   मनुष्य   तुम   कारी   कमरिया वाले   श्रीकृष्ण का भजन करो ।
कृष्ण   में   निष्ठा होने   के   कारण   कुंती के   पुत्रो ने   राजसूय यज्ञ
मैं   उनकी   ही   पूजा   की उनकी   जयजयकार   की । उनकी कृपा
से   सभी   भाइयों   ने मिलकर   महाभारत   के   युद्ध   मैं   अधर्मी
कौरवों   और   उनके   सहायकों को   हरा   दिया। अधर्म   पर   धर्म
की   जीत   हुई । श्रीकृष्ण   मैं   अनन्य   प्रेम   के कारण      मित्र
सुदामा   ने   मित्रभाव   को   पूर्ण रूप   दिया। दोनो   कौ    अपनी
काया का [ शरीर  ] भी ध्यान   न   रहा । उनके नेत्रों से अश्रुजल
बरसात   मैं   छत   के   पनारे [नाली ] की   तरह   बह   निकला ।
मुठठी   भर   चावल छीनकर खा गये । और उन्होंने साक्षात
लक्ष्मी रुक्मिणी जी   को   सुदामा   के   धनाभाव   को   मिटाने
का   इशारा   कर दिया। दीनबन्धु श्रीकृष्ण सा   कोई   हितैषी
संसार   मैं    नही हैं। उसी   का   सुमरन   करो। गोपाल के
स्वामी   कृष्ण   की   बात   अनोखी   है।
[   3     ]
[  गुपाल  परमसांच  रसमाधुरी ]
मनमोहन    सौ   हितू   ना   कोई ।
भले   मनुस   राखौ   निज   गेहा                चिन्ता  काऐ    होई।
बहुतक    दोस   पुरे   नर    अंदर               माया   रचना  बोई  ।
हरि   बिरचित   जग   परम   सुहानौ          दरसउ  आपौ   खोई।
अधम    ते   अधम   पाप   नस   जाबें        हरि मग बनौ बटोई ।
सगुन   भगति   हरि    मारग   सोंधौ          मैल हिऐ मन धोई  ।
आतम   सौं     परमातम    बदलै             भगति  जोग संजोई ।
साधु संग  हरि भजन  ‘’गुपाला  ‘’       जगरस   देइ  बिलोई ।
हिंदी अर्थ  ;——
मनमोहन   के   जैसा   कोई   भी   भला   करने   वाला   नहीं    हैं ।
हे   अच्छे   आदमी   अच्छे   कर्म   करो   ताकि आपको   कभी
चिन्ता   न   हो। हे   मनुष्य   तुम्हारे   अंदर   बहुत   सारे   दुर्गण
हैं    यह   सब   माया   द्वारा उत्पन्न   हैं ।यह   सुहाना   संसार
सब   भगवान का बनाया   हुआ है। उसमें अपने   को भूलकर
प्रभू के   दर्शन   करो।   हरि   के   मार्ग   पर   चलने   वाला राही
बन   जा । उस   राह   के   राही   के   सारे   बडे   से बडे पाप मिट
जाते   है। सगुण   भक्ती   का   मार्ग सीधा है । मन तथा हिरदय
के   मैल को   धो   देता   है । इस   भगति   से   आत्मभाव   से
परमात्मभाव   को   प्राप्त   होकर   तू   जोगियों   को   मिलने
वाली   अमूल्य    गति   तू   पा   जायेगा। गोपाल   कहते हैं
साधुओ   का   संग   तथा   हरि  भजन   जगत   के   झूंठे रस
को   मथकर   अलग   रख    देते    हैं
[   3    ]
[  गुपाल  परमसांच   रसमाधुरी ]
बैसनब     दुरलभ    काज   पुनीता।
सदां      भजन     जाप    तप     पूजा         पाठ   भागबत       गीता।
भजन   कीर्तन   जप तप   जोगा               सब    कारज  मनप्रीता ।
जन कल्यान   लक्ष्य   आयु    कौ                सुकरत  राखें       रीता।
सेवहिं   जान   प्रभु   मनमोहन                     हरि   बोलें   हरि    कीता।
सुमरन    सदां      ‘’गुपाल’’    लाड़ली        सब  प्रानी   हरि   मीता।
हिंदी अर्थ  ;——
संसार   मैं   सच्चे   बैष्णब   मिलना   बड़ा   कठिन   है  वैष्णवों   के
प्रत्येक   कार्य   पवित्र   होते   है।  हमेशा वे जप   तथा   तप पूजा
करते   रहते   हैं। तथा भागवत   गीता पढते रहते   है  एवं ज्ञान
जीवन   मैं   ढालते    हैं ।  भजन   करना   कीर्तन   करना   जप
करना   तप   करना उनके   मन कौ भाता है। अच्छा   लगता है।
जन कल्याण   और   जीवों   की   सेवा ही     उनके   जीवन   का
लक्ष्य   है। अच्छे   कर्म   करना    उनकी    जीवन   शैली  है। सदा
ही   वे   प्रभु   के   सेवक प्रभू का नाम बोलते   रहते   हैं। वे   सदां
ही   श्री राधिका   के   चरणो   का   सेवन करते रहते हैं याद करते
रहते   हैं। वे   संसार   के   सभी   प्राणियों   के   सच्चे   मित्र हैं। प्रभु
श्रीकृष्ण   भी   उनके   सच्चे   मित्र   हैं ।
[  
[  गुपाल    परमसांच    रसमाधुरी ]
गोबिंद    चरन    प्रानी    मन   धरि   रे ।
नाम    अमोलक   मिथ्य   जगत    बिच    .      झूंठे        नाते      हर       रे।
प्रानन   प्यारौ    मोहै   लागै                       भामिन        कहती      बर    रे।
निकर जांये   जब   प्रान   पखेरू                   अबिरल       आंसू     झर    रे।
मात   पिता   सुत   भाई   बन्धु                     सबहि        जांये     जुरि    रे।
अंतिम    करम   करैं   सब जुरिमिल             लडकी     सौ    जायै  जरि  रे।
बहु जनमन   औ   मृत्यु   बाद   रह                 मोहन        नात      अमर  रे।
”गुपाल ”  हरी    सांच    संबंधी                      आन       नात       नाहै      रे।
हिंदी अर्थ  ;——
प्रानी   तू   भगवान   के   चरणो    को   मन   मे   रख   ले । उनका    नाम
अमूल्य है । संसार   के   अन्य   नाते   सब  झूँठे    है। जब  प्रान   निकलते
है। पत्नी   अपने   पति   से   कहती है कि आप   मुझे   प्राणो   से   भी प्यारे
लगते   हो   मात   पिता   भाई   बहन   पत्नी   सब   मिलकर आसू बहाते
है। अंतिम   करम   कर   तुझे   लडकी   के   समान   जला   देते   है।जन्म
से   पहले   तथा   जन्म   के   बाद   एक   ही   नाता   अमर रहता   है। वो   है
श्री कृष्णगोपाल    कहते   हैं      प्रभू से    यही   एक       नाता   सच्चा   है।
बाकी   सब   झूँठे हैं ।  श्रीकृष्ण   ही   तेरे   साँचे   सम्बन्धी   हैं ।
[ ४  १  ]
[  गुपाल  परमसांच    रसमाधुरी ]
औगुन   गारी   दुनिआं     प्रानी ।
काहे   कंठ   कंठ   तक  डूबौ            छांडौ  निज .नादानी।
भोगत    नीके   रुचिकर लागें       पाछें  हिय  पछतानी।
संग कुसंग तजौ  जग प्यारे         अपजस  मीतबढानी ।
खोखर   तन   मन   होइ  बाबरे      औसर चूक      नदानी।
नसा नास  तन मन धन खाबै        कीरत आयु   नसानी।
परमारथ संतन  जग  सेबा         नीकौ  करम    बखानी।
गुपाल     कही   बात  बेलागी      जीबन  जीबौ    ध्यानी।
हिंदी अर्थ  ;——-
संसार के   रस   मन को   बुरा   करने   वाले   अवगुणों को
बढ़ाने   वाले हैं । तू    क्यों    गले   तक   इनमें  डूबा   हुआ
है। अपनी   यह   नादानी   छोड दे । यह सब   भोगने में
अच्छे लगते है। समय   बीतने पर पछताना   पडता है।
बुरे संग को   छोड़ दो    ये      अपकीर्ति को   बढाने    बाला
है । यह शरीर   मन तथा धन   सभी को   खोखला   कर
देती हैं ।  तुम   अवसर का   सही   उपयोग करो   यह
तुम्हारी   नादानी है   संसार मैं अच्छा कार्य है नशा
नाश   करता है।     जो तन   मन तथा धन को    खाकर
आयु को   नष्ट  करता है।  तथा   अपकीरत करने वाला
है ।   परमारथ   संतो की सेवा      अच्छी   बातें हैं
संसार मैं अच्छा कार्य है । गोपाल ने   यह बात   स्पष्ट
बिना   झिझक   कही  है    हे   मनुष्य   इन पर .ध्यान
से   विचार करिये।
२    ]
[  गुपाल  परमसांच    रसमाधुरी ]
केहि   विधि   जिऊं     सुझै    नहिं    स्वामी।
परिवर्तन जग    ब्यार   अनूठी                  चौदिस    बसें        कुगामी  ।
प्रभुदित   होंत   कुकरमन   प्रानी                    मदिरा    गटकत     जामी।
लोक   लाज   मरजाद   मिटानी                      गनिका       पातर     नामी  ।
त्याग   तपस्या   सबइ    भुलानी                   साधू         ढोंगी          कामी ।
गुपाल    दास    प्रभू   तुम   चरनन            छमऊ                     अंतरयामी।
हिंदी अर्थ  ;——-
हे स्वामी   मैं  किस प्रकार    से   जीऊँ   अपना   जीवन   व्यतीत   करुँ ।
मुझे   जान   नहीं   पडता   है। चारों    तरफ परिवर्तन   की   हवा   चल
रही है । तथा   हर तरफ   कुमार्ग पर   चलने वाले   दीख र हे    हैं ।
जो ऐसे हैं   जो  कि बुरा करने   पर   ही   प्रसन्न   होते   है। जो
व्यसनो   में   मस्त   रहते हैं । लोक लाज   भी   सब   मिट गयी
है। बिना   वस्त्र वाली   औरते   अच्छी   मानी   जाती हैं । त्याग
तपस्या   लोग   सब   भूल गये हैं । जो हमारे पथप्रदर्शक हैं
वे   भोगी   तथा कामी   है   सच्चे   साधु महात्मा   बहुत कम
हैं । गोपाल कहते   है। हे स्वामी में तुम्हारे चरणों का दास
हूँ । तुम   मुझे   गह   लो।  आप    तो   सर्वज्ञ   हो । सबके
मन की   जानने   वाले   हो।     मेरे   दोषों को   क्षमा   कर   दो  ।
[ ४ 3
[  गुपाल    परम सांच      रसमाधुरी ]
धन   धन     ठगिनी     मोहिनी माया ।
जन्म   घडी   प्रमुदित   गुरजन सब       तू   आ       रूदन   मचाया ।
क्षुधा   लगी   जब     तोइ      बावरे          जननी   क्षीर     पिलाया  ।
फेरत   हाथ    हरी     बिसराने            माया   मोह   बढाया         ।
तात   मात    भ्राता    भगिनी    सब      माया     सों    लिपटाया  ।
जनक बने फेर  जनकज  ग्यानी        लागै        मूल    पराया ।
सूद     लगें       प्रानन       सौं   प्यारे     तन मन सब महकाया  ।
”गुपाल ” परम प्रभु एक  बिसारे      ध्यान  न   क्यों    तू   आया ।
करलै     याद    नंद     नंदन     कूं         झूँठौ   जग   क्यों    भाया।
हिंदी अर्थ  ;——-
इस जगत   में   मनुष्य को   ठगकर रखने वाली लुभा देने वाली
माया धन्य है।जब   प्रानी का जन्म होता है। तो   सभी बडे खुश
होते हैं । केवल   जन्म लेनेवाला   रोता है भूख   लगते ही   माँ
अपना    दूध  पिला   देती है माँ के   सिर पर   हाथ  फेरने से
संसार की माया और प्रबल हो   जाती है भगवान   विसर   जाते
हैं    याद नहीं रहते     हैं । तथा माया के संग लिपट जाता  है।
माता   पिता   भाई   बहिन सब   झूंठे    नाते हैं। मोह बढाना ठीक
नही हैं । सभी   मिलकर   तेरा    साक्षात   माया से विवाह कर
देते हैं।  पिता से   पितामह
बनते   देर   नहीं   लगती  है पितामह    बनकर अपने  आपको
जगत का जानकार जानता है ।   अपने   पुत्र   पुत्री से अधिक
उनकी   संतान   प्यारी   लगने   लगती है तेरा   तन मन   सब
महकने   लगता है गुपाल कहते हैं   तू  प्राणी   परमेश्वर को
भूल जाता है । अरे    तू नन्द नंदन श्रीकृष्ण   का  भजन कर
इस झूंठे संसार को   छोड़ दे   जो तुझे   बहुत   प्रिय   लग रहा है
[ ४   ४    ]
[  गुपाल   परमसांच    रसमाधुरी ]
मनुज   अनाथ   जेइ   भजहिं    न    तोई  ।
मोहन सेबा  श्रेष्ठ करम  जग    आश्रय और न  कोई   ।
प्रेमी दूजी   आस    न   करहिं     भगति   भाब संजोई ।
राधे  राधे   कृष्णा     कृष्णा        भजो सदां हिअ   भोई ।
सबइ काज जग नाम रटन कर    हरे राम      धुन   बोई।
मन बंधन जग बन्धन  तोई         स्वतइ मुकति   होई  ।
‘गुपाल’ पन्थ  भगति रस दायक   राधे   भाब सुखोई    ।
हिंदी भावार्थ :——
गोपाल   कहते   हैं    कि     वे   मनुष्य   अनाथ हैं । जो
तुम्हारा  भजन   नहीं   करते हैं। श्रीकृष्ण की सेवा
श्रेष्ठ    कार्य है ।तथा   उनके सिवायदूसरा   सहारा
नहीं है ।  प्रेमी भक्त किसी   दूसरे की आस नहीं
करते हैं।भगती   भाव  मैं   वे   सदां   मगन   रहते
हैं  ।   राधे   राधे   कृष्ण कृष्ण भजते रहो । तथा
प्रभु   मैं   भोये   रहो ।  सब   कार्य मैं   नाम   रटते
रहो ।  हरे राम की   धुनि   बोते  रहो ।तेरे   मन के
बंधन   तथा शरीर के  बंधन  अपने   आप      टूट
जायेंगे ।अनायास ही   तुम   मुक्त हो   जाओगे ।
गोपाल   कहते   हैं   भक्ति का   रास्ता   रस दायक
है । श्रीराधे भावना  श्रीराधे भक्तिभाव   मनुष्य
को  आप ही   सुख     देने   वाले हैं ।

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