गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी

[    १ ]
[  गुपाल बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
काल कुठरीआ     दैंहंइ    दरसन ।
तेजबंत    तमनासी  मोहन          ,  बंधन    स्बतइ  अबंधन ।
महा गदा   कर महासंख    कर     , अदभुत  चक्र   सुदरसन  ।
अभय करत हरि चौथे कर सौं       जनक जननि  सुखदरसन ।
तात   मात  दोनूं  हिअ  हरसत    ,   करै कौन कवि     बरनन।
सहमी  सहमी देबक जाई            ,कंसत्रास   निज   कंत बचन।
नंद भवन कह बाल भऐ  प्रभु       , अंक   जननि   करें  रुदन  ।
‘’ गुपाल ‘’उठे  बसुदेब प्रभु लै    , तनमन  कीनों     अरपन   ।
हिंदी अर्थ  ;——
श्रीकृष्ण  प्रभु  का  प्राकट्य  हुआ       वे  चतुर्भुज  रूप   मैं ,
दरसन , दे , रहे , हैं अवतार ,होते  ही, देवकी ,वसुदेव, जी, के,
अपने, आप ,ही,बंधन ,खुल , गये। तीन, भुजाओ में गदा शंख
और ,चक्र ,सुदर्षन ,धारण,किये  , हुए,  हैं  ।  एक, हाथ, से ,वे
दोनों  ,को, भयमुक्त, कर, रहे हैं ।   मातापिता,  खुश हो ,रहे हैं ।
मन  में  खुशी , हो ,रही है।   लेकिन , कंस, की बात और वसुदेव
जी के अपने बचन को स्मरण कर  श्री देवकीजी चिंतित हैं माता
पिता और श्री हरी की ख़ुशी का   बर्णन कौन कर सकता है  नंद
भवन मे जाने ,की, कह कर ,   भगवान, बालक, रूप् ,हो ,गये।
तथा ,माता, की ,गोदी ,मे, वे  , मगन, हो ,गये ,और ,रोने ,लगे ।
गोपाल, कहते, है। वासुदेवजी , कृष्ण , को ,लेकर ,गोकुल चल
दिये उन्होंने उनकी शरण मैं ,अपने शरीर तथा मन को समर्पित
कर दिया ।
[      ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
प्रगटे     घनस्याम   चतुरभुज  रूपा।
सहमी ,सहमी, जननि ,देबकी           , अचरज  अति , बसु, ,भूपा।
दौनन ,टेर, सुनी , माधव हरि            ,  नासहिं   ,  अब,  दुख, कूपा।
कंस ,संहारन ,धरम ,बचाबन          ,      आएै  , रूप ,  अनूपा।
भगतन ,तारन ,पुरजन, पारन         ,   करन,   छांह , हर , धूपा।
मनिमय , सुबरन ,जडित, आभूसन  ,चक्र  ,          सुदरसन  ,  धारी।
कौस्तंभ, मनी , कंठ ,बनमाला          , सोहें     ,    कृष्ण    ,मुरारी ।
जन्मन तप, भये ,सुफल हमारे         ,   हे ,  प्रभु ,   प्रानन , प्यारे।
करौ, बाल, लीला , मनमोहक            ,    गुपाल ,चक्षु, अति, प्यारे ।
हिंदी अर्थ  ;——
श्यामसुंदर चतुरभुज रूप मैं प्रकट हो गये। माता देवकी सहम गयी ।
वासुदेवजी को अत्यंत अचरज ,हुआ। उन्होंने सोचा हमारी दोनो की,
प्रार्थना स्वीकार, हो गयी । धरम को बचाने कंस को मारने  अदभुत
स्वरूप, रखकर, प्रभु, आये, है। भगतो, को पालने ,दुष्टो ,को ,मारने ,हर
,धूप,पर, छाया ,करने ,मणियो,, से,, युक्त ,कुण्डल ,पहने ,चक्र सुदर्षन ,
धारण ,किये  ,हुए, हरि, आ ,गये।कौस्तंभ मणि व पुष्पहार, पहने ,हुए
,प्रानो, के ,प्यारे ,भगवान, को ,अपने ,सामने, देख, जन्मों ,,के ,फल,सफल
,हो, गये है।  हे, गोपाल, के ,गोपाल, अब, आप  , मन, को ,सुन्दर लगने,
वाली ,बाल ,लीला ,कीजिए।
[ ३   ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
मोहिनी मूरत मोहन  भानी ।
कोंधत द्युति दामिन घन मोहक   ,    बरसत मेघ    लुभानी ।
नब नीरद  सौ स्याम कलेबर         ,  जमुना जू    मन भानी  ।
पदपंकज प्रभु स्पर्सचाहना            ,   लेंत     हिलोर  सुहानी  ।
पग परसे सिमटी ठकुरानी           ,    सूरत हीअ      बसानी ।
दरसन कीन अघाबै ना मन       ,      हुलसाबै     जलरानी ।
लख वसुदेब  जमुनजल क्रीड़ा    ,  बाल   अलौकिक   मानी।
‘’गुपाल’’  रुचिर प्रभू मनमोहक,      निरखत   नेह    बढ़ानी ।
हिंदी भावार्थ –
प्रभू की मोहनी मूरत हिरदय में बस गयी है। नये बादल की
सी स्याम रंग कांति मन को        हर रही है। जमुना जी को
लुभा रही है। आकाश मैं    मोहक     बिजली चमक रही है ।
लुभाये हुये बादल   बरस   रहे हैं ।   प्रभू के प द धोने स्पर्श
करने के   लिए  जमुना जी  आकार बढा रही हैं । वो बार बार
हिलोरें लेती हैं । भगवान   के चरण छूकर जमुना जी शांत
हो गयी । तले  मैं  समां  गयीं। बाल गोपाल के दर्शन कर
उनने मन मैं बसा लिया है ।  जमुना जी का मन नहीं भर
रहा है वो प्रसन्न होकर देखती जा रही हैं। वासुदेव जी ने
देखा जमुना जी बिलकुल उतर गयीं हैं । यमुना जी का
खेल देखकर उनको विश्वास   हो गया है कि उनका बालक
अलौकिक है। गोपाल के  गोपाल मन मोहक है देखते ही
प्रेम बढ़ा देते हैं । कुछ   भी कर सकते हैं।
[  ४ ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी  ]
केई  , बिधि ,गोकुल , , देबी  ,जाबों ।
ललनि जनम  ,भौजी, जसुदा जी              ,  लाल  ,पुढाबों    , लाबों  ।
अगनित ,डयौडीदार ,कंस ,निरप             ,     उनऊं  ,पिंड ,    छुडाबों  ।
कारागार ,  चौफटा ,  फाटक                       , मंद,      मंद,  मुस्काबों ।
लीन ,छुपाअ  ,टोकरी ,माधब                    ,   जननी  , खैर,  मनाबों ।
काल ,निसा, लै ,चलै ,जनक ,सुत            ,   जमुना ,तट ,ना  ,   पाबों ।
निरख  , बारि,  बिस्तार ,जमुन, बसु           ,   निज ,कुलदेब   मनाबों ।
पग ,परसे , जमुना , तल ,बैठी               ,     हीऐ  ,  बसु        हुलसाबों ।
”गुपाल ”पुढाअ , ललि , लै ,चाले          ,   प्रभू ,  जान  , सुत   ध्याबों    ।
हिंदी अर्थ  ;——
हे  प्यारी  देवी  देवकी  में गोकुल  कैसे  जाऊँ । जहां  यशोदा
,भाभी, के, लडकी ,पैदा, हुई , है।  श्री कृष्णा ,को, सुलाकर, उस
,नवजात, कन्या ,को ,लाना , है,     यह , इस ,अलौकिक पुत्र, का
,आदेश ,है   ।  कंस, राजा ,के , अनगिनती , डयौडीदार , है। उनसे
,किस, तरह, पिंड ,छुडाउगा। उनकी, यह ,बात,सुनकर ,फाटक
,अपने ,आप, खुल, गये।    मन ,में ,उन्हींने ,खैर ,मनाई, तथा
,दोनों ,माता देवकी ,तथा , पिता  ,वासुदेव को ,आश्चर्य ,हुआ ।
श्याम सुंदर,  को  ,सुलाकर  ,सिर ,उपर , उठाकर , मंद ,मंद ,
मुस्काने     लगे । काली   रात्रि  मैं , पिता वासुदेव जी ,अपने
पुत्र श्रीकृष्ण को ,लेकर चले ,लेकिन ,उन्हे , भादो मे, यमुना
,जी ,का ,किनारा, नजर ,नही , आया। जमुना जी ,का ,
विस्तार ,देखकर ,वासुदेव, जी ,अपने ,कुलदेव, को ,मनाने
, लगे। भगवान,  श्री कृष्ण,   ने  ,अपना  पैर ,बढा दिया।स्पर्श
, कर ,जमुना ,जी ,उतर ,गई। अपने ,पास, ह्रदय, में,
गोपाल, को  ,बिठाकर ,जसुदा जी  , के,  साथ , सुलाकर ,
वासुदेव ,जी, मथुरा   ,लौट  ,आयै । वे   ,अपने ,पुत्र ,को ,
परिपूर्णतम  ,ब्रह्म , मानकर   उन्हें , ,गोविन्द, समझ ,वे
,मन, ही ,मन ,अपने, गोपाल ,का, ध्यान , करने , लगे।
[  ५  ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी  ]
सुघड़    स्वरुप   ,  ललनीआ  , भाई ।
व्याकुल, कंस  , मुनी ,बानी, सों     ,             , अष्टम,   गर्भ, गिनाई।
लख्य सिला ,पटकी, नबजाता        ,         छुअत ,उडी ,नभ , जाई ।
मूरख ,,पाप, घटें   ,ब्रज बसुधा         ,        प्रगटे     , संत       ,      सहाई।
बाल नास  , आयुस ,निरप  , दीनी        ,   लीने         , असुर       ,     बुलाई।
‘’गुपाल ‘’ ,कंस,   बुद्धि  , बौरानी  ,  चिंता     ,  काल        ,     लगाई ।
हिंदी अर्थ  ;——
देवकी, की , अति, सुन्दर ,पुत्री, कंस ,को ,अच्छी, लगी ,उसका ,वात्सल्य,
जगा   । लेकिन ,आठवां , गर्भ जानकर, कंस ,व्याकुल, हो, गया , और,
उसे, मारने ,की ,सोचने ,लगा ।पैर ,पकड़ ,कर ,उसने, भारी, पत्थर ,को,
लक्ष कर ,दुध मुँही, बच्ची, को, पटका  ।  लेकिन, वह, तो ,छूटते, ही ,
आकाश ,मैं ,उड़ ,गयी , और , आकाश  ,वाणी ,हुई ,है मूरख ,संतो, की,
सहायता ,करने ,वाले, प्रकट ,हो ,गये, है। क्योंकि ,ब्रज, में भगवान, का
,अवतार ,हो , गया। सुनकर, कंस, को, फिकर, लग, गयी । कंस ,की ,
मती, भ्रष्ट, बुद्धि ,ख़राब  हो, गयी। उसने, ब्रज, के, सभी ,नवजात
,बच्चों ,को , मारने, के, आदेश  ,दे , दिया ।
[ ६  ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी  ]
कूबर ,मनी   ,हरखे  ,दौउ ,  भाई।
साप ,मियादी ,नारद ,रिसिबर          ,   अज ,पाबन ,तिथि ,आई।
भगतन, हेत, धरी , ,हरि काया           ,    छोडत ,निज ,   ठकुराई ।
घिसटत ,स्याम ,जांत ,ऊ ,ओरा          ,  बाल ,कुबेर ,            बुराई।
अडयौ ,उलूख  , तरू ,बिच , खैंचत     ,    मनमोहन ,हरिराई       ।
उखर ,गये, त्यागी, जर्जरता          , निज  तन   , मन ,  अधमाई ।
स्तुति ,करहिं ,अधाबै  , नांई          ,    ,चरन  ,  परै ,  हरि ,  जाई।
सदा ,रखउ ,मरजाद ,देबपन           ,  ‘’ गुपाल’’   ,  लीन , बिदाई।
हिंदी अर्थ  ;——
मनि , व कूबर, ,नाम के ,यक्ष भाई, आज प्रसन्न हो रहे है। क्योकि
,उन्है, नारद ,रिसि, के, शाप , की ,अंतिम ,तिथि, याद, थी। वह
,पवित्र, तिथि, आ ,गयी ,थी। भगवान, ने ,अपने, भगतो ,के, लिए
,वह शरीर, धारण ,किया, है। बालक स्याम घिसटते हुए ,उन वृक्षो
के ,पास जा रहे है।  माँ ने ,उन्है ,उलूख से ,बाधा था। वह उलूख ,
दोनो वृक्षो के ,बीच अड गया । वे दोनो  वृक्ष, पुराने वृक्षो की ,तरह
उखड गये।तथा अपने तन की ,नीचता को ,त्याग दिया ।भगवान
,भगतो,  की ,हर ,बात, को ,पूरा, करते, है। दोनों , ने सदां ,  देवत्व
की मर्यादा रखने ,का, संकल्प लेकर , प्रभु ,गोपालकृष्ण, से ,विदा,
ली।
[  ७    ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी]
अमलार्जुन  ,  द्रुप  ,  बांधत  ,  स्याम ।
नटखट ,बात ,एक, नहीं , मानै,        ,   बाबा  नंद ,       नैन ,    अभिराम।
नित्य, गोपिका ,दैबें  ,तानै                , हैगौ ,जीवन ,       मोइ   ,   हराम।
लाला ,कबऊ  न ,माने ,मेरी                , सांची ,     सांची ,  कह , बलराम।
दधि रस, लूटे , नित्य गैल में             ,गोप ,ग्वाल   ,    मोहन ,घनस्याम।
,कसके ,कान्हा,  डोरी ,बांधौ               , प्रन कर ,       करूं न   ,ऐसे काम ।
घाटत ,, घाटत ,पहर ,बितानौ             ,भयौ ,,  लाल ,  मुख मंडल,, बाम।
परमेश्वर ,प्रभु , डोर , बंधै ,न              , नेह , जेबरी ,  लीजै ,       काम ।
अकुलाने ‘’गुपाल’’ ,लख , जननी           पुरनानंदी      ,       पूरनकाम।
हिंदी अर्थ  ;——
जसोदा ,जी , ने, श्रीकृष्ण, को  , अमलार्जुन ,के, वृक्ष, से ,बांधने, का ,सोचा
।     क्योंकि ,यह, नटखट कृष्ण ,एक, भी ,बात ,नहीं ,मानता, है,  यह नंद
बाबा, के  ,आँखों ,  का ,तारा, है ।  नित्य ,ही, गोपियाँ जसोदा, जी को उल्हाने,
देती, हैं ।  जीवन, का ,सारा, सुख ,हराम ,हो ,गया, है। व्यर्थ ,हो ,गया, है ।
बलराम ,सही ,कहता , है। कि कृष्ण ,उसकी, भी,,नही ,मानते, है।  नित्य ,
ही, रास्ता ,रोककर ,दधि रस को ,लूटता, है। तथा, गोप ग्वालो ,को, खिलाता
, है।  तुझे ,आज ,मैं ,कसके ,रस्सी, से ,बाँधूँगी । तथा, प्रण करने, पर ,ही तुझे
, खोलूँगी ,कि , तू , कभी, ऐसा ,नहीं ,करेगा । भगवान, को ,बांधते ,बाँधते,
श्रीजसोदा जी को ,पहर, बीत ,गया। उनका ,मुख ,,लाल ,हो ,गया । परन्तु ,
परमेश्वर ,श्रीकृष्ण ,को ,कैसे, बाँधा ,जा सकता, है ,। परमेश्वर ,श्रीकृष्ण को
, प्रेम ,की, डोरी ,से ,ही ,बाँधा, जा ,सकता, है माँ, की, परेशानी ,,समझ ,कर ,
जानकर ,श्रीकृष्ण ,स्वयं ,ही, बध , बॅध ,गये। श्रीकृष्ण, सबकी, मनोकामना
, पूरी ,करते हैं।
 
[   ८  ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
स्याम , गौर , सुन्दर , अती  ,जोरी ।
राम  ,गुपाल कृष्ण ,छबि भाबत ,       ,    कोट ,  अनंग   ,  मनोअरी  ।
छींके ,माखन ,मटकी अटकी                  ,    गह  ,लीनी , हरी , ओरी  ।
नहने ,नहने ,कर सों , दधिरस               ,   भरभर   , भरइ  ,     कटोरी ।
पूरन ,इच्छा ,करे ,नेह    मन              ,     ब्रज बनीता  ,   ब्रज छोरी ।
इकठौरी ,गोपी  ,जुरि,  ,निरखइ             ,    जेइ  ,बिधि ,चंद्र ,      चकोरी।
निरख ,मात , दाऊबल ,बिस्मित          , तोरी     ,   मटुकिया,     कोरी ।
आप्त ,काम, परिपूरन ,स्वामी               ,  काहे     , दधीरस  ,       चोरी।
हिंदी अर्थ  ;——
काले कृष्ण, तथा ,गोरे बलराम ,की, जोड़ी ,अत्यंत ,मनोरम ,है , अति,
सुन्दर ,है। बलदाउ, के ,संग, गोपाल कृष्ण ,गोपाल, की ,छवि, करोडो ,
कामदेव, को ,लुभाने, वाली, है। छींके , के  ,उपर ,मटकी ,रखी हुई।
भगवान ,कृष्ण ,ने ,अपनी, ओर ,झुका ,लिया , है। छोटे  छोटे से ,
,कटोरी ,भर कर, माखन, वितरण कर रहे हैं ।वे सभी ब्रज के ,बालक ,
बालिकाओं की ,सबकी ,इच्छा, पूरी ,कर रहे हैं । उनके ,मन मैं ,अति
प्रेम है ।  सब गोपियो  ,उनके ,कृत्य को ,ऎसे,देख,  रही है। जैसे चकोरी
चंद्रमा को, देखती   है। बलराम जी चकित हो  गये कि माँ भी उन्हें देख
रही है   उन्होंने कोरी नई मटकी को तोड़ दिया है । भगवान हर तरह से,
तृप्त  हैं । उन्हें किसी की ,इच्छा नहीं  है। वे कैसे ,दही की, चोरी ,कर
सकते है। गोपाल यही , बता, रहे है। प्रभु ,पूरन कामी ,हैं।
 
[ ९  ]
[    गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी  ]
चूरी , कंगन , रून-झुन ,बोलहिं।
स्तन ,हिलहिं, प्रेम रस ,उत्कट ,                          ,आपइ  ,           दूध,  चुबेरहिं।
नेह , बूंद , परिपूरित श्री मुख                            , केसन , सुमन , बिखेरहिं।
करन आभुसन , नाचत ,मंथर ,                          ,विद्युत    ,द्युति ,  से ,  प्रेरंहिं ।
दृश्य ,अनूठौ, मनभाबन ,एइ                               ,   ठाडे , कृष्ण    ,     निहोरहिं।
दधिरस ,माथन , बंद , मथोंनी                            , क्षुद्या ,त्रास    ,      निगोडहिं।
कूद ,अंक ,बैठे ,हरी, जननी                            ,  बरबस, दूध    ,    निपोरहिं ।
‘’गुपाल ‘’जसुदा, कर ,,गह ,लीने,                        ,  आनन ,ऒर   ,    चकोरहिं  ।
हिंदी अर्थ  ;——–
जसोदा जी, के, चूरी, तथा, कंगन ,बजने ,से ,रूनझुन, की ,आवाज ,निकल, रही, हैं ।उनके ,पयोधर, हि ल, रहे, हैं । कृष्ण ,के ,प्रति ,उनका ,प्रेम ,इतना ,गहरा  है। कि ,उनसे ,अपने, आप ,दूध, निकल ,रहा है । उनके ,मुखमंडल, पर, पसीने ,की, श्वेत, बूदे ,दिखाई ,दे , रहीं , है । तथा ,उनके, बालों, पर ,पुष्प ,बिखरे हुए, है । उनके ,कानो ,में, कर्णभूषण ,मंद, गति,  से ,नाच , रहे , है। तथा ,उनकी ,चमक ,विद्युतसी है। कृष्ण ,इस ,मन भावन, दृश्य, को ,निहार ,रहे , है। भगवान, ने ,कहा माखन,निकालना बंद कर दो। अपनी माखन  निकालने वाली  मथनी [रई  ] को अलग रखदो ।,   उन्हें,  निगोडी[निष्ठुर ]   ,भूख लगी है । कृष्ण भगवान, कूद, कर, माँ जसोदा की, गोदी ,मैं  ,बैठ गये। तथा , माँ ,  से ,जोर कर ,दूध ,पी ,रहे है । गोपाल , कहते हैकन्हैया , जी ,ने , जसोदा के ,हाथ, पकड, लिए ,तथा वे ,अपनी ,माता, जसोदा ,का ,मुख देख ,रहे हैं ,जो ,दूध, चलाने ,से ,लाल , हो ,रहा , है ।
०   ]
[    गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
।। कान्हा जसुदा धैनु दुऔमत ।।
नहने नहने कर थन पकरइ  मोर पांखुरी     मोहत ।
घोंटुन साध जमाई  गगरी  पीरी  काछिन  सोहत ।
स्तंभित घनी धैनू निहारत  बाल कृष्ण  झकझोरत ।
बज्रासन हरी भाब भंगिमा  झर  झर  दूध  निचोरत  ।
जननी रोकत धैनु बत्स कूं निरख निपुन  हरि भोमत ।
‘’गुपाल ‘’दूध गऊ हरि काढें गोपि  ग्वाल  सुख होबत  ।
हिंदी भावार्थ :—
कृष्ण मैया यशोदा की गाय का दूध निकाल रहे हैं।   छोटे
छोटे हाथों से गाय के थन पकड़ रखे हैं।  उनके सिर के ऊपर
मोर पाँख लहरा रही है। उन्होंने अपने घुटनों के साथ दूध
इकटठा करने की मटकी को रखा है   उन्होंने पीला  अधो
वस्त्र पहन रखा है।  गाय माता बिलकुल  स्थिर होकर प्रभु
को देख रही है। वह बालक कृष्ण उसे अच्छा लग रहा है।
उनकी मनमोहन छबि झटका देने वाली है। है भगवान
योगेश्वर  वज्रासन  सी मुद्रा मैं बैठे हैं।  दूध को एैसे निकाल
रहे हैं। मनो  झरना बह रहा हो।   माँ यशोदा बछड़े को रोक
रहीं हैं। और अपने लाला की दूध काढ़ने की निपुणता देख
खुश हो रहीं हैं।  गोपाल कहते हैं। सभी गोप ग्वाल  अपने
गोपालकृष्ण को   दूध काढता देख सुखी हो रहे हैं।
[     ]
 
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
 
 
      ।। भोर भई अब  उठऊ कन्हाई ।।
बीती निसा तमस अबसाना   चहूं ओरी   सुरखाई ।
नवजीबन संदेसौ  आनों धरनि लेंत  अंगडाई  ।
सीतल मंद पबन मनभाबन बृज  बसुधा महकाई ।
प्रकिति प्रफुल्लित जीबन पुलिकित हरखत सखी  समुदाई।
बालसखा जुरि मिल सब आने टोल के  टोल बनाई।
दरसन करहिं अंक भेंटिंगे कूल  कलिंदी  नहाईं  ।
सुनी मात मन बात गुपालहि खेलन  रहे   हरसाई ।
 
हिंदी भावार्थ :—
सुबह हो गयी है । हे कृष्ण अब जागो रात्रि बीत गयी है।  उसका
अंधकार छंट गया  है।  तथा चारो ओर सूर्य की लालिमा छाई हुई है।
प्रकाश की लालिमा ने बसुंधरा को लाल चुनरी ओढ़ा दी हो एैसा प्रतीत
हो रहा है।   नये जीवन का संदेश देने वाली ब्रज बसुन्धरा  इठला रही
है। ठण्डी धीमी मन को भाने वाली हवा  ब्रज बसुन्धरा को महका रही
है।   वातावरण हर्ष से भरा हुआ है।  तथा गोपियाँ भी हर्षित है। तुम्हारे
सखा सभी मिलकर  तुम्हारे पास आये है।  वे टोली बनाकरआये हैं।
परन्तु तुम अपने हिसाब से हे गोपाल इनकी टोली तुम बना दो।
आपके दरसन कर गले मिलेगें तथा फिर जमुना मैं स्नान करेंगे ।
माता की बात सुनकर उठकर कृष्ण  खुश होकर खेलने के लिए दौडे ।
वे अन्य बालकों की तरह अत्यन्त प्रसन्न हो गये ।
 
 
 
[   १ २    ]
 
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
 
 
                     ।। दौरें घनस्याम टोंटकी डर सौं ।।
पाछें पाछें  भगत जसोदा          घनी दूर  खिरकन सौं ।
लुका छिपी ज्यौ रहे खिलाई      चाहत पकरन कर   सौं ।
पूरन बृहम  खिलाबन अनुपम   निरखत धनि भागन  सौं ।
सुरखप्रभा मुखमण्डल सुन्दर       ब्याकुल  अंतर्मन  सौं ।
हारी कान्ह  न अब  मारुंगी       सांच  कहौं   हौं   उर सौं ।
द्रबित ’’गुपाल’’कृष्ण मनभाबन  लिपटे आन अंक सौं।
 
हिंदी भावार्थ :—
श्याम सुन्दर  लौदरी ‘‘पतली लकडी’’ के डर के मारे दौड रहे हैं ।
पीछे पीछे जशोदा जी दौड रही है। भागते भागते गोकुल के घर
से काफी आगे निकल गये हैं। परिपूर्ण ब्रहम का यह बाल चरित
उन्हें बडे  भाग्य से मिला हैं। भगवान का मुख लाल हो गया है।
माता देखकर  अकुला गयी है। कान्हा में हार गयी हूँ । में सच
कहती हूँ तुझे अब  नहीं मारूगी। माँ  की इतनी सुनकर कृष्ण
द्रवित होकर जसौदा जी के हिये से लिपट गये।
 
१  ३ ]
 
 
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
 
                      ।।स्याम नांइ  मैआ ढिंग आबत।।
माखन मिसरी  कर गह जननी बारइ  बार  बुलावत ।
कान्ह मोर  गाहक माखन कौ  आनन  मात निहारत।
बेली मुख से कान्ह लगाई सर्र सर्र पी जाबत।
नहने नहने निज कर जोरै जननी  हरि   फुसलाबत।
बाल सुलभ लीला मनमोहन  ‘’ गुपाल ‘’   मात  सुहामत   ।
 
हिंदी भावार्थ :—
स्यामसुन्दर माँ जसोदा के पास नहीं आ रहे हैं।   मां ने माखन
व मिश्री हाथ में ले रखी है।   तथा प्रभू को बार बार बुला रही हैं।
मां जसोदा सोच रही हैं।  मेरा कान्हा माखन प्रेमी है।  वह जरूर
आयेगा ।   माता उनके मुख को देख रही है।  तथा बेली [बरतन ]
को मुख से लगाकर पी गये। छोटे छोटे हाथ से अपनी माता  को
फुसला रहे हैं।   गोपाल कहते हैं श्री कृष्ण की बाल सुलभ लीला
देख कर जसुदा मैया मुदित हो रही है।  प्रसन्न हो रही है।
                            
१ ३  ]
 
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
 
।। रीझे स्याम मां लेत बलइआ ।।
खंम्ब स्फटिक  नंद जू पौरीन  मनीमय   आंगन  मइआ  ।
बिखराबत  लट  कबहू कान्हा  झटक संबारत  भइआ  ।
मुख  बिचकावत  प्रभु हरसाबत थिरकत  बृज  नचबइआ ।
मोरपंख खिसकाबत बांधत निरखत  मुकुट कन्हइआ।
कान ऐंठ मोहन  हौं  बरजौं  झका न मोइ  झकबइआ ।
मात’’ गुपाल ‘’प्रेमरस पागी  भूली महा  भुलबइआ ।
हिंदी भावार्थ :—
माता स्याम को देखकर रीझ रही है। तथा बलैया भी ले रही है।
प्रसन्न हो रही है।   नंद बाबा की पौरी के खम्बे स्फटिक के हैं।
तथा यशोदा माता का आँगन मणियों से युक्त हैं। तथा उनके
बेटे श्रीकृष्ण भी बहुत ही चंचल हैं।  भगवान कृष्ण कभी अपनी
लटों को बिखरा देते है। कभी बृज के भैया उन्हेंसँवारते हैं।
कभी मुंह बनाते है।  कभी मोर पंख को ढीला करते है। मैया
प्रेम से पागल होकर बोली  कि तेरा कान ऐंठती हूँ।  तू मुझे
परेशान कर देता है। गोपाल कहते है।  वे अपनी मोर पंख को
खिसका लेते हैं।  फिर बांध लेते हैं।  वे अपने मुकुट की शोभा
को बार बार देख रहे हैं ।  कि वह तो संसार के समस्त जीवों
को भुला देते है।   तू तो मैया प्रेम मैं पागल हो गयी हो।
उसके बराबर भुलवाने वाला कौन है।
 
 
[   १   ४   ]
 
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
 
 
 
।।  बरजत जननी कुंमर कन्हाई  ।।
नटखट कऊं दौरि नहिं जाबै   कसि  गहि लीनौं माई ।
मात तरजनी  कृष्ण बताई   समझाई  लरझाई ।
हाब भाब निरखे जननी निज  मोहन हांसी आई ।
गहन समुन्दर सैल बिहंगम निर्जन जंगल खाई ।
बिकल भई लख मुख  मनमोहन बरबस लेंत  जम्हाई।
भांति भांति मां लोक निहारे दूजौ कान्ह ना पाई।
‘’गुपाल’’ निरख ब्रज भूमि सुत मुख  जसुदा  मन अकुलाई
हिंदी भावार्थ :—
माँ यशोदा श्री कृष्ण को मना कर रही है। रोक रही है।  माता ने
कृष्ण के दोनो हाथो को कसकर पकड़ लिया।   तथा बोली अब
नट खट तू कैसे दौड़ेगा।  माता कृष्ण को तरजनी  बता रही हैं।
बेटा मुझे तंग मत करो मन कृष्ण प्रेम मैं है।  जो उसे  डांटने
से रोक रहा है। मां के हाव भाव को देखकर भगवान कृष्ण को
हॅसी आगयी। मुख खुलने से  माता जसुदा को उनके मुख मैं
गहरे समुद्र पहाड़ निर्जनवन  भांति भांति   के लोक सब कुछ
मिला पर दूसरा कृष्ण न मिला।  माँ जसोदा को श्रीकृष्ण के
मुख मैं सुन्दर बृज भी दिखाई दिया   गोपाल कहते है।  मुख
मै पूरे बृज को  देखकर माता घबरा गयी
 
[  १  ५   ]
 
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
 
।। बूझै स्याम कहा भयौ मैया ।।
हाथ पकरि जसुदा झकझोरी  बतान धीर  धरैया ।
घबरानी  जसुदा अति भारी जान  आन  निज  छैया ।
मूरख हौं  समझत तो बालक  नटबर जगत  खिबैया ।
मुकती चाहना कतै न मोई चाह लला हौं  मैया ।
ग्यान ध्यान ’’गुपाल ‘’ ना भाबै  भाबै    कृष्ण  बलैंया ।
हिंदी भावार्थ :—
भगवान माता को विस्मय से पूछ रहै है। माँ तुझे क्या हो
गया है।   भगवान कृष्ण ने हाथ पकड़कर जननी को झकझोर
दिया।  तथा बोला हे माँ तू तो मेरे को भी धीरज बंधाती थी तुझे
क्या हो गया है।  पर माता बहुत घबराई हुई थी।  उसने श्रीकृष्ण
को जान लिया था अत वह अपने पुत्र की छाया लेने लगी।
बोली अरे मैं मूर्ख तुझे बालक समझती थी।   कृष्ण तू तो
जग का पालन हारा है।  मुझे मुक्ति बिल्कुल नहीं चाहिए
तू मेरी तो एक ही इच्छा है। कि मैं अपने प्यारे पुत्र की प्यारी
मैया बनी रहूँ।  अरे गुपाल मुझे   किसी ग्यान की आवश्यकता
नही है।   मैं तो अपने कृष्ण पर बलिहारी जाती हूँ।
[  १  ६  ]
 
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
।। कहत स्याम हौं तेरौइ बालक ।।
निरखौ सुपनौं झूंठौ कोऊ  समझत मोई  प्रतिपालक।
अंसुअन रोदन करें  बिहारी  हौं हूं  नहिं मुनी ज्ञानक।
स्याम अंक गह लीनों मैया  कबहू न कहों संचालक।
हौं हूं  तोरी मात पुरातन तू मोई  प्यारौ बालक ।
जननिअंक ”गुपाल” प्रभु लीने  दुलरा  रही  गऊ पालक ।
हिंदी भावार्थ :—
स्याम सुन्दर माता को कह रहे हैं।  कि में तेरा बालक हूँ।
तैंने हे माता कुछ गलत सपना देखा हैं।  नेत्रों से आंसुओं की
धार बह  रही है। कृष्ण रो रहे हैं।  हे माता मैं मुनियों द्वारा
जानने योग्य नहीं हूँ।  मैं परमात्मा नहीं हूँ  अरे मैं तो तेरा
पुत्र  कृष्ण हूँ।   जसोदा ने  कृष्ण को अंक में ले लिया। कि
में तेरी माता हूँ।  तथा तू मेरा ही बालक है।  माता  गायों
को पालने वाले को दुलार कर रही है।
 
१  ७   ]  
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
 
कहऊं  कहा कछु बोल न आबत
 
बाल चरित हरि माया  मोहक   सिव  बिरंच   डगमाबत।
आदि अंत जिन बेद न जाने   नेति –  नेति  कह  गाबत।
कोटि – कोटि मुनि जतन कराबत  पार  न कोऊ पाबत।
सुमरन नाम करे ते प्रानी भबसागर  तरजाबत ।
मनभाबन सोभा मोहन प्रभु  मन  ‘’गुपाल ‘’ अति भाबत ।
 
 
हिंदी भावार्थ :—
क्या कहूँ मुँह से बोला नहीं जा रहा है।  भगवान की माया निरखकर श्री शंकर भगवान, श्रीबृहमाजी भी डगमगाते है।  जिनका कोई आदि है  न अंत है।   जिनको वेद नेति नेति कहते हैं। कोटि कोटि मुनि जतन करते है।  तब भी उन्हें पार नही पाते हैं।  जिनके नाम सुमरन से प्राणी भवसागर से तर जाता है।  श्री गोपालकृष्ण प्रभू की मन भावन शोभा गोपाल के मन को बहुत ही भाती [[अच्छी लगती ] है। 
 
 १ ८   ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
 
                      ।। कहत कन्हैआ  जननी कहा   भई ।।
कांची  घटकी कुम्भकार  ब्रज छुहतहि  मां  टूट गई ।
दधिरस फैलत का बिधि रोकूं  भू  माखन  रूप  भई ।
जैमन कौ ना लगौ   सलीका  सबरी मां बिखरगई।
मइआ बोली मधुरस  घोली झूंठी  तौ  कान्ह कही ।
अजऊ लोभ माखन मिसरी कौ    ‘’गुपाल ‘’  मनकही   कही ।
 
 
हिंदी भावार्थ :—
कृष्ण कहते  हैं ।   जननी क्या  हो गया जो तू इतनी नाराज हो गयी  है । कुम्हार का  कच्चा घड़ा छूने भर से   ही टूट गया । इसमें मेरा दोष नहीं  है। यह माखन धरती पर फैल गयी है। में इसे खा भी न पाया विखर गयी । इसके विखरने से मही [ धरती ]  माखन से ढक गयी। माता बोली कृष्ण  तेरी झूठ बोलने की आदत नहीं गयी है तू झूंठी कहता है और सच्ची बताता है । हे गोपाल आज भी तुझे माखन  मिसरी का लोभ है मोह है। ये गोपाल सब सही सही कहता है। इसने अपने और मेरे मन की बात कह दी ।
 
[   १  ९      ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]      
निसा ,बितानी ,भयऊ  ,सुहानौं ,भोर।
निरख ,उनींदी, छबि , नटनागर         ,    नाचै ,जसुदा ,जू ,मनमोर ।
खोलउ  ,नैन   ,सलौने  , सुन्दर              ,     आनों ,निसरानी  , कौ,   ओर ।
     प्रान, सुधाप्रकती ,बरसामत                     ,         बन ,तडाग, अति , भारी ,    जोर।
तनमन ,पुलकित ,होबत ,कान्हा        , सुनि, , झालर ,घंटान  , ,   घोर ।
जमुना  ,तट ‘’गुपाल’’  इकठौरे       ,   सखा       ,  मचाबें  , भारौ ,सोर ।
 
हिंदी अर्थ  ;——
रात्रि  ,बीत, गयी ,है । मन, को ,सुन्दर ,लगने ,वाली ,सुबह ,हों, गयी ,है । श्रीकृष्ण ,की ,आधी ,नींद , की ,सूरत ,,देखकर ,माँ ,जसोदा, अति ,हर्षित ,हों ,रही है । माँ ,कह ,रही ,है । हे  ,कान्हा ,अपने, सुन्दर नैनों ,को ,खोलो ,रात्रि ,रानी ,का ,अंत, ,आ ,गया है । प्रानों ,के ,लिए (जीवन के लिए) अमृत, जैसा वातावरण है । प्रकृति, ने ,प्रदान ,किया ,है ।  बागों मैं, कोलाहल है ,,कृष्ण ,,मेरा, मन तथा शरीर ,दोनों,  हर्ष से ,रोमांचित ,हों ,रहें हैं । मंदिरों में ,झालर घंटा ,जो ,बज रहे हैं  । गोपाल, कहते है । जमुना, माँ के ,तटपर ,सारे ,ग्वाल बाल ,इकट्ठे, हुए हैं । तथा ,शोर ,मचा ,रहे ,हैं।
 
 
  [  २ ०    ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
 
गौधन ,मनूआ , मोहन  ,  भायौ।
बरजत ,नहने ,कर, गौसुत ,हरि           ,      गौ, थन  , मुख्ख   ,  लगायौ     ।
स्यामा ,धैनु ,पिबाबै  ,दौनन                ,                .जनमन ,कौ   ,फल पायौं ।
कृष्ण . पिये ,थन ,रतन ,घटै ना          ,        बाढत   ,      होत    ,       सवायौ ।
झिड़कत ,जननी , कान्हा ,मानों              ,     गैया     ,बछरा      , प्यायौ        ।
धैनु  ,कोख लै ,  जनम  ,  गऊ, सुत          ,              माधव ,बन्धु  ,   बनायौ ।
निरख    ,दुग्ध   ,पान   , लीला     , हरी      ,    ‘’गुपाल  ‘’   हियौ,    उमगायौं ।
, हिंदी अर्थ  ;——
””ऐसा ,लगता है , गौधन (गउ तथा बछड़ा)  कृष्ण को , मन में ,भा गये हैं। श्री कृष्ण , छोटे , छोटे , हाथो से ,बछडे को ,रोक , रहे हैं। गाय के ,एक थन को, श्री कृष्ण ने ,मुख में ,लगा ,रखा हैं । स्यामा ,नाम  की ,गाय ,कृष्ण  को ,दूध  ,पिला रही है। तथा ,जनम ,जनम  के पुण्य का ,फल पा रही हैं। तथा ,मन मे  बिचार ,रही है श्री कृष्ण को ,दूध पिलाने से, दूध नहीं ,घटेगा ,उल्टा ,वह ,सवाया ,हो जायेगा । श्री जसोदा   श्री कृष्ण , मना ,कर रही है , डांट रही हैं, हे कृष्ण ,तुम, बछड़ा को ,दूध ,पिलाओ ,,खुद, मत ,पीओ  । गाय का बछड़ा भी भगवान कृष्ण के ,साथ ,दूध पीकर ,अपने ,जन्म को ,सफल ,मान रहा है। उसने, माधव को ,अपना बंधू ,बना ,लिया है गुपाल की , दूध ,पान ,लीला को, देखकर ‘’गोपाल’’ का ,ह्दय ,प्रेम से भर गया हैं।
[  २  १    ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
भोरी ,सी ,सूरत ,स्याम ,सलौना।
मनिमय, आंगन ,विचरत, आली        , नंद गोप  ,  धनि ,छौना ।
दधिरस ,मन्डत ,आनन , बिगरौ       .  ,       ग्यानीजन   , भरमाबै ।
पैंजनिया की, छनक , अनूपा     ,     ,           जसुदा ,मोद, मनाबै ।
पुन्य ,अकूते ,गोप ,ग्वालिनी     , झांकी   ,  हिऐ ,      बसाबै ।
गुपाल, जननि ,भाग, को, बरनै     ,     मोहन ,अंक , लगाबै
हिंदी अर्थ  ;——
””सुघड सुंदर  ,श्याम की ,सूरत ,भोरी ,सी हैं। नंद गोप ,तथा ,उनकी पत्नी का ,पुत्र उनके, मणियों से ,युक्त आगॅन में ,खेल रहा हैं। उनका ,दही से सने, बिगड़े ,मुख ,देखकर ,ज्ञानियों, को ,भी ,भ्रम, पैदा, होता हैं। पैंजनियों, की ,छनक ,छनक, सुनकर ,जसोदा ,जी ,खुशी , हो ,रही, हैं। गोप बालको ,तथा बालिकाऔं के ,कुछ, बहुत  ,पुन्य, हैं। जो, उन्होने ,उनकी ,सूरत, अपने, ह्दय, में ,बसाली, है । गोपाल ,कहते, हैं। माता, जसोदा, के ,भाग्य, को ,कौन ,पा, सकता है ,पा ,सकता है ,बरनन ,कर सकता है      जिसने  ,प्रभु को ,अपनी ,गोद में ,बिठा ,रखा,  हैं।  अपनी ,गोद ,मैं ,बिठाती है
 
[  २  २     ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
बाल रुप,  मोहन ,अती , भाबै।
मनिमय  ,आभूसन ,   हरि, धारें         ,                मंद  ,  मंद ,       मुस्काबै।
मनमोहक , सारंग , पांखुरी           ,              को ,कबि , जे  ,कथि, गाबै।
मनमिलिंद ,रसपान, छकै, ना           ,        छबि  , अनुरुप      ,      लुभाबै।
कनकझाल ,हरि , गल , वनमाला      ,                   मोहक, हरि , सरसाबै।
खग ,नर ,पसु ,सुधि, भूल ,बाबरे    ,       सोभा   , सिंधु    ,      डुबाबै।
नंद , यशोदा, लखि ,लखि हरषै       ,  गोप   ग्बाल  ,                  इतराबै ।
‘’गुपाल’’  मूढ ,मूरती , मोहन           ,   संत     ,        भगत     , सुखपाबै।
हिंदी अर्थ  ;——”
”भगवान का ,बाल रुप, बहुत ही , भा  , रहा, अच्छा ,लगता ,है  । मणियों से ,युक्त ,आभूषण ,उनके ,अंग ,अंग, पर ,सोभा ,देते, हैं । वे ,मंद ,मंद , मुस्करा , रहे, हैं । मनमोहक , मोरपंख, से, बने ,मुकुट, की ,शोभा, का ,बर्णन ,कौन , कर ,सकता ,है ,ऐसा ,कौन है । मन ,रूपी ,हँस, रस का, पान ,करता हुआ, नही ,थक ,रहा, हैं। सोने ,के, झाले,[   कुंडल ] ,हैं   गले में ,बनमाला हैं ।  प्रभु ,इतने ,मोहक हैं, ,कि ,वे ,सारे ,संसार पर ,छा, गये हैं । पशु ,पक्षी ,आदमी ,सुधि ,भूलकर ,शोभा, रुपी  ,समुद्र में, डूब, जातें हैं । श्री नन्द बाबा  व ,जसोदा जी , देख ,देखकर ,मन में ,हर्षित, हो ,रहे हैं ,तथा गोप ,ग्वाल ,मन में ,इठला  ,रहे   हैं , तथा, इतरा, रहे,  हैं । हे, गोपाल ,मूर्ख ,श्री मोहन की, मूर्ति  को, देखकर  ,संत, भक्त ,  बहुत ,सुख ,पाते हैं। ””  तू ,भी ,सुख, प्राप्त ,कर ,ले।
[  २  ३   ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
भोर ,भई ,लाला, नहिं ,  जागत।
फेरइ  ,ललित ,ललाट  ,जननि, कर ,      मनुआ   ,   मोद , मनाबत ।
त्रिलोकी  के , सूत्रधार  ,    हरी    ,      जसुदा ,नेह  ,   लुटाबत ।
रीझे , कृष्ण, ल़ाढ , लखि ,  मैआ    ,        झूंठेउ , गये , रिसात।
देखहूं  ,कोउ ,    मधुरौ  ,  सुपनों  ,        ज्योंई, जननी  ,जगात ।
काल ,सैन, करौं ,,बाबा, ढिंग       ,     नहिं   ,छोड़ो ,  निज ,हेत ।
आपहि ,आप, जगों   ,महतारी      ,       जबहि ,होय ,मोहि ,चेत।
जसुदा ,स्याम, अंक ,गह ,लीनौं        ,       करों , न , अब  तो     तंग ।
‘’गुपाल’’  इहि ,सौभाग्य ,मात , कौ  ,             स्याम , सुहामत,     रंग।
हिंदी अर्थ  ;——
भोर , हो , गयी है , दिन, निकल, आया ,है ,परन्तु ,श्रीकृष्ण ,जग ,नहीं  ,रहैं,  हैं ।
उनके ,सुन्दर ,मस्तक, पर, माता, जसोदा ,हाथ ,फिराते ,हुए, मन, मैं  ,खुश , हो, रही है । मां   ,का ,प्रेम, देख ,भगवान, प्रसन्न ,हो ,गये, तथा ,बहाने, से ,क्रोध , करने, लगे ।कहने, लगे ,जब, भी  , मैं  ,कोई ,मीठा ,सपना ,देखता, हूँ । तभी ,जगा देती हैं। मां  , मैं  ,कल से , बाबा ,के,पास ,सोया, करुंगा । ताकि ,वहाँ ,अपने, मन के अनुसार ,जगा ,करुंगा। जसौदा ,जी ,घबरा, गयी,  बोली ,मैं ,अब ,तुझे ,परेशान ,नहीं, करूगी। कृष्ण, को, मां ,ऩे, गोद, मे, बैठा  , लिया ,गोपाल ,कहते ,हैं ,यह  माता ,का ,सौभाग्य ,है। तथा श्री कृष्ण, हास्य  ,कर ,रहे , हैं।
[  २  ४   ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
कान ,पकरि , जसुदा , हरी ,बरजै।
हरी  ,लौदरी ,देइ  , न  ,जननी          ,     कान्हा ,में, मन, लरझै।
मांटी  , खामत ,नेंक ,न , मानत      ,      लाला ,मोइ  ,   दुख देत।
माखन, मिसरी ,,टौटो ,नांई              ,  क्यों ,बृज रज , सौं  ,हेत।
तुतलानी, बोली  ,बोलें ,हरि               ,   मानुंगौ      ,तोइ  ,बात ।
सगरौ ,दधि  ,माखन , पी , जाऊं        ,   बाढ़ैगौ ,मोइ       ,   गात।
मोहन ,कही , न ,मांटी , जीमों          ,     मोइ    , मात  प्रिय ,   आन।
‘’गुपाल’’  मात  , गात, पुलकानौ    ,      निरखी ,हरी ,मुस्कान।
हिंदी अर्थ  ;——
कृष्ण का कान पकडकर माँ  जसोदा  ,उन्हैं ,डाट रही है ।  उनके पास ,गीली ,लकडी है।उनमें दे,  नहीं  ,रही है। क्योकिं ,कृष्ण ,उन्हैं, बहुत ,प्रिय है।  हे कृष्ण तू , मिटटी क्यों  ,खाता है। मुझको  बहुत ,दुःख देता है। हमारे ,माखन मिसरी की ,कमी नही हैं। तो मिटटी मे ,क्यों , मन लगाया हे। तुतली बोली से ,हरि कह रहै है। कि में ,तेरी, बात ,मानूगां।  सारा दही ,माखन खा ,जाऊँ गा। क्या, मेरा ,शरीर बढ जायेगा। मुझे, अपनी    प्रिय माता की ,सौगंध है कि में ,अब, दधि माखन ही  ,खाऊँगा। मिट्टी नहीं खाऊंगा । गोपाल की ,बात सुनकर ,माता की खुशी का ,ठिकाना न रहा ।  जब उसने ,लाला की ,हमेशा ,  रहने वाली  चिर  मुस्कान ,देखी।
[   २      ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
 
 
 
।। क्रीड़ा  कंदुक   करत   कन्हइया ।।
कालिंदी तट चपल मंडली दाऊ   टोल   बनइया ।
रमनरेत ब्रज रमें बिहारी   भारी   नेह  लुटइया ।
ब्रजरज  उड तन  लागी माधब सोहत जग   भुलबइया ।
ब्रहम जीब  सब अंतर मेटयौ    गोप   कुमार   सुहइया  ।
बड भागी ए ‘’गुपाल ‘’ बाल ब्रज   मोहन सखा  नचइया  ।
 
हिंदी भावार्थ :— –
कान्हा ने गैंद का खेल अपने मित्रों के साथ जमा लिया हैं।   जमुना जी के किनारे रमन रेती में मंडली को बलराम जी ने खेलने के लिए बाँट दिया है।  खेलने से भारी शोर हो रहा हैं।  श्रीकृष्ण प्रेम बाँटने मैं दक्ष हैं।  वे मित्रों मैं प्रेम बाँट रहे हैं।  ब्रज  की  रज उड़कर श्री श्यामसुन्दर के शरीर पर लग गयी जो उनके सौंदर्य को बहुत सुहा रही है।  वे बहुत अच्छे लग रहे हैं।  उनकी छबि संसार को भुला देने वाली है।   ब्रहम जीव का कोई यहाँ कोई अंतर दिखाई नहीं देता है।   गोपों के बच्चों को प्रिय कृष्ण उनके ही जैसे हैं।   गोपाल कहते हैं।  ग्वाल बालों के भाग तो देखो जिन्होने मोहन को सखा बना लिया है।   वे भगवान को अपने साथ नचा रहे हैं।
 
 
[           ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
अब ,नहिं  ,  मांगूं ,गेंद ,कन्हाई।
निकरौ, दह ,सौ ,सहज ,सांवरे                     ,      रोमत ,         जसुमति ,माई।
भूल ,बिसार, हमारी                            ,   कान्हा ,झूठी        ,करी ,ढिठाई।
जो , नांहि   ,निकसै  ,तू ,जमुना, सौं,,       ,        प्रान ,       पखेरू, जाई।
ब्रज बसुधा  , दरसन ,हरि ,  ,तरसी              ,               हीया ,फठ, फट, जाई।
धैनु ,गोप ,सब ,गारी ,देबें     ,           ,                 लगी ,कलंक, बुराई ।
मोय, उबारौ, आन, गुपाला                ,                    जीवन, धन ,हो ,जाई।
हिंदी अर्थ  ;——
श्रीदामा ,बोले, हे ,कृष्ण ,में , अब तुमसे ,गैद ,नहीं माँगूँगा  ।  हे सांवरे  ,तुम ,जमुना जी की ,देह ,से [ यमुना जी के अंदर से   ]  निकल ,आओ ,, माता, यशोदा ,भी ,रो, रही, है  ,हे कृष्ण ,हमारी, गलती ,क्षमा करना।मैंने ,गलत ,जिद, की। अगर, तू ,नहीं ,निकलेगा।    तो, हमारे,  प्रान, निकल , जाँयेंगे ।ब्रज  की भूमि ,भी, दरशन , को, तरस ,रही है। अत, तुम, जमुना, जल ,में, से ,निकल ,आओ। हिरदय ,फ़टे ,जा रहे ,हैं ,मुझे ,गाय ,ग्वाल, ग्वालिन ,सब ,गाली ,दे रहे है। मुझे ,तुम्हें ,जमुना मे ,गिराने का, कलंक ,लग गया है। इससे ,तुम्हीं, मुझे, बचा सकते हो। मेरा ,जीवन ,धन्य हो ,जायेगा
२  ७  ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
सखान , टेर , हरसे ,  गिरधारी।
कूदौ ,ना ,हौं ,लेन ,गेंद ,  सुन           ,  काऐ     ,ग्लानी,   भारी।
मूरख ,जमुना ,सोक ,टारबे   ,गरब    ,    नसन ,       फनधारी।
कालिअ ,  नारि ,बचाबै  निज पति   ,  हौ,  बिनती ,  स्वीकारी ।
फन, फन ,नृत्य, करै, नट नागर,   ,  सोभा , सिंधु ,  मुरारी ।
वंशी,  बजी ,खिली ,ब्रज बसुधा         ,    धेनु ,गोप , ,  बलिहारीं।
जसुदा ,नंद ,मोद, कौ , बरनै              ,   निज जीवन ,रहे , बारीं।
कान्हा, उमर ,लगै ,हम, दौनन           ,  सिव ,संकर ,  त्रिपुरारी।
‘’गुपाल’’ एइ  ,कालीदअ ,लीला            , जन ,जन, ब्रज   ,सुखकारी।
अर्थ  ;——
मित्र ,की ,विनती ,सुन ,गिरराज, धारण, करने, वाले ,गिरधारी ,प्रसन्न ,हो ,गये ,हैं। हे, मूर्ख ,में ,जमुना जी, के, दुख ,को ,हरने, के, लिए ,तथा ,काली, नाग, का ,अभिमान, गिराने ,के ,लिए, कूदा  । गेंद ,लाने का ,तो, बहाना, है। कृष्ण  ,फन, फन ,पर ,नृत्य,, कर ,रहे, ,हैं । उनकी ,शोभा , मुनियो, के, मन, को ,भी ,हरने ,वाली ,है। भगवान, के, वंशी ,बजाने ,गाय ,व ,गोप बलिहारी, होते , है।जसुदा, नंद, का, हर्ष ,  का वर्णन  ,कोई,  नहीं ,कर सकता , दोनों यशोदा जी ,व ,नंद बाबा, अपना ,जीवन ,वार रहे, वे ,कह ,रहे, हैं ,    हे, कृष्ण , तुम्हें  ,हमारी ,दोनों ,की ,उम्र ,लग ,जाये। हे शंकर भगवान ,ऐसा ,कर, दीजिए, हे ,तीन लोकों ,के ,स्वामी ,आप ,एैसा ,कर, दीजिये ।गोपाल, कहते है।यह काली   दह , लीला ,समस्त ,जीवों को, सुख देने वाली है। यह ,भगवान, द्वारा ,की ,गई ,लोकहित ,की ,लीलाओं ,मैं, से ,एक ,है ।
 
 
 
 
 
 
 
 
[    २     ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
खेलत , स्याम , राम , दोऊ  , सोहहिं।
लडी, करधनी,  द्युति  ,दामिन ,सी                       , नूपर ,चमक ,   ,   बिखेरहिं।
केस ,बिन्यास,       छबि ,मन मोहै          ,पटुका   ,  पीत   ,       लहेरहिं।
नीलाम्बर , बलराम       ,सुहाने                         , लुका  ,छुपी  ,  जुरि,   खेलहिं।
अचरज  ,सखा,  होत ,अति, मन ,में               ,      खोज , न ,पाबत  ,टेरहिं।
हार ,थाक ,  टेरें  , मनमोहन                        , ‘’गुपाल’’ कृष्ण ,   निहोरहिं ।
लिपटत  ,गात , करें ,हरि ,मिन्नत                    ,     ‘’ गुपाल’’ तन   कर फेरहिं।
 
हिंदी अर्थ  ;——-
खेलते ,हुए ,श्री कृष्ण ,व ,बलराम ,दोंनो, शोभा, दे ,रहे, हैं, कौंधनी ,की लड़ियाँ  ,उनकी ,द्युति  दामिन, सी चमक रही हैं। नूपरों  का ,अलग ,सोंदर्य हैं।  बालों   की ,छटा , मन को मोहने वाली है। ,नीले ,वस्त्र ,पहने श्री बलराम ,जी ,अत्यंत ,शोभा, दे ,रहे ,हैं, , और ,वे ,मिलकर ,लुक ,छुप, खेल ,रहे हैं। , सभी ,मित्रों, के, मन मैं ,विस्मय, होता है की, वे ,ढूंढने ,से, नहीं, मिलते ,हैं। हारकर ,थककर ,वे ,अपने ,मनमोहन ,को बुलाते हैं ,भैया ,हम, हार,  गये ,तो ,उनके, सामने ,वे ,प्रगट ,हो ,जाते हैं।उनके ,सखा ,हरी ,की मिन्नतें करते ,हैं ,खुसामद ,करते हैं ,गुपाल ,कहते हैं, वे ,अपने ,हाथों ,,से ,प्रभु ,के ,शरीर ,का ,स्पर्श, करते, हैं।
२  ९   ]
[  गुपाल बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
चहूं , दिसि , धैनु  , बछरीआ   ,  बछरा।
ताल ,तलइआ   ,सबई    ,  पुराने                , डूबक , कंहू   ,   पुनीत   ,  धरा ।
कूंकन  ,मोर ,पपइआ  ,  दादुर             ,पाबस, रितू ,     जबर    , नखरा।
बन    . सोभा, .बृन्दाबन     , अदभुत    , भांति ,      भांति , कुसुम, धरा।
घोर , घनी, जमुना, जल प्लाबन             ,    भादर     ,मास ,   जोर ,बदरा।
हाथ ,फ़िराबत ,घूम ,घूम ,हरि                ,    चाटत,स्याम ,  नेह ,अफरा।
”गुपाल”   कृष्ण,   गऊ , कर   ,   सेबा       ,    पुलकित , गौधन ,  घनी, धरा।
हिंदी अर्थ  ;——–
चारों , ओर , से, मनमोहन, श्री कृष्ण ,गाय , बछडों , से, घिरे ,,हुए हैं । ताल ,तालाब, सब ,पानी से ,भरे हुए है। जहाँ  ,कही , बृज  की, पवित्र धरती , भी , दिखाई ,नहीं , दे, रही है  । मोर ,पपइया  ,तथा ,मैढक, सब ,बोल, रहे है। वर्षा,  ऋतु ,की  ,मन ,को ,मोहने ,वाली, अदायें ,  है । वृन्दावन, मे ,वनो ,की अदभूत ,शोभा , है । उनमें, विभिन्न ,प्रकार, के, पेड, पौधे, फूलों, से, युक्त ,लगे ,है। जमुना ,की ,बहने की, आवाज ,.गरज ,रही, है। भादो, के ,महीने ,में ,बादलो ,का, जोर , है। श्याम सुन्दर , अलग  2 गायों , पर, हाथ ,फेर , रहे ,  है। गायें ,उन्हे ,जीभ,  से,  स्पर्श,   कर ,रही,  हैं । गायें , भगवान ,के ,प्रेम ,से ,फटी ,जा ,रही ,हैं ।  गोपाल ,कहते ,हैं ,कि ,श्रीकृष्ण ,अपने ,हाथों ,से ,गायों ,की ,सेवा ,कर ,रहे , हैं ,गायें , बहुत ,प्रसन्न ,हैं ,तथा , उन्हें ,  सेवा  ,  करते ,  देख , ब्रजबसुधा  ,  भी ,   प्रफुल्लित ,  हो , रहीं  ,  है ।
[        ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
गौ ,चारत ,  हरी  , संग ,   बलदाऊ ।
अदभुत, भूमि, सुहानी, जमुना,             ,  ब्रजमंडल         ,    ब्रजराऊ       ।
कदम्ब ,कुसुम ,सुगंध ,सुहानी               ,  मोहक , बिरख  , सुहाऊ   ।
ब्रज  ,छबि , हरिगोलोक, लजाबै          ,  दरसन , प्रेम   ,  बढ़ाऊ   ।
निरमल ,पोखर,  बाग ,लुभाने               , खग कलरब           ,  ललचाऊ  ।
पुष्पहार , अनुपम  , भ्राता, हरि  ,             , सुन्दर ,सुखद  ,   स्वभाऊ  ।
तरू ,बन ,औषध ,लता, पता  ब्रज       ,        पुलिन ,कुंड    ,  कुंडाऊ   ।
‘’गुपाल ‘’मुकंद, हरि, मनमोहन           ,           तारे    ,ब्रजबनिताऊ   ।
हिंदी अर्थ  ;——–
श्री हरि कृष्ण , बलराम ,जी , के , साथ , गौयें , चरा , रहै, हैं । अलौकिक ,भूमि ,ब्रज, जहाँ  ,जमुना ,जी ,की, मोहकता ,तथा , शयाम सुन्दर ब्रज राजा, ब्रजमंडल सभी ,अदभुत , हैं   । कदम्ब  के , फूलों, की, सुगंध ,मन , को ,मोहने ,वाले ,वृक्ष, शोभा ,दे ,रहे है। ब्रज, की, छबि , स्वयं ,श्रीकृष्ण ,के , गोलोक ,को , भी ,लजाने , वाली, है ,यह ,प्रेम ,धाम ,दरसनीय, देखने ,योग्य    है ।  विभिन्न प्रकार, की ,   चिड़ियाएँ   ,  चहक,   रही,  हैं , अन्य ,पक्षी,  भी ,अपनी ,अपनी ,आवाजें ,निकाल ,रहे ,है । निरमल पानी से ,भरी   पोखर , हैं । फूलो , के , हार, से ,सजे, हुए ,दोनो, भाई ,कृष्ण, ,बलराम, के ,साथ , गोप ,ग्वालों, की, की ,घनी, टोलियाँ, हैं , , दोंनो ,भाई, इकटठे,  है। । बृज , के,  बनों,  पेड ,वृक्ष ,औषधियाँ ,तथा ,लता पता, भी हैं । तथा ,कुडो, के ,अदभुत ,किनारे ,है।
गुपाल ,कहते, हैं , श्री , मुकंद ,हरी ,,मन ,को ,,,मोहने ,वाले, हैं , तथा,  ब्रज स्त्रियों ,के   , आँखों, के, तारे, हैं
[   ३ ]
[  गुपाल ,बालक्रीड़ा  लीलारस माधुरी ]
कृष्ण,  भक्त , क्यूं , जंचहिं , नरायन ।
बैकुंठहु , जिन,  नांहिं ,  कामना        ,          साध ,एक  ब्रज, होइ  ,बसाबन  ।
द्वारिकाधीस     ,रूप ,   न  ,          भाबै   ,       बासै   ,     हिऐ   ,    रंग प्रदायन ।
बंशी , भाबत   ,चक्र ना    , भाबत      ,        राधे    ,  प्रिय . , नांइ ,पटराइन   ।
महल, न ,पुरी , द्वारिका     ,भाबत       ,         बासै    ,मन      , रुचिर , बृंदाबन ।
राजकाज ,जिन,  फीकौ      ,लागे        ,        नीक  ,  लगै ,स्याम   , गौचारन  ।
खारौ      , समंदर ,  हिअ  , न      ,भाबै  , ,    कालिंदी   ‘’गुपाल’’  ,मनभाबन ।
हिंदी भावार्थ :—-
बृज के, सगुण भक्त, श्री नारायण रूप  को , नहीं , भजते हैं, श्री विष्णु ,उन्हें ,अपने, इष्ट ,नहीं ,लगते, हैं ,वे अपने ,लाला ,प्रभु ,श्रीकृष्ण गुपाल ,को, भजते हैं ।  उन्हें ,बैकुंठ की, कामना ,नहीं है । उन्हें ,ब्रज का ,बास सुहाता है, अच्छा लगता है।  राजा रूप ,श्री कृष्ण ,उन्हें ,प्रिय नहीं हैं । उन्हें   ,गोपाल , भाते हैं ।
वंसी उन्हें प्रिय है, सुदर्शन चक्र ,उन्हें ,प्रिय नहीं है ।  राधे ,प्रिय हैं ,रुकमनी   प्रिय   नहीं है ,वे ,केवल ,श्रद्धा का ,केंद्र हैं । द्वारिका के, महल ,उन्हें ,प्रिय नहीं है व्रन्दावन अच्छा ,लगता है । राज के कार्य से, उन्हें ,गाय ,चराते, कृष्ण ,अच्छे ,लगते  हैं । खारे समुद्र को, छोड़ ,उन्हें ,जमुना जल अच्छा लगता है ।

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