गुपाल बिनय कामना रस माधुरी

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[ गुपाल बिनय कामना रस माधुरी ]
 
 
।। बिनबऊं   नाथ   दोऊ  कर  जोरी ।।
युगल चरन मन रमैं हमारौ       हिऐ     लालसा     मोरी ।
नटखट मोहन संग बिराजी          श्री जी अति मन  भोरी ।
भुवन लुभाबन रूप निहारत            भीजहिं नैनन कोरी ।
नेह सागर मन ले हिचकौरे             निरखी जुगली जोरी ।
लगा चरन मन हरी गुपाला            होंइ प्रसन्न  किसोरी ।
 
 
हिंदी भावार्थ
  हे भगवान में अपने दोनों हाथ जोडकर युगल चरनो मैं  मन
की इचछा  पूरी करने की विनती कर रहा हूँ।  मोहन संग
राधे रानी का लोकों कों मोहित करने वाला रूप देखकर मेरे
नयनों की कोर [ पलकें ] प्रेम आंसुओं से भीग गयीं हैं।  मेरे
आराध्य श्री कृष्ण और अराध्या की यह भुवनमोहिनी अनौखी
जोड़ी के नेह सागर में मन आनंद ले रहा है।  अरे गुपाल तू
चरन कमलों में मन लगादे ।  तो वृषभानु किसोरी की कृपा
अवश्य   हो   जायेगी।    वे मुदित   हो जाएँगी।
 
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[ गुपाल बिनय कामना रस माधुरी ]
 
।। जित निरखौं पाऊं  प्रभू तोई ।।
चंचल चितबन मनहर सोभा          संग  श्री  राधे    होई ।
लता पता बनकुसुम घनेरे             निरखौं हरी  हौं  भोई ।
जीव जंतु जल जंगम गिरी तरु    एहि छबि   बचै  ना कोई ।
सुपनौं सांचो होइ हमारौ                गोबिंद  जय जय  होई ।
निरख निरख ‘’गुपाल’’ कृष्ण छबी  सगुनी भगति  संजोई।
 
 
हिंदी भावार्थ :— –
हे प्रभू गोबिंद मैं आपको जिधर भी देखना चाहूँ उधर ही आप मिलो।
  हे चंचल चितवन वाले श्रीकृष्ण आपके संग श्रीराधिका जी भी हों ।
 सारे संसार में लता पता वन फूल जीवजन्तु पर्वत निर्जनवन सब में
 आपको ही देखकर आनंद लेता रहूँ। हे मनमोहन कृष्ण श्री जी के साथ
आपको सर्वत्र देखने का मेरा सपना सच हो जावे ।गोपाल कहते हैं कि
आपको बार बार देखने से मेरा      हिरदय  अमर   प्रीत से भर जाय ।
सगुण उपासना की सगुण आपकी भक्ति मैं धारण करूँ।
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 [ गुपाल बिनय कामना रस माधुरी]
 
 
। फेरहू  दिरग    मोइ  ओर  कन्हाई ।।
हरि दासन कौ दास बनाबौ                सेबों  तोइ   गुंसाई ।
मूंदूं  तौ अंतर मैं  परगट                 खुलहिं निहारुं   सांई ।
बानी ते निस बासर  सुमरुं              तोहि    दाऊ  के  भाई।
सीस धरुं पग रज संतन जग           धाबऊं  ज्यों  परछांई ।
‘’गुपाल ‘’जनम सफल कर दीजै      परम   सिद्ध ठकुराई।
 
 
 
हिंदी भावार्थ :— –
हे कृष्ण अपने नयनों से मेरी ओर देखो। मुझे अपने दासो का भी
दास बना लो।में तुम्हारी सेवा करुंगा। अगर में नेत्रो को बन्द कर लूँ
तो आपकी छबि मेरेअन्दर में प्रकट हो जावे।  हे  बलराम  के   भाई
में मैं अपनी  वाणी  से  प्रतिदिन आपको  याद  करता  रहूँ।   संतों के
चरणों की धूल को मैं अपने  सिर रखकर  उनके  पीछे  छाया की तरह
चलता  रहूँ।  पीछे – पीछे परछाई   बन   रहूँ।  हे गोपाल  मेरा    जन्म
सफल कर दो।  तो आपकी प्रभुताई अति श्रेष्ठ रूप मैं सिद्ध हो जाएगी।
 
 
  
[  ४   ]
 
[ गुपाल बिनय कामना रस माधुरी  ]
हरि  संकीर्तन निस दिन गाऊं ।
राधे राधे स्याम स्याम प्रभु            मनसौं      टेर     लगाऊं ।
कृष्ण हरे हरि कृष्णा कृष्णा             कर    मनबा    सुख पाऊं ।
गोपाल हरे गोविन्द हरे            माधव     हरि  चित   लाऊं ।
हरि गोपाल  सुधा  रस  पीऊं         साधू    संतन        प्याऊं ।
जनम जनम पातक हरि मेटें          पुरखन          मुक्त  कराऊं ।
‘’गुपाल’’ मग कल्यान करैआ             प्यारे       बन्धु  बताऊं ।
हिंदी भावार्थ ——– –
भगवान का कीर्तन में प्रत्येक दिन करूं । राधे राधे श्याम श्याम की पुकार में रोज
मन से नित्य लगाता रहूँ । हरे कृष्ण हरे कृष्ण चैतन्य हरे कह कह कर में कीर्तन
करूँ और सुखी हो जाऊँ ।गोपाल हरी गोविन्द हरी चैतन्य हरी अपने हिरदय मैं
बसा लूँ।गोपाल के अमृत रस को मैं पीता रहूँ तथा  साधु संतों को पिलाता रहूँ ।
श्री प्रभुमेरे सभी जन्मों के पापों को नष्ट कर देंगे । तथा मैं अपने पूर्वजों के पापों
को नष्ट करवा दूंगा। यह मार्ग संसार में कल्याण कारक है । में समस्त जग के
बन्धु बांधवों   
      
     [गुपाल बिनय कामना रस माधुरी  ]
                                           
                                                                                                      
 
            ।। बसौ ,  कन्हाई , हिऐ ,  हमारे ।।
गिरराज धरन गोबिंद प्रभू ,बैनु     रसीली  बारे ।
मोरपखुरिया  कुंडल  मोहक,  मोटे दृग कजरारे ।
  श्रीमुख चंद्र प्रभा सरमाबत,  उर बनमाला धारे  ।
कजरारी लट सीसइ सोहें , कटि पीताम्बर धारे ।
         कहत ‘’गुपाल ‘’छबी नटनागर,  बिसरै नांइ बिसारे ।
हिंदी भावार्थ :—
 हे कृष्ण आप  हमारे हदय में   निवास कीजिये ।  हें गिरिराज
उठाने वाले गोपालकृष्ण हे गोविन्द हे मेरे स्वामी आप रसीली
वंशी धारण करने वाले है ।  आपकी वंशी रस प्रदान करने वाली है
आपके शीश पर मोर मुकुट कानों में कुण्डल शोभा दे .रहे हैं ।
 आपके कजरारे मोटे नयनों की मोहकता मन को भा रही है । 
आपकी मुखमंडल की ज्योती से चन्द्रमा की चांदनी भी शरमा
रही है । आपके वक्ष पर वन माला शोभा दे रही है ।  काले
रंग की  लटों  को    आपने   सिर  पर  सजा   रखा है ।  आपने
अपनी  कमर  मैं  पीला  वस्त्र  लपेट  रखा है ।  गोपाल कहते हैं
कि आपकी यह ग्वाल बाल जैसी  विलक्षण वेशभूषा भुलाने
से भी भुलाई नहीं जाती है ।
 
[    ६  ]
[  गुपाल बिनय कामना रस माधुरी   
 ।।  सांबरे अब मेरी सुन लीजै ।।
सुमरन नाम सदां हौं करिहौं  ऐसी मोइ मति दीजै ।
निज नैनन तोई कूं निरखौ नांइ  ज्योती हर लीजै ।
बानी से निस बासर गावौं  मनमोहन प्रभू जै जै ।
सुनि प्रभु कथा प्रेम  रस उपजै   नैनन हरी रस भींजै ।
हाथन   ते  हरि पूजूं  तोई एहि  औसर  मोहि  दीजै ।
कर किरपा ‘’गुपाल ‘’ पै मोहन  दास जनन हरी लीजै ।
 
हिंदी भावार्थ :—  
    हे कृष्ण अब     मेरी  सुन  लो।  मेरे  को  एसी  मति   दो
[ बुद्धि ] प्रदान करो । जिससे मैं आपका सुमरण करता रहूँ ।
 मैं नेत्रों से आपको देखता रहूँ।   अन्यथा  मेरे  नेत्रों   की
रोशनी चली जावे ।  मुख से सदां आपकी जय – जय कार
करता  रहूँ।  प्रभु की कथा सुनकर मैं प्रेम मैं सराबोर हो जाऊं।
   और मेरे नयन भगवान के प्रेमाश्रु रस से भीगते रहें।  हाथों से
मैं आपकी पूजा करता रहूँ।  हे प्रभु  एसा अवसर  प्रदान कर
दीजिये।  गोपाल कहते हैं कृपा कर गोपाल को
अपने भक्तों मैं ले लीजिये।  अपने सेवकों मैं ले लीजिये।
 
[     ७   ]
       [   गुपाल बिनय कामना रस माधुरी   ]
   
 ।  चितबऊ मोरी  ओर  मुरारी ।।
सदां रटूं  हरि नाम तिहारो भगतन हिअ भयहारी ।
प्रति छन प्रति पल राधे राधे  मोहन मायाहारी ।
सोमत जागत बैठत चालत आठों  याम बिहारी ।
मोरमुकुट प्रभु  छत्तर छाया मोपे रहे  गिरधारी ।
भगतन बान ‘’गुपाल ‘’ सुहानी   आन  जगत बीमारी ।
                                 
हिंदी भावार्थ :—:-
हे मुरारी मेरी ओर देखो।  भगतों के भय को दूर करने वाले, मैं प्रति
क्षण   प्रति पल राधे राधे करता  रहूँ।  हे माया को हरने वाले,सोते,
जागते, बैठते, चलते, आठों प्रहरमैं आप को याद करता रहूँ। हे मोर
मुकुट धारी आप की कृपा हमेशा मुझ पर बनी रहे।  गोपाल कहते हैं
यह  सौदा सच्चा है।  संसार के सबसे चतुर व्यौपारी भगवान के
      भक्त  इसे ही करते है।     और सब जगत तो बीमारी के सामान है ।         
 
              
[     ८    ]
गुपाल बिनय कामना रस माधुरी  ]
 
छमऊ स्याम जग दोस हमारे ।
पुन्य भूमि   बासों प्रभु मेरे       फिरऊ  ना औगुन हारे।
राधे राधे कृष्ण कृष्ण ब्रज           नित्य  लगहिं जैकारें।
ढुंढन स्याम तोइ और दासन            कोटन  आबें  द्वारे ।
पायो जनम जोगी जन दुरलभ        छुटहिं  बन्ध   सुकारे ।
 पाप बढयौ भारी ब्रजमण्डल        तुमई  नाथ  रखबारे ।
‘’गुपाल’’ ब्रज अघ मुक्त  बनाबौ       ब्रजबासिन  मन प्यारे।
 
 
हिंदी भावार्थ –
हे श्याम सुन्दर मेरे दोष क्षमा कर दो  । में इस पुन्य भूमि
ब्रज  में रह कर भी अकर्म करता हूँ । जहाँ पर राधे राधे व
कृष्ण कृष्ण के नित्य जै कारे लगते हैंजय जय कार होती है
। हे मोहन तुझे तथा तेरे भक्तों को ढुंढने यहाँ पर करोडों 
लोग आते है। हे स्वामी फिर भी ब्रज में पाप बढ गया हैं ।
हे गोपाल इस ब्रज को पापों से मुक्त कर दो। क्योकि आप
ब्रज वासियों से बहुत प्यार करते हो। बृज मैं पापों के लिए
कोई स्थान नहीं होनाचाहिये सर्वत्र धर्म का    साम्राज्य होना
चाहिये।
[   ९     ]
[   गुपाल बिनय कामना रस माधुरी  ]
[ गुपाल बिनय  रसमाधुरी ]
मोहन सुनि लेउ टेर हमारी ।
तोइ  ते लगन एक टक लागी             जोगीन    संत    सुखारी ।
कृष्ण नाम जग अटल आसरौ            लीनों  , प्रभू , गिरिधारी ।
ताली दै दै लोग हंसत  हरि              मोरी ,       हंसी  ,  हमारी  ।
मेरी टेक प्रभू तुम राखौ                 आपइ  रहे         ,  तुम्हारी ।
कही ’ गुपाल’सदां भगतन        जग     बिगरी  बात    संबारी।
हिंदी भावार्थ ——–
हे कृष्ण अब तुम मेरी सुन लो । हे भगतों के भय   दूर करने वाले
मेरी लगनआपसे प्रत्येक क्षण लगी है। हे प्रभु आप संत तथा
जोगियों को सुख देनेवाले हैं । हे कृष्ण हे गिरधारी गोविन्द मुझे
तुम्हारे नाम का कभी खत्म नहींहोने वाला सहारा आसरा है ।
लोग ताली दे देकर  हँस रहे हैं । मेरी हंसी मैं  हम दोनों की हंसी हो
रही है । हे प्रभू मेरी मनौती को रख लीजिये । आपका मान अपने आप
रह जायेगा । भगतों की मदद करने की आपकी      बात पक्की हो
जाएगी । गोपाल कहते हैं कि आपने भगतों की हमेशा  बिगरी
  बात रखी है।
[   १   ०   ]
[   गुपाल बिनय कामना रस माधुरी  ]
मनबा , होउ ,चरन, अनुरागी ।
करम ,करो  ,हरि ,सेबा  ,जानौ           मानस ,       परहित  ,    लागी।
परमारथ ,संतन   , पद  सेबा                    बन, तू , हरि, रस ,  रागी  ।
कृष्ण ,राधिका ,नाम ,  सुधारस             ग्रहस्थ    , जोग ,    विरागी ।
दीखै, जेहि ,कछु ,मिथ्य, जगत मैं   ,       नस्वर    ,   एहि,   रसरागी ।
‘’गुपाल ‘’       जपौ, निरंतर ,माधव    रसना         ,   हो ,    बडभागी।
हिंदी अर्थ  ;——
हे  मन तू  श्रीकृष्ण राधिके, के,चरणों का ,दास ,हो, जा।
जो,  भी ,करम ,करै ,  उसे, प्रभु ,की ,सेवा ,समझ ,कर।
दूसरे, के ,हित, में, ही ,भलाई,  हैं। संतो ,की ,सेवा, परमारथ
,कर ,तू हरि, की पगडी  बांधने ,वाला,हो, जा। कृष्ण,राधिका
, के ,नाम ,का ,अमृत , गृहस्थी ,जोगियो तथा बैरागियो के
,भी ,पीने योग्य है। इस मिथ्या ,संसार मैं जो भी दिखाई देता
है वह ,राग ,उत्पन्न करता है ।   हे गोपाल ,भगवान का, नाम
,लगातार, जपलो ,, भजन कर लो ।जिससे, ,तुम्हारी जबान
(रसना)   बहुत  ही , भाग्यवाली, होगी ।

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