गुपाल ब्रज ,जमुना   रसमाधुरी 

[ १ ]
 
 
                   [    गुपाल ब्रज     जमुना    रसमाधुरी  ]
 
                 ।।  कामबन  सोभा  मोइ  लुभाबै ।।
कोट पुरातन कुन्ड चुरासी          चुरासी खम्ब गिनाबै ।
चरन पहारी    भोजन थारी          मन अती नेह बढाबै ।
गौकुल चंद्र मदन मोहन प्रभु      कामेश्वर अती भाबै ।
तीर्थराज़ के     मन्दिर मोहक    सोभा  बरन ना जाबै ।
ब्रहममहूरत हरि हरि होबत        सत संगत  हरी पाबै ।
बास कामबन सदां  ‘’गुपालइ’    हीअ  ललचाइ बुलाबै ।
हिंदी भावार्थ :—-
काम़वन की शोभा मेरे को लुभाती है। चैरासी कुन्ड चौरासी
खम्बातथा किले के खण्डहर इसकी महत्ता समझा रहे हैं।
चरन पहाड़ी भोजनथारी मन  मन्दिर में श्री कृष्ण के स्मृति
चिन्ह हैं।  जो प्रेम बढाने वाली है। गोकुल के चन्द्रमाँ  मदन
मोहनजी कामेश्वर तीर्थराज विमल कुण्ड की शोभाबरनी न
जा सकती है।  ब्रहममहूरत में हरीहर की धुनि तथा संतो की
   संगतसे प्रभु से निकटता बढ़ती है।  गोपाल कहते हैं कामाँ
  का निवास गोपाल कोहमेशा ललचाता है। आकृष्ट करता है।
   अपनी ओर बुलाता है।
[   ]
 [    गुपाल ब्रज  जमुना   रसमाधुरी  ]
   
।। जमुना तीर बसइ   ब्रज  पाबन ।।
जंह सोहहिं तरूबर अति मोहक   नभ बिच ज्यों तारागन।
कगरी  अनुपम गोकुल मधुबन    बृंदाबन   अति पावन।
गोबरधन गिरि   पादप सुन्दर        बरसानों मनभाबन।
नंद गांव सोभा को बरनै जो             हरि  की  ठहराबन।
घर घर मंदिर जहाँ विराजत      जुगल   रूप  नारायन ।
भरतखन्ड ‘’ गोपाल ‘’ अनूठी    ब्रज भूमि कलीतारन।
 
 
हिंदी भावार्थ :—
बृज जमुना के तट पर बसा हुआ है।   जहाँ पर मोहक तरूवर शोभा दे रहे है।
जमुना के सुन्दर तट पर गोकुल मथुरा वृन्दावन पवित्र नगरियाँ है।   गोवर्धन
 पर्वत पर सुन्दर वृक्षों का समूह है।   बरसाना मन को बहुत ही अच्छा लगता है।
नन्दगाँव शोभा का बरनन नहीं हों सकता जहाँ प्रभु श्री कृष्ण निवास करते हैं।
  यहाँ पर घर घर में मंदिर हैं।  जहाँ राधे संग मनभावन श्री कृष्ण की जुगल जोरी
विराजमान हैं।   ‘’गोपाल’’ कहते है।  भारत वर्ष में ये बृज भूमि
कलियुग में तारने वाली भूमि है।
 
  
[     ]
  
 [   गुपाल ब्रज  ,जमुना   रसमाधुरी  ]
        
।। बृज मंडल सोभा कौन कहै ।।
पतित पाबनी जगत तारनी        जमुना निरमल धार बहै ।
घर घर मंदिर जहां बिराजत       कृष्ण  राधिके  प्रीत  लहै।
जहां  नमन की बिधा अनूठी             जै राधे जै  कृष्ण कहै ।
राधे राधे रटती सुनती                   सीतल  मंद समीर बहै।
ब्रजमन्डल  भूलोक पुनीता   अजहु ‘’ गुपाल’’ सुबास चहै।
 
हिंदी भावार्थ :—
हे प्रभु ब्रजमण्डल की शोभा कौन कह सकता है। जिसमें पतित पावनी
जमुना की धार बह रही है जहाँ घर घर में मंदिर है।      जिनमें श्रीकृष्ण
राधिके की मनुष्य को प्रेम प्रदान करने वाली जोड़ी विराजमान है। जहाँ
नमस्कार करने  की अलग  परम्परा है। जिसमें जय राधे  जय   कृष्ण
कहा जाता है।बृज मैं राधे राधे कहती सुनती रटती हुई शीतल धीमी वायु
बहती है। गोपाल कोपृथ्वी लोक स्थित उसी परम पुण्य भूमि का ही वास
आज भी चाहिये ।
[     ]
 
 
  गुपाल ब्रज , जमुना   रसमाधुरी  ]
[ गुपाल ब्रजमंडल  रसमाधुरी ]
सामन झर ब्रज कोकिल बोलहिं ।
कबउ  बीजुरी कबउक झनझन             मेघा आबहिं    खोबहिं ।
भांति भांति  ब्रजलता उगानी          कुसुमकली      बृज सोहहिं।
बिसरी सुधि बुधि तन मनमोहन         गिरबर      मनबा  मोहहिं ।
मोरन निरत  बिहंगन कलरब            हालि   साबनी      बोबहिं।
सबै जीवजल मगन सुहाने              मनभाबन  सखी    बोलहिं ।
अदुभुत ब्रज कौ बास ‘’गुपालहि’’           प्रेमभूमि   हरी    भोबहिं ।
हिंदी भावार्थ –
सावन महीना का झर लगा हुआ है। बृज मण्डल में कोकिल कोयल बोल रही है।
कभी बीजरी चमकती है। कभी बादल बरसते है। बृज मैं तरह तरह की ब्रजलता उगआई है।
\कुसुम कली से बृज बसुधा का श्रृंगार हो गया है। \मनमोहन को अपने शरीर की
भी याद नहीं रही वे श्री गिरिराज को निरख रहे हैं किसान खेती बो रहे है। सारे जल के
जीव प्रशन्न हो रहें हैं। वे अपनी अपनी सखियों को बोल रहे है। गोपाल यह बृज का
वास बड़ा ही अदभुत है। यही प्रेमभूमि लीलाभूमि मेरे प्रभु आनन्दकन्द श्रीकृष्ण को भी
लुभाती है।
[      ]
  गुपाल ब्रज ,जमुना   रसमाधुरी  ]
बिचरहिं , बृन्दा , बिपिन ,गुंसांई ।
कालिंदी   , सोभा ,को, बरनै                ,     अपढर , मन  ,लरझांई ।
कुँज  , गलीन ,आने, बिसमाने             ,     चहुं  ,दिस  ,राधे, राधे ।
कान्हा ,कान्हा ,रौर ,व्यौम ,  ब्रज        ,     कान्हा , नेह  , अगाधे  ।
सुरभित ,,सुरभि ,बहत , बृन्दाबन           , गामत   , रास   ,   बिहारी ।
तुलसी ,बृन्द, रुपै ,घर, मंदिर       ,   ,  ‘माधव  मदन मुरारी।
प्रेम, पगाने ,ब्रजबासिन, लख        ,हरसित   ,  मन     , उमगानौं।
तुलसीदास ,लुट, लुटी ,   मारें ,     ‘ गुपाल  ‘’      , रूप     ,सुहानौ  ।
हिंदी अर्थ  ;——
”श्री ,तुलसीदास जी ,वृन्दावन में ,घूम रहे हैं। जमुना ,नदी के, किनारों  की
,सोभा ,उनके, मन को, ललचा रही हैं। छोटी ,छोटी ,गलियों को, देखकर, वे,
विस्मय से ,देखने ,लगे ।  सब ओर, श्री राधे ,राधे ,हो ,रही हैं। कृष्ण ,कृष्ण का
,शोर ,हो रहा हैं। मानो ,पूरा ,बृज ,कृष्ण ,प्रेम ,में ,डूबा ,हुआ हैं। सुगंधि लिए
सुरभित , पवन, बह, रही श्रीकृष्ण का ,नाम ,गा रही है,। घर ,घर में ,तुलसी जी
, का ,पौधा ,लगा ,हुआ हैं।   तथा ,घर के, मंदिरों मैं, मुरली लिए ,श्री कृष्ण हैं ।
 प्रेम में ,पागल हूए ,ब्रजवासियो को, देख श्री तुलसीदास  ,हर्षित हो रहे हैं। तथा
,ब्रज रज , में ,लोटने लगे ।,   ब्रज रज मैं ,लोटने से ,उनका ,शरीर और ,
सुन्दर ,सुहावना ,लग रहा है।,
     ]
[   गुपाल ब्रज , जमुना   रसमाधुरी  ]
गिरी , गिरिराज ,बास ,ब्रज ,धामा।
सुत ,द्रोनाचल , भूधर , स्वामी                  , स्याम ,बरन  ,   युत ,जामा  ।
याचक, मुनि  ,पुलस्त   ग्यानीबर              ,  द्रोन  , नैन        ,  अभिरामा  ।
काशी , पुरी  ,बसाबौं  गिरिबर                   , मन      कामा ,     निस्कामा     ।
भांति , भांति ,बन सम्पद  मोहक          ,    तरूबर     ,कोट , प्रनामा ।
मोक्ष ,प्रदाता ,जीबन ,दाता                    ,  कलयुग          ,कृष्ण, सुदामा ।
‘’गुपाल’’ सरन , लीन  ,    गिरिबरधन  ,    पूरन   ,  होंय ,सब ,   कामा।
हिंदी अर्थ  ;——
ब्रज मण्डल, में, श्री, गिरिराज जी, का ,वास ,है। श्री गिरिराज जी , सभी
पहाड़ों, के, स्वामी ,  द्रोणाचल ,के, पुत्र हैं , द्रोणाचल समस्त ,पहाडों ,के,
पिता हैं। इनके ,लिए ,मुनि पुलस्त ने ,कामना कर ,उनके, पिता से ,
याचना कीं। कि ,श्री गिर्राज जी को ,वे ,उन्हें ,दे,  दें, ।  वे श्री गिर्राज जी ,
स्याम , रंग, के ,हैं  द्रोण , से , मुनिवर ने ,उनके ,नैनों , की, शोभा, गिर्राज
जी को, माँगा  । उन्होंने ,काशी , सिद्ध क्षेत्र, में ,गिरिराज जी ,को, स्थापित
,करने, का ,सोचा, था। जो, इच्छा, पूरी , नहीं, हो, पाई। इस ,गिरिराज, जी ,पर
भाति, भाति ,के ,वृक्ष तरूवर , तथा वनस्पतियाँ ,शोभा, देते है।
यह ,मोक्ष ,के ,साथ, कलयुग, का, कृष्ण समान, दाता जो ,माँगने ,पर
,सुदामा ,की, तरह,  पूर्ति ,करने, वाला , है। गोपाल,  ने ,भी, श्री गिरिराज
,जी, की ,शरण, ली है। उसकी, पूर्ण ,इच्छा, होनी, है।   इसमें को,संसय ,नहीं ,है।
[  7  ]
[    गुपाल ब्रज , जमुना   रसमाधुरी  ]
मुनी      ,   पुलस्त   , तिरबाचा   ,  गहेऊ ।
करस्थान , बास , गिरी       ,राजा                 ,बासौं ,  जंह , धरि ,  देऊ  ।
प्रमुदित  , गिरिगोबरधन,  हुलसे                    , पूरन ,  कामना    ,  ध्येऊ ।
आसन     ,कर ,गिरराज, द्रोन सुत            , उमगत ,    भूमी  ,   सनेऊ।
धाऐ  , मुनिबर, , साध , पूरनिज                 ,  कासी , नाथ  , पग ,  नेऊ ।
दूर   ,घनी    ,काशी ,कैलाशी             ,   लगी , साध  , मुनी ,   गेऊ।
हिंदी अर्थ  ;——
गिरिराज, जी, ने ,पुलस्त मुनि ,को ,त्रिवाचा ,लेने ,को ,कहा । प्रमुदित ,होकर ,
मुनि ने ,ध्येय पूरा हुआ जानकर  [ गिरराज ,की ,स्वीकृति, समझ ]   ,हाँ  , कर दी ,।
मुनि ,  पुलस्त्य ,  ने   , श्री गिर्राज जी ,  को , अपनी ,  हथेली बिठाने ,का ,आश्वासन
सहर्ष ,तीन ,बचन, प्रदान  कर ,दे ,दिया ।  गिरिराज ,जी ,को, तीन, वचन, दे ,दिए ।
भी ,बृज ,मैं ,निवास ,होने ,की ,ख़ुशी ,हुई , उन्होंने,   सोचा , कि , मुनि के ,भूलने,
 पर , मैं , बृज , मैं,  बास , करूँगा  ।  मुनि, ने , मनोकामना, पूरी , हुई , जान ,अतीव,  हर्ष
,का , अनुभव , किया । गिरराज,  जी, को ,।  मुनि, ने ,स्वारथ ,पूरा ,हुआ, जान,  तेज
,गति से ,चलने, लगे। ह्रदय ,में ,विश्वनाथ ,के, लिए ,प्रेम,  है। कैलाशनाथ ,की ,काशी
,बहुत,  दूर है। भोलेनाथ, के,  घर , को ,श्री गिरिराज ,  का ,घर , बनाने, की
, पुलस्त , जी, को , लगन ,  लगी ।
[ ८   ]
  गुपाल ब्रज ,जमुना   रसमाधुरी  ]
बिसरौ ,पन ,मुनी ,संका ,आई।
कालिंदी ,कलकल, मन , बासी             ,    सुरभित ,     मरूत , लुभाई।
भांती, सुभांति  , द्रुप ,नबनीता              ,  ब्रज मंडल         ,    अधिकाई।
हौनी, हौंन, ,  मनें ,ना , घाटै        ,     बरजत ,रुकत ,न, भाई  ।
धरनी ,धर ,बिसराम  , करूंगौ             ,        मुनि , मन ,सुरत, लगाई ।
धरत, मुदित, , मन, श्री गिरिराजा        ,     पाबन    ,  भूमि    ,  लखाई।
संध्या , कर, रिसि ,  ध्यान धरें, हर   ,        तिरबाचा         ,   बिसराई।
‘’गुपाल’’ जान, ब्रज बास,   अबसइ    ,    सैल ,     लई   , अंगड़ाई ।
हिंदी अर्थ  ;——
लघुशंका ,की ,इच्छा , होने  ,के, कारण, मुनि ,को, प्रन ,विसर ,गया ,वे ,
अपने ,दिए ,हुए ,वचन , को,, भूल गए । जमुना जी, के ,बहाब ,की ,
कलकल  मधुर ,ध्वनि ,तथा, सुगंधित, सुन्दर वायु , मन ,को ,
लुभा  , दे ,रही थी । जो ,मुनि, पुलस्त , जी ,के, मन ,मैं ,बस ,गयी ,
ब्रजमण्डल ,में ,भाति, भाति , भिन्न ,भिन्न किस्म [ तरह ]  के ,
नवीन , पेडों, की, सघनता,  थी। होनी  , होकर ,मानती, है, जो ,घटना,
घटना ,प्रभु, ने ,तय ,कर ,दिया है ,वह ,रोकने ,से ,भी ,नहीं ,रूकती ,है ,
मुनि, ने ,धरती ,पर, गिरराज ,को ,रखने  ,का ,मन ,बना ,लिया ।
ब्रज की ,धरती ,को, देख ,गिरराज ,बहुत ,हर्षित, हो, गये । पुलस्त ,
जी ,निवृत्त ,होकर संध्या ,कर रहे थे। ब्रजवासी ,बनना
, निश्चित ,जानकर ,गिरराज ,जी, हर्षित ,हो ,रहे, थे ।
[     ]
  गुपाल ब्रज  , जमुना   रसमाधुरी  ]
कही    , पुलस्त , चलउ      ,  गिरि       ,    भाई ।
गंगा    दूर ,  घनी ,    सिब  कासी          ,      ब्रज बसुधा   , सुभ,आई।
भयौ , अचल  , थाके, मुनि,  बोले              ,   काअ     ,  लई       ,अधमाई।
मुनिबर , सुमरन , प्रन  , अब कीजै            ,   गिरिबर  ,   मन ,    मुस्काई।
तिरबाचा, याद ,मुनी , कीनी                   ,   क्रोधित  ,  साप   ,    सुनाई।
तिलतिल ,घटउ , नित्य, गिरिराजा            , कासी ,   तोएै  ,     न ,     भाई।
गिरिराज,   साप,   मुनि ,  बर ,जानौ          , मन     ,      मांई    ,    हरसाई।
गिर्राज प्रभु ,”गुपाल” मन पुलकित           ,       प्रगटें    ,  संत    ,   सहाई  ।
हिंदी अर्थ  ;—-
मुनि, पुलस्त जी ,बोले ,अब, गिरराज, चलो। यहाँ , से ,श्री गंगा जी,
बहुत ,दूर,  है ,अभी ,ब्रज, ही ,आया है । गिरराज जी ,वहाँ , स्थापित
,होकर, बोले ,मुनिवर ,अपने, प्रन ,को ,तो ,याद , करिए। मुनि ,ने ,
प्रन को, यादकर , क्रोध ,के ,कारण, श्री गिरिराज, को ,श्राप ,दे ,दिया ,
कि ,तुझै , काशी ,नही ,भाई। तू ,तिल ,तिल, रोज, घटेगा। श्री गिरिराज
जी ,ने, सहर्ष ,साप, को ,धारण ,कर ,लिया। गोपाल ,कहते हैं , गिर्राज
जी, को , वास बृज मैं भगतों को अच्छा लगता है । पता ,था ,की
,एक दिन, श्री कृष्ण, प्रभु, प्रकट, होंगे सोचकर ,खुश, हो, गये।
[  १ ०   ]
[     गुपाल ब्रज  , जमुना   रसमाधुरी  ]
गहऊ , साप, मन मंदिर ,आसा।
आबैं , स्याम   ,चराबैं ,  गौधन                    ,     नित ,प्रित  ,रोचक ,रासा ।
स्वामिन, संग प्रभु,  हरी, दरसन               ,सहज ,  होइ    ,   दुख   नासा।
दान ,मान ,दधी , लूटन ,लीला            ,  साक्ष्य ,बनौं  , हिय ,हासा।
चरन ,कमल, मस्तक , हरि , खेलहिं             ,अतिसय   ,पुन्य     ,प्रकासा।
सरन , दिबैया , सब ,जग के, हरि            ,    आंगन , करें    ,सुबासा।
‘’गुपाल’’ प्रसन्न ,होंइ ,   गिर्राजा          ,      अंगुल ,करिऔं ,  बासा।
हिंदी अर्थ  ;——
श्री गिरिराज, जी ,ने ,पुलस्त मुनि ,के ,श्राप, को, एक ,आशा , के
, साथ , वरदान ,मानकर ,अंगीकार ,कर लिया। मधुसूदन ,श्री कृष्ण, यहाँ  ,
प्रकट ,होकर ,गऊ  ,चरायेंगे ,तथा ,रास ,करिगें। अपने, नैनो ,से, मैं  स्वामी,
तथा, स्वामिनी, के, दरसन,कर, दुखों ,का ,नाश ,करूगा। दान ,मान ,दधि
लूटन, सब, लीलाओं, का ,में ,साक्ष्य, बन , सकूँगा । वे ,मेरे ,मस्तक ,पर ,
चरन ,रखकर ,,खेलेगे। लीलाएं ,करिंगे  ,यह ,मेरे ,अत्यधिक, पुन्यों का,
प्रकाश, होगा।  गिरिराज, जी ,यह ,जानकर, भी ,प्रसन्न ,हो रहे
है कि वे श्री कृष्ण मुझे ,अँगुली, पर ,धारन ,करेंगे ।
[   १ १     ]
  गुपाल ब्रज  , जमुना   रसमाधुरी  ]
ब्रजमण्डल ,गिरि राज ,कन्हाई।
दो योजन , बिस्तार ,प्रभू  जी   ,     , योजन       ,      पंच  ऊँचाई।
भांति , भांति , द्रुप ,पादप ,सोहें           , योजन     ,      अष्ट ,लंबाई।
तिल  ,तिल,  घाटत सब,गिर, राजा       , श्राप ,  लीन  ,   मुनि राई।
पांव    , पखारत , सहोदरा ,जम            , कल , कल  , बारि, बहाई।
गौधन ,गिनती, करी, नहिं  जाबै         ,  गोलोकऊ ,   सरमाई ।
‘’गुपाल’’ भूमि , अनूठी , पाबन      ,      कुंडन  , ब्रज    , अधिकाई।
हिंदी अर्थ  ;——
बृज ,मैं ,श्री गिर्राज जी, भगवान स्यामसुंदर ,का ,पर्वत रूप है ।
श्री गिर्राज जी , की ,चौड़ाई ,दो योजन ,तथा ऊँचाई, पाँच योजन, थी ।
,यानि, पूरे ,दस कोस ,यानि पंद्रह किलो मीटर ,थी।  उनके ,ऊपर ,भांति भाँति के ,
पेड़ ,पौधे शोभा दे रहे हैं। श्री गिर्राज की ,लम्बाई , आठ, योजन है , सभी पहाड़ों के ,
राजा ,श्री गिर्राज जी ,मुनि ,द्वारा ,दिए, श्राप के, कारणतिल तिल कर, घटते ,जा, रहे हैं,
यमराज, की ,बहिन, श्री जमुना जी ,का ,जल ,कल ,कल,
ध्वनि के, साथ ,उनके ,चरण, धो ,रहीं, हैं  ,गऊ, धन ,इतना ,है ,कि, उसकी ,गिनती ,नहीं की,
जा ,सकती है ,बृज ,को ,देखकर ,गोलोक, भी ,शरमा ,जाता है गोपाल ,कहते हैं ,की ,बृज की,
यह, भूमि ,अनोखी है ,जिसमें ,जलकुंडों ,की, भरमार, है
[१ २     ]
  गुपाल ब्रज,जमुना  , रसमाधुरी ]
 
महाबन, छांड़ि, बृंदाबन , जांई।
जसुदा , रोहिनि  ,नारि ,संग , जिन                     ,  गोपी  ,जुरि  ,मिल ,आंई  ।
रथ , गाड़ी ,छकड़ा ,भर ,लीने                              , गौधन ,    झुंड , हंकांई ।
नंद ,बसानों , नंदगांब , ब्रज ,                                , कदम्ब , सुरम्य ,सुहाईं  ।
वृसभानुपुर ,   भानु ,    बिराजें                              ,सोभा , बरन      ना . जाई।
सुन्दर , मारग , अनुपम,कुंजा                               , मंदिर , रुचिर,       सुहाईं ।
”गुपाल”, बासें    जहां  ,      लाड़ली                       , काऐ   ,     रहै    ,न्यूनाई ।
हिंदी अर्थ  ;——-
महावन, को, त्याग, कर , छोड़कर, श्री नन्द बाबा ,वृन्दावन ,को ,चल ,दिये, है।
जसुदा ,तथा, रोहणी,  के साथ ,गोपो, के , परिवार ,भी, है। रथ ,तुरंग ,छकडा,
सब ,सजकर, तैयार है  , उनमें बहुत सारा, आवश्यक सामान ,भर ,लिया है
गौधन ,भी , हाँकने के लिये ,तैयारी है। बाबा नंद, उपनंद सभी, वृन्दावन की
भूमि को देखकर ,ललचा रहै है। बाबा नंद ने, कदम्बो के ,विशाल वनों के ,बीच
,नंदगाव ,बसाया है। वृषभानु  जी ,यहीं ,पास मैं ,वृषभानपुर , मैं ,रहते ,हैं  ।
उनका ,नगर ,बहुत ,ही सुन्दर है ,जिसकी शोभा का ,बर्णन, सम्भव ,नहीं ,है, ,
मार्ग , बहुत, ही ,सुन्दर, हैं । यहाँ, के कुंज भी  अनुपम हैं । मंदिर , भी ,बहुत
,ही सुन्दर  हैं, गोपाल  जी , कहते हैं ,जहाँ,  स्वयं, श्री जी (लक्ष्मी) ,का,
निवास है । वहाँ , काहे ,की ,कमी ,हो ,सकती  है।
  3  ]
 
[गुपाल ब्रज , जमुना   रसमाधुरी ]
अहम बढानों    हिआ  फुलानों        ,   प्रमुदित , निज,   ठकुराई।
.भेट. लींन  तीरथ , भूमंडल                    ,    प्रभुता,  मद , गद ,छाई  ।
खिन्न ,होत ,मन ,ब्रज , ना, आनों           ,      चोट .लगी .      प्रभुताई।
पूछत ,हरि , सौं भेद   ,    बुझाबौ              ,        मन  मांही        इठलाई।
सुनहु ,प्रयाग ,ब्रहम,   , ब्रज बासौ            ,        पुन्य ,भूमि  ,  सुखदाई।
प्रलय ,काल ,     अबिनासी , अबिचल         ,     ब्रज मंडल    ,     अमराई।
, ब्रज  गौलोक  , खंड ,  भूलोका             ,   ‘’गुपाल’’   प्रभु    ,  बतराई ।
हिंदी अर्थ  ;——
संगम तीर्थ , जो ,प्रयाग ,मैं ,स्थित,,  है वह ,सभी ,तीर्थों ,का ,राजा ,है
वे,भगवान ,के ,हाथ , से , तीर्थ राज ,बनकर , बड़प्पन, के, कारण ,मुदित, हो ,रहे ,हैं
। धरती, के ,समस्त , तीर्थों,द्वारा, भिन्न प्रकार ,की, भेँट , पाकर ,घमंडी ,हो ,
गये ,हैं। ब्रजमण्डल ,के तीर्थे ,के ,न ,आने ,के ,कारण ,मन ,में, खिन्नता, का
,अनुभव ,,कर ,रहे, हैं। मन, में ,इठलाकर ,भगवान से ,इसका ,भेद ,पूछ ,
रहे, हैं  । गोपाल ,के ,प्रभू ,बता ,रहे, हैं ,हे ,प्रयाग ,ब्रज में ,भगवान,  का ,वास है
। तथा ,गोलोक ,का, एक ,खण्ड ,होने, से ,अमरता, को, प्राप्त, है। यह ,भूलोक
,से, अलग, है। इस, भूमि का, प्रलय काल, मैं ,भी ,विनाश ,नहीं, होता, है।
    उनको ,प्रभु ,ने ,ऐसा ,बताया  ।
[   ४    ]
[   गुपाल ब्रज , जमुना   रसमाधुरी ]
निरखऊं    ,    नैन ,    लुभानी , धरनी ।
भांति ,भांति , ब्रज , बिरख ,मनोहर            ,     पात ,फूल ,    फल, जननी।
ताल , तलाई  ,पोखर ,कुंडा                        ,    जमुना , जल ,जग, तरनी ।
मंदिर  ,मंदिर ,बैनू ,बारौ                           ,        जप ,  तप ,पूजा ,सगुनी ।
करन , सुधा , श्री राधे ,कृष्णा                  ,  मरूत ,बअत  ,हरि  ,,भजनी ।
कुंजन ,कुंजन   ,    लुटै , प्रेम रस ,                ,   कौन ,कबि , जेई      ,  बरनी।
‘’ गुपाल ‘’ लाल, सखा, हरि ,प्रीतम       , भाब  , भाबना       ,   मननी।
हिंदी अर्थ  ;——-
मैं ,अपने, नैनो , से , ब्रज , की ,शोभा, देने, वाली, मन ,को ,लुभा देने वाली ,
धरती ,को  ,सुन्दर , धरती , देखूंगा । जहाँ,  पर ,भांति ,भाति, के ,तरह ,तरह ,
के , मनोहर , वृक्ष, फल, फूल, वाले, है, यह ,बृज की ,धरती ,इन सभी ,वृक्ष ,
फूल फल ,पौधों ,की ,जन्म देने वाली ,है । जो ब्रज की, वसुंधरा का ,श्रृंगार है ।
यहाँ पर तालाब ,पोखर आदि की ,भरमार है ,तथा जमुना जी का जल ,संसार से
,पार ,लगाने, वाला है मंदिर ,मंदिर, पर , यहाँ  बंशी, धारण ,करने, वाले, श्री कृष्ण
,निवास, करते ,हैं    । जहाँ , जप ,तप, सगुन भक्ति, की, पूजा, होती है । कानों ,में,
यहाँ   ,राधे , कृष्ण भक्ति, का, अमृत रस, सुनाई, देता, है। यहाँ , की, कुँज  गलियों मैं
[सँकरी गलियों मैं ]  प्रेम रस, बॅंट रहा है । ऐसा, कौन ,कवि ,है जो ,उस ,आनंद, का ,
बर्णन ,कर ,सकता है, गोपाल , कहते, हैं,         जो ,  मनुष्य  ,गोपाल जी , को , अपना
,स्वामी ,अपना ,भगवान , अपना मित्र, अपना ,बालक ,, या ,अपना ,प्रीतम , मानता ,है ,
ये ,सभी , भाव , गोपाल, जी ,को ,मान्य है। ब्रज, मैं ,हरी ,को ,किसी ,भाव, से, भजो
,श्री कृष्ण ,उसी ,को ,स्वीकार, कर, लेते ,हैं।
[ ५   ]
[   गुपाल ब्रज , जमुना   रसमाधुरी ]
पाबन ब्रज,  प्रभु   , धाम , सुआनौ ।
बृंदाबन , बहला बन ,  मधुबन            , भांडी बन,  , मन,       भानौ   ।
बारह बन ,सुन्दर ,अति भारी        , काम, ताल,  बन ,   मानौ ।
कुसुम .सरोबर, मानस ,गंगा               , भानु ,  ,सरोबर    ,     जानौ।
किसन   कुंड ,राधाकुण्ड ,सोहत       ,   नारद   ,कुंड   ,   लुभानौ ।
कोस ,चुरासी  ,  कुंड चुरासी        ,   ,  पुन्य  , प्रदायिन, ,   जानौ ।
गिरबर ,जमुना, अदभूत सोभा        ,   कृष्ण , स्वरुपइ    ,   मानौ ।
भूतेश्वर ,,चकलेश्वर , भोला                 , काम, गोपेस  ,       लुभानौ ।
सांचौली  ,मैया ,अति ,सांची                ,राधे , , ,        सत,      पतिआनो।
‘’गुपाल’’ रूप ,धरौ     जननि ,जग      , ,   पूजन , भानु,   , सुआनौ    ।
हिंदी अर्थ  ;——-
ब्रज, जैसा  , सुंदर ,  सुहाना , कोई ,धाम  ,नहीं , यह ,गोविंद का ,सुहाना धाम  है
, सुन्दर वृन्दावन , बहूला बन ,मधुबन ,भाण्डीर मन को लुभा ,लेते, हैं। बृज मैं,
बारह ,उत्तम ,सुन्दर, बन हैं ,,जिनमें ,काम बन , तालबन ,भी, आकर्षक हैं ।
कुसम सरोवर ,मानसी गंगा , भानु सरोवर , पवित्र ,सरोवर, हैं ,कृष्ण कुण्ड
,राधाकुण्ड ,नारद कुण्ड ,सभी सुहाने, हैं । ब्रज चौरासी, कोस ,मैं ,चौरासी, कुण्ड,
पवित्र, हैं, । इनका ,स्नान ,दर्शन ,सभी, पुण्य प्रदान करने ,वाले हैं ,श्री गिर्राज ,जी
,तथा, जमुना, जी, को, कृष्ण स्वरूप ,ही समझना, चाहिए ।   भूतेश्वर, चकलेश्वर
,कामेश्वर, गोपेश्वर ,ब्रज ,के ,प्रसिद्ध, शिवलिंग, है। सांचौली , मैया , अत्यंत, सच्ची है ।
इन्होने, श्री राधे, को, भी ,सत्य ,सिद्ध, कर, दिया ,भगवान ,स्वयं, देवी ,बन गये ।
जिन्हें ,श्री राधे ने, वृषभानु जी ,को बताया।    हे, पिता ,जी ,  मैं,  बन , मैं
,   देवी , दर्शन , हेतु , आई ,थी
६      ]
 
 
गुपाल ब्रज , जमुना   रसमाधुरी ]
 
 
 
                    ।। सूर सुता अति स्याम जू  भामत ।।
ब्रज के जेते हैं जड जंगम   पोसक नीर पिबामत ।
मन्जन रंजन धेनु गोप कौ  जमुना जल  करबामत ।
बैनु बजत लहराबत तो जल गोपिन कूँ भरमामत ।
तोइ आचमन मन प्रानिन कौ स्याम रंग  रंगामत ।
जमुना जी कौ संग गुपालहिं   हरि कौ संग दिबामत ।
 
हिंदी भावार्थ :—
जमुना जी भगवान कृष्ण को अती प्रिय हैं।  क्योकि यह ब्रज के समस्त पौंधे
लता पतान सब को पौष्टिक  पानी पिलाती है।  इसके जल से ब्रज के गोपग्वाल
गायें  गोपिया तृप्त रहते हैं। जब वंशी बजती है।   तो जमुना जलमैं लहरें उठने
लगतीं हैं।  जमुना जल आचमन करने से प्रानी स्याम रंग में रंग जाते है।  जमुना
जी के संग गोपाल को भगवान श्री कृष्ण का संग सानिध्य दिला देता है।
बरबस ही गोपाल कृष्ण मिल जाते हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
                                 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
[     ]
 
[     गुपाल ब्रज , जमुना   रसमाधुरी   ]
कालिदीं तट रूचिर सुहामत ।
झुन्ड झुण्ड अम्बुज इकठौरे    सोभा   मन   सुख पामत ।
बहुभांती प्रसून  बहुरंगी        क्रीडा   भ्रमर    लुभामत  ।
मथुरा नगर अटारी ऊँची     जमुना    तीर     लखामत ।
रंग  बिरंगी नाब सुहानी      जमुना   सैर   करामत ।
नीम पीपरी पीपर सोहत     बरगद    छांह   सुहामत।
अंजन मंजन तरपन पितरन    स्यामा     नीर   करामत  ।
सूरसुता बैभब को बरनैं      जेइ  ‘’गुपाल’’    लुभामत।
हिंदी भावार्थ – जमुना के दोनों तट सुन्दर लग रहे हैं । कमल पुष्पों के झुण्ड के झुण्ड इकठ्ठे होकर शोभा को बढा रहे हैं । मेरा मन अत्यंत सुख पा रहा है तरह तरह के अन्य  प्रजाति के अनेक रंग वाले पुष्पों से श्री जमुना का तट सुसज्जित  है। खेल करते हुए भौंरे अत्यंत शोभायमान हैं ।  मधुपुरी [मथुरा ] ऊँची अटटालिकायें जमुना के किनारे से दिखाई पडती हैं । रंग विरंगी नावें लोगो को इधर से उधर घुमा ले जा रही हैं । नीम पीपरी पीपरके वृक्ष शोभायमान हैं । बड़ के पेड़  सुहारहे हैं। यह जमुना जी का पानी लोगों को स्नान कुल्ला पितरों का तरपन सब करवा देता है। जमुना जी के वैभव की कथा कौन कह सकता है। जिसने ब्रज के रसिक श्री स्याम सुन्दर गोपाल को भी लुभा  लिया है
    ]
[   गुपाल ब्रज , जमुना   रसमाधुरी   ]
कृष्ण ,कृष्ण  , कहें     ,    सखा  ,  पुकारें ।
बाबा नंद , जसोदा , ब्याकुल           ,                रुदन ,करें  ,हिय ,फारें ।
कूदौ   ,मोहन ,    कालीदह ,   मैं          ,          जमुना  ,   भरै  ,     सरारे ।
कंदुक  , बुही ,लान ,दऊं ,तोहि          ,   रोक, न     ,     अश्रू  ,   पनारे   ।
बेसुध, भजहिं  ,सुनी, ब्रजबासी             ,       कान्हा   ,   कहाँ  ,       उचारें।
बंसी  , बजी ,हरस ,ब्रज ,    भारी       ,         जमुना   ,   कृष्ण    ,   सुखारे।
छबी , निरख ,सब ,हरसित, तन ,मन  ,         देंय  , प्रभू          , जैकारे।
फन ,फन, नाचें,  प्रभु , मनमोहन      ,   ‘’  गुपाल ‘’   फन    , सब ,      हारे।
हिंदी अर्थ  ;——””सभी ,मित्र ,कृष्ण ,कृष्ण ,कह ,कह, कर  ,पुकार, रहे हैं। श्री नन्द बाबा, व जसोदा दोनों ,घबड़ाकर ,जोरों ,से ,रो ,रहे हैं , माँ  ,स्याम ,सुन्दर ने ,गजब ,कर ,दिया वह ,कालीदह के ,महाबहाब मैं ,जमुना जी, मैं ,कूद ,गया ,। वह ,उसी , गेंद को ,लाने के, लिए , कह, रहा था  ।   और ,रोने से ,मना कर ,रहा था,   सभी ,बृजवासी ,भागकर ,जमुनाजी ,पहुंचे । कृष्ण ,तुम ,कहाँ हो, ,बोलने लगे । कृष्ण की बंशी ,बजते, ही  ब्रजबासी ,ऐसे , खुश हुए, जैसे, कृष्ण को ,देख कर, उनके, प्राण ,बच ,गये हों ।  जमुना जी, कृष्ण को, देख, सुखी, हो गयीं हैं । श्री कृष्ण की छबि ,देखकर ,सब शरीर से ,,मन से ,प्रसन्न होकर श्री कृष्ण की ,जय जय कार ,कर ,रहे हैं ।  , काली नाग के ,फन फन  पर,  ‘’गोपाल’’ के प्रभु ,, श्री कृष्ण   नृत्य ,कर रहे हैं ।    काली ,फुंकार,  रहा है ।    क्रोध  , कर ,रहा है। उसके ,फन ,सब, हार ,गये हैं ।
[     ]
[      गुपाल ब्रज , जमुना   रसमाधुरी   ]
मुकती , प्रदायन, रुचिर, मनोहर ।
भगतन    ,सिद्धी,  दायक , जमुना    ,        बसुधा ब्रज       ,     पुरा      ,      धरोहर ।
जबर          जोर ,भादौं , अति ,बरखा    ,                 धारा ,      धार    ,   घिरी   धरनी    ।
झूमत , तरुवर , झूमत,   प्रकृति     ,                             बूढ़े , बाल, गोप   , तरुनी  ।
स्यामा ,संग ,स्याम की, झांकी              ,        सौभाग ,  अती       ,    ,हिय ,हरसै   ।
मुकुटमनी ,गोपाल ,कृष्ण  हरि                ,             कृपा   , नेह     , अती     ,   बरसै ।
परम ,भाग ,एहि, दसा ,अनूठी             ,           श्री      , सूरसुता ,जल ,   कगरी ।
बेड़ा ,पार, करै ,ठकुरानी                           ,          ‘’   गुपाल ‘’  , भगती    , की  , नगरी ।
हिंदी अर्थ  ;——””जमुना जी, सुन्दर ,मुक्ति ,प्रदाता हैं। तथा ,यह ,जगत मैं ,रिद्धि ,सिद्धि की ,देने वाली है। तथा  ,भूमण्डल की ,पुरानी, धरोहर हैं। भादो की ,घनघोर ,वर्षा ,हो रही हैं । आकाश से ,पानी, धाराओं के, रूप मैं ,गिर ,रहा है ,तथा, उसकी, बहाब ,धारा से ,पृथ्वी ,घिर ,गयी है,   वृक्ष भी ,झूम रहे हैं  पूरी प्रकति ,आनंद से ,झूम रही है , बूढ़े ,,बालक ,तथा ,गोपों की, तरुणियां भी ,आनंद से झूम रही हैं राधे कृष्ण की ,सुन्दर झाकी ,देखकर शोभाग्य स्वरूप , हिरदय, हर्षित होता है । गोपाल कृष्ण की ,कृपा ,बरसती रहती है, परम, भाग से ,इस ,सुन्दर ,अनुठे , दृश्य को ,देखने से ,जी ,नहीं ,भरता हैं। यह ,जमुना ठकुरानी का ,जल ,किनारा है । इस ,भगति की, नगरी मैं, श्री जमुना जी ,बेडा ,पार ,करने, वाली हैं
[   २ ०    ]
[गुपाल ब्रज , जमुना   रसमाधुरी ]
को ,अस , जेइ ,जमुना , नहिं,  भाबै   ।
स्वर्न ,पराग, मढी  ब्रज भूमी         ,          नीर ,धार , बअ, जाबै ।
रतन ,जड़ाऊ    ,घाट ,अनूठे      ,      देव , सरित   ,     सरमाबै।
चौदिस,  पुष्प ,खिलन, मन ,भाबै        ,    गंध पबन   ,  फैलाबै  ।
कुंजन , पगमग ,पुष्प ,बिछाबन       ,    मन ,उमंग, महकाबै    ।
स्त्रीरत्न ,जुरे    , हरी , संगा          , राधे  ,   समुधर,   गाबै ।
बत्स चिन्ह ,कौस्तभी  , माला             , मोहन , सबइ ,  सुहाबै   ।
‘’गुपाल ‘’कृष्ण ,राधिका ,जोरी         , कोटि ,   अनंग  ,लजाबै  ।
हिंदी  भावार्थ :—- संसार मैं ,ऐसा ,कौन ,है ,जिसे ,जमुना ,अच्छी ,नहीं ,लगती है ।
जिसकी  [जमुना  की ], धारा , सोने   , पराग , से मढ़ी ब्रज भूमी , मैं ,से ,बह रही है । कालिंदी ,यमुना जी की शोभा देखकर  देख देवता  की  नदी   सरमाती हैं  । चारों  ओर फूल खिले ,   हुए हैं । जो मन को ,बहुत ,अच्छे, लगते हैं , जिनकी सुगंध हवा ,द्वारा ,वायुमंडल मैं ,फ़ैल रही है गलियों मैं ,प्रसून बिछे हैं तथा ,कुंजों मैं [ बैठकों  मैं ] फूल बिछे हैं । जो मन की उमंगों को ,  महका रहे हैं ,चारों ,ओर ,स्त्री, रत्नों .की ,भीड़ है । जो मधुर ,  स्वरों ,मैं ,राधे कृष्ण , गा, रहे हैं । श्रीकृष्ण के ,वक्ष पर ,श्री वत्स का ,निसान है ,तथा उन्होंने ,कौस्तभ माला ,धारण ,कर ,रखी है    गोपाल कहते है रास मंडल मैं श्री राधे कृष्ण की जोरी करोड़ों   , रति कामदेव को लजा रहे हैं ।
[    २   १    ]
[   गुपाल ब्रज , जमुना   रसमाधुरी ]
सुकृत ,घनेऊ   ,  नर , जमुन , बुलाबईं ।
स्यामा ,नीर ,स्याम ,सुन्दर , सखि               ,  सोइ, गोबिंद , सुहाबईं  ।
अञ्जन ,मंजन ,पितरन      ,   तरपन        ,  ब्रज बासीन    ,करबाबईं  ।
गौधन ,खग , बन , पशू ,प्रानीन             , ब्रज भूमि  ,नीर पिलाबईं  ।
प्रानदायिनी, पुन्य ,प्रदायनि                 ,   बसुधा ,रूप,   बढ़ाबईं   ।
गंग ,जमुन , भूमण्डल ,थाती                 ,    भोले , मुनी,   बताबईं   ।
‘’गुपाल’’ कृष्ण ,प्रिया, जमुना, जी         ,    पूजहिं ,नर , तरजाबईं    ।
हिन्दी भावार्थ :—-  जिनके, पुन्य ,घने ,होते ,हैं ।  उन्हें , श्री जमुना जी, बुलाती ,हैं।
जमुना जी ,का ,रंग , स्याम रंग ,का, है इसी कारण ,काले ,रंग के पानी वाली ,जमुना जी [सूर्य सुता,]श्री मनमोहन को ,बहुत अच्छी लगती हैं ,  श्री कृष्ण ,को ,बहुत ,भाती  हैं ।  यह ,ब्रजबासियों के ,सारे ,कार्य ,स्नान ,  पितृ, तर्पण ,पीना ,करती है गौ धन पशु पक्षी ,जीव ,जंतु ,  सबका पालन करती है ।यह ,प्राणदायिनी ,पुण्य देनेवाली ,ब्रज की बसुन्धरा की [ धरती की  ]शोभा बढाती ।   गंगा ,जमुना ,दोनो , ,बहुत ,अच्छी हैं श्री शंकर ,आसुरी मुनि को बता ,   रहे ,हैं, कि , ये , भूमण्डल , निधि, है, गोपाल      ,कहते हैं जमुना ,जी ,श्रीकृष्ण , की प्रिया हैं उनको, पूजने, से ,   मनुष्य ,संसार ,सागर, से ,पार ,हो ,जाता है ।

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