गुपाल  महारास  रस  माधुरी भाग – १

[      ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

लता   माधबीन   कुञ्ज  सुहावत  ।

शुक्ल पाखरी कातिक   पून्यों       चंद्र  ‘ गुपाल ‘नचावत    

धवल  चांदनी  चंद्रोदअ  छट        पूर्ण ब्रह्म मन    भावत    

कला सोडसी ससि इतरावत           सोड़स स्याम रिझावत   ।

ब्रज भूमी  भूमंडल  अनुपम             हरि गोलोक  लजावत  

रतन   सुपान  गुमट  कलिंदी          निर्मल   ताल सजावत   ।

गिरब्रज गिरीराज  गोबरधन         गंध कदम्ब  उडावत        ।

झरना  झरहिं भ्रमर  कुलाअल       चिरिआ  चिर चहकावत ।

  बजी अधरनी अधरन माधव         गूंज व्योम गुन्जावत   

 

 

 

हिंदी भावार्थ :—

 

माधवी  लताओं से  अलौकिक  कुञ्ज बनी हुई  हैं।  महीनों

मैं   उत्तम मास  कार्तिक की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा अपने

सुघड़ रुप मैं उपस्थित हुई हैं जो चन्द्रमा जी के साथ साथ 

ब्रजचंद्र श्रीकृष्ण को नृत्य करवाने हेतु आमंत्रित कर रही

। चन्द्रमा की उदय छटा से ही चन्द्रमा की चाँदनी ने संसार को

आलोकित किया हुआ है।चन्द्रमा की उदय छटा से ही चन्द्रमा

की चाँदनी ने संसार को आलोकित किया हुआ है।जो पूर्ण ब्रह्म 

श्री कृष्ण के मन को अच्छी लग रही है 

चन्द्रमा अपनी सोलह कलाओं से विकसित हो पूर्ण हुआ

इठला रहा है।और  सोलह कलावतार पूर्ण ब्रह्म श्रीकृष्ण को

लुभा रहा  है। भूमंडल मैं ब्रज भूमि श्री हरि के गोलोक से भी 

सुंदर है । रतन और सीपियों से मंडित गुमटों से सजी 

यमुना जी के किनारे निर्मल पानी से भरे हुए तालाबों को

सज्जित किया गया ।गिर्राज जी के शिखरों से कदम्बों

की सुगंध भ्रमरों का कोलाहल यहाँ चिड़ियाँ  चहचहाती

रहतीं हैं ।भगवन श्री कृष्ण के अधरों पर अधरनी गुंजायमान

होने लगी जिससे पूरा व्योम गुंजायमान हो गया 

 

 

[      ]

 

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

 

धबल चांदनी   प्रभू      मनभानी ।

टेरो सखिअन पुरबें   प्रन अब     मोहन    हिऐ   समानी ।

बैनु  लीन साध  सखी टेरन        फूंकत   हरि     लुभानी ।

छेड़ी  तान  तराने  तैरे             दूर  दूर    ध्बनि  जानी  ।

प्रेम  बयार  बही   ब्रज  बेसुध   सखिअन  नींद   चुरानी ।

गोविंदा  गोपाल   प्रेमरस        निसा  प्रीत      निसानी ।

छोड़े  मीत  बाल  जगपालक     दौरि  चली  मन ध्यानी।

‘’ गुपाल’’ साध साधकनि लागी      जमुना  तीर सुआनी 

 

हिंदी भावार्थ :–

– चंद्रमा  की   सफेद  सुंदर  चाँदनी  श्री श्याम सुंदरकृष्ण

को बहुत अच्छी लगी। संसार को लुभाने वाले गोविन्द

के हिरदय मैं सभी गोपियों  को बुलाने की इच्छा   हुई ।

उन्होंने अपनी प्यारी बांसुरी को स्वर दिया उससे सखियों

के आमंत्रण की ध्वनि निकलने लगी । बांसुरी की ध्वनि से

प्रेम के तराने निकलने लगे । बांसुरी की मोहक ध्वनि ने

निद्रा वशीभूत हुई ब्रजांगनाओं को जगा दिया । सारा ब्रज

प्रेम की सुरीली   मदहोश ध्वनि से बेहोश हो गया    ब्रज

ललिनांये  अपने  बालकों पालकों को  छोड़ अपने सर्वस्व

परम पति  परमात्मा श्रीकृष्ण से मिलने चली गयीं ।  वे

ध्वनि को   लक्ष्य कर चली जा रहीं थीं    पुराने  जन्मों

की अपनी    साध  को  पूरी   करने   सभी पुराने जन्मों

की   साधक  अपने प्रभु से मिलने जमुना के किनारे आ

गयीं ।

 

[  ३  ]

 

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

 

सुनी  बैनु   मन  भयउ  उछाबौ     

त्रिलोकी   जग  रचनहार   हरी      नौंत   सप्रेम   बुलाबौ   ।

आधी   रैन  भैन  टेरत  प्रभु           मनबा   मोर  सुहाबौ 

गोपीन   टोल  जुरे  ब्रज  भूमि       संग  गुपाल   लुभाबौ ।

निरखत  सोभा मनभाबन हरि    सखि   नटबेस  नचाबौ।

भर  भर  तान  सुरीली  प्यारी     चौदिस   नेह      लुटाबौ ।

सुकृत घने  मन हरखत हौं        सखि आज नन्दसुत पाबौ।

‘’गुपाल’’ सखी  प्रान प्यारी   हरि  गोबिंदा सखि      पाबौ।

 

हिंदी भावार्थ :—-

आपकी  वंशी  की  धुनि सुनकर मेरे मन मैं हर्ष  हो गया  है  ।

हे  भगवत  आप  तीन   लोकों  की  रचना  करने  वाले  हो ।

और   आपने  हमें  वंशी द्वारा  निमंत्रण  देकर  बुलाया  है ।

हे  सखियों  जब     मध्य रात्रि  को  प्रभु  ने  मुझे  बुलाया

तो  मेरा  मन  प्रसन्न  हो  गया ।   सब  टोलियां  ब्रज  की

रास  भूमि  मैं  मिली  सबके  मन  को  गोपाल श्री कृष्ण का

 संग  बहुत अच्छा  लगता  है  ।     भाते  हैं  सब  मनभावन

 श्री कृष्ण  की  शोभा  निरख  रहीं  हैं। सबको उनका नटवेश

 अच्छा  लगावे   वे  सब  मिलकर   उन्हें    नचाना   चाहती  

हैं  ।   वेणु  मैं  सुरीली  तान  भर  कर  श्री  श्यामसुंदर ने प्रेम

  की   बरसात  चारों  दिशा  मैं   कर   दी  । हे   सखि   में  

अपने  पुण्य  याद  कर  प्रसन्न  होती  हूँ ।    जिनके कारन

 मुझे  नंद  का  बेटा  श्री कृष्ण  आज  मिला ।      गोपाल  

कहते   हैं  कि  ये  सखियाँ  हरी   प्राण प्यारी  हैं  मोहन  

के  मन    के  कारन  आज  मिली  हैं ।

 

[    ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

प्रेम  पिआसी सखी    जुरि  आनी 

झूंठे  नात  तजे  छन  मांई             अमर   नात  अजमानी   ।

लगन लगी हरि मिलन अगाधा       जन्मन     आस पुरानी  ।

झुण्ड  झुण्ड  सबइ    इकठौरी           ससिबदनी     परछांनी ।

मोहन  बउ   जन्मन सखि   पाऐ     नैन चपल       चपलानी।

एक टक  लखत चंद्र ब्रज सुंदर       रास चंद्रिका      भानी   ।

गुपाल’’ कान्ह नीक अति लागे  गोपी    सबइ   लुभानी    ।

 

 

हिंदी भावार्थ :—-

प्रेम की  प्यासी  सखियाँ  मिलकर  भगवान  के  पास  

 गयीं ।उन्होंने  संसार के सभी  झूंठे नाते छोड़  दिये  तथा

 परमात्मा से  नाता  जोड़  लिया।  झूंठे  नाते छोड़कर क्षण

भर  मैं  वे    गयीं। वे  अपने  अमर     नाते[  श्री  बृह्म

जीव ] की अमरता की कहानी लिख रहीं हैं । उनकी  जन्म

जन्मों  से  केवल  प्रभु  से  मिलने  की  इच्छा है । वे  सब  

चन्द्र बदनी भगवान  कृष्ण  की  परछाई  सी  हैं    उन्हें

मोहन  बहुत  दिनों  मैं  मिले  हैं।वे  एकटक  प्रभु  को

आँखों    की  चपलता  छोड़  देख  रहीं  हैं।वे  बृज चन्द्र

 श्री कृष्ण    रास की    चन्द्रिका  श्री राधे  जी  को देख

 रहीं हैं। गोपाल  कहते  हैं  कि  श्री कृष्ण   उन्हें  बहुत

भाते  हैं  उन्होंने अपने जीवन  को श्रीकृष्ण के समर्पित

 कर  दिया है ।

 

 

[      ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

 

भरत कुलांच  कछुक   सखी   आनी ।

अल्हड़ बय किसोर  म्रग नैनी      रासभूमि  रसराज  सुहानी ।

श्रम कीनों जिन प्रभू मिलन  जुरि    स्वेत    बूंद   चमकानी ।

मोती  स्वेत  बूंद   सौं  सोभा           रूप रसिक    रसखानी 

कृष्ण मिलन सब आसलीन हरि     गाढ़ी        प्रीत पुरानी ।

जुरि  जुरि  आनी  गांव  गांव  सौं    अदुभुत  अमर  कहानी ।

प्रेम  समुद्र  नन्द  कौउ     ढोटा        रास  गंग    मनभानी।

‘’गुपाल ‘’प्रमुदित     राधे रानी      करत   नेह   अगवानी ।

 

 

हिंदी भावार्थ :—

भर  भर  डग  दौर क़र सखी आ गयीं। उनकी अवस्था किशोर  है ।

भावों  से भरी वे रस भूमि  मैं    गयीं ।  प्रभु से मिलने के लिए  

जो  श्रम  हुआ  है ।  उनके  शरीर  पर  पसीने  के  रूप  मैं  सफ़ेद

 दिख  रहा  है । वह  पसीने  की  बुँदे  मोती   की  तरह  दिख रहीं

   उन्हें  केवल  कृष्ण  से  मिलने  की आसा  है।  उन्ही के लिए

 वे  घर बार  छोड़  कर  आईं  है  क्योंकि  प्रभु  से  उनकी पुरानी

प्रीत  है । वे  प्रेम  की  अमर  कहानी  लिखने  रास मंडल  मैं  

गांव  गांव  से  आईं ।ये  श्री  नन्द  का  पुत्र  प्रेम  का  सागर है

  उससे  प्रेम की  गंगाएं  बहती  हैं।    श्री कृष्ण  श्री जी  के

साथ ख़ुशी  हो  रहे  हैं     आदर सहित  सखियों की अगवानी

  कर  रहे  हैं ।

 

[      ]

 

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

 

      नेहाकुल    भई     जग       बिसरानों   

दौरि चलीं निस  सुन  वंशी  धुनि                 मोहन    माधब      भानों 

हिय उछाह अति      नेह       सांबरौ            छनक  जगत   छुटिआनों   

भांति भांति हिय उपजी    इच्छा               पूरन    होंय   सखी   जानों   

आज    प्रभू      हौं     सेवा     करिहौं      मन   रूप स्वरूप       सुहानों    ।

आज करहुं  सबइ मनचीती               ‘’ गुपाल ‘’     झारूं   नखरानों   

 

 

हिंदी भावार्थ    :—

 

सभी साखियॉ कृष्ण प्रेम मैं अकुला रहीं हैं।  वे  सभी  बैनु रस मैं

         सराबोर होकर दौड़ पड़ीं  उनके मन मैं सबको मोहने वाला जो समां

                 गया है। संसारीया है   उनके हिरदय मैं जन्म जन्म की इच्छाये

                         जीवित  हो उठी हैं  वे सब अब पूरी हो जाएँगी। उनके मन मैं श्री गोबिंद

                             का जो स्वरुप है उसको वे सजाकर सब मन के अनुसार सेवा करेंगी 

                     आज   सब  मैं    मन   की   करुँगी       अपने   प्यारेमोहन  के 

                   सारे     नखरे  निकाल  दुंगी ।

 

 

 

[       ]

 

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

 

सबहि   सखीन   पूछै  जग   मोहन ।

परिबारीजन  कुसल  तिआरे       आनी    मधुर  प्रयोजन ।

बेसुध  बाल मात पित छांडे          पग  पग  आनी   कोसन।

लोक लाजतज  घर छांडे सब        बाल ग्बाल   तज गोधन।

बोली  सखी सुनो  मनमोहन         आमंत्रन     सुख  बोधन ।

तोइ  मिलन आसा सुख दैनी         हास्य रसिक   रस लोचन 

‘’गुपाल’’ रसिक  हरी  गोबिंदा        सखिन  संग  मनमोहन ।

प्रेम  भगति  ना   पाबें    बेदा         गोलोकउ            आरोहन ।

 

हिंदी भावार्थ :—  

सब  सखियों  से  संसार  को  मोहने  वाले  कृष्ण  पूछ  रहे  हैं । 

 आपके  परिवारीजन  कुशल  मंगल  हैं  क्या   मधुर प्रयोजन  लेकर

 आयीं  हो  सोते  हुए  बालक  माता  पिता गांव  घर  को  छोड़  वन

मैं  कोसों पैदल   गयीं हैं ।लोक   लाज  अपने  पति  बहन  प्रिय  

गोधन  को  भी  छोड़    गयीं । सखी  बोलीं हे  मनमोहन  हमें  बुला कर

ज्ञान  मत  दो  तुम्हारी  मिलने  की  आसा  सुख  देनी  है ।हे  हास्य के  

रसिक  तुम्हारे  रस भरे  नेत्र  हैं गुपाल रसिक बजा बजा कर देख रहे हैं ।

गोपाल  कहते   हैं  हे  रसिक  हरी गोविन्द  तुम  सखियों  से प्रेम  करने

वाले  हैं   प्रेम  भगति   करने  वाले  को  को वेद  का  जानकार  भी न पा

 सकता  है । भक्ति प्रेमी  सीधे  भगवान   के  परम  धाम   इससे  व्यक्ति

 सीधे  गोलोक  मैं  चला  जाता  है ।

 

 

[        ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

 

केहि  कारन   ग्रह    तजि  अलि  आनी ।

आधी  निसा   सघन  ब्रन्दाबन         जमुना       पुलिन     सुहानी ।

भय   न भयू सखि रंचमात्र  मन             निसा  मध्य मन    भानी।

निसंकोच कह मधुर   प्रयोजन              पुरबें         राधे        रानी  ।

बतियां  सुन सखि   हांसी  जोरी           गुपाल      प्रेम        पगानी ।

तोर   बैनु   सुन  नींद   नैनन          बनि औ    हमकूं       ग्यानी ।

राधे   प्रिय     मनमंदिर     जाने         काहे       गढ़त       कहानी ।

‘’गुपाल’’ कृष्ण बोल    बंद   भये        सकुचानी सखि    स्यानी  ।

 

 

हिंदी भावार्थ :—–

 

हे  सखी  तुम  घर  छोड़ कर  किस  कारन  से  आई  हो ।   मध्य रात्रि  

मैं इस  घने  वृन्दावन  मैं  जमुना  के  किनारे   आई  हो । आपको भय

  नहीं  लगा रात्रि  तो असुरों को प्रिय है।निर्मल मन  से अपना प्रयोजन

 कहो।  श्री राधेरानी सब  पूरा करेंगी ।श्री कृष्ण प्रेम मैं पागल सखियाँ

जोर से  हँसने  लगीं ।   तेरी वंसी को सुनकर  आँखों  मैं  नींद  नहीं  है ।

   बड़े गुरु बनकर ज्ञान की बात कर रहे    हैं  श्री राधे सब   हमारी   मन

की जानती हैं। नई कहानी क्यों गढ़ रहे  हो। उनकी बात कह श्री कृष्णा

चुप हो गये।  श्री राधिकेरानी  व अन्य सखियाँ जोर से  हँसने  लगी ।

 

 

[        ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

सखी  मानिनी  सुनि  रिसि  मानी 

हौं     अलि  नेह   सांबरे     भोई        पगन     कींन      नादानी    ।

हरि  सुंदर     हौं    चन्द्र चांदनी         कमतर     बिधिना   जानी ।

बाल  बड़े बाबा  तू  मोहन                   हौं      पितमात  निसानी ।

तनिक  लजै  ना   बात  बनाबै               बैनु    बुलावौ     आनी  ।

बूझत नेंक न  लाजे   निष्ठुर                  प्रीत रीति सम्मानी    ।

‘’ गुपाल’’   निज घर   जान कहत अब     

 

 

हिंदी भावार्थ :—–

एक  सखी  जो  मानिनी  थी  सखी  की  इस  बात  को   सुनकर  बहुत  क्रोधित  हो

 गयी ।उसे   श्याम सुंदर   से  कोई  शिकायत  नहीं  है  मुझे  कोई  गिला  नहीं  है।वह  

बोली   हे  सखी  सुनो   बोली  मैं   भी  श्यामसुंदर   के    नेह  मैं  भो  गयी  हूँ   मोहित

 हो  गयी   हूँ  । पर  श्री कृष्ण  को  बराबरी  की  रीत  को  निभाना [ मित्रता  का  व्यबहार

 निभाना  चाहिये ] है अगर  कृष्ण  सुंदर  हैं   तो  मैं  भी  कम   सुंदर  नहीं  हूँ। चंद्रमा  की

 धवलता  लिए  हुए  हूँ।  मैं  बहुत  ही  गौर वर्णी  हूँ मैं उन    से  किसी  तरह  कम  नहीं

हूँ। अगर  वो  बड़े  बाबा  का  बेटा      है  तो  मेरे  माता  पिता  का  नाम  चलता  है।  उसको

  तनक     भी  लाज  नहीं  आती  है  बुलावा  देकर  पूछता  है। क्यों   आई  हो । अपनी  जगह

 बुलाकर  भगाता  है  इसका  प्यार      झूंठा  है  ये  अभिमानी  है  गुपाल  कहते  हैं  कि  सखी

  बोली      चलो  अपने  घर  लौट  चलें  ये  हरी  मित्रता  का  भाव  जो      बराबरी  का  

होता  है  नहीं  जानता   है ।

 

 

 

 

 

 

      ]

 

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

 

फरकइं   अधर   बोल   नहिं   आबत ।

लम्बी  लम्बी  स्वांस  लेत  सखि            कृष्णगुपाल          लखावत ।

तोर  दरस   परस   प्रभू    आनी            न्यौंत     देत      भरमाबत 

हितु  हमार  त्याग  दिए  छन  मैं          बातन  बान        चलाबत    

निर्मोही  लखौ    नेह  हमारौ               स्वांस  स्वांस   तू      पाबत   

गुपाल  तजौ  निज प्रान पलकउ             कछून  हरि      रह   जाबत   ।

कही  कान्ह  अलि   सांच    आबत      निस्ठुर          काअ          सुहाबत  ।

 

हिंदी भावार्थ :—-

सखी  के  होठ  बोलने  को  फरक  रहे  हैं  हिल  रहे  हैं ।  पर  बोल  नहीं  पा  रही   है ।

यह  विचित्र  प्रेम  की    दशा  है   सखी  लम्बी  लम्बी  साँस  ले  रही  है और  प्रभु  की  ओर

 देख  रही  है । अरे  हम   तो  तुम्हारे  आमंत्रण पर   अरे    हम    तो  तेरे   से ही मिलने

 आई हैं  बुलाकर  पूछ  रहे  हो    कि   हम क्यों  आई  हैं ।मुझे चाहने  वालों  को  छोड़  तेरी  

चाह    मैं  आई  हूँ। तू  मुझे  बातों  की  तीर  से  घायल  मत  करे  क्योंकि   मैं  पहले  से  ही

घायल हूँ। अरे  निर्मोही  तू  हमारा  प्रेम  तो  देख    जब  साँस  लेती  हूँ  तो  तू आता  है

छोड़ती  हूँ  तो  भी  भाता है । गोपाल  कहते  हैं  कि  सखी के प्राण  एक पलक  मैं  निकल

 जाएँगे  फिर  कुछ  नहीं  रह  जायेगा। श्रीकृष्ण  बोले  हे  सखी  आपका  कहना  मुझे  सत्य

 प्रतीत  नहीं  होता   है  अगर  ऐसा  है  तो  मेरा  जैसा  निष्ठुर  तुम्हें  क्यों  अच्छा  लगता  है।

[   १  १ ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

सबै  छांड़ि   गही   सरन  मुरारी   ।

प्रेम  बाढ़   हीऐ     उमगानी              दीनीं लाज          बिसारी ।

राधे  कहउ    दोस  स खि  मेरौ            बूझत        क्यों     बनबारी  ।

टेडी   चितवन      टेडी भंगिम            टेडी   बोली        यारी  ।

समझाबौ   अलि      दुःख   पामत         जीबन     प्रान  अधारी  ।

कछु     बोलीं   हौं   आस   लगामत        चालै         चलइ   पिछारी ।

खावत  कछु  तौ  बचेइ   खावों              नचत    नचौं     असरारी ।

बैठत  उठत   नींद   एइ   सुमरत             ‘’गुपाल’’    प्रभु    जगख्वारी।

 

 

हिंदी भावार्थ :—–

संसार   मैं    सब  कुछ   छोड़कर    मैंने   मोहन   की  सरन ली है ।

कृष्ण  प्यार  की  बाढ़  मैं  मेरी  लोक लाज  भी  बह   गयी ।हे   

श्री राधे  मेरी  सखी  तुम  बतावो  इसमें   हमारा  क्या  दोष  है

 और  वह   हमसे  पूछ  रहा  है  कि  मैं  क्यों  आई  हूँ। हे   राधे

यह   टेढ़ा   ही  खड़ा  होता  है   इसकी  अदा  भी  टेडी  है। टेडी  ही

 बात   करता  है   फिर  भी  इससे  हमारी  मित्रता  है । इसको  

  समझाओ  ये  हमारा  दिल   दुखावे। गोपियों  के  जीवन     का   प्राणों  का  

आधार  कृष्ण  ही   तो  है। हम  तो  प्रतीक्षा    करती  हैं  कि  ये  कुछ  बोले   कहीं  

चले  वहाँ  हम  भी  चलें  कुछ     खाये  तो  बचा  हुआ  हम  खा  लें  ये  नाचता  है

  तो  हम  नाचने    लगती  हैं।बैठने  उठने  नीद  मैं  भी  हम  इसे  याद  करती  हैं

हे  गोपाल  कहते  है   सखियाँ   कहती    हैं   गोपाल कृष्ण  के   बिना  पूरा  

जीवन  बेकार   है       हीन   है ।

 

 

 

 

[  १ २  ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

जस  गावऊं     अली   प्रभु   दिन  राती  ।

पल  छन  सुमरन  कृष्ण  नाम  हरि         नाम  राग     दिप   बाती  ।

भाब    भाबना  नीक  सुहामत           रूचिर.  विसय    सबभांती 

तन   मन  लीनों   छीन  सांबरे         आन     राग       सुहान्ती 

केबल  श्रीकृष्णा   मनभाबन               राधे     जग     ठकुराती  ।

नाम  प्रेमरस  डूबी   हौं   सखि           गोबिंदा    प्रिय       साथी  ।

‘’गुपाल’’ बिओगिनि  श्रीकृष्णा  हौं           जोग   सुजोग   सुहाती     

जानें  कहा    गुपाल ऊ     मनमें         काठी    बोलत      बाती ।

 

 

हिंदी भावार्थ   :—-

हे  मित्र   राधिके   हम  स्वामी श्रीकृष्ण   का  यश    रात  दिन  गाते रहते   हैं ।

उनका  सुमरन  हम  प्रत्येक  पल  करती  हैं  कृष्ण  नाम      की  बात  हमें  

अच्छी  लगती  हैं   उसी  नाम  की  ज्योति मेरे  हिरदय रूपी  दीपक

 मैं  जलती  रहती  है । सभी  भाव  भावनाओं  द्वारा   श्रीकृष्ण  ही   अच्छा

  लगता  है       यह  मेरी  हमारी  रूचि  का  विषय  श्री कृष्ण  ही  है ।

इस  सांवरे कृष्ण  ने  हमारे  तन  मन  पर  अधिकार  कर  लिया  हैं ।

हमें  आत्म तत्व  अच्छा  लगता  नहीं है। अपने   आत्म विषय  का  कोई

चिन्तन  हमें  अच्छा  नहीं  लगता  हैकेवल  श्री कृष्णा  ही  हमें  भाते हैं।

और  हमें  अपनी  श्री राधे     ठाकुर  जी  लगती  हैं ।उनकी  ठकुरसुहाती  

  ही    हमें   अच्छा  लगता    हैं।   हे  सखी  मैं  केवल  इनके  नाम  के  प्रेमरस

 मैं  डूबी  हुई  हूँ ।और  चाहती  हूँ  कि  जीवन  मैं  ये  प्रभु  मेरे  साथी  बन  जावें ।

हे  सखी  मैं  श्री गोपाल कृष्ण  की  विरहिणी हूँ  हमेशा  उनसे  मिलने  का  परम

संयोग  तलाशती रहती  हूँ लेकिन  सखी  इस गोपाल कृष्णा के  मन  मैं क्या  है  जो

 इस  सुन्दर   मुख  से  इतनी  कठोर  बातें करते  हैं ।दया  के  सागर  क्या  बातें  करते  हैं।

 

 

[  १ ३  ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

मैं   बिसरी   सखी  मिली  स्याम   मै ।

नांइ   रही  मन   मान  टेक  कछु       सिमट    गइ    ब्रजराज   राम       मैं   

गहन  निसान  लुके  सब   प्यारी         सुन्दरतमउ    कृष्ण      बाम  मैं 

ब्याधि  बिसाद   भऐ     छूमंतर         सुखी  भई      सुखी     ललाम  मैं  

जीबन  रस   हौं  पाबौ    आली      छकूं          नांई       प्रेमजाम     मैं    

कछुक  नांइ     खटकै     मन  मेरे   अटकी      हौं   प्रभु   घनस्याम      मैं   

‘ हौं     तौ  आनी  मिलन  कृष्ण  सों    रास    निसा    भइ    निस्काम  मैं ।

गुपाल पअपानी  ज्यौं मिलऊं           होउ    अनाम     कृष्ण नाम  मैं    ।

 

 

 

हिंदी भावार्थ :—-

हे  सखियौ   मेरा   अहंकार  मेरी  मैं  मिट  गयी  है । मेरे  मन  मैं    मान मर्यादा

 तथा  खुद  की   जिद  कुछ  भी  नहीं  बचा  है  मैं  तो  घनश्याम   मैं  मिल  गयी  हूँ

 मेरे  जीने  की  रीतियाँ  के  निसान     बार  बार  एकजैसा  बरतने  के  कारण  जो

 बन  गये  थे। वो  सब    छुप  गये  हैं  मैं  श्रीकृष्ण  की  सुंदरतम  प्रिया  बन  गयी  हूँ

मेरी    सभी  बीमारी  दुख़  प्रभु  के  प्यार  मैं  उड़  गये हैं ।  हे  सुंदरी  सुखी  सखी

 मैं  तो  सुख  का   सुंदर सा  सागर  बन  गयी हूँ।   हे  सखियो  मुझे  जीवन  का  रस

मिल  गया  है । मैं  प्रति .दिन प्रेम    के  जाम  पीती  रहती  हूँ। उनसे  मेरी  तृप्ति  

नहीं  होती    है   मेरे  मन  मैं  कोई  खटका नहीं  है सभी    खटके  बृज  के  राम श्री

कृष्ण  मैं  समा  गये  हैं   मैं  प्रभु  मैं  ऐसे  मिल  गयी  हूँ  जैसे  पानी   दूध  मैं  मिल

जा ता है   श्याम  की  तरह   ही  मैं  काले  रंग    की      हो  गयी    हूँ ।  मैं   तो  

निस्काम  [ बिना  इच्छा  लिये   ]    भाव   रास  के  लिए  आई  हूँ ।

 

 

 

[  १  ४ ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

करऊं      बाइ   जस   हरी  सुख  पाबईं ।

सजों    स्याम   हित  सांझ  रैन  दिन      निरखत  हरि      मुस्काबईं   

केस  बिन्यास  बनाबौं   रुचिकर          चंदन      इत्र     लगाबईं ।

स्वेद  गंध   आबत  तनसंधिन           बारि       सुगंध        नहाबईं 

हंसे     स्याम जु   मन  सुख  पाबै      रूठत   प्रभु       दुखपाबईं  ।

तन  मन  सब  बारों  ‘’गुपाल’’   हौं      क्रपा दृष्टि           है  जाबईं   

‘’ गुपाल’’ सुख  मोइ            अलि   भाबै         और    जगत    सुहाबईं ।

 

हिंदी भावार्थ :—-

हे  सखियो  मुझे  वही  करना  अच्छा  लगता  है  जिसमे  मेरे  कृष्ण  

सुख  पाते  हैं। मैं  श्रीकृष्ण  के  लिए  शाम रात्रि  दिवस  सजती  रहती  

हूँ  सोचती  हूँ  जैसे  ही  कृष्ण  मुझे  देखें  मैं  उनके  मन  को  लुभा  सकूँ।

मैं  अपने  बालों  की  छटा  बदलती  रहती  हूँ  अपने  शरीर  पर  अनेक  

तरह के  इत्र  चन्दन  लगाती  हूँ   कहीं  पसीने  की  गंध  शरीर संधि  से

    निकले  इसलिए  मल मल  कर  नहाते  हुए  भी  परेशान  नहीं  होती

  सुगन्धित  जल  द्वारा  स्नान  करती  हूँ  ।जब   प्रभु   हंसते हैं  तो  मेरा  

मन  सुख  पाता   है  जब  रूठ  जाते  हैं  तो मुझे कुछ नहीं भाता   मुझे  

अत्यन्त  दुःख  होता  है।  है   मैंने  अपना  तन  मन  सब  गोपाल  

पर  न्यौछावर  कर  दिया  है   केवल  एक  ही  मनौती  है  कि  श्रीकृष्ण

मिल  जावें  उनकी  दया की  नज़र  मुझ पर  हो  जाबै   गोपाल का  सुख  ही

मेरे  जीवन    का  रस  है ।मुझे  जगत  मैं  कुछ  अच्छा  नहीं  लगता  है

 

 

 

[  १  ५  ]

 

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

छांड      न     सकूं    गोबिंद    गुपाला  ।

जेइ   मन  भाबै       बरतइ   मोई           भोई  लखि    नंद   लाला।

स्याम        कही        बुरी  नंइ     लागै           बुरौ लगत चुप्प   .लाला।

प्यार  करत  हरि          नीकौ सोहत               मोहत   मुरली   बाला।

सबइ  अदा  हौं   बारों   तन मन                 चपल   चपलनी    चाला।

बंसी   बोल  घुरी  मिसरी    सखि                 नसा   चढ़त   ज्यौं  हाला।

एक  छनक  मोहन  ढिंग  आनी                उरत     पांख  बिन   ठाला।

‘’गुपाल’’ छांड  जाऊं    अब  हों               तजतइ        हाल   बिहाला ।

 

 

हिंदी भावार्थ :—–

हे  सखियो  मैं  श्रीकृष्ण  गोविन्द गोपाल  को  नहीं  छोड़  सकती ।

वे  मेरे  से     मन  के   अनुसार   व्यवहार  करने  को   स्वतंत्र   हैं  मैं  उसके

  सुंदर  रूप  को  देख  मोहित   हो  गयी  हूँ । ये  मोहन  कुछ  भी  कहता

  मुझे  बुरा  नहीं  लगता  है  जब  ये  चुप  होता  कुछ  भी  कहता   नहीं  है

  तो  मुझे  बुरा लगता  है ।    प्यार  करता  गोपाल  मुझे  बहुत     अच्छा

लगता  है मुरली  बजाने  बाला  वो  मुझे     मोह  लेता  है । उसकी  सब  

अदा  पर  मैं  अपने  शरीर   मन  को  बार  दिया   है  न्यौछावर  कर  

दिया  है ।  उन  चपल कृष्ण की चपलनी  चाल  पर  मैं  वारी  जाती  हूँ  ।

 बाँसुरी   के  बोल    जीवन  मैं  मिस्री  घोल  देते  हैं ।और   मुझे  शराब

 जैसा  नशा  होने  लगता  है । जो  खाली  बैठा   था।एक  क्षण  मैं  मोहन

  पास  पहुँच  जाती  हूँ ।  मेरे  मन  का  हंस  बिना  पंखों  के  उड़ने  लगता

  है  जो  खाली  बैठा  था। मैं गोपालकृष्ण को  छोड़कर  कहीं   नहीं जाउंगी।

       उसकी  प्रीत  मैं  मेरा  बुरा    हाल  हो  गया  है । उसको  छोड़ते ही  मैं हाल

 बेहाल  होने  लगती हूँ।

 

 

[   ६ ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

मोहन  बस   भई    नहिं   बस  मनऊ 

कान्हा   दरस  लालसा  गाढ़ी               प्रेरित    मन       अनुसरऊ     

आपुन  आप  उठत  पग  आली             बैनू          ध्वनी     अफरहूं     

जोर  जबर  हिअ   अलि  अकुलानों          माधब    कस   बिधि   मिलऊं  ।

स्वांस  रुकत  व्याकुल   अति भारी         बिना    गुपाल         अकुलऊं 

गारी  निकसत  मन  ना   माने            चलत  फिरत  हरि    भजऊं 

इंद्री  सब  ‘’गुपाल ‘’बस  कीनी           सखी   जंत्रबत      फिरऊं   

 

 

हिंदी भावार्थ :——-

हे  सखियो  मैं  मोहन  के  वश  मैं  हो  गयी  हूँ   मेरा  मेरे  मन  

पर   भी  अधिकार   नहीं   है । कृष्ण  को   देखने   की  लालसा  बहुत  

गहरी  है।  जिसके  कारण  मन  प्रेरित   होता है  ।मन  का  आदेश  शरीर

भी   मानता  है । मेरे   पैर    बंशी   की  धुनि  सुनकर  उसी  ओर      उठने

  लगत हैं ।बंशी   ध्वनी  सुनने  से   प्रेम वश  हिया  मचलने    लगता   है   

मेरे  हिरदय  पर  इसके  प्रेम का  जोर  इतना  अधिक   है  अब  गोपाल   के

  मिलने  का  रास्ता  कैसे  मिलेगा । बंद  होने  से  साँस    रुकने  लगती  है

 और  मैं  छटपटाती  अकुलाती  हुई  बृज  के  वनों   मैं   फिरती हूँ । गाली

  भी  देने  की  इच्छा  होती  है   पर   मन   नहीं    मानता  है  फिर   गाली

  देता  भी  नहीं  है।  चलती फिरती    मैं  इसी  को  भजती  याद  करती   हूँ ।

इस  गोपाल  ने  मेरी  सब  इंद्रियों  को  बस  मैं  कर   लिया  है ।  हे  सखी  मैं

 यंत्रवत  भागती  फिरती  हूँ । मेरी   आयु  यों   ही  निकल  ही  जा  रही   है ।

 

 

[ १  ७  ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

बिहिंसित       बरजत   अलि  मोइ    भाबै   

ओठन  मधुरी  तान  बैनु   सुन             अपढारौ            ललचाबै ।

मधुर  मृदुल  तन  नीकौ  आलि        मधुर      मधुर          बतराबै ।

मधुर  बचन. चितबनहु  मधुरी         मधुर      दसन  मधु   खाबै ।

चरित   मधुर   हरि चाल     मधूरी      मधुर      नैन       मधुराबै।

मधुर  कृष्ण     मधुरौ  रस   भारौ      मधुरौ   रसमधु       प्याबै  ।

गोबिंद ’’गुपाल’’ मधुरता   मोहत        मधुर   मधुर      मोहै  भाबै ।

 

हिंदी भावार्थ   :—-

हँसता   हुआ        ना  करता  श्यामसुंदर   मुझे   बहुत  ही  अच्छा

लगता  है । इसके  होठों  पर  मीठी    तान  देने  वाली  वंशी  की  ध्वनि  सुनने

 को  मेरा    हिरदय  चाव  से  भर  जाता  है । यह  श्यामसुंदर    बहुत ही मधुर

और   मीठा  हैं  इसका  शरीर   भी  बहुत  ही  सुंदर  है   मधुर  है  यह  अपनी

मोहनी  की  मधुरता  को   बृज  मैं   फैला रहा  है। इसकी  बोली  अदा  सभी

मधुरता  लिए  हुए  हैं । इसके  दांत  मुख  सभी  बहुत  मधुर  लगते  हैं। इसकी

सभी   लीलायें  बहुत  ही  अमूल्य   मीठी   हैं   । सुंदर   और  अनौखी  हैं ।  ये

 मधुर  कृष्ण  मुझे  मीठा   लगता  है।  ये  मीठा  रस  घोर  घोर   कर  पिला  रहा

है ।  इस  गोपाल  गोविंद  की  मधुरता  मुझे      मोहती  है।   ये   मधुर

 मधुर   गोबिंद   मुझे  भाता[ अच्छा लगता ]   है ।

[ १  ८  ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

सुनऊ  सखी  हरी  प्रेम  पिआसे ।

सांचौ    नेह  जान   आबें   प्रभु           झूंठे       देबत         झांसे   

जो  जस  भजै  भजत  बैसेई               मोहन      मोहक        रासे 

अदुभुत  इष्ट  शिष्ट  सखि  भारी            उलटे    सुल्टे           फासे ।

चित्त   पट्ट    दोऊ     गोबिंदा            ग्यानी      बिबिधि        प्रकासे ।

इक     बिनती  सुन  लेउ   हमारी           गुपाल     चौपर                 पासे  ।

‘’गुपाल’’ आस  बिस्वास   स्यामजु            करइ   मनुज             सुख हासै 

 

 

 

हिंदी भावार्थ :—-

श्री राधिका  बोली  कि  श्रीस्यामसुंदर  प्रेम  के  प्यासे हैं । उनका  आपसे  सच्चा  प्यार   है

  वे  तो  तुम्हे  झूंठे  ही  झांसे दे    रहे  हैं।वे  तुमसे  मजाक  कर रहे हैं  बहका  रहे  हैं

 उनको  जो  जैसे  याद  करता  है   वे  तुमसे  मजाक  कर  रहे  हैं  बहका  रहे  हैं  

मनमोहन उसी  प्रकार   ये  श्रीकृष्ण  बहुत  अनौखे  इष्ट हैं  और   सभी  प्रकार  के

 उलटे  सीधे  चालें  चलने  मैं  माहिर  हैँ    इनके  बराबर  कोई  शिष्टाचारी   भी  नहीं

 हैं  सब  तरह  के  तरीके    उन्हें  आते  हैं।चित्त  पट्ट  दोनों  ही  ढँग   से   चलने    मैं  

वे   पूरी   तरह   सिद्ध   हैं  । आप   सभी  सखियों   से     एक  मेरी  विनती  सुन  लो

 उनका  नाम  ही   उनका  स्वरुप  है  सारे  तरीके   बिधियाँ  भी   श्रीकृष्ण  ही   हैं

 गोपाल  कहते हैं  हे  मित्रो    हे  सखियो  श्रीकृष्ण  पर  विश्वास  रखिये। उन  पर

 विश्वास  रखने वाला  मनुष्य  संसार मैं  सुखों  से  हँसता  रहता  है।

 

 

 

१  ९ ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

कारे     प्यारे       सलौने       काना ।

बात   पिआरी   तन  मन   बेधत            हौं         तोइ   पतिआना ।

सकुच  सरम   छांडी    निरमोई                गोकुल     कुंड       डुबाना         

ब्रजकुंजन         नरेस       बनबारी            सर्वेस्वर      स्व       माना 

सबहि  त्याग  हौं    लीन  भई  हरि      गोबिंद        रूप        सुहाना  ।

छीनत  याइ  काह  तैं  दीनों                 उदभव   ही       लुभाना ।

घन कंजूस   मदन  मनभावन       ’’गुपाल ‘’       आनंद           लुकाना     

 

 

 

हिंदी भावार्थ :—-

 

 

हे  प्रिय  कारे  सुंदर  कृष्ण  तुम्हारी  प्रिय  बातें  शरीर  और  मन    को  चुभ  

रहीं  है । तुम्हारी  बातों     का   अर्थ     मैं   नहीं    समझ      पाती    हूँ ।तुमको

      शरम  नहीं  आती  है  पूछते   हो  हम    यहाँ  क्यों  आईं  हैं। हम  तुझे

 जानती  नहीं थीं   कि  तुम  इतने  निष्ठुर  हो ।आपने  अपनी  लाज सरम

सबको    गोकुल  मैं  छोड़    दिया है गोकुल के तालाब मैं डुबा  दिया है        और

   इन   ब्रज  की  कुंजों  में  तुम  राजा  बने  बैठे   हो ।  हे  मन      मोहने  वाले

  लाला  तुमको    किसी   का   डर   नहीं   है । तुम  अपने  आपको    सर्वेश्वर  

मानते     हो । हम  भी  तुमको  सर्वेश्वर   मानते     हैं   अरे  निष्ठुर  सबको  

छोड़  मैं  तुममें   खो  गयी  हूँ । तेरा   प्रेम  मुझे  भाता  है ।  तुमने     हमें  क्या  

दिया  है  जो  प्रेम रस  को  भी  छीनना  चाहते  हो ।   जो   हमारे  हिरदय  मैं  पैदा

  हुआ  है ।  मन  को  अच्छा  लगता  है  अरे  मनभावन   कामदेव  तुम  बहुत

 कंजूस  हो ।   सभी  सखियों  ने  ये   मन  मैं   ठान  लिया  है   हे   आनंद कंद

  आनंद   को   आप   छुपाये   बैठे हो ।

 

 

[      ० ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

कर   जोरे    हरी   बचन  उचारहिं ।

सुनउ   सखी   हौं   रिनी  तिहारौ                  छांड  जगत    बन     आबहिं   

माया  एक  छनक  सखी   त्यागी                सोमत      तजे        गुपालहिं 

मोह  तजौ   जग  नेह  कीन  हरि               स्याम      निस्ठ     मुनि  हारहिं ।

पालनहार  त्याग  दीऐ    अलि                  तन      मन       कान्हा  बारहिं   

जोगीराज  तपस्वी      अदुभुत                कर        कर             उद्यम  हारहिं  ।

प्रेम   मूरती    इष्ट  मोइ    तुम               ‘’गुपाल ‘’  हरी        समझाबहिं   ।

 

 

हिंदी भावार्थ :—–

  भगवान  श्रीमोहन  हाथ  जोड़कर  बोले ।

हे  सखी  मैं  तुम्हारा    ऋणी  हूँ। क्योंकि   तुम  मेरे  लिए  संसार  को  छोड़  कर  

यहाँ  आई  हो  ।      संसार  की  मोह माया  को  तुमने  एक  पल  मैं  त्याग  दिया

  और   मुझ  हरी  से  प्रेम  किया  तुमने  अपने  सोते  बच्चों  को  भी  मेरे  लिये  छोड़

 दिया   अरे  तुमसे  तो   कृष्ण  परायण  मुनि  जो  श्रीकृष्ण को  पूरी तरह  अपनाते  हैं

 हार  गये  । तुमने  अपने  पालको  को  माता  पिता   सास   सुसुर  पति  सबको  एक

  छन  मैं  त्याग  कर  दिया । और मुझे    देखकर  अपने  आपको   न्यौछावर  कर  दिया ।

  योगी राज   तपस्वी      कठोर  तपस्या  करने  के  बाद  मुझे  प्राप्त  नहीं   कर  पाते

  हैं।   अरे  प्रेम  योगिनी तुम  मेरी  इष्ट  हो  गोपाल  कहते  हैं श्री हरी  गोपियों

को  बता  रहे  हैं   समझा  रहे   हैं।

      ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

कर   जोरऊं     सखि           सुनउ   सयानी ।

हौं   बूझी  जग  कुसल  तिहारी          सरल  भाब   सखि   भानी   

कछुक  नहिं    मन   भाब  पिआरी          तन  मन  अरपन   मानी  ।

नेह   निरख   सखि  हिअ    उमगानों     बोध . न   मीत    चुभानी ।

नंद सुबन   जसुदा  मनभाबन         छमउ     बालबय      जानी ।

बैनु   बुला बौ    अमर  जान   अलि       जमुना           तीर    सुहानी  ।

‘’ गुपाल’’ सखी  हिअ  बासें   सबइ       प्रेम     पुनीत     पुरानी   

 

 

हिंदी भावार्थ :—

भगवान  कृष्ण  बोले  हे  सयानी  समझदार   सखियो  

मैं  तुम्हारे  हाथ  जोड़ता  हूँ।  अरे   मैंने  तो   सरल  भाव  से  तुम्हारी  

कुशलात  पूछी  थी।  मैं  समझता  हूँ  उसमें  हानि  नहीं  थी     मेरे

          मन  कुछ  गलत  भाबना  नहीं थी   मेरा  शरीर  मन  सब  तुम्हारी  

 अगवानी मैं  अरपित   था   समर्पित  था   तुम्हारा  प्रेम  देख  हे

सखियो  मेरा   हिरदय  उमड़ने  लगता  है। हे  मित्रो   हे  सयानी

 समझदार   सखियो   मैं  यह   जान  पाया  कि   तम्हें  मेरी

बातें  क्यों  चुभ  गयीं। मैं  नन्द  का  बेटा  यशोदा  मां  के  मन

 को  प्रिय  लगने वाला श्री कृष्णगोपाल  तुमसे  क्षमा  मांगता  हूँ

।मुझे  बालक  जानकर  क्षमा   कर  दो ।      मेरी  बंशी  ने  तुम्हे  बुलाया  है

   आमंत्रण  अमर  है। जमुना    के   सुंदर  किनारे  पवित्र  प्रेम  की  कहानी

  लिखेंगे । गोपाल  बोले  हे  सखियो  तुम  सब  मेरे  हिरदय  मैं    

    बसती  हो  मेरा  तुमसे  परम  पुनीत  प्रेम  है  इसे  पहचान  लो ।

 

 

[      २  ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

पुरबौं    हौं   सकल  मनोरथ  मन  के ।

गुपाल  दास  भगत  प्रेमीजन            दुरभाबा  तज  हिअ  के  

जीब  बिरम     सबई    इक   माया        ग्यान बोल    संतन   के ।

पहुंची  कसक   उठी   पीरा  मन        प्रेम    डगर  प्रियखटके 

छमउ  गुपाल   जान  जन  आपुन     बचन  स्नेअ   हरी    के  ।

आबौ   जुरि  मिल  रास  रचाबें         सखी  राधिका     बर   के ।

‘’गुपाल’’ मुदित  मन  गोपी  भारी       खुले    बंध     गांठन    के ।

हिंदी भावार्थ :—

श्रीकृष्ण  बोले  सखियो  मैं  तुम्हारे  समस्त  मनोरथ   पूरे    कर  दूंगा।

मैं   तो   प्रेमी   भगतों  का  दास  हूँ । तुम  मन    मैं  आये  समस्त  

बुरे  भावों  को  त्याग  दो ।ब्रह्म  और  जीव  सब  एक ही  माया  है   यह  ज्ञान

 संतों द्वारा  अनुभूत है। प्रदत्त  है कुछ  भी  दूसरा    नहीं  है  सब  एक

  ही  माया  है  मैं  तुमसे  अलग  नहीं  हूँ । मेरे  कुछ  बोलने  से  जो  पीरा

 मन   मैं  उठी  है। वे  प्रेम  की  डगर  के  प्यारे  खटके

  हैं ।उनसे    नाराज  नहीं  होते।गोपाल  बोले  मुझे  अपना  जानकर  क्षमा  

कर  दो  हरी  के  ये  वचन  प्रेम  रस  मैं  सने  हुए  हैं  आओ  हम   मिलकर

प्रेम  की  अलौकिक  रासलीला  करेंगे । हे  मेरी  प्राण  से  प्रिय  सखियो  तुमही

मेरे  प्राण  हो । गोपाल  कहते  हैं  कि   गोपियाँ  अपने  मन  मैं  मुदित  हो  रहीं

  हैं  महारास  होने  की   तैयारी  हो   चुकी   हैं  सभी  बाधा  पार   हो  गयीं  हैं  

 

 

[     ३  ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

जगदीश्वर       हरे     गिरिराज     गुपाला  ।

मनमोहन       गोबिंद     हरी   प्रभु           बासुदेव           नंदलाला   ।

प्रगटे  भूतल  भार  उतारन               बालापन        हरि  काला   

अगिनित  असुर  हने  प्रभू  छनइ           गोप       ग्वाल    रखवाला ।

भ्रमबस   चोरी      कीनीं     ब्रह्मा           हरे . गोप  गौ         ग्वाला ।

लै  कैं   गबने  ब्रह्मलोक    हर             ग्बाल       बाल         नखराला ।

अतिबृष्टि  ब्रज  भूमि  घिरानी                सऱन    गिर्राज   विसाळा ।

बिधि  इंद्र  दोऊ   हरी   हारे               कीनीं         भक्ति    रसाला ।

‘’गुपाल’’ चुप्प  आसुरी  शंकर              दिरग      अंसुअन     माला ।

 

 

हिंदी भावार्थ : —–  

हे  गिर्राज  हे  गोपाल  तुम  जगत  के  ईश्वर  हो ।    हे  मन  के

मोहने वाले  गोविन्द  हरी  प्रभु  आप  वासुदेव   श्रीनन्द   दोनों  के  पुत्र

हो  आप  संसार  का  भार   उतारने  के  लिए   आये   हैं। आपके  बाल  काल

  के    काज  अत्यंत  कराल  हैं । तुमने  अगनित  राक्षसों      को   एक  छन

  मैं  मार  दिया ।  गोपों  गोपियों  गउओं    को बचा दिया  शंकर  भगवान  बोले

 आपने  पिता      ब्रह्मा  को  भ्रम  मैं  डाल  दिया।  उनने  सारे  गोप  बाल     गौ

 बछड़े  आदि  को  चुरा  लिया  उन्हें  लेकर  ब्रह्म लोक      चले  गये  आपको

उन्होंने  केवल  कोरा  ग्वाला  समझा  अति  वारिश  होने  से  जब  ब्रज  की

भूमि  घिरी  तो  आपने   विशाल  गिर्राज  की  शरन  से  ब्रज वासियों  की  रक्षा

 की ।    आपसे  बिधाता  व इंद्र दोनों  हार  गये  मुनि  बोले  त्रिपुरारी   शंकर  के

 साथ  मैं  आपकी  विनती  करता  हूँ ।  गोपाल कहते      हैं ।  श्रीशंकर

   आसुरी  मुनि  हाथ  जोड़कर  खड़े  हो  गये  उनके नेत्रों मैं आंसुओं

की माला है ।

 

 

 

२ ४   ]

 

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

आसुरि  नाम   रिसी  तप धारी ।

कृष्ण  लाड़ली  इष्ट  देव   जिन                 सेवें           बिबिध        प्रकारी ।

निर्जन  बन   बन  सैल विहंगम             खोजें                हरि          साकारी ।

दरस  मिले   मुनि   अकुलाने                राधे             स्याम        बिहारी ।

चले  आसुरी  ब्याकुल     भारी                दरस              देउ           बनबारी ।

क्षीरसिंधु  छानों  बदरीबन                  जुगलरूप       छबि          प्यारी   

भोले  नाथ  भेंट     कैलासा                 संकट                मुनी        उचारी  ।

हर  हर  बोले  अबइ  बताऊं              ‘’ गुपाल ‘’          रिसी         गिरधारी।

 

 

हिंदी भावार्थ :—–

  आसुरि  मुनि  महा तपस्वी हैं उनके इष्ट देव श्रीकृष्ण व श्री राधिका

जी हैं  वे  ध्यान  मैं  नित्य   साकार  दरसन  करते  रहते  हैं । दरसन  

 मिलने पर     मुनि   व्याकुल  हो गये  हैं । श्री कृष्ण  कहाँ   चले  गये हैं ।

   वे  उन्हें  ढूंढते  बैकुंठ  क्षीरसागर बद्री वन सब जगह ढूँढा         परन्तु  वे

   कहीं    मिले ।  आखिर  वे  श्री भोले नाथ के  पास   कैलाश  पंहुचे ।

हे  प्रभु  मुझ पर  संकट  आगया  है   मुझे मेरे  इष्ट प्रभु के दरसन  नहीं हो रहे हैं

देवाधिदेव  महादेव  बोले  हे  मुनि हम  तुम्हें  अभी बताते हैं  की योगेश्वर  कहाँ  पर हैं ।

 

 

[           ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

सुनउ    तापसी   गिरा   हमारी ।

दरसन  करन  रास ब्रजमंडल                   गबनहुं    . चलउ    पिछारी   ।

दूर  घनौ  ब्रजमंडल    सुन्दर              मोहक          मदन  मुरारी ।

नंदी  बैठ  चले  सिब   संकर               आसुरि  मुनी         पिछारी  ।

मुंडमाल  गल   बिसधर  धारे               कर त्रिसूल         भअहारी   ।

बाल  बृद्ध  निरखें  जोगिन   सब              प्रनबें           बिबिध    प्रकारी ।

‘’गुपाल’’ अनौखे  साधु   प्यारे                 ब्रज भूमी              मन हारी 

हिंदी भावार्थ ;—- हे  तपस्वी  मेरी  बात  सुनो।    मैं  ब्रज  मैं  रासमण्डल के  

दर्शन  करने  जाउंगा   मन  को मोहने  वाले  श्री श्यामसुन्दर  रास कर

रहे हैं । अच्छा  ब्रज   यहाँ   से  बहुत  दूर है    श्री शंकर   नंदी  पर  बैठ  

कर  चले । आसुरी  मुनि उनके  पीछे  चले । मुंड मॉल  पहने  गले  मैं

विषधर  डाले एक हाथ मैं     त्रिशूल  लिए  हुए हैं ।  जो  भय को  दूर

करने वाला है  बच्चे  और  बूढ़े  सभी उन्हें  देख  रहे  हैं   उन्हें  अपने

 हिसाब से प्रणाम  कर  रहे हैं।    गोपाल       कहते हैं वे  प्यारे

 साधू   मनोहर  बृज भूमि की  शोभा  देखते  हुए  जा    रहे हैं ।

 

२  ६  ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

राधे  राधे   हरीबोल   सुआनौ ।

मन  मुस्काने      सिब       त्रिपुरारी               आसुरि  अब  ब्रज          आनौं 

दिब्य  तरु        मनमोहक    उपबन                  बास    प्रभू             पहचानौ 

बिना   करे       हरि  सुमरन  होई                     स्रवन   जुगल       रस    जानौ 

धन्य  धन्य   ब्रज  भूमी    बासी                   परिहौ    मोहन              आनौ ।

खेलन     कूदन    बिचरन  हरि  ब्रज               रंजन      मंजन                भानौ 

‘’गुपाल ‘’मूढ़ कहा  लगि   भासै                 आसुरि           मुनी             लुभानौ   

हिंदी भावार्थ :——श्री शंकर  और  आसुरी मुनि  को  राधे  राधे  का बोल सुनाई  

दिया    श्रीकृष्ण की  आवाज  आने  लगी।     मंजिल आयी  जानकर  वे  खुश

हो  गये  ।  अलौकिक   पेड़  कुँज वन  उपवन  चौरासी  कोस  मैं  फैले  हुए हैं  ।

ब्रजमंडल  मैं बिना  बात  ही        बिना बात  हरी  सुमरन    होता है ।

ये ब्रज के  वासी  धन्य  हैं जिनके  बीच  प्रभु को  आना  पड़ा  इन लोगों  ने

   जाने   कैसे  पुण्य  किये  हैं  जो  ये  प्रभु  के  संग  खेलते हैं  बैठते  हैं।  इस

ब्रज की  शोभा को  गुपाल  क्या  गावे  जिसे  देखकर  शंकर त्रिपुरारी  

महा तपस्वी  आसुरी मुनि   ब्रज के  मोह  मैं  पड़ गये ।

 

 

[    ७ ]

 

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

निरखत. ब्रज  संकर  मुनी   आने  ।

बारि   ध्वनी     श्रीकृष्ण  राधिका         जमुना         घाट             सुआने  ।

चन्द्र  चन्द्रिका  ब्रज    तम नासन          कन   कन              बास  सुआने  

लहर  उठत  जल  चंचल  उछरत           चमक  नअन             चुंधिआने   ।

स्वेत  चन्द्रिका  चादर  जमुना             जोबन  बारि               लुभाने       

औगड़नाथ  महा  सिबयोगी                  रास   निसा          ललचाने    

आसुरि  मुनि  प्रनबें   कर    जोरी        अंजन  अघ              मिट  जाने  ।

‘’गुपाल ‘’बोले  हर  प्रमुदित    हो            दरस  करौ             मुनि  स्याने 

हिंदी भावार्थ ;——

बृज  को  देखते हुए  वे  यमुना जी  के  किनारे   गये हैं।

पानी की ध्वनि    कृष्णा राधिका    के  सुहाने  बोल   बोल  रही है

 यमुना  जी के  घाट बहुत ही  शोभायमान  हो  रहे हैं । चंद्रमा जी   की

 चाँदनी  अँधेरे  को  खत्म   करने  वाली  है   लेकिन  यहाँ बृज के चन्द्र

श्रीकृष्ण   चन्द्रिका की  चमक से इस  महारास रात्रि का  अँधेरा  

समाप्त  हो  गया है   जिसमें  कण  कण  चमक  रहा  है   क्योंकि  वे

 दोनों  बृज के कण  कण  मैं  व्याप्त हैं पानी   की     लहरों  से   जल

बूंदें  चंचल  होकर  उछल  रहीं  हैं  उसकी सफेद  बूंदें मोती की  तरह  आँखे

 चुंधिया  रहीं हैं ।   जो पैदा  होती  हैं  मर  जाती हैं  ऐसा लगता    है  कि  मनो

 जमुना जी  श्रृंगार कर  हरी  के  गले  मैं स्वेत  फूलों की माला डालना

चाहती है । उन्होंने  अपने  यौवन  को  छुपाने  के  लिए  चांदनी की  स्वेत

 धवल  चादर  ओढ़  राखी है   सुंदर  दृश्य  देख  महान  ओगड़  योगी  रास

 रात्रि को     देख  मन मैं  ललचा  रहे हैं ।  आसुरि मुनि  हाथ जोड़  विनती  

कर    रहे  हैं  मैं  जमुना मैं स्नान कर लूँ  ताकि  मेरे  पाप  मिट  जावें   

गोपाल       कहते हैं   कि  शंकर  भगवान   खुश होकर  बोले  कि

पहले   स्नान  करते हैं  फिर  प्रभु के  दर्शन  करेंगे ।

 

 

      ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

अंजन    करंइ  मुदित  मुनी    भारी ।

बम बम  भोले  प्रभु    सिबसंकर           तन   मन   हरस     अपारी 

समुधर  ध्वनि  मन  चंचल   ब्रज बन              मुनि  निरखो      भअहारी ।

आसुरि बोले   हौं   प्रभु      आकुल               जुगल     जोरि      मनहारी ।

महाकुञ्ज    मग     सुमन बिछाबन        चाले  सुमरि        बिहारी   

गिरा  स्रवन    सुनि  चौंके    जोगी               चितबत    स्वर    सुकमारी ।

पुरुस  प्रवेस     निसरस  जानौ                                   छमऊ     अबगुन    भारी   

प्रहरी  भार   ‘’गुपाल’’ निभावें                चन्द्र मुखी     ब्रजनारी        

 

 

हिंदी भावार्थ :—-

 मुनि   स्नान   करते मन  मैं  प्रसन्न   हो  रहे हैं ।

शंकर भगवान के मन तन बहुत प्रसन्न हैं संगीत की    मधुर  ध्वनि  से  बृज

 के  इस बन मैं  कण  कण    चंचल  हो  रहा  है । जिससे   मुनि आसुरी

 तथा भोले शंकर के   कानों मैं आनंद वृष्टि  हो  रही  है ।

शंकर भगवान  से  बोले  मुझे . रासबिहारी  को  देखने की   तीव्र  इच्छा. हो

  रही  है ।   आप  प्रभु  के   दर्शन   के  लिए  चलिए ।आसुरी   मुनि    बोले   हे

 मुनि श्रेष्ट   वंशी वाले  तथा .श्री राधे को  देखने के   लिए  मैं  भी  व्याकुल

हूँ । यह   युगल स्वरूप  मन को  अच्छा   लगने  वाला हैबन  के  रास्ते  मैं

  फूल  बिछे  हैं   श्रीकृष्ण  राधिके का ध्यान  करते हुए  दोनों  चले  जा रहे हैं।

   तभी   नारी   स्वर   सुनकर  वे  आश्चर्य चकित हो  गये   जिधर से आवाज

 आई थी  उसी दिशा  मैं  देखने लगे। वह  बोली  यहाँ  इस  रास रात्रि  को

 पुरूषों का  प्रवेश वर्जित है     पुरुषों  को  यहाँ  प्रवेश  का   अधिकार  नहीं  है ।

आप  मुझे  क्षमा कर  दीजिये। गोपाल  कहते  हैं  कि  वह  चन्द्रमुखी  सुकमारी

पहरेदार थी । उसने  उसे  बखूबी  अंजाम  दिया  भगवान शंकर   मुनि  रुक गये।

 

२  ९  ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

सुनऊ रतजगी      हौं   त्रिपुरारी     संकर ।

आसुरि महामुनी   संग       तापस                  भक्त    दास    हरि            किंकर 

कैलासी   बासी      सुकमारी                                कृष्ण             राधिका       प्रभुबर  ।

आनौ      जान  दौरि  आबिंगे                            नेअ  मूरती                     सुखकर 

कर जोरे     सखि       विनअ  प्रार्थना                  आयुस       हरी    हर         संकर   

जुगत     कऊं    नीकी  अति  भाबन                  पुरै              लालसा         मुनिबर     

चंद्र सरोबर       डुबकी  लेऊ                            बनों            सखी           अति   सुंदर।

अहम        आबरन     छुटइ   ’’ गुपाला ‘’            प्रिया          प्रभू              प्रियबर 

हिंदी भावार्थ :—-

 शंकर  भगवान  ने  अपना  परिचय  दिया  बोले   हे  पहरेदारिनी   मैं   महादेव  हूँ  मेरे

     साथ  महातपस्वी   मुनि  आसुरी  हैं जो  भक्तों हरी  के  सेवक  हैं भक्त  हैं ।

 हे   सुकमारी        मैं     कैलासपर्वत  पर   रहता   हूँ   तथा   कृष्ण व  राधिके मेरे  

इष्टदेव  हैं ।अगर  प्रभु     मेरा  आना  सुनेंगे   तो  वे प्रेम मूर्ति   दौड़कर   जाँएंगे।

सखी हाथ  जोड़कर  उनसे  विनय प्राथर्ना कर  बोली   हे महादेव  मैं  भगवान

श्रीकृष्ण की  आज्ञा पालन  कर  रही हूँ।  मैं  आपको  एक युक्ति  बताती हूँ  जिससे

 आपकी  इच्छा पूरी हो  जाएगी  आप इस  चन्द्र सरोवर  मैं  डुबकी  लगाओगे  तो

आप   सुन्दर  नारी बन जाओगे  जिससे  आपकी  इच्छाएं  पूरी  जाएँगी   भगवान

 की सखी  बनने  से  आपके  अहंकार  का  भी  नाश हो  जायेगा।      गोपाल

 कहते हैं   हरी  की  प्रेयसी  बनकर   रास  का आनंद  लीजिये।

 

 

     ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

करऊं         होइ        जेइ  विधि   मन  चीती    

चन्द्रसरोबर       डुबकी          लैऊं            अजब  गजब  प्रभु  रीती ।

मानसरोबर  गिरि         कैलासा          मंजन  कीन         बऊती  ।

कबहु   नारि      गात  हौं  पायौ      मुनिबर   कहौ     सुनीती  

छांड़ि  तरक   प्रभु  ब्रज स्नाना        आसुरि     कई      सुनीती।

लोचन  बंद  करउ  जल  उतरउ       सुमरि    कृष्ण  कर  प्रीती ।

हरि   अनंत  हरि  काज  अलौकिक        पाबईं     लक्ष    पुनीती ।

नारि  पुरुस   ना    भेद         त्रिकाली   लोक लाज  जिन जीती ।

गुपाल महादेव  मुनि    कूदे       गहन  कुंड         ब्रज  भीती ।

 

 

हिंदी भावार्थ :—-

 श्री शिवशंकर  बोले  कि  मैं  वही  करूंगा  जिससे  मेरे  मन  

की  हो  जाये। मैं  अवश्य  ही  चंद्रसरोवर मैं  स्नानं  कर  लूँगा ।   मेरे प्रभु की भी

  अनोखी  रीतियाँ हैं   लीलाएं हैं ।  लेकिन  कैलास के  मानसरोवर  मैंने  अनेक  बार

 स्नान किया  लेकिन  कभी भी  एैसा  नहीं  हुआ। हे  मुनि श्रेष्ठ मुझे  बताओ।

आसुरी बोले हे  प्रभु शिवशंकर  इन बातों को  छोड़  दो  नेत्रों  को बंद  कर जल मैं

 घुस जाओ   तथा श्रीकृष्ण  को  प्रेम से  याद करो  श्रीकृष्ण  अंतहीन हैं । उनके  

बारे मैं सोचना  निरर्थक है  जैसा  उसे  करने  से   हमैं  लक्ष्य की  प्राप्ति  हो  

जायेगी । हे  त्रिकालज्ञ  नारी  पुरुष  मैं  भी कोई  अंतर  नहीं  है।

 इस  भाव  से  हम लोक लाज  जो  नारी  बनने  से  हो रही है  त्याग  सकते  हैं

गोपाल       कहते हैं ऐसा  सुनकर  भोले  शिव शंकर  तथा मुनि आसुरी  

कुण्ड के  जल  के  भीतर  कूद  गये।

 

[      ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

नारि   रूप   दोऊ  मन   हरखाबईं   

सुंदर  तन  चंचलता  आनी              नख सिख     सुघड़    लखाबईं    

प्रमुदित   दौन  लखैं  निज  काया         रमनी  रूप              लुभाबईं     

चाल   निरख  म्रग साबक लाजें           बसन   सुरूप             सुहाबईं   

रटत  राधिका   कृष्ण     गुपाला              सिव   हरि  कीरत     गाबईं   

कुञ्ज  कुञ्ज  ते  निकरत   जावें          जुरे    जूथ       सरमाबईं     

‘’गुपाल ‘’नारि  बन   प्रभू      ढूंढे           प्रेम  निकुंज  न         पाबईं       

हिंदी भावार्थ:——

स्त्री  बने  दोनों शिव शंकर   तथा  मुनि  आसुरी  मन  मैं  प्रसन्न   हो  रहे हैं  

नख  सिख शरीर   सुंदर लग रहे हैं। सुंदर बने हुए दोनों बहुत चंचल हो रहे हैं ।

एक दूसरे को  देखकर  दोनों  हंसते  हैं   नयन  भर  कर  अपने  रूप  को  देख  रहे हैं ।

  उनके वस्त्र  सुंदर  सुरूच  सुहाने   हैं ।  वे  राधिका  राज  गोपाल  को      यादकर  

थिरकते  हुए  चल  रहे हैं ।   कुञ्ज  कुञ्ज  से  निकलते  हुए     जाते  हैं  

वे  इतने  सुंदर  लग  रहे  हैं   गोपियों  के  जूथ  उन्हें  देख कर    शरमा  रहे  हैं गोपाल

      कहते हैं   स्त्री बने  वे  हरी कृष्ण  को  ढूँढ   रहे  हैं  रास  निकुंज  उन्हें   मिली ।

 

 

 

[ ३ २    ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

पुछत     दोऊ    गोबिन्द    गुपाला ।

पीताम्बर मनमोहनी अचकन             मोरमुकुट      बनमाला।

कुंवरि  राधिके   परम सलौनि              रूप अनूप     रसाला  ।

चँवर ढुलामत सखि  सयानी               पहरी  मुतियन माला  ।

बेग बतावो प्रभू  ठिकानो                 खोज रहिं   ब्रजबाला  

‘’गुपाल’’ संग सिव आसुरि  चालि           मृगनैनि      गजचाला ।

 

 

 

हिंदी भावार्थ :—

 श्री शंकर व आसुरी मुनि  पूछने लगे गोविन्द कहाँ  हैं ।पीतांबर  

धारी  मन को मोहने वाली अचकन  मोरमुकुट   बनमाला पहने प्रभू

का ठिकाना बताओ ।  विशाल   नेत्रों वाली  रूपवान श्री राधिके कहाँ  हैं ।

  स्त्री भेष धारी शिव व आसुरी मुनि के   साथ पता बताने  हथिनी जैसी चाल

हिरनी के से  नेत्र वाली सखी चली ।

 

 

      ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

महाकुंज  सखी   चली  लिबाई ।

पूछत सखि  मग    कौन सुहानी            सुघड़ देस   सखि आई  ।

प्रेम पिआरी  मोहन दोनों                    मिलन  निसा    सुखदाई ।

  महानिकुंज    सखि       पहुंचावों         माधव   दरस    सुखाई    ।

सुरभित बयार बहत ब्रज  बनउ               गंध   सुगंध               बहाई 

बहु विधि चौक पुरे भूमी  पै                 नाना जीब        छपाई  ।

‘’गुपाल ‘’ गली सांकरी   नीकी                संकर  मुनि    ललचाई   ।

हिंदी भावार्थ :—-

पहरेदार सखि महादेव शंकर व आसुरी मुनि को  

लेकर रास्ता बताती हुई उन्हें महाकुंज की ओर    

ले जा रहीं थीं। अन्य गोपियाँ पूछने लगीं ये सुंदर  

सुघड़ सखियाँ खान से आयी हैं । ये मोहन की प्यारी  

हैं । इनको मै प्रभु से मिला रही हूँ । मुनि और शंकर जी  

को मधुर ध्वनि सुनाई दे रही । धरती पर सुन्दर  चौक  

बनाये ।  नाना तरह के जीव बने हुए हैं।  संकरी गली  

महादेव व आसुरि मुनि को मोहित कर रही है ।

 

 

 

३  ४   ]

 

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

 

रस निकुंज  अब   निकटहिं    आनों  ।

ब्रज माधव   सखि  रुचिर  माधुरी                पीजै      ना          पछतानों ।

ब्रज भूमी      भंडार  प्रेमरस                                   सागर        स्याम             समानों 

दिब्य         अलौकिक   प्रीतम  प्यारी                   रूप   सरुप                         सुहानों 

अष्ट सखी                    भंगिम   मनमोहक          जुगलसुरुप                  लुभानों 

त्रिपुरारी  ज्ञानी       मुनि  भारी                प्रेम  डगर            चकितानों   

‘’ गुपाल’’       ग्यान  देह  हर  बिसरौ                  प्रेम             हरी  उपजानों   

 

 

हिंदी भावार्थ :—-

 सखी  बोली  हे सखियो   रस निकुंज  अब  निकट   गया  है ।

ब्रजेस  श्री स्यामसुंदर  की  रूप  माधुरी  का  रस  जी  भर  कर  पीना ।

अन्यथा  पछताना  पड़ेगा ।बृज भूमि  प्रेमरस के  भंडार है  यहॉँ श्री कृष्ण

 प्रेम के समुद्र हैं। ये  प्रीतम  प्यारी  दिव्य   अलौकिक    हैं। जिनकी

 सुंदरता  मनमोहक  है  उनका  स्वरूप  सुन्दर मनमोहक   हैं  जो  सबको

 लुभाता  हैंआठों सखियों की आठ भंगिमा हैं ।  वो  एक  से  एक     सुंदर हैं

युगल  स्वरूप बहुत सुहावना   है  ।श्री शंकर  और  आसुरी  मुनि  महा ज्ञानी  हैं

   उनका  मन  प्रेम  का  भँवर  बना  मोहित  हो  रहा  है।     गुपाल  कह्ते  हैं

 उसे   अपनी  देह  का  भी  ग्यान नहीं     है । उनके  मन मैं  श्री कृष्ण

राधिका का  उत्कट  प्रेम  उपज  आया  है।

 

 

[        ]

 

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

 

भांति    भांति   सखी   हर  समझाबै  ।

प्रनबउ जाइ   परम परमेश्वर          त्रिकालग्य         समझाबै        

जुगल रूप  सोभा  अति न्यारी      जे ब्रज        धरनि     लुभाबै    

जीव जंतु तरु बन  सलिला         जुगल  रूप          छबि       भाबै     

बाल वृद्ध तरुन तरुनी सब           राधे      कृष्णा         गाबै 

जब सों  प्रगट भऐ  जगमोहन         तब सों  जगत       लुभाबै   

अनुपम नर नारी जुरि आवें            देसन    भेस          सुहाबै   

‘’गुपाल ‘’मोहनी प्यारी जोरी             गुन सुगंध          फैलाबै  ।

 

हिंदी भावार्थ :—

वो सखी शंकर जी को विभिन्न तरीके से समझा रही है ।

कामदेव के शत्रु महादेव को परमेश्वर श्रीकृष्ण  को प्रणाम करने की कह रही है ।

 दोनों युगल स्वरुप की शोभा अलग है ।   जिसे देख बृज की धरती मोहित है ।

जीव जंतु पेड़ जंगल नदियां सबने उनकी छवि को हिरदय मैं बसा  रखी है ।

   बालक बूढ़े युवा युवती सब राधे कृष्णा गाते हैं  जबसे   वे  जगमोहन श्रीकृष्ण

संसार मैं आये  हैं तबसे बृज सबको लुभाता है ।  अनोखे  नर नारी यहाँ आते रहते हैं

  जो  बिभिन्न देशों के बिभिन्न बेषभूसा वाले हैं   गुपाल कहते हैं यह मोहनी

जोड़ी अपने   गुणों की सुगंध धरती पर फैलाती है ।

[      ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

करी  प्रबेस  चकित  हरी  दोनों ।

चन्द्र चन्द्रिका धवल चाँदनी                    शुभ्र धवलता    कौनों 

मनि मंडित सिंहासन अनुपम                       हीरा     पन्ना  सोनों 

दिव्य द्युति पुंज बउरंगी  सब                    दस दिस रंग सोहनों ।

बनमाला कौस्तभ मनि  धारी                 मोहिन संग    मोहनों  ।

निश्चल नैन स्वामिनी राधे                   चितबन    नेह भिगोनों।

सबै जगत देऊं   वारि जुगल छबि           ‘’गुपाल’’      लाल  सलौनों ।

 

 

हिंदी भावार्थ :—-  

भोले संकर नारी बने आसुरी मुनि के साथ प्रवेश कर    

गोविन्द को देख चकित हो रहे हैं ।  चंद्रमा की चंद्रिका    

धवल चांदनी से  कौने कौने को सफ़ेद आलोकित कर  

रही है ।  प्रभु का सिंहासन मणियों से जड़ा है     इस  

अनुपम सिंहासन मैं हीरा  मोती   पन्ना सोना सब जड़ा  

है।  सिंहासन से दिव्य प्रकाश का रंग बिरंगा पुंज निकल  

रहा है ।  वन माला धारण किये हुए मोहन व मोहनी शोभा  

दे रहे हैं स्वामिनी श्री राधे  के नेत्र स्थिर हैं उनकी बांकी  

चितवन है ।   नेत्र नेह से भीगे हुए हैं ।  सारे संसार को इस

जुगल छवि पर न्यौछावर करता हूँ ।  गुपाल कहते हैं  श्री

राधे व स्याम इतने सुंदर हैं ।

 

[   ३  ७  ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

ललिता  साखा  चंबर    ढुलामत ।

चम्पकलता  सखी  म्रगनैनी                 अदुभुत       बैनु    बजावत   ।

चित्रा   थाप    देंत  सखी  ढोलक            रुचिर  ध्बनी          बहलावत  ।

इंदु   संग  श्री ललित   सुहानी              समधुर    राग             उचारत ।

थिरकत  सबै         अनंद  अवस्था         नुपुर    पा इली         बाजत  

वाद्य  गीत  संगीत    लहर  ब्रज         रासेश्वरी               सुहाबत   

औघड़  सिव  मुनि  प्रेम  पगाने           ‘’गुपाल’’  नेह          डुबावत   

 

 

हिंदी भावार्थ :—-

ललिता    विशाखा  श्री राधे  कृष्ण  को  चँवर  ढुला  रहे  हैं ।

हिरनी  जैसे  नेत्रों  वाली  चम्पकलता  अदुभुत  वंशी  बजा  रही  है।

चित्रा  ढोलकी  की  थापों  से  रुचिर  ध्वनि  निकाल  भगवान  के  मन  को

 बहला  रही  हैरही हैं।  इंद्रलेखा   सुन्दर ललिता  मधुर  गले  से  सरस  

रागिनी  गा  रहीं हैं ।सभी  सखियाँ  गोपाल  कहते  हैं  आनंद  से  थिरक  

रहे  हैं पायलों की  खन  खन  होती हैं ।नूपर  बज  रहे  हैं  वाद्य गीत

 संगीत     रुचिर शिवजी  औघड़  मुनि  आसुरी  प्रेम  मैं  पागल  हो  रहे  हैं ।

श्रीकृष्ण  का  नेह  का     रस सागर  सभी  को  डूबाती हैध्वनि  बृज  मैं  चल  रही    है।

 

 

 

[    ८  ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

मुदित भयेऊ   लखि मुनि त्रिपुरारी  ।

निरमल  नेह     उमड़ प्रभु  बूढे      भगत प्रेम    हरि भारी  ।

आबौ  कर आलिंगन लेबौ             मोहन  भुजा      पसारी  ।

गोपि रूप शंकर जी हरखत            ब्रह्मज्ञान   मुनि   हारी ।

श्रीकृष्ण संग न्रत्य करत हैं            नेह गंग       उमड़ारी ।

जीव और प्रभु अंतर मेटौ            थिरकत     संग बिहारी  ।

‘’गुपाल ‘’महारा त्रि  रस       अदुभुत      बहत    भूमि  असरारी ।

 

 

हिंदी भावार्थ :—–

गोविन्द श्री शंकर व भगत मुनि को देख कर  

प्रसन्न हो गये हैं। भगतों के निर्मल स्नेह मैं वे डूब  

गये । भगतों के प्रेम मैं वे द्रवित हो गये । श्री कृष्ण  

ने अपनी भुजा फैला दीं । मिलने को बुलाया । गोपी  

बने शंकर प्रसन्न हैं ।आसुरी  मुनि प्रेम मैं अपना

 ज्ञान भूल गये हैं        वे अपने प्रभु के साथ नाच रहे हैं ।

  नेह की गंगा उनके     हिरदय मैं उमड़ रही   है ।

  जीव और प्रभु का अंतर मिट गया है  । सब भगवान के संग

नाच रहे हैं ।गुपाल कहते हैं महा रास  की इस रात्रि मैं प्रेम

लगातार बह  रहा है ।

 

 

 

[      ९   ]  

 

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

 

 

।। महारास  हरि  राजहिं  कैसे ।।

मोरमुकुट प्रभु  रूप मनोहर ग्बालेश्वर     हर    जैसे ।

अंग अंग आभूसन फुलबा बनचर  स्वामी  जैसे ।

पीतबसन लहराइ रहौ  हरि कोंधन  दामिन     जैसे ।

कर बैनू  गल मोहनमाला कोट  अनंगन  जैसे ।

रासप्रिया छबि को कबि बरनैं  प्रभा   पुंज तम जैसे ।

‘’गुपाल’’ रासलीला रस देंनी निरखी सुकरत  कैसे।

  

 

हिंदी भावार्थ :—-

महारास में श्रीहरी कैसे लग रहे है।  माथे पर मोरमुकुट सुन्दर मनोहर

मानों ग्वालेश्वर शंकरभगवान हों। अंगो पर पुष्पों के गहने सजा रखे हैं।

 वनवासियों के राजा हों ऐसे लग रहे हैं।  पीताम्बर कृष्ण पक्ष में चमकने

वाली बिजली जैसा लग रहा हैं।   हाथ में बांसुरी लिए कृष्ण करोडों कामदेवों

की शोभा को लजाते हैं। करोड़ों कामदेवों का सौंदर्य श्री कृष्ण जैसा नहीं हो सकता ।

रास प्रिया राघिका जी अंधकार के बीच ज्योति पुंज सा लग रही हैं।  गोपाल कहते हैं

जिन जीवों ने ये महारास देखा उनके पुन्य कितने थे कैसे थे। कितने पुण्यशाली थे

वो प्राणी आंकलन करना मुशिकल है।

 

 

[    ०  ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

चन्द्र सरोवर   स्याम    सुहाबहिं 

जूथ  जुरे संग     हरि    ब्रजभूमि                          भेंटहिं   मोद          मनाबहिं ।

थिरकत  आली     मोहक   लाली                              नंद     नंदन    जिन   भाबहिं।

चिरजय  मुस्कन    प्रेम  निरत  छबि                    अनुपम   कृष्ण       नचाबहिं ।

स्वेद  बूंद निरखत   तन    सखियन                         राग   मल्हार       सुनाबहिं  ।

घिर  घिर  बदरा  ब्रज      घुमड़ाने                       फुआरे  फुआर        छुड़ाबहिं  ।

भूले  सुधि  बुधि    श्रीहरि   निरखें                         कौसल    घन     छिंटबाबहिं ।

ब्रज बाला  ’’गुपाल’’   मन     हुलसत                     थिरकन  अनंग      बुलाबहिं    

हिंदी भावार्थ :—–

सुंदर  श्री स्याम  चन्द्र सरोवर के  तीर  पर हैं   किनारे पर हैं  उनके  साथ

झुण्ड के झुण्ड गोपियों के शोभायमान हैं  । उन गोपियों को  श्रीकृष्ण का  संग

                        हर्ष  प्रदान  करने  वाला है ।   गोपियाँ  नाच. रहीं हैं  सखियों के  

मन को    भा   रहे हैं  तथा  प्रभु को  बुला  रहीं हैं । सदां  रहने वाली  

मुस्कान  के  साथ  श्रीकृष्ण  उन्हें  नचा रहे हैं

सखियों के  शरीर पर  पसीने की  बूंदे देखकर  भगवान को ऐसा  लगा कि  

सखियों के  शरीर  की  थकान को  वर्षा करवाकर  मिटाया   जा  सकता है  

सो उन्होंने  मल्हार रागिनी की शुरुआत करदी  ।       बादल  घिर कर  ब्रज मैं

 आ गये । शीतल  वर्षा की  फुहार  छोड़ने  लगे । सखियाँ अपनी सुधि  भूल कर

     तथा मेघ भी  अपने पूरे  कौशल से  सखियों को भिगो रहे हैं  ताकि

श्रीनंदनंदन की  इच्छा  पूरी  हो सके ।  बृज की  गोपियाँ    अपने मन मैं

 प्रसन्न   हो  रहीं हैंतथा उनकी  मंद  मधुर  शास्त्रीय नृत्य की  अभिव्यक्ति

  कामदेव को  भी  आमंत्रण  देती  प्रतीत  होती है 

   १  ]

 

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

चन्द्र  कृष्ण  संग       रास   चंद्रिका  ।

रासस्थली      बिराजहिं    दोऊ              मंद सुरभि    बिधि    पंखा।

चंवर  ढुलामत  बांकी   आलि                    थिरकत   लाज    शंका।

वाद्य  बजे      सब राग   सुरीले              धुनी    सुमुधरी       बंका ।

निरख  निरख  नैनन    फल  पायो          सखि          ज़ुराबहिं   डंका  ।

सोलह  सिंगार  करे      सखियन             रीझै      बैनू            टंका   

जन्मन  तप      फल    पावें गोपी        ‘’  गुपाल’’            संपदा    रंका ।

 

 

हिंदी भावार्थ :——

चंद्रमा  रूपी  कृष्ण के साथ श्री राधिके हैं ।वे रासस्थली मैं विराजे हुए हैं ।

  मंद मंद  शीतल  वायू  चल रही है  ऐसा लग रहाहै  ब्रह्मा जी ने इसके लिए पंखा लगा दिए हैं।

 उनसे मंद  शीतल  वायू निकल रही है।कुछ खूबसूरत  स्वस्थ  निडर  सखियाँ  

उनके  ऊपर  चंवर  ढुला  रहीं हैं  तथा थिरक रहीं हैं उनको   किसी भी  तरह    की

  लाज व् शंका  नहीं है ।  बाजे  बज रहे हैं जो  अनेक  प्रकार की   सुरयुक्त ध्वनि 

अपने  आप   निकाल   रहे हैं ।  श्री कृष्ण को  प्रसन्न कर  रहे हैं । जो  यह  देख

 रहे हैं उनका  मनो  जन्म  सफल  हो  गया है ।   श्री कृष्णा को देखकर  लगता है

 उनके नेत्र सफल हो गए हैं   नृत्य करते  सभी सखियाँ  हाथ मैं लिए  डंकों को

मिलती हैं सभी  सखियों  ने सम्पूर्ण  श्रृंगार  किया  हुआ

है वे पूरी तरह   जगत पालक  श्रीकृष्ण को  साधारण  समझ कर  मोहित  करने की

 सोच  रहीं हैं  उनको  प्रेम का  रोग  लगा है ।  वे सोच रहीं हैं  यह  अपनी  वंशी को

 टाँककर   हम पर रीझ जायेगा। सभी सखियाँ अपने  मैं किये तप का फल पा   रहीं

 हैं  पूर्व  मैं  किये  गए  तप  के  कारण  भगवान का  सानिध्य  प्राप्त  किया है

 गुपाल कहते हैं  ऐसा  लग   रहा है  जैसे धनहीन  कंगला किसी प्राणी को अकूत सम्पदा

 मिल गयी हो ।

 

 

[  ४ २  ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

करहिं   सिंगार  जुगल    जोरी    जुरि  ।

पुष्पासन          राधे       प्रभु     मोहन          रुचिर   सुहाने             प्रियबर   

स्याम        गौर           दोऊ   मनभाबन               आभा          अदुभुत       मनहर  

अंजनद्रग अरपन             श्री     कृष्णा                       चन्दन     केसर           रुचिकर 

नूपुर       यमुना         पग      पहनाने              माला               गंगा    सुखकर ।

उज्ज्वल  टिक्का        बिरजा  दीनौं                  कुण्डल      ;गौरी                सुन्दर 

नाना      भूसन          अर्पित कीने          ललित  सजाबे                         निजकर  ।

‘’गुपाल ‘’    कृष्ण      सजावें       भारी             बैनु        दीन   मोहिन         कर   

 

 

हिंदी भावार्थ :—-

सभी मित्र  सखी श्री राधिके  को  तथा श्री कृष्ण को  सजा  रहीं हैं मिलकर

भगवान  कृष्ण व स्वामिन     राधे को   सजा रहे हैं ।  श्री कृष्ण  राधिका  फूलों के  

आसन    पर विराजमान हैं । वे दोनों प्रिया प्रियतम  बहुत ही सुन्दर   सुहाने हैं

   स्याम रंग के श्रीकृष्ण  तथा  गोरे  रंग की   श्री राधिके   मन को बहुत ही  अच्छे

 लगने वाले हैं उनका रूप  सौंदर्य अप्रतिम है वे  नैसर्गिक रूप से बहुत ही सुन्दर

हैं  उन्हें  किसी  श्रंगार की  आवश्यकता  नहीं है।कृष्णा  नामिनी  सखी  ने

 श्री कृष्ण  राधिके को  फूल  इत्र  चन्दन  केसर अर्पित कियेतथा उन दोनों के  

नेत्रों  मैं  काजल  लगाया       यमुना जी  अपने  हाथ से  उन्हें   नूपर पहना  रही  है

विरजा सखी ने उन्हें टीका दिया है ।      गंगा जी ने  उन्हें   स्वर्ण से बने हार  पहनाये।  

श्री गौरी सखी ने उन्हें  सुन्दर  कुण्डल  भेंट  किये।     सखी ललिता ने

 नाना  प्रकार  के  आभूषणों  से श्री राधिके  को  तथा श्री कृष्ण को अपने

हाथों से सजाया । श्री कृष्ण को अच्छी तरह से  सजा दिया  और  उनके हाथों मैं

 वंशी पकड़ा दी।

 

 

 

[       ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

जल  बिहार      सखिअन     करबाबहिं ।

क्रीड़ा   रास  बूंद  जल   उछरत                    बारि      गात      सखि        भाबहिं   

निरमल        जलकन    माथे  सोहें              छटा               अनूप       रिझाबहिं    ।

खुले  केश      बिन्यास       मनोहर               झरहिं               पुष्प       सुहाबहिं     

लागै मनहु    नील पट        अदुभुत                 छींटहु                              रंग          रगाबहिं    

परमानंद       निमग्न         संग धनि             अंजिल              बारि        चढ़ाबहिं    

जमुना बीच   गुपाल हरी    हर                     .अबिरल            धार         बहाबहिं    

गजनी  झुण्डन  ज्यौं        गजराजा         ‘’गुपाल’’             स्याम        सुहाबहिं   ।

.

हिंदी भावार्थ :——

श्री कृष्ण   सभी  सखियों के  संग  जमुना जी  मैं  जल बिहार  कर रहे हैं

अथवा  सखियाँ  उन्हें  जल विहार  करवा  रहीं हैं ।    खेलने के कारण पानी

कि बूंदें जल मैं उछर रहीं हैं  जो सखियों के  शरीर  पर  शोभा  दे रहीं हैं ।

   जमुना जी के निर्मल  जल के छींटे     श्री कृष्णा के  माथे पर  जल कण  बनकर

  स्वेत मोतियों  जैसे शोभायमान  हो   रहे हैं ।  उनकी  यह   अदुभुत        छटा  

गोपियों को  लुभा  रही है    श्री कृष्ण     के   खुले केशों से जमुना जी मैं  खिले  

पुष्प  लगे  हुए हैं     फूल      गिर रहे हैं  जमुना मैं  बह   जाते हैं नीले रंग के

निर्मल  जमुना जी  के जल  वे बहते  हुए  पुष्प  इस प्रकार  शोभा  दे रहे हैं

जैसे जमुना जी को नीली  छींट जो तरह तरह के रंगों से आच्छादित है ढंका गया है  

जिसमे  बहुरंगी  छींट की  छटा   है ।  बृज  की औरते    आनंद  विभोर  हो  रहीं हैं

 इस  अलौकिक  आनंद  मैं  जो पूर्ण योगियों  का  आनंद है  निमग्न हैं  । वे अपनी  

अंजलि   मैं  पानी  भरकर  श्री कृष्ण के  शीश पर  महादेव   की तरह   चढ़ा    रहीं

हैं । गोपाल  कहते हैं  श्री कृष्ण जमुना जी  मैं  मस्त  हथिनीयों  से  घिरे गजराज

 ज्यों  शोभा  दे रहे हैं  ।

 

 

 

४  ४ ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

सोहत   स्याम जू           राधिकारानी ।

नभ गंगा   ब्रज  चन्द्र  चंद्रिका                 ससि  गन   गोपी                   छानी  ।

कमर  कसें  पीताम्बर   अनुपम                 बैनू              मधुर          लुकानी 

पुष्पहार       बनमाला    धारी             .  कीर्ति लली                 सन्मानी ।

कर  पकरे     हरि प्रिया   राधिका        .     थिरकत       हांसत         जानी   ।

छोरा  छोरी  दोऊ  अदुभुत                     निरखत      भाग            जगानी ।

‘’गुपाल’’ दास  जुगल  चरनन   प्रभु              बरनी छबि      मन     भानी   

  • हिंदी भावार्थ :——
  • श्री भगवान  स्याम सुंदर  श्रीजी  के साथ  शोभा  देरहे हैं ।   वे  आकाश  गंगा  में  मैं
  •  चन्द्र  चंद्रिका  से  शोभादे रहे हैं उनके  चारों ओर   गोपियाँ   ऐसी प्रतीत होती हैं
  • जैसे   तारों ने परिपूर्णतम चन्द्रमा श्रीकृष्ण राधिके को  घेर रखा है।  वे  कमर
  •  मैं  पीतांबर  कसे   शोभा  दे  रहे हैं । तथा अपनी  सुन्दर  वंशी को  उन्होंने  
  • उसी  मैं छुपा रखा है। पुष्प मालाओं से अलंकृत   तथा जंगली [ वन ]  वनो के
  • फूलों की  मालाएं  डाले  श्री मोहन  कीर्ति कुमारी राधिके का सम्मान कर रहे है ।
  • श्रीकृष्ण  अपनी  प्रिया  राधिके  के  कोमल  हाथ को  पकड़कर  जारहे हैं  ये  दोनों  लड़का

लड़की  अनौखे  हैं  उन्हें देखकर  प्राणी  अपने  भाग   की सराहना  करने  लगते  हैं

  समस्त  जीव धारियों  को  अपने  भाग्य  जगे   प्रतीत  होते  हैं। ये   गोपाल  

श्रीकृष्ण राधिके  के  चरणों का  सेवक है  उनकी  सुंदर  छटा का  प्यारा  बरनन  किया है।

 

 

[   ४  ५    ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

करहिं   सिंगार   प्रिया   प्रिय     दौनों ।

चंदन  अरु  कस्तूरी  केसर            उबटन    सुरभित      सोअनों ।

भाल  कपोल  फूल  बउ    काढ़े             रुचिर     रंगीन       ओढ़नों।

कुंकुम  बेंदी   नैनन  सुरमा              महाबर    नीक        नखूनों ।

गजरा  गल  अरु    मोहन माला            अंगुल       मुदरीन       सोनों ।

बनमाला  बनमाली  भानी                   गौड़ीअ       तिलक    नबीनों ।

दौनो  निरखत  एक  दूजे   अलि        मोअनी     सखी      मोहनो ।

‘’गुपाल’’  जुगल  जोरी  कर दरसन       क्यों       संसार       लुभौनों ।

 

हिंदी भावार्थ :—-

श्रीकृष्ण व राधिके  दोनों   अपना  अपना श्रंगार  अपने  आप कर रहे हैं  

श्रीकृष्ण व राधिके  दोनों ने    चंदन कस्तूरी तथा केसर का सुगन्धित  मनको

भाने   वाला लेपलगाया है   दोनों ने  मस्तक  व कपोलों पर  सुंदर   फूलों  की  

कढ़ावट की ।  श्री राधे जी  ने  मन को  भाने बाला   ओढ़ने का वस्त्र ओढ़ना ओढ़

लिया है । श्री राधे   जी  ने        कुंकम   बेंदी  लगाई है  उन्होंने  आँखों मैं  तथा काजल

  अपने नाखूनों पर  महावर  लगा  दिया । फूलों  कागजरा  तथा गले मैं  मोहन माला  तथा

 अंगुली   अंगुली मैं  सोना  पहन    लिया हैवन मैं  प्रसन्न  रहने वाले       श्रीकृष्ण

को वन माला भा  गयी ।    माथे पर  उन्होंने  भगवान स्वरूप तिलक लगा लिया है।

 संसार को  मोहने वाली  तथा मोहने वाले  एक दूसरे  को देख मोहित  हो  रहे हैं  

 गोपाल कहते है कि  तू इस युगलस्वरूप का  दर्शन क्यों नहीं करता है।

क्यों इस झूंठे संसार  मैं  लुभा  रहा है 

 

 

[     ६  ]

                                                                                     गुपाल  महारास  रस  माधुरी

आरत  भई       चन्द्रानन  टेरत ।

रासभूमि  सुखरंग      भुलानों                           कातर  नअनन                हेरत ।

संख चूर्ण   कामातुर  भारी                                भय    काल       सखि       छेड़त ।

लै     उत्तर  दिस    कीन     पलायन                    दौरत           हरी            हेरत ।

बिलखत  सखि   हरि   ओऱ   निहारत            स्याम    स्याम    धुनि            टेरत ।

हिमगिरि  पकरि  कृष्ण  जु  लीनों                 हन्यौ       पकरि             सुख  देबत ।

स्वांस  स्वांस  हरि कीरत  गाबै                  उपकृत   छबि                सहेजित   ।

भरि  भरि  अंक  गुपालउ    भेंटे                   दुःख  टारन        सुख      देबत ।

हिंदी भावार्थ :—-

शंख चूर्ण  यक्ष् के  कारण  चन्द्रानना  घबड़ाकर  श्री कृष्ण  को  

पुकार  रही है ।  वह   रासभूमि  के  अलौकिक  सुख को  भूल  गयी है ।  डरी

हुई   कृष्ण को   सहारे की   तरह  देख    रही है ।  शंख चूर्ण यक्ष्  कामातुर  होने के  

कारण  म्ररने का  भय     नहीं है । वह    श्री कृष्ण की    मित्र का  अपहरण  कर  रहा

है । और चंद्रानना को लेकर  उत्तर दिशा   की   ओऱ  भाग  रहा  है ।  तेज गति के

  कारण   धरती पर   पैरों का   स्पृश  कम्    है । सखी  बिलखती हुई  प्रभु की

  ओऱ  देख  रही है ।  परन्तु  वह  दुष्ट   श्री कृष्ण  जो  उसका  पीछा  कर रहे हैं

 नहीं  देख   पा  रहा है हिमालय  पर  पकड  कर  उसे प्रभु ने   मार  दिया   प्राण

तत्व  निकल  कर प्रभु मैं  समा  गये । चन्द्रानना ने    सुख  की  साँस   ली।

भगवान के बल बुद्धि तथा साहस की प्रशंशा करने लगी । भगवान  द्वारा  उपकृत

 हुई  प्रभु की  संखचूर्ण को मारने के बाद की छबि को हिरदय मैं उतारने लगी । वह

भगवान से मिलने लगी । जिनने  दुःख को   समाप्त कर   सुख  दिया है ।

 

 

 

[        ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

बजहिं  मृदंग   बीन   करताला ।

बैनु  रसीली   चंग सुरीलौ               बजैं         झांझ         सुर ताला   

स्रवन    मेघ मल्हार  रागनी                  थिरकत      अलि ब्रज बाला ।

दीपक  मालकोस         हिंदोला              सुर अदुभुत      नन्द लाला   ।

आठ  ताल     सातों स्वर  गूंजे                 हाब   भाब     नखराला     ।

अष्ट सखी   जुरि  संग  राधिके               सोभा  अनुपम  आला            

‘’गुपाल ‘’भाग   बरन  को  सखिअन          बस  जिन   मुरली वाला      

 

 

                                                                                              हिंदी भावार्थ :—

मृदंग  बीणा  तथा  करताल  बज  रहीं हैं।

बंशी  रस भरी  तान  छोड़  रही है  तथा सुरीला चंग  बज रहा है ।  झांझ की

  शास्त्रीय ध्वनि सुर ताल के साथ  हिरदय व   मन को  एक  कर  रही है

 मेघ मल्हार राग को       सुनकर  ब्रज बाला थिरक  रहीं  हैं ।  मंथर गति

से नाच  रही हैं।   दीपक  हिंदोला       मालकोश के  साथ  श्री कृष्ण का  अदुभुत

 स्वर है ।   आठों सखी गोपियों के साथ श्री राधे  अनुपम शोभा को प्राप्त हो रहीं हैं  

 गोपाल कहते हैं  इन  सखियों के  भाग्य का  कोई भी  बर्णन नहीं  कर  सकता है  

क्योंकि  इन्होने  परमात्मा  श्री कृष्ण को  वश  मैं  कर  रखा है।

 

  ८  ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

कहहिं ‘’गुपाल ‘’’ धन्य  ब्रज बनिता ।

तृनबत  सुख  सब   छांड़े    झूंठे           कृष्ण  जलधि            सुख       सरिता ।

जग मद   छांड़ि  मोअ  तज  आनी          अबलम्बन               तज      भरिता ।

गांव  गांव   जुरि मिल  सखि  आयीं        प्रेम  मगन                 हरि     चरिता ।

परम  पुनीत  भाब   सखी  राधे          कछुक                        नचाबैं   ललिता।

छकत      पीबत   सोम   कृष्णरस         थिरक                   रहीं   मनमुदिता  ।

जोग हरि      सबै  जोगिन    प्यारी           अदुभुत   करतब       करता         

 

 

 

 

हिंदी भावार्थ :—-

श्री गुपाल  कहते हैं  बृज की  नारी  धन्य हैं । जो  संसार के  सुखों को  तिनके  

के  समान   त्याग कर  जमुना के  किनारे  आईं हैं । जिन्होंने अभिमान  मोह

    तथा      जगत की      इच्छा सब त्याग दी हैं ।  तथा संसार मैं उनका भरन

पोषन करने   वालों को त्याग दिया है उनका  सहारा केवल श्रीकृष्ण रह गए हैं ।

   वे दूर २ के गांवों से आईं हैं  भगवान के   पावन  चरित्र  मैं  लीन हैं । उनके  दिलों

में   श्रीकृष्ण के  प्रति  प्रेम  उमड़  रहा है   श्री राधे का भाव  अनुराग  पवित्र सात्विक

है  उनके साथ  बहुत   सारी सखियाँ  एकत्रित हुईं है।

  कुछ एक  सखियाँ       ललिता जी के पास हैं । वे  उन्हें  नृत्य  करवा  रहीं  है

श्री कृष्ण रस  का  वे   सखियाँ   अमृत  पान   क़र  रहीं हैं ।  उस रस  

को  पान   करते  हुए  वे थकती  नहीं हैं।  वे  मन मै  प्रसन्न होकर नृत्य कर रही हैं ।

 योगेश्वर  हरी  श्री कृष्ण  को  वे सभी  योगिनियां  बहुत  प्रिय हैं। परमेश्वर

 श्रीकृष्ण के  कार्य  अलौकिक हैं  उन्हें  कौन जनता हैं।

 

 

[     ९ ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

सख्य  भाब   प्रानिन  सुखदाई ।

जानत     सखा       कृष्ण प्रभु प्यारे                बरतौ   ज्यों       हिअ       आई ।

बालभाब  सख्य    सोंउ   उत्तम                       हो      मन         निरमल     भाई  ।

रमत  संग  गिरधारी मोहन                        जीमों                  संग         जिमाई ।

पौढ़  संग  हरि सों   बतिआओ                        उठत      स्याम            उठ जाई  ।

कदम  कदम  बाढे   भगती  रस                       प्रेम        गाढ़                  गहराई ।

जे   मन भाब    प्रेम  ते  सुमरो                   मोहन        रूची                 बढ़ाई ।

लागि   प्रभू   राधे          मनभाबन                   भजौ             भाब         गहराई ।

‘’गुपाल’’   नेअ   कृष्ण  हरि सांचौ                    माया  दैंत                भुलाई ।

 

 

हिंदी भावार्थ :—-

श्रीकृष्ण से  मित्र भाव  सभी  जीवधारियों  को  सुख  देने  वाला है ।उनको

अपना मित्र  मानकर  जो  मन मैं  आये  सो  कह  डालो । उनको  बालक

 मानना  प्रभु भक्ति का  बाल भाव है  यह  मित्र भाव से  भी  श्रेष्ठ है  क्योंकि

 इसमें  कहीं  भी  वर्जना नहीं है  कहीं भी परदा नहीं है बालकपन  मैं   प्रभु  तन

मन दोनों से  निर्मल हैं  उनके  संग खेलो  उनके  संग  जीमो  [  खाना खाओ  

 उनके  संग सोलो [सो जाओ  ] वो  जगें  तो  जगो । उनसे  ढेर  सारी  बातें करो।

एक एक कदम  श्रीकृष्ण की  ओर  बढ़ाने से    भगति रस    बढ़  जाता है ।और

 गोविन्द से प्रेम मैं  गहराई  आती   है  हे  गुपाल  तुम  अपने प्रभु से प्रेम  बढ़ा लो

  वो  माया को  भुला  देंगे     जो भी  भाव  मन  मैं  है उसी  भाव  से   प्रेम से  सुमरो

        आपके  मन को  श्री कृष्ण  अच्छे  लगने   लगेंगे । प्रभु  अपने  आप  रूचि

 बढ़ा देंगे। युगल स्वरूप  श्रीकृष्ण राधिके  बहुत ही  मनभावन हैं  अपने प्रबल  

भाव से  गहराई से हरी का भजन करो। गोपाल  कहते हैं  अगर  तुम्हारा श्री कृष्ण से

 सच्चा  प्रेम  हो गया  तो निशिचित  ही वे  कृपा करके  संसार की  माया से   तुम्हें   मुक्त

 कर  देंगे।

     ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

बिचरहिं  स्याम     सखीन     मन  भाबहिं ।

चन्द्र      चन्द्रिका    धरा    सुआनी           पूनों             सरद               सुहाबहिं    

नीम       नरंगी        नीबूं    सोहत             सुमन     वाटिका              पाबहिं         

कटहर  पीपर   बट .बन  तुलसी                  कलरब       खगन                        सुनाबहिं      

करत   बिहार   सलौने सुन्दर                  मधुप             कृष्ण   मधु    गाबहिं      

तटी   गोरधन  प्रभु  मन  भानी              बैठक         रुचिर                 बिठाबहिं   

बूंदा बूंदी   प्रेम   नेअ     सखि                  मुनि           ग्यानी          डगमाबहिं  ।

कास       होंत     गोपि   हरि   प्यारी         हठ        सौं        गात    सुखबाबहिं   

‘’गुपाल’’ बैनुरस  सरसत     ब्रज बन          जीब          प्रभु                मिलबाबहिं   

 

हिंदी भावार्थ :—-     

 श्री स्यामसुंदर  गोपियों के  संग  रात्रि मैं  घूम  रहे हैं । चन्द्रमा की   शीतल  

धवल     किरणों से    आलोकित  ब्रज की धरती  अत्यंत  शोभा को  प्राप्त  हो  रही है।

 शरद ऋतू की     यह     पूर्णमासी श्रीकृष्ण के कारन  शोभा को  प्राप्त  हो  गयी है ।

वहाँ       नीम   नरंगी  नीबू  के बहुत   सघन  पेड़ हैं ।  तरह  तरह  के  फूलों की  

वाटिका  भी लगी  हुई है कटहर  पीपल  के पेड़ तथा तुलसी के  तथा बरगद के वन हैं ।

   पक्षियों के  शोर से  वन  मैं  बहुत ही  कर्णप्रिय ध्वनि  निकल  रही है  यह  रात्रि  

विचित्र है । विहार  करते  सुन्दर  मोहक कृष्ण  सखियों के  संग हैं   वो  उन  गोपियों को  

प्राणों से   भी प्यारे हैं । श्री कृष्ण ही  शहद हैं  शहद का मीठापन भी श्री कृष्ण ही हैं  

तथा   मधु  पीने  वाले श्री कृष्ण स्वयं  गाते हैं ।

श्री गिरराज की  तलहटी  श्री कृष्ण  को  भा  अच्छी  ] गयी।  सखियों के  प्रेम से  वे

रुक  गए हैं सखियों  को  श्रीकृष्ण  अपने साथ बिठा लिया है । ब्रज मैं  प्रेम की बूंदा बूंदी  

से सखियाँ  सुखी हो रहीं हैं  ब्रज के साधु  मुनि भी  प्रेम की  बूंदा बूंदी से प्रसन्न हो रहे हैं

 परन्तु विवश हैं  वो  सोच  रहे  हैं  हम  गोपी  क्यों    बने   क्यों  हमने  हठ योग  धारण

 किया। हमारा  शरीर  भी  सूख   गया  है  तथा  प्रभु की  प्राप्ति  भी  नहीं  हुई   

इधर इन  ब्रजांगनाओ  को देखो  प्रेम भक्ति से इन्होने  साक्षात  गोविन्द को

 प्राप्त कर  लिया है।गोपाल      कहते    हैं     कि    श्री कृष्ण  की   वंशी  ने  

प्रेम राग   बरसाकरसभी जीबों को   प्राणियों को     उन्हीं मैं मिला  दिया है  

सब श्री कृष्ण  मैं एकाकार  हो  गए हैं।

 

 

  १ ]

 

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

जल    जड़  चेतन   रसिक  सुहाने  ।

नद  नाले  सरिताऊ       प्रमुदित               चित    चितचोर  चुराने     

बेनू  समुधर स्वर       मन भाबै          रस  बरसत  सुनि    गाने     

चरन  पहाड़ी  चरन         बने हरि              शैल  सिखर      नरमाने   

दरस  करत   सखि   मन सुख पामत         लाल   लाड़ली       भाने     

महारास  निस   प्रेम       अलौकिक          अदभुत  सुर           संधाने  ।

लोप  भये  प्रभु    संग      राधिके              गोपी       बिरिइन       ताने।

आकुल  गोपी     बन         मग  ढूंढें          ‘’गुपाल ‘’   जुगल       सुआने 

हिंदी भावार्थ :—- पानी  जड़   तथा सभी जीवधारियों को श्री कृष्ण सुहा  

रहे हैं । नदी  नाले   कुण्ड  तालाब सभी  खुश  हो गए हैं  ऐसा लग रहा है कि

उनके  चित्त को  चितचोर श्री कृष्ण ने  चुरा  लिया है ।  तथा उन्हें गोविन्द

श्री कृष्ण बहुत अच्छे  लग रहे हैं बंशी  बहुत  ही मधुर  स्वर लहरी  छोड़  

रही है ।  वहाँ  पर  साक्षात  रसों  की  बरसा  हो  रही है।  भगवान के  पैरों

  के  निशान    पत्थरों के पिघलने के कारण  चरण  पहाड़ी  पर  बन गये हैं

  पर्वत की  शिलाओं  ने  अपनी  कठोरता त्याग दी है   वे कृष्ण  प्रेम से  

मुलायम  हो  गए हैं ।    युगल  स्वरूप  के  दर्शन  करने से   सखियों के  

मन को  प्रसन्नता  हो रही  है    क्योंकि  उन दोनों की  छबि मोहित  करने

वाली है  महा रास  की  इस रात्रि मैं  गोपिनयो  का  प्रेम  लौकिक  नहीं है

गोपांगनाओं    तथा  श्री राधे कृष्ण का  प्रेम  दिव्य  अलौकिक  है।  गोपियाँ

 अदभुत  स्वर से गा  रहीं हैं । जिसे  देख कर  राधा कृष्ण  अपने  आप  मुस्करा

 रहे  हैं   वे   दोनों   राधा कृष्ण  गोपियों को छोड़कर   अदृश्य   हो   गये ।

उन्हें न पाकर गोपी  आपस  मैं  ताने[  उलाहना  कि   तेरी  वजह  से  श्री रधिके

तथा श्यामसुन्दर  चले गए हैं  ] देने  लगीं ।

गोपाल  कहते  हैं   अत्यंत  व्यग्र  व्याकुल  सखियाँ  वन  के  कोने  कोने  मैं

 उन्हें  खोज  रहीं हैं  उन्हें  श्री कृष्ण  राधिका  बहुत  प्रिय  हैं ।

 

 

 

 

५  २  ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

बट   बिहार   राधे  हरी    भाबै     

कीरत  नंदिन   प्रमुदित    मोहित     परम       नेअ                मुसकाबै    

सुमन  सिंगार   हरि  मन   मोहै               पलक   प्रेम         मुंद जाबै ।

केश चोटिका  सुघड़ सुहानी                  नाग   सुता   जन    छाबै   

नीक  रुचिर  मन भाबन  जोरी                  रुचिर      भद्र बन ठआबै   

कर  गअ   जांइ  प्रभू मनमोहन              मुदित   अधर      बतराबै    

हरि  राधे  ढूंढत  सखि   चालीं           खोज  कऊं   ना          पाबै ।

व्यथित  सखीं   कोकिलबन  घेरौ          कुंज  कुंज            बतराबै  ।

राधे  माधब  लखि  सखि  हरसीं           ‘’गुपाल’’  प्रेम       डुबाबै   

हिंदी भावार्थ   :—–

श्री राधिके  श्रीकृष्ण  विशाल  बरगद  के  पेड़  के  नीचे  दोनों

 सुखी  होकर बैठ गये हैं  बरगद  बहुत  ही  घना है ।  राधे  मन  मैं  प्रसन्न

 हो  रही हैं । क्योंकि  श्री कृष्ण  अन्य  सखियों को  छोड़कर  अकेले  आये हैं

 अत  प्रभु का  उनसे  अलग स्नेह है।श्रीकृष्ण  श्री राधिके  का  फूलों का  श्रृंगार

 देख  रहे हैं  श्री राधिके के  नेत्र  प्रभु के प्रेम मैं  मुंद गये हैं। श्री राधिके की  लम्बी

काली  चोटी   नवजात  नागिन  सी  लहरा  रही है।  सुन्दर  अच्छी  मन को  मोहने

वाली जोड़ी  सुन्दर भद्र बन  मैं रुकी हुई है ।   श्री राधिके  के  हाथ  को  अपने  हाथ

 मैं  लेकर  श्री माधव कृष्ण कोकिलावन की  ओर चल दिये।    उनसे  प्रेम के वेग मैं  

बोला  नहीं जा रहा है  वे  होठों ही  होठों मैं बातें  कर  रहे हैं।  उधर अन्य  अनगिनत

सखियाँ श्री कृष्ण को ढूंढती घूम रहीं है  लेकिन  उन्हें  माधब   कहीं  नहीं  मिल  रहीं हैं ।

  मन   मैं   अत्यंत  दुखी सखियों ने  पुरे कोकिला बन को घेर लिया है। वे  एक  एक  कुञ्ज

मैं  श्री कृष्ण  राधिके को  ढूँढ रहीं हैं। दूर से ही  गोविन्द कृष्ण  राधिके को  देख

उनके  हर्ष का  पारावार  न रहा    गोपाल कहते  है कि  युगलस्वरूप का  दर्शन  

प्रेम मैं  डुबाने  वाला है। इनका  दर्शन  आनंद का सागर है।

 

 

 

 

        ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

चलउ  बेग   सखिआं    हरि     आंई    

बोलीं   राधे          सुन  बनबारी             पैंआं        चलत      थकाई ।

राजसुता  सकुमारी    कोमल                पांअ        धरी          अधमाई।

बारम्बार  कही          हरि   चालौ            राधे        तन        अलसाई ।

प्रभू    लाड़ली          हिरदअ    जानी         कांधे      लऊं            चढ़ाई ।

त्यार  चढ़न   कांधे   ह्वे        जौंलग         अंतर्ध्यान              कन्हाई  

‘’ गुपाल ‘’  बिरह         भगबती  आकुल     दिरगन         नीर     बआई    

 

हिंदी भावार्थ :—      

   श्री  राधे  बोली  श्री कृष्ण  अब  हमें  यहाँ  से  निकल  जाना चाहिए ।  क्योंकि

  सब  सखियाँ   गयीं  है ।  शीघ्र  चलिये।     श्री  राधे  बोली  देखो  मैं राजकुमारी

हूँ   ।     मैं  अभी  छोटी  बच्ची हूँ   मैं बहुत  ही कोमलांगी हूँ  आपकी  प्यारी भी

 हूँ   मेरे   पैरों ने  [ जड़ता ] जिद कर ली है  जैसे वे  अब नहीं  चलेंगे । श्रीकृष्ण

  ने  बार  बार  कहा  परन्तु   श्री   राधे  ने   आलस  कर   लिया । स्वामी  कृष्ण  ने

     श्री    राधे    के       मन की  जानी   वे  समझ  गए कि  राधिके  उनके  कंधे  पर  

बैठना  चाहतीं  हैं । बोले मेरे कंधे पर चढ़ जाओ ।    जैसे  ही  लाड़ली  चढ़ने को  तैयार

हुई   भगवान  श्री कृष्ण  अदृश्य  हो गये । गोपाल  कहते हैं  कि  श्री राधिके  जी  श्रीकृष्ण

को   पाकर  बहुत  ही  दुखी  हुईं  उनके  नेत्रों  से  विरह  के  अश्रु  बहने  लगे।

 

 

[  ५  ४  ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

सखीन  पऊंच    राधा  तंअ   देखी ।

कित      बजमारे  मोहन   आली               सोक       छांड      हरसेखी  ।

लुके   निरख   सखि   जूथ  गुपाला     मारत         ललिता      सेखी     

बोली  श्री जी   सांची      भैना         पतौ                  करमन लेखी  ।

सुख अपार  गआय दुःख     दीनों     प्रान   तजों       अबसेसी          

जुरि   मिल  विनअ  करौ  तुम  हरि  सौं     प्रगटें    नेअ   विसेसी   

‘’गुपाल ‘’ भाब   बसी   गोबिंदा              आतुर     हौं    मनदेखी ।

 

हिंदी भावार्थ :—

सभी  महिला  मित्रों  ने  पहुंच  कर  अपनी  प्यारी  सखी राधा को   कृष्ण

वियोग  मैं  तड़फते     देखा।   कृष्ण  कहाँ है । हे  हम  सबको  हर्ष प्रदान  

करने वाली तुम दुःख त्याग कर  प्रसन्न हो जाओ।  ललिता  सखी  बोली  

कृष्ण कहीं  हम  अनगिनत सखियों को देखकर  छुप  तो  नहीं  गए। राधा  बोली

 हे  मित्रो  मैं  सच  कह रही हूँ ।  श्री कृष्ण   ने      सुख देकर  मुझे  दुःख दिया है

  मैं  अपने प्राण  छोड़  देती  हूँ अब  श्री कृष्ण   के बिना  जीवन  मैं  कुछ बचा नहीं है।

तुम  सभी      इकठ्ठी  होकर  उन्हें  पुकारो   वे   अपने  प्रेमी भक्तों का  दुःख देख नहीं

पाएंगे  और अभी  यहीं  प्रगट हो  जाँएंगे। गोपाल कहते हैं  कि श्री कृष्ण प्रेम भाव के

 भूखे हैं  अवश्य प्रगट हो जाँएंगे  जितनी मिलने की उत्कंठा  आपकी  बढ़ेगी  

 

उतनी ही उत्कंठा प्रभु की भी बढ़ेगी।

 

 

 

५ ५  ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

टेरें   सखी   मोहन हरि     आबौ ।

ब्याकुल   कीरत  नंदिनि  भारी          स्वांस  स्वांस            पछ्ताबौ ।

बन  बन  ढूंढत  थाकी   हौं   सग         भूख      प्यास         बिसराबौ ।

तू  तौ  प्रान  हमारौ  केशब               गलती   आन    .         बताबौ 

निरगुन  हौं   सग  गुनी  गुपाला           प्रभु अनुसरहिं          आबौ   

नांइ   तौ   प्रान निकस  अपढारे             सांचे    मीत              बचाबौं  ।

‘’गुपाल’’ सखि   आरत   हरि  टेरे             मिंतर      सोक      मिटाबौं   

 

 

 

हिंदी भावार्थ :–

श्री ललिता   बोलीं  कि    हे  श्याम सुन्दर  हम सब  सखियाँ तुम्हें  बुला रहीं हैं

  अब  आप    जाओ।माँ कीर्ति की लाड़ली बेटी  श्री राधिके अत्यंत दुखी है  

उसे  अपनी हर साँस  पर  पछतावा हो रहा है  राधे  सोच  रहीं हैं  कि मैंने

 ऐसा क्या कर  दिया  जिससे श्री मनमोहन  कृष्ण  मुझे छोड़कर  चले गये।

सभी बनों  मैं तुमको  ढूंढते हुए  हम सभी  बहुत  थक गयीं हैं    हमें  अपनी  

भूख प्यास का भी ध्यान नहीं है  हम भूख प्यास को भूल चुके हैं।हे केशब

तुम तो  हमारा  प्राण हो  हमारी भूल  हमारी गलती  तो  हमें बताओ । हम  

सभी  गुण हीन हैं  हे हमारे  प्रभु  स्वामी आप  बहुत ही  गुणी हो  हम सब

आपका अनुसरण करेंगी  ।अगर  तुम  नहीं आये  तो  हमारे प्राण निकल  जाएँगे

 हे सच्चे मित्र  हमारा जीवन  बचालो ।गोपाल  कहते हैं  कि सखियाँ

 दुखी होकर  पुकार रहीं हैं  अपनी  सच्ची मित्रों का शोक मिटा दो।

 

[         ]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

प्रगटे   प्रभू  स्याम   सखीन मन    मोअत  ।

मोर मुकुट  हरि   चितबन   प्यारी       कुन्डल   स्रबनन        कोंधत।

बसन  बसंती   गल बनमाला               ब्रज      बसुधा       रस बोरत 

गंध  उबटनी    बगुरत   चौदिस           नन्द      सुबन   सखि   भोमत 

जुरमिल  ठाडी  कीनी  राधे              प्रेमाश्रु   दिरग          छोड़त ।

कर  जोरे  कअ  किरपा  कीनी             नहीं  प्रान        तन   छोड़त ।

‘’गुपाल ‘’ नेअ  अलौकिक   सांचौ              सखी  जूथ  हरि      सोअत ।

 

 

 

 

हिंदी भावार्थ :—  

मन को  मोहने  वाले   स्यामसुंदर  श्रीकृष्ण वहाँ आ गये । वे  बहुत

  ही  मनोहर  लग  रहे हैं ।    मोरमुकुट  पहने   श्रीकृष्ण के  कानों मैं

 कुंडल     चमक  रहे हैं  उनकी  चमक  नेत्रों को  बंद  करे दे रही है । उनके

 वस्त्र  वसंती हैं   तथा  वन मैं  वे वनमाला  धारण  किये हुए  बृज भूमि को

 रस से  भरे  दे रहे हैं । उनके  शरीर  से  सुगंध  निकल  रही  है   वह  चारों

दिशा मैं फ़ैल रही है  नन्द के  पुत्र श्रीकृष्ण  सभी  सखियों को  अच्छे लग

रहे हैं।सभी  सखियों  ने  मिलकर    श्री राधा को  खड़ा  किया । उनके  नेत्रों से

प्रेम के  आंसू  निकल  रहे  हैं । हाथ  जोड़कर  वे  बोलीं  कि आपकी   हम सबके

 ऊपर बहुत कृपा है ।  जो   आपने   दर्शन  दिए   हे  मेरे  हम  सबके  प्राणों के

 स्वामी  प्राण  शरीर  से   निकलने   ही  वाले  थे  श्री राधे जु   तथा  सखियों का

   का प्रेम संसारकि  नहीं है  वह  पारलौकिक  है  अलौकिक  है ।इसलिए  सखियों

के  झुण्ड  श्रीकृष्ण को  तथा श्रीकृष्ण  सखियों को शोभा दे रहे हैं।

 

 

[  ५  ७]

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

खेलहिं  कछुक  गेंद     हरी  संगा।

कुसुम  बखेरत  तक  तकि  मारत        चूम  सुमन    प्रभु        अंगा।

नूपर   खन  खन  ध्बनि मन मोएै       निकसत         म्रदुल       तरंगा।

गिरत   अबीर  गुलाल  उड़ामत                पटी  परी     नभ           गंगा 

दोनू   कर  सौं  कसकें  पकरें          .  लाल  करें     तन            नंगा ।

प्रभु  मुस्काबै      बैनु  बजाबें          बहत             नेअ  रस       रंगा।

गीत  संगीत    मधुर       मन भाने     सरस             हिएै          हरिरंगा।

भूतल  सुख  तजे  सब  तृनबत        मन चंगा      तन      चंगा  ।

रास   बिनोद  ‘’गुपाल’’ अनूठौ           परस   रईं     हरि      अंगा   ।

 

 

 

 

हिंदी भावार्थ :—-

कुछ  गोपियाँ  प्रभु  के  संग  गेंद  खेल  रहीं हैं ।   वे  फूल  बखेर  रहीं है  

तथा फूलों  को चूम   चूम कर   श्री कृष्ण के  शरीर  पर  निशाना  लगा  रहीं हैं

श्रीकृष्ण को निशाने  से  मार  रहीं हैं ।  नूपरों की  ध्वनि  खनखना  रही है  जिससे 

  भाव  तरंग  निकल  रही है । ये  तरंगे  बहुत  ही  मन  को  मीठी  लगती  हैं  ।

अबीर  गिर  रहा  है   गुलाल  उड़  रहा   है  जो  पूरे    आकाश   मैं  व्याप्त  है  पूरी  

आकाश गंगा   रंग  बिरंगी हो रही है ।   भगवान  के दोनों  हाथ  सखियों   ने  अपने

 हाथ  मैं  ले  रखे  हैं   वे  कह रहीं हैं  की हे  लाला  आज हम  तुम्हारे को नंगा  करते  हैं

 तुम्हारे  कपडे  उतारते  हैं।     प्रभु के शरीर के छूने से गोपियों के शारीर मैं रस की   गंगा

 बह  रही  है  माधव   श्री कृष्ण   हँस  रहे     हैं   प्रेम  के  अमर  रस

की  तरंग  उठ  रहीं हैं ।  गाना  बजाना  मन  को  अच्छे  लग   रहे  हैं ।

रस  रंग  से   मन   तथा   हिरदय   भीग   रहे  हैं । सखियों .  ने  धरती के  सारे

सुख  त्याग  दिए हैं ।  उनका  मन    तथा  तन  दोनों  स्वस्थ हैं ।  श्री  गुपाल   रास   विनोद

 .अनौखा    है  वे  गोपियाँ     इसके  माध्यम  से  ईश्वर की  आराधना कर   रहीं  है

       वे  धन्य  हैं   

 

 

[ ५  ८     ]

 

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

आपुन  आपुन   मन   सखी   करिईं  ।

नारि  नबेली   प्यारी  भगतिन          हरी    सौं      क्रीड़ा      करिईं  ।

मनहर  रूप  अनगिनत    मोहन              लै       प्रभू स्याम  बिचिरिईं   ।

नअने  कर  खेंचे  कुंजन   अलि              मधुरे   बोल             उचिरिईं    

चिंतन   दृष्टि  कान्ह  जिन  दीखै                  प्रभू  घनस्याम          सुमरईं ।

पूरन   पुन्य उदय    फल    जानी      त्रिभुबनपती                   लै  फिरईं।

महारास  ’ गोपाल’’ अलौकिक                सुमरईं    जग           भबतरिईं  ।

 

 

हिंदी भावार्थ :—-     

    सभी  सखी  अपने  अपने  मन की   कर  रहीं हैं।

वे  युवतियां  जो  यौवन युक्त  हैं  अलग अलग     श्री कृष्ण के  साथ  खेल  रहीं हैं ।

  प्रभू  श्रीकृष्ण ने  असंख्य  शरीर  धारण  कर  रखे  हैं वे  हरी  को  हाथ  पकर कर  

अलग अलग  कुंजों  मैं  ले  जा  रहीं हैं ।          सभी  ये  जानती हैं  प्रभु   केवल  मेरे  संग  हैं

 अपने     पुण्यों का सुमरन कर रहीं हैं  जन्मों के पुन्य   फल  गोपियों को  मिल गये  हैं

 तीनों   लोकों के    स्वामी  को  लेकर  फिर  रहीं  हैं ।   गुपाल  कहते  हैं कि  

मनुष्य  भगवान की  रास लीला की रात्रि को  याद करसंसार  सागर  से  मुक्त  हो

जाता है ।

 

 

[       ]

 

गुपाल  महारास  रस  माधुरी

कुंज   कुंज हरी सेबा  होई ।

 

हरि  सृंगार  बनात     सिआबें             मुदित   मगन   मन  खोई ।

           जमुना  जल  निरमल  सखि  लानी          निरखत  हरि   पग    धोई  ।       

चंदन  अक्षत   भाल   कृष्ण        हरी       तिलक   लगाबत       भोई ।

सकल   बासना   नास सरीरा               सखा   भाब   हिअ       जोई।

जीब  मिलन  प्रभु  हरि  अबिनासी                 मारग  मिले         बटोई  ।

‘’ गुपाल’’ कृष्ण  नेअ      सुख  सांचौ          करौ        जीब    सुख होई।

 

 

हिंदी भावार्थ :—

हर  कुञ्ज  मैं  श्री हरी  की  सेवा  हो  रही है ।  अपने  हाथों  से  हरी  का सृंगार

  खुश  होकर  कर   रहीं हैं   वे    इतनी  मगन   हैं  जिससे  ऐसा  लगता है  

कि उनका  मन  श्रीकृष्ण मैं   खो  गया  है।  सखियां जमुना जी का  निर्मल  जल

 लेकर  आईं हैं  प्रभु श्रीकृष्ण को  उनके  अलौकिक  चरणों  को  देख रहीं

हैं  उन्हें  जल से  धो. रहीं  हैं ।स्याम सुंदर के   सुन्दर  मस्तक पर  वे  चंदन    लगा

 रही हैं  सखी  उन्हें   अपने  मन का  तिलक  लगा  रहीं हैं   उनकी  वासना  पूर्ण  रूप से

  नष्ट  हो  गयीं हैं  उनने   श्री कृष्ण  को  मित्र  मान  लिया  है   अनन्य प्रेमी  जीव  

गोपियों का  अपने  प्रभु से  मिलन  एैसा है  जैसे राहगीर को  अपना मार्ग  मिल

गया हो। गोपाल  कहते हैं  कि कृष्ण प्रेम का   सुख ही  सच्चा है  हे प्राणधारियौ  

उनसे ही   प्यार  करिये       आपको  अवश्य ही  सुख  प्राप्त होगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *