गुपाल व्यग्रता रस माधुरी

   ]
[         गुपाल व्यग्रता रस माधुरी     ]
चन्द्रानना ,   बुझा ,  मोहै    ,  रीती  ।
जेहि ,बिधी  ,स्याम ,सुहाने ,आबें         ,  बेग , बताबौ,      नीती  ।
कुन ,कुन ,पुन्य, देब ,कुन ,पूजूं              , आलि , होइ, मन,  चीती ।
बृंदा  ,सेबा  , ब्रत ,   बृंदाबन                    ,हरि  सों ,  गाढ़ी,   प्रीती ।
मन बांछना  ,  सुकृत ,बढ़ाबन                ,   स्याम, लुभाबन ,रीती  ।
‘’गुपाल’’ रिझाबन .आन, रीत ,न               ,        गह , संकल्प , सुरीती ।
हिंदी भावार्थ :———-
श्री लाडली जी , श्री राधिके   ,बोलीं, हे, प्रिय सखी ,चंद्रानना , ऐसी ,विधि ,
मुझे ,बताओ । जिससे मनमोहन, श्री श्याम सुंदर से मेरा मिलन हो जाये ।
कौन से पुण्य करने से, कौन से देवता को पूजने से ,मेरी इच्छा पूरी होगी ।
  चंद्रानना सखी , श्री राधिके से ,बोली , की तुम बृंदाबन मैं ,तुलसी पूजन
का ब्रत ,लीजिये । भगवान ,श्री कृष्णा को प्रसन्न करने का अचूक, उपाय
है । यह ,श्री कृष्ण से, प्रेम को ,बहुत ,ही गाढ़ा ,कर ,देता है, मन की, इच्छा
,पूरी करने, वाला पुण्य देने वाला तथा श्री कृष्णा को ,लुभाने का यही तरीका
है। गोपाल कहते हैं , कि  श्री मोहन को प्रसन्न करने का कोई ,और उपाय
,इतना ,कारगर ,नहीं है। इसलिए ,हे ,सखी,  तुम , श्री तुलसी, पूजा के ,इस
संकल्प को ,ग्रहण ,कर लो ।
[   २ ]
 
[         गुपाल व्यग्रताशमन    रस माधुरी     ]
आश्वनी, मास ,सखी , ब्रत , लीजै  ।
लली, राधिके, बृंदा     , पूजौ            ,   केतक ,बन , चुन लीजै   ।
मंदिर ,रुचिर ,बनाऊं ,निज ,कर,      ,  राधे ,   अर्चन       ,   कीजै  ।
कार्तिक मास दुग्ध , स्नाना            ,  अख्यत ,   चन्दन , दीजै   ।
मार्गसीस  ,ईख रस, चुनियों           ,पौस ,  द्राख्य ,  रस,    भीजै ।
फाग ,मास ,मिसरी ,रस ,घोरो       , अंजुलि ,  अरघ ,       सुदीजै ।
जगत ,स्वामिनी, भानु ,कुमारी          ,  ‘’ गुपाल ‘’   मिलें    , तपीजै ।
हिंदी भावार्थ :———-
हे ,सखी ,अश्विन मास की पूर्णमासी को तुम  श्री तुलसी पूजा का व्रत रखौ ।
हे ,राधे , मैं केतक वन ,मैं , अपने ,हाथों से ,सुंदर ,मंदिर ,बना दूँगी । हे
स्वामिनी सखी तुम पूजा सेवा करिये।   कार्तिक महीने मैं, श्री तुलसी को ,दूध
 से स्नान करवायिये ।माघ महीने मैं,    अक्षत   तथा चंदन चरणों मैं, अर्पित
,करिये।  पौष महीने मैं ,द्राक्ष रस से पूजा ,करिये।       फागुन ,महीने मैं ,
मिसरी ,घोर कर , दोनों हाथों की अंजलि मैं  रस भरकर  तुलसी जी ,को ,
स्नान करवाहिए ,    चैत्र महीने मैं ,पंचाम्रत से ,तुलसी की ,पूजा करिये ।
,दीपक, जलाकर,श्री तुलसी से , विनती ,कीजिये ।  चन्द्रानना बोली  , श्री कृष्ण,
गोपाल ,आपको, अवश्य ,मिलेंगे , तुम श्री तुलसी की तपस्या कीजिये ।
[   ३     ]
प्रिया प्रिय मिलन रस माधुरी
श्री हरी  रुप बताबऊ  प्यारी।
ललित सखी हरी  चित्र बनाबौ      गाहक गुनिन हौं गुनवारी ।
सुनी बैन मूंदे अलि नैना              स्मृति करहीं मन मनहारी।
रुप अनूप लख्यौ जस कौ तस  हास्य भाव स्याम छवि प्यारी।
लम्बे कर आनन तेजस्वी             नीलबरन ग्रीवा लपकारी।
पुष्पमाल कौस्तभ मनी  सोहत  कौंधत जस साढ़  चपला री।
निरख रुप राधे हो  विहवल सूरत   जिनहि   मुनि मन प्यारी ।
प्रेम गंग असरार बहै रोकत      रुकै न ललित सखि प्यारी।
गुपाल अंक भर भैंटहिं दोनौं मूरत बसहिं   हिये       मुरारी।
हिंदी भावार्थ :———-
राधिका सखि बोलीं हे प्यारी हरि रुप बताबौ। तुम तौ चित्रकार भी हौ।
बोल सुनकर भावविभोर हो ललिता ने अपनी कुँच निकाली ।हास्य भाव
से युक्त सुन्दर रुप का चित्र बना दिया।जो नीले बरन वाले मुख पर तेज
वाले तथा वंषी हाथ मैं लिए हुए है।फूलमाला धारन कियै हुए है। तथा जो
कौस्तभ मनि को धारण किये हुए है।जिसकी चमक ऑंखो को चुधियाती है।
उनके चित्र को देखकर श्री जी विहवल हो गयीं।गोपाल कहते हैं दोनौं सखि
गले मिल रहीं है। दोनो मन मैं भगवान की मूरत बसी हुई है।
[   ४   ]
गुपाल उत्सुकता  रस  माधुरी
भानुलाड़ली    हिअ  सकुचाबै ।
खोलत मूंदत सुन्दर नैनन      बिना    स्याम  अकुलाबै ।
बरसानों आनों माधब  सुनि     प्रमुदित   मन   हुलसाबै।
पौढत दौरत बैठत छन छन      नटबर कब   तक आबै ।
लोक लाज भय तजौ न जाबै      ललिता  सखि   मुस्काबै।
चूरी पहरूं कहौ मात सों         मन मेरौं    ललचाबै।
कही मातु टेरौ मनिहारिन         अदुभुत  चूरी   लाबै।
त्रिभुबन सुन्दर मोर राधिका        इह अनुरूप     सजाबै ।
‘’गुपाल’’ रुचिर राधिका भोरी     राधे   राधे    गाबै ।
हिंदी भावार्थ ——–
श्री वृषभानु की पुत्री श्री राधे अपने हदय में सकुचा रही है। अपने सुंदर नयनों
को खोलती है व बंद कर रही है।तथा बिना श्याम सुंदर के व्याकुल हो रही है।
मोहन का बरसानों आगमन सुन खुशी होकर बैठी है। कभी लेटती है। कभी
दौडती है।कभी बैठती है। प्रत्येक क्षण नटवर गोपाल को बुलाने की सोच रही है।
लेकिन लोक लाज भी नहीं छोडी जा रही है। ललिता सखी यह देख कर मुस्करा
रही है। में चूरी पहनूंगी मेंरी मां से कह दो। माता बोली सखियौ जाओ मनिहारन
को बुला लो। आपको पता है कि तीन लोकों  में भी मेरी राधिका जैसी सुंदर नही है।
उसी के अनुसार चूरी पहना कर प्रसन्न करो । गुपाल को श्री राधिका बहुत ही
सुखकर  लगती  हैं  वह  राधे  राधे  गाता  है। और  श्री  राधे की कृपा चाहता है।
[  ५    ]
गुपाल  समझायस रस माधुरी
काहे, तू ,  ब्यथित ,   सुहानी  , आली।
जानहूं  ,    गाढ़    , प्रेम , श्री हरि, सौं              नेह ,   चेतना ,   चाली  ।
गौर बरन ,राधे ,अलि प्यारी                     बिरअ ,स्याम , हो ,   काली।
अश्रुधार ,कालिख ,काजर , ते                      कारौ       ,आनन ,   लाली।
खोलहु , द्रग ,हरि ,आन, मिळैंगे                ,  छांडौ ,   हठ ,      हठबाली।
जाबौं , टेर ,लगाबौं  , जुरि मिलि             , कृष्ण    , भगत ,   प्रतिपाली।
आबउ ,जान ,नेअ , सखि , सांचौ             ,     करत ,   धैनु   , रखबाली।
गुपाल ,सखी  ,  चूर ,भई ,दोउ              ,     प्रेम   ,भाब        , मतबाली।
हिंदी भावार्थ :———-
हे, सुन्दर ,सुहानी , सखी राधिके, तू ,क्यौं ,दुखी ,हो ,रही है। तुम ,तो ,उनसे ,
पक्का ,प्रेम, कर लो ।मैं जानती हूँ   कि ,तुम्हारा ,श्री परमात्मा श्रीकृष्ण से
चतुर सखी ,बोली, आप ,हठ छोडकर ,नेत्रौं को ,खोलिये। हम ,सब  ,सखियाँ ,
उनको, बुलाने ,चले, जाँएगे ,मैं उन्हें बुला लाऊगी ।वे भक्तों के ,पालने ,वाले हैं ,
तुम्हारे प्रेम को सच्चा जानकर वह गायौं व ,गोपों  की ,रखवाली ,करते हुए, वे ,
अवश्य, आयेगै। गोपाल ,कहते ,हैं ,दोनौं, सखी ,कृष्ण, भाव, मैं ,चूर ,हो ,रहीं हैं ।
[    ६    ]
गुपाल  परम निशचय   रस  माधुरी
त्यागौं ,   तन , सखी  हरि  , नहिं  , , आऐ    ।
उत्कट ,प्रेम ,हिऐ ,उमगानों               ,    मूरत ,   मन    ,   महकाऐ     ।
तपत ,देइ ,अपढारी ,मेरी                  , .ताप ,   ज्वार    ,    बढ़ जाऐ    ।
स्वांस, गती  , अलि , मोर ,बढ़ानी   ,   तन, मन ,   चैन ,      उड़ाऐ    ।
बिरअ , समुंदर ,गोता खाबौं              , को , अस  ,  प्रभू ,     मिलाऐ     ।
देह, उष्णता ,दग्ध ,करै ,मन            ,कृष्ण   , मेघ  ,मन  ,       भाऐ     ।
‘’गुपाल’’  दरस, प्रभु  हरी कृष्णा    , ,  सीतलता    ,  सखि        ,लाऐ    ।
हिंदी भावार्थ :———-
राधिका ,बोली, हे सखी   ,अगर ,हरी, नहीं ,आये ,तो ,मैं ,शरीर को, छोड़ ,दूँगी ।
 उनसे मुझे उच्चकोटि का ,उत्कट , प्रेम ,पैदा ,हो गया ,मैंने, भगवान की ,मूर्ती
,अपने ,हिरदय मैं, बसा रखी है , जो मेरे मन को महकाती  रहती है ।मेरा शरीर
  ,अपने ,आप ,तप रहा  है, ताप की तीव्रता ,बढ़ती ,ही ,जा ,रही ,है।  मेरे स्वांस
गती भी बढ़ गयी है । मेरी साँसें ,तेजी से ,चलने ,लगीं हैं,  जो ,मेरा ,तन मन का
,चैन ,उड़ा रही हैं ।  विरह के ,सरोवर ,मैं ,गोता ,खा रही हूँ ।  हे सखी   ,एसा ,
कौन  है । जो , मेरा संयोग ,से कृष्ण,कराए । देह की गर्मी ,इतनी ,बढ़ गयी है ।
 कि अब , उसे ,कृष्ण रूपी, मेघ ही, बुझा , सकते हैं । गोपाल कहते हैं
श्री राधिका ,बोली हे सखी   , प्रभु के दर्शन ,होने से , तन ,मन सभी शांत हो जाता है
, मुझे   भी शीतल कर देगा।
[    ७  ]
गुपाल  परम निशचय   रस  माधुरी
धरऊ  ,धीर ,सखी ,स्याम, मिलिगे ।
भाबुकता ,      छांडौ ,       अलि राधे ,         काया ,पीर ,हरिंगे    ।
भगत,        प्रेम रस,   भूखे , मोहन ,      नंगे ,     पाम, भजिंगे ।
रूप ,घनों, हे रूप ,        स्वामिनी     ,  रूप अगनि , धधिकिंगे   ।
नैन, खोल ,ललिता ,मुख निरखत      , राधे    ,   तोइ , टेरिंगे     ।
जोग ,संजोग , भेंट , सुखदैनि          , दोऊ ,भेद , भरिंगे         ।
‘’गुपाल’’ ध्यान रखो निज तन मन   , स्याम ,    आन ,  निरखेंगे ।
हिंदी भावार्थ :———-
हे राधे, हे सखी ,हे मित्र तुम ,धीरज ,रखो ,कृष्ण ,तुम्हे, मिलेंगे । हे राधे तुम
भावुकता छोड़ दो , तुम्हारे सभी शरीर के दुःख मिट जाएँगे । अरी  ,मोहन ,तो
, भगती के भूखे हैं,  तुम्हारी ,भगति, देखकर, वे ,नंगे पैर, आएंगे  ।  हे रूप की
स्वामिनी श्री राधिके वे तेरे सौंदर्य की अग्नि के कारण तुझसे मिलने को तरसेंगे
।  जोग संजोग आप दोनों का मिलन होगा ,जिससे आपके अंतर के सारे भेद
मिट जाँएंगे और दोनों एक हो जाओगे। तुम ,अपने ,नेत्र ,खोलो, मैं ,ललिता ,
तुम्हारा ,मुख ,देख ,रही हूँ । वे अवश्य ही, राधे ,राधे, कहेंगे ।  गोपाल ,कहते हैं
,अरे, राधिके ,तुम ,अपने मन ,तथा तन को ,स्वस्थ ,रखिये ,क्योंकि ,
श्री गोपाल कृष्ण ,आपसे ,मिलने ,आ रहे हैं ।
[  ८    ]
गुपाल  परम निशचय   रस  माधुरी
गौ चारन, भेंटन , हरी ,आबहिं ।
चित्र लखी, ह्वे , निरख ,चित्र हरि     ,     धैनुन,   पाछें , धाबहिं  ।
मोरमुकुट , मोहन  छबि बांकी       ,    ग्बालन ,खेल, रिझाबहिं  ।
कन्दुकक्रीड़ा    , लुकछिप  , लीला      ,    जंगल   ,  बीच ,    जमाबहिं ।
भबन ,सुहानों, बृसभानु जू           ,     ऊंच   ,खिरकिआ,   भाबहिं   ।
स्याम ,कलेबर, सोहनी , बंसी           ,  ग्बालन   , बिलग  ,जनाबहिं ।
”गुपाल ”कृष्ण , कहा ,छबि ,बरनै    , जे   ,ब्रज गोप    , सुहाबहिं ।
हिंदी भावार्थ :———-
गऊ ,चराते हुए ,श्री कृष्ण ,हमारा कल्याण ,करने ,आयेंगे ,ललिता बोली।
और वे ,दोनों ,प्रभु का ,गायों के ,पीछे ,दौड़ते ,चित्र , देखने , लगी । देखकर
वे, सब चित्र ,जैसे ,हो गयीं । मोर मुकुट धारी ,श्रीकृष्ण ,गोप बालकों को
, खेलकर,प्रसन्न कर रहे हैं । वे गेंद , तथा ,लुका छिपी का ,खेल ,जंगल
मैं ,खेल रहे हैं । भानु बाबा के, सुंदर  भवन मैं, लगी, ऊँची खिड़की ,बहुत
सुन्दर ,लगती हैं  काले रंग तथा   ,सुंदर ,वंशी लिए कृष्ण,और बालकों से,
अलग लगते हैं गोपाल उनकी छबी का का क्या बर्णन कर सकता है  ।
जो ब्रज गोपों को,  बहुत सुहाती, बहुत,  भाती है ।
[     ९   ]
गुपाल  रूप परिवर्तन रस माधुरी
नर ,सों, नारी, बन ,गये ,    लाला  ।
प्रीत  कसौटी, कसें       ,राधिके             ,      गोपी   रूप ,         क्रपाला  ।
नुपुर,कनक ,झनक ,       झंकारहिं          ,    मोह्क, चंचल,          बाला ।
रौना क्षुद्र ,घंटिका     ,  सुन्दर                , रतन ,जड़ी  ,          ,मनिमाला ।
मुदरी ,कंचन , अंगूरीन, सोहें               ,मोह ,     रहीं   ,           सुरबाला ।
स्वर्न हार ,भुज बंद , अनूठे                 , लाज ,रहीं  ,          ब्रज  बाला ।
  सुघड़ ,नारि , ज्यों , रचे, महाबर      ,      निरखत ,सब     ,    ब्रज बाला ।
बरन, न ,जाय ,’’गुपाल’’  छबी, हरि ,         पुष्प हार    ,        बनमाला  ।
हिंदी भावार्थ :———-
भगवान ,श्रीकृष्ण ने, गोपी का ,सुंदर ,रूप ,धारण ,कर , लिया । श्री राधिके जी
की प्रेम   परीक्षा करने के लिए प्रभु ने यह रूप धारण कर लिया ।  पैरों मैं सोने
के   नुपुर, ध्वनी, उत्पन्न ,कर  रहे हैं । सुंदर लग रहे हैं , तथा ,वे ,बहुत ही ,चंचल
,बालिका की ,तरह, लग ,रहे, हैं। उनकी ,माला मैं ,छोटी ,छोटी, घंटी, लगी हैं ,तथा
,उसमें, लगे ,रौना ,भी बहुत ,सुन्दर, लग रहे हैं, तथा, उनमें मणियाँ ,तथा रत्न जड़े
हैं। सोने से ,बनी, अंगूठियाँ अंगूठी ,उनकी अँगुलियों मैं हैं जिन्हे देखकर, देवताओं
की   स्त्रियां ,मोहित ,होती, हैं ।  जिन्हें देखकर देवताओं की नारियां  जलन  कर
 रहीं हैं । उनका , सोने  का  हार  , बाजूबंद ,बहुत     ही ,सुन्दर है ,बृज की स्त्रियां
,उन्हें देख ,लजा रहीं हैं । उनका ,नारी ,रूप ,बहुत  ही, सुंदर है । आँखों मैं ,काजल
,लगाये ,श्री हरी राधिका की ,अन्य ,सखियों, जैसे ,लग रहे हैं ।  बहुत ही होशयार
औरतो की तरह ,उन्होंने ,अपने नाखूनों को ,रचा रखा है । उनकी छ्बी वर्णनातीत
है । गले मैं गुंथे हुए पुष्पों की माला है , जो वन के फूलों से बनी है।
[    ९   ]
गुपाल  रूप परिवर्तन रस माधुरी
नारि , रूप ,  हरी , मन ,मुस्काबत ।
गोपदेबी    , बन ,गए ,मुरारी           ,  ब्रसभानूपुर        ,जाबत ।
रंगमहल ,श्री राधे,  रानी               ,   निरखत     , चौदिस, पाबत।
चंद्रानन , मनहर ,चितबन, प्रभु          , लाडली ,ओर ,  लखाबत    ।
नयन ,विसाला  , रूप रसाला         ,रांका पति     , सरमाबत    ।
गोपदेबी , मन ,मै, हुलसाबै                ,  राधे  , अंक , लगाबत ।
‘’गुपाल ‘’स्वामि ‘,स्वामिनी,  लीला   , निरखत जे   , सुख पाबत ।
हिंदी भावार्थ :———-
भगवान ने ,गोपी का ,रूप रख लिया ।
उसे  ,देख ,देख कर, वे ,मन मैं ,मुस्काते हैं । गोप देवी  ,बनकर , श्रीकृष्ण बरसाने ,
को , श्री, राधिके से मिलने, जाते हैं ।वे ,श्री राधे के, रंग महल ,मैं , पहुँचकर    ,चारों
,ओर ,राधिके ,को खोज ,रहे हैं । भगवान का ,चन्द्रमा ,जैसा ,मुखमंडल है ,वे बहुत ही
मनोहर  हैं ,सुन्दर हैंतथा लाड़ली की ओर देख रहे हैं ।     जिनके नेत्र बड़े बड़े हैं ,
अतीव ,सुंदर हैं । उनकी धवलता  , गोरे रंग को , देख ,चन्द्रमा ,भी , सरमाता है ।
गोपदेवी बने श्रीकृष्ण माधव मन मैं प्रसन्न हैं ,  कि राधिके मुझसे ,आज ,
अंक भरके भेंटेंगी।   गोपाल के स्वामी स्वामिनी की, यह लीला को ,जिसने ,देखा ,
ही ,सुखी ,हो गया।
[  १ ०   ]
प्रिया प्रिय मिलन रस माधुरी
गोपी रूप मुरारी धारयौ ।
कीर्तिं नंदिनि  भेंट अमोलक  श्री, कृष्णा  मन  उमगायौ।
रैन भैन भई      सुपने जैसी    दौन जनी  मिल सुख पायौ   ।
दिनमाली अलसाने मनहि   जुगल भेंट हों काह छुटा यौ ।
जन्मन बीत मिले हों दोनों हू   गुपाल निरख हरखायौ ।
भेंटत सुख आली  केहि  बरनों  भूख प्यास जिन विसरायौ।
वासो कछु दिन संग हमारे  कथा  कृष्ण कथि सखि  गायौ।
गोपदेवी मन हरख रहीं   श्री राधे  जू गही  अंक लगायौ ।
गुप्त प्रवास नन्द नन्दन कौ गोपाल दास अती भायौ  ।
हिंदी भावार्थ :———-
श्री कृष्ण स्त्री भेष मैं मिलने पहुंचे । अमूल्य मिलन की इस बेला मैं उनका मन प्रसन्न हो रहा है। हे बहिन यह रात्रि बेला स्वप्नं जैसे हो गयी है। सूर्य भगवान भी आलस मैं हैं। ताकि मिलन लम्बा हो ।पर विवश हैं। एसा लग रहा है कि जन्मों के बाद मिले हैं । गुपाल भी खुश हो रहा था। मिलन का सुख इतना प्रबल है ।भूख प्यास भी नहीं है। राधिका बोली हे सखी हमारे संग कुछ दिन रहो और मुझे श्री कृष्ण की कथा सुनाओ । गोप देवी बने श्री कृष्ण मन मैं प्रसन्न हैं । उनने श्री राधे को अंक लगा लिया। बरसाने मैं हरी का प्रवास प्रभु दास गोपाल को अच्छा
लगा ।
[  १ १ ]
गुपाल वृषभानुपुर सौन्दर्य रस माधुरी
उपबन, नंदन ,बनऊ   ,लजाबें  ।
भांति ,भांति , प्रसून ,सुहाने            ,     बरसाने  ,          महकाबें  ।
कमल ,कनेर, कदम्ब , केतकी             ,    रजनीगंधा      ,    भाबें ।
गुलाब ,  गुड़हल ,गेंदी ,   गेंदा           ,   हार ,  सिंगार     ,  लुभाबें।
चंपा ,  चमेलि  ,     चंद्रमल्लिका         ,   पारिजात     ,        भरमाबें।
भानु सरोबर ,खिले ,पुष्प दल              ,बतखन    ,झुंड     ,   सुहाबें ।
अबिरल , अनुपम , पबन, सुगंधित       ,    भ्रमर   , गूंज   , गुजियाबें  ।
‘’गुपाल ‘’ ब्रज  ,बन बेल, अलौकिक     , श्री ,   गोबिंद          ,लुभाबें
हिंदी भावार्थ :———-
बरसाना  के  ,बाग ,स्वर्ग के ,नन्दन ,वन को ,लजा रहे हैं ।  भांति ,भांति, के फूल ,अपनी सुगंध से , बरसाने को नगर को, सुगंध ,प्रदान ,कर रहे  हैं ।  कमल, कन्नेर , कमलिनी कदम्ब,,रजनी गन्धा ,कदम्ब , मन को ,अच्छे ,लग रहे हैं ।  हार सिंगार के फूल ,गुलाबों के फूल   गेंदा के फूल , गेंदी के फूल , मन को, लुभा ,रहे हैं ।  चंपा चमेली ,चंद्रमल्लिका तथा पारिजात के, पुष्प मन को ,भरमा, रहे हैं ।  भानु सरोवर मैं ,खिले पुष्प दल ,,बतखों के झुण्ड, नेत्रों को ,अच्छे, लग
रहे हैं ।  लगातार ,अनुपम ,वायु ,बह रही है , तथा ,भ्रमरों की ,गूँज, सुहाती है
मकरंद की मादकता मैं भँवरे गुंजायमान हैं ।  गोपाल कहते हैं की ब्रज के सभी बन ,फूल अलौकिक हैं ,वे सभी ,श्रीकृष्ण के, स्वागत हेतु, धरती पर, आये  हैं ।
[   १ २   ]
प्रिया प्रिय मिलन रस माधुरी
बूझत राधे सखी केहि गाम ।
दिव्य अलोकिक रूप तिहारौ          बाढ़े कौतुक कह निज नाम।
कौन जनक जननी को तोही           जाई तू जिन सुंदर श्याम ।
धन्य होंय सब भूतल मंदिर              जहाँ परेंगे मोहक  पाम ।
निश  दिन निरखत होंय  प्रफुल्ल्ति  नर नारी औ जीव तमाम।
चाल ढाल वानी अति  अनुपम खोलहु मुख कछु बोलौ वाम ।
प्रीतम मोर रंग तोही  सौ        नाम गुपाल रूप अभिराम।
हिंदी भावार्थ :———-
श्री राधे भगवान श्री कृष्ण जो गोपी बनकर उनके पास हैं ।
पूछ रहीं हैं ।  कि उनका क्या गाँव है ।  हे सखी तुम्हारा रूप दिव्य अलौकिक
है ।   मेरे मन मैं जिज्ञासा बढ़ रही है,  अपना नाम तौ बताओ । तुम्हारे माँ तात
का क्या नाम है।  जिसने स्याम रंग की तुम्हे जन्म दिया । इस संसार मैं जहाँ
आपके चरण परेंगे वहाँ धरती धन्य हो जाएगी ।  और सभी नर नारी आपके
दरशन की चाहना करेंगे।  आपका चलना ,बोलना सभी अदुभुत है आप अपना
मुंह तो खोलो ।
मेरे प्रियतम तेरे रंग के है । उनका नाम श्री कृष्ण है।
[  १ ३   ]
राधे सखी संवाद रस माधुरी
अंग ,अंग ,सखी ,ताप, बढ़ानों ।
जरै  ,  गात ,  कछु  , रोग,  सुहानी       ,    तो ,सों ,कहा, छुपानों ।
प्रेम   , ज्वार , गोपसखि,  बोली ,         ,  मनवा , मोहन   , भानों ।
स्याम , सखा  ,  सखि ,  प्रीत ,  अनौखी ,   छांड़ों  ,    पीनों ,  खानों ।
नहिं ,कोउ ,वैद्य ,  सिबा        ,कान्हा ,     , अली   ,राधिका  , जानों  ।
गुनी  ,घनी  , राधे , उर ,   ,जानों            ,      मोर, ब्यथा ,पहचानों ।
‘’ गुपाल’’ राधिके   ,खोलै ,    अंतर     ,       ,     गोपिदेवी   ,  मुस्कानों ।
हिंदी भावार्थ :———-
श्री राधे, गोपिदेवी से ,बोलीं, हे सखी, मेरा ,हर ,अंग ,जल रहा है ,मेरा ,ताप बढ़ गया है। एसा , लगता ,है ,जैसे ,मेरा ,शरीर, जल रहा है।  मुझे ,कुछ ,रोग तो ,नहीं ,हो गया है, हे सखी मैं ,तुमसे ,क्या ,छुपाऊँ।  गोप देवी ,बोली, तुम्हे ,कृष्णा से, प्यार हो गया है , तुम्हें उनका ही प्रेम ज्वार है ,तुम्हे वह मनमोहन भाने लगा है।  इस श्याम सुन्दर कृष्ण की प्रीत ही ऐसी है ,कि जिसमें ,फंसकर प्राणी ,अपनी ,भूख प्यास भी खो बैठता है।  इस बीमारी की कोई दवा नहीं है , इसका कोई बैद्य भी नहीं है , श्रीकृष्ण ही, इसका ,निराकरण ,कर सकते हैं ,श्री राधे ,बोली ,मेरी व्यथा को पहचाना ,हे सखी ,तू ,बहुत गुण वान है जो तैने मेरे मन की बात जान ली।
श्री राधे ने ,मन को, खोल दिया ,,गोपी , बने श्री कृष्ण मुस्का रहे हैं  ।
        ]
राधे सखी संवाद रस माधुरी
मोहन  ,कारन  , अली  , दुख ,आनों ।
मिन्तर ,     पीरा ,   मोइ  , न ,     भाबै  , प्यारी ,   परै ,  थुकानों ।
गली       सांकरी,           बरसाने, गिरी , हौं , दधि ,बेचन ,जानों ।
कारौ ,  रंग ,   बेंत ,        वंशी ,कर      ,   प्रगट, होत, मदमानों ।
जबरन, सखि ,मग ,दधिरस, मांगत     ,ठानत  ,ठान ,  दिबानों  ।
गोरस ,लम्पट ,मटकन ,     फोरे          , दधिरस   ,सब लुढ़कानों ।
घनों ,ढीढ ,ए ,नन्द जू ढोटा           , क्यों,राधे, सखि   , भानों ।
‘’गुपाल’’     ब्यंग, बान , हरि ,     बींधै  ,  राधे ,  मन   ,तडफानों ।
हिंदी भावार्थ :———-
गोपी ,रूप धारी, भगवान , श्री कृष्ण , बोले  ,हे सखी, आपके ,दुःख का , कारण, ये, नंदनंदन मोहन ,है ।  हे मेरी प्रिय मित्र तुम्हारी पीड़ा मुझे अच्छी नहीं लगती है । मित्र पीड़ा मैं ,सुख अनुभव करने वाले ,लोगों को ,जगत ,मैं ,तिरस्कार ,सहना ,पड़ता है  हे सखी , मैं तुम्हें ,अपनी बात ,बताती हूँ ,कि ,जब मैं ,बरसाने की ,पहाड़ी की ,संकरी [ तंग ] गली से माखन बेचने जाती हूँ ,तो मेरे मार्ग  को, रोक , वहाँ ,काला, कृष्ण बेंत तथा वंशी हाथ मैं लिए , प्रकट ,हो जाता  है ।   ,और माखन ,मांगता है  ।  दधि खाने की ,लेने की ,जबरदस्ती ,करेगा ।  मदमस्त नन्द का बेटा ,अच्छा  ,नहीं है ।  तूने ,उससे ,क्यों ,प्रेम ,बढाया है ।  और वह, माखन, प्रेमी ,मेरी ,मटकी फोड़कर ,सारी ,दही ,फैलवा ,देता है ।  यह नन्द का , बालक  बहुत , ख़राब हैं  ,अच्छा ,नहीं ,है , उसमें कुछ भी अच्छा नहीं है तूने ,उससे ,क्यों ,प्रेम ,बढाया है ।,गोपाल कहते हैं श्री कृष्ण
राधे की ,तरफ ,व्यंग ,वान ,छोड़ ,रहे हैं ।  जिससे ,राधे का ,मन, तडफारहा है ।  उन्हें ,गोप देवी,  बने ,भगवान कृष्ण की ,बात , असह, प्रतीत ,होती हैं ।
[१     ]
राधे सखी संवाद रस माधुरी
गोप ,देबि , तू, ढीट ,लुगाई ।
सृष्टि , सुकरता ,  जग  दुःख हरता         ,  नाहक  , कीन   ,बुराई ।
मारे ,   असुर ,        घने ,ब्रज मंडल  ,     घटी,  कंस  , अधमाई ।
खोजत , रहें ,सदां , ऋषि   कृष्णा     ,      मुनि  ,संतन ,समुदाई ।
प्रेमाबतार ,भगत, हितकारि             ,   अदुभुत , प्रभु  , प्रभुताई ।
गोप ,गाय, सौ, बढ़  ,जाती ना       ,  ,  मूढ मती , ना  ,   भाई ।
सुमरि ,’’गुपाल’’ जगै, ब्रज मंडल     ,  सुमरि ,सुमरि,सअनाई  ।
हिंदी भावार्थ :———-
भगवान कृष्ण की, बुराई ,सुनकर ,श्री राधे तिलमिला गयी ।   कहने ,लगी ,हे गोप ,देबि ,  कि तुम तो ,ढीट ,लुगाई हो ,तुम अच्छी औरत नहीं हो ।  अरे सृष्टि के अच्छा ,करने वाले ,संसार के ,दुःख हरने वाले, भगवान, श्रीकृष्ण की तू अपने मुख से बुराई करती है।   अरे ,मोहन ,ने ही ,ब्रज मैं ,अनेक ,असुरों कों  ,मारकर ,कंस की ,अधमता कम कर दी । ब्रज से डर  निकाल दिया।इन कृष्ण को,  हमेशा, संतों के , ऋषि मुनियो के ,समुदाय ढूढ़ते रहते हैं प्रेम के अवतार ,भगतों के, हित चाहने वाले , श्री कृष्ण की, प्रभुता, अनुपम है । अरे ,ग्वाल बाल तथा गऊ माता से, बढकर कोई भी ,जाति नहीं है , ये तुम्हें क्यों अच्छी नही लगी ।  अरे ,सारा ,ब्रज  उठते ही , उनका [श्रीकृष्ण का ]  नाम लेता है ,और ,उनका ही नाम लेकर सोता है   एक ,तू ,है की उनकी,,निंदा गान करती है ।
 ]
राधे सखी संवाद रस माधुरी
बृजेश्वरी , नेअ , हरी   ,सांचो  ।
कोटिन , रती , पसंग, लगें ,ना , अनुपम , मोहक , ढांचो   ।
प्रबचन , ग्यान, सेस , सरमाबत , असि , बुधि  बातन , खांचो ।
महल , दुमहले , हरिमअ ,   तेरे ,  कृष्ण ,नाम,सखिसांचौ ।
प्रेम ,  परीक्षा ,  मोहन ,     जांची , मन मंदिर ,नहीं , कांचो ।
बुद्धी , घनी,  देबगुरु ,        लाजै  ,गोप देबि  , हिअ ,जांचों ।
‘’गुपाल’’ धन्य राधिका प्यारी       ,  धन्य , भूमि,बरसानों ।
हिंदी भावार्थ :———-
गोप देवी ,बोली ,हे राधिके, तुम, सत्य हो ,सच्ची हो   ।  तुम्हारी ,सुन्दरता , की ,करोड़ों ,रति ,भी बराबरी ,नहीं ,कर सकती हैं। वे ,सभी ,मिलकर भी ,तुम्हारे, अंश ,मात्र ,नहीं हैं ।   जब  तुम   बोलती  हो   तो  शेष जी भी ,  सकुच ,जाते हैं, आश्चर्य करते है ।  आपकी  ,बातें,  इस प्रकार, की , वे ,ज्ञान ,ध्यान, से ,परिपूर्ण हैं   । श्री कृष्ण ने, तुम्हारी, प्रीत, परीक्षा, ले ,ली है ।  तुम्हारा ,प्रेम ,कहीं से, कच्चा ,नहीं है । तुम्हारे ,शरीर ,की ,कोशिकाओं से बने महल , दो ,महले ,सब ,कृष्ण रस ,से भरे ,हुए हैं ।,हे ,राधिके, उनमें ,सब पर, कृष्ण, नाम लिखा ,है, तुम्हारी  ,बुद्धि  की, श्रेष्ठता से ,देवगुरु ,बृहस्पति भी ,सरमा ,जाते है, गोपीदेबि ,ने ,मन मैं ,जाँच ,लिया, है।
गोपाल , कहते ,हैं , कि ,हे राधिके, तुम, धन्य ,हो ,तुम्हारा ,निवास ,बरसाना ,धन्य है।
      ]
राधे सखी संवाद रस माधुरी
सांचौ, नेअ ,प्रगट ,हरी ,हुंगे     ।
टेरौ ,प्रीति, भगत ,कर, अरपन     ,          प्रेमपुंज,  प्रगटेंगे ।
आरत, दीन, जनन,  रखबारे        ,      भगतन, ना , भूलेंगे ।
जोरौ ,कर ,लेऊ ,मूंद ,नैन            ,      ,नंगे ,पांम , भजिंगे ।
कृष्णा,  मूरत, मन  ,    प्रगटाबौ  ,   सांचे        , आन, मिलेंगे ।
कीनी ,राधे  , ज्यौं ,सखि , भासी  ,       ,प्रेम प्रभू ,निरखेंगे ।
ब्रह्म ,गुपाल  ,प्रगट, हों, आली      ,    ‘’ राधे  , भेंट करेंगे ।
हिंदी भावार्थ :———-
अगर , राधिके ,आपका ,सच्चा प्रेम है । तो ,भगवान, अवश्य, प्रगट, होंगे । उनकी ,अपना प्रेम, अपनी ,भक्ति का ,समर्पण ,करके ,देखौ  ।  दुखी ,प्राणियों के , रखवारे ,श्री श्याम ,अवश्य ,प्रगट होंगे । वे ,तुम्हे ,नही ,भूल ,सकते हैं । अपने ,हाथों को ,जोडकर, अपने  नेत्रों को ,बंद ,करके, देखो, हे ,सखी ,राधिके, वे ,श्री भगवान ,  नंगे, पांव ,आ ,जायेंगे । श्री कृष्ण की ,मूरत ,मन मैं देखौ , तो कृष्ण आपके पास ,सशरीर आ जाँएंगे । भगवान ,आ, जाँएंगे  । श्रीराधे ,का ,मन श्री कृष्ण,  सों , मिलने को , इतना ,आतुर है । कि  जैसा गोप देवी  [श्रीकृष्ण ]  बता रहीं है । वे ,वैसा ही , करती, और बोलीं ,अब ,मैं ,गोपाल के, प्रेम को ,देखूंगी । गोप देवी  [श्रीकृष्ण ]  बोली, कृष्ण, ब्रह्म, का ,ही रूप हैं ,वे, अवश्य, प्रगट, होंगे।
  ८    ]
राधे सखी संवाद रस माधुरी
नयन ,छबी , गोबिंद   ,   सुहाबै  ।
मोहक, बैनु , ,सखि ,  कर  , मोहन       ,मोइ  , ब्रजरसिक, लुभाबै ।
मनिमंडित ,हरि ,  मुकुट ,  मनोहर         , मोर  .   पांख .    फहराबै  ।
दिरग ,  बिसाल ,  ,   सुंदर,  कजरारे  ,    मनबा ,    मोइ  ,सुख पाबै ।
स्वर्नहार , भूसन, कंचन ,हरि           ,     कोटी ,   अनंग ,   लजाबै  ।
जसुदा ,नन्द , जू नटखट, छोरा          ,      रस सागर ,बनी ,जाबै    ।
रूप ,रंग ,चितबन ,अति ,अदुभुत        ,’’गुपाल’’ जोर ,कर,     गाबै   ।
हिंदी भावार्थ :———-
भगवान की ,नयन ,छबी ,मन को ,सुंदर, लगती ,है ।
बंशी हाथ मैं ,लिए ,यह ,बृज  का ,रसिक, मुझे ,बहुत ,अच्छा ,लगता है ।
मणियों से ,मढ़ा, बना ,मुकुट के ऊपर, मन को ,हरने वाली मोर  पंख, लहरा, रही है ।
सोने का हार , सोने के बने आभूषण ,धारण कर ,पहन कर श्री कृष्ण ,करोड़ों ,कामदेवों को सरमा देते हैं, तथा,  करोड़ों ,कामदेव को लजाते ,हैं । जसुदा ,नन्द का, यह नट खट ,लड़का, संसार ,मैं, रससमुद्र, बनकर ,प्रेम, बाँट रहा है । उनकी, रूप रंग, चितवन, अदुभुत है ।
यह ,गोपाल ,हाथ, जोडकर, उनकी ,स्तुति गान ,कर रहा है  ।
९   ]
राधे सखी संवाद रस माधुरी
मनमोहन , स्यानी ,सखी  ,   भाबत ।
बनमाला           ,     पीताम्बर  ओढे    ,   आली ,    रसिक ,   लुभाबत   ।
चंचल   ,     चितबन  ,  मनअर     ,  मूरत    ,    नटखट ,      रूप , सुहाबत ।            ,
जसुदा ,   नन्द ,  अनंद,   कृष्ण ,   जग     ,    ब्रज      ,चौरासी  ,  भाबत   ।
बैनु ,   बजत     ,    रस लअरी , निकसत     ,     झूमत   ,   तरुबर ,   गाबत  ।
सैन   ,        रैन,        भैंन ,   भई ,भारी    ,     नैनन ,   नींद ,  न ,  आबत  ।
मधुर ,    मधुर ,     आलिंगन ,     कर  हरि        ,     मधुर ,  मधुर ,  बतराबत ।
कहत ,   ‘  गुपाल’’, मती   ,     बौराई        ,  राधे   ,      कृष्ण     ,, लखाबत ।
हिंदी भावार्थ :——
हे ,मेरी ,चतुर मित्र, ललिता ,ये, मन को, मोहने वाले, कृष्ण, मुझे ,बहुत ,ही ,अच्छे, लगते हैं ।  पीला  वस्त्र, डाले, हुए , वन के फूलों से, बनी ,माला, पहने, हुए ,हे ,सखी, यह बृज का रसिक, मुझे ,बहुत ,लुभाता ,है ,आकर्षित, करता है  ।  इसकी ,चंचल सूरत ,तथा मन को अच्छी ,लगने वाली ,मूरत,   तथा नटों ,जैसा वेश,  मुझे ,बहुत ,अच्छा  ,लगता है । यशोदा तथा कृष्ण का आनंद ये कृष्ण ,चौरासी कोस मैं फैले बृज का प्राण है।  जब ,इसकी , बंशी, बजती है , तो, उससे, रस रूपी ,लहरें ,निकलतीं हैं ।v  हे , बहिन ,रात्रि ,  मैं ,मेरा ,सोना , बहुत ,   ही ,भारी , हो,  गया, है,  मुझे, नींद ,नहीं ,आती ,है,   ऐसा, लगता, है ,कि ,कृष्ण ,मुझसे ,मधुर मधुर बातें कर रहा है , गुपाल ,कहते ,हैं  ,कि , मेरी ,  बुद्धि ,भ्रमित ,होगयी है ,मुझे ,कृष्ण के ,सिवाय , अन्य ,कुछ ,दिखाई नहीं देता है।
[     २  ०    ]
प्रिया प्रिय मिलन रस माधुरी
नयन छबी हरी की मन भावै ।
मोहक बेणु लिए सखि निरखौ मोये ब्रिज रसिक लुभावै ।
मनिमंडित हरी मुकुट मनोहर    मोर पांख  फहरावै  ।
दिरग विशाल मोहक कजरारे    मनवा मोहि सुख पावै।
स्वर्णहार कौस्तभ मणि धारी     कोटी अनंग लजावै ।
जसुदा नन्द कौ नटखट छोरा      जग मैं रस फैलावै ।
रूप रंग चितवन अति अदुभुत    गुपाल जोर कर गावै।
हिंदी भावार्थ :———-
भगवान की नयन छबी मन को सुंदर लगती है।  बंशी लिए यह ब्रिज का रसिक मुझे बहुत अच्छा लगता है।  मणियों से मढ़ा मुकुट के ऊपर मन को हरने वाली मोर  पंख लहरा रही है । सोने का हर तथा कौस्तभ मनी धारी करोड़ों कामदेव को लजाते हैं ।  जसुदा नन्द का यह नत खट लड़का संसार मैं प्रेम बाँट रहा है ।  उनकी रूप रंग चितवन अदुभुत है ।  यह गोपाल हाथ जोडकर   रहा है ।
[ २   १   ]
प्रिया प्रिय मिलन रस माधुरी
नयनन सखि  मोहि नटखट भाबै ।
मोहक बैनु लीन कर निरखूँ                ,    आली ब्रज  रसिक लुभाबै   ।
मनि मंडित हरि  मुकुट मनोहर           , पंख    मोर     सिर लहराबै  ।
दिरग विशाल मोहक कजरारे              ,निरख निरख मन सुख पाबै     ।
स्वर्न हार कौस्तभ मनि धारी              ,हरि कोटि       अनंग लजाबै  ।
जसुदा नन्द अनंद कृष्ण जग              ,अदुभुत रस      अलि फैलाबै  ।
रूप रंग चितवन अति मोहक               ,गुपाल जोरै        कर  गाबै  ।
हिंदी भावार्थ :———-
मेरे नयनों को कृष्ण अच्छे लगते हैं । उन्हें मैं सुंदर
वंशी लिए देखती हूँ । मुकुट मैं मनी मढी हुई हैं।  तथा
सर पर मयूर की पांख लहरा रही है।  स्वर्ण कौस्तभ
मनी धारण किये हरी करोड़ों कामदेव से अधिक सुंदर हैं।
जसोदा नन्द का आनंद कृष्ण संसार मैं अनोखा रस फैला
रहा है । गोपाल हाथ जोर कर रूप रंग चितवन की मोहकता
को गा  रहा है।

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