गुपाल  श्री गोविंदी   गोविंद  रूपरस माधुरी 

                                                 [  १    ]                                              
[   गुपाल      श्री गोविंदी   गोविंद  रूपरस माधुरी     ]
जोरी जुगल ‘’गुपाल’’ लुभाबै ।
स्याम अंग बनमाल बिभूसित     बंशी     कर   मुसकाबै।
मोरमुकुट पीताम्बर धारी        कोटि        अनंग  लजाबै।
त्रिभुबन ललित लली भानू बर     धैनुन  हाथ       फिराबै।
सारंग कूंक मची ब्रज भूमि       नाचत     हरि   हरि गाबै ।
मूरत मोहक कृष्ण  राधिके       नैन    ‘’ गुपाल’’   सुहाबै ।
 
हिंदी भावार्थ —— –
गोपाल कृष्ण की अनौखी जुगल जोरी मन को  लुभा  रही  है।
स्याम रंग वनमाला भूषित वंशी को हाथ में लिए हुए  मुस्करा
रहे हैं ।मोर मुकुट पीताम्बरधारी करोडों काम देवों को लज्जित
कर रहे हैं।तीनों लोक मैं सुंदर वृषभानु की बेटी श्रीराधिके गायों
पर हाथ फिरा रही है।मोरों के कूँकने से समस्त ब्रज गुजांयमान
है। हरी हरी की कर्ण प्रिय ध्वनि के साथ नृत्य करते हुए  वे ऐसे
लगते  हैं  मानो वे जुगलस्वरूप श्री श्यामसुन्दर का  भजन कर
रहे हों ।    यह मोहनी  युगल श्री राधे    कृष्ण की  छबि [मूर्ती ]
गोपाल    के   नयनों  को   बहुत  भाती है । अच्छी लगती  है।
[     २  ]
[    गुपाल   श्री गोविंदी   गोविंद  रूपरस माधुरी     ]
भोरी  , सूरत , गोबिंद  ,सलौनौ ।
कालजयी ,चिर ,मुस्कन ,मोहक    पुलकित , अंग  , अंग, कौनौ।
रोम, रोम, बसौ ,हरी ,मेरे             ,मुरलीधर   ,श्रीकृष्ण,    ,प्रभौ ।
पटपीत, धरन ,सारंग, मुकुट       ,  नीलबरन अती  रुचिर बिभो ।
तन मन  बार जुगल छबिनिरखूं       ,    कृपा    सिंधू , सुखरासी ।
‘’गुपाल’’ ,मांग  ,अमोलक ,  प्यारी , कृपा   , करऊ  ब्रजबासी   ।
नटखट ,सूरत ,निरख, सांवरी          , हिरदय   नां ऐं संमाऊं      ।
‘’गुपाल’’,आरजू  , एक, मनौती,      , गोबिंद     हरी हरि  गांऊं  ।
हिंदी अर्थ  ;——
भगवान की ,सुन्दर ,सलौनी ,भोली सी ,सूरत है । जिनकी
,मुस्कान ,कालजयी है ,काल को ,भी ,पराजित ,करने ,वाली है
, जिससे ,मेरे ,अंग-अंग  का ,  कौना-कौना ,पुल्कित ,हों रहा है
 । हरषित, हो ,रहा है ,पीला ,वस्त्र,मोर पंखो का ,मुकुट, नीला
रंग  का शरीर , अत्यंत ,सुन्दर है । मेरे , मनुष्य शरीर कोमैं ,
इस पर ,न्यौछावर ,करता हूँ । तथा ,युगल स्वरूप श्री भानु
नन्दिनी राधिके ,और श्री यशोदानंदन के, दर्शन की ,इच्छा है
,जो दया के सागर हैं ,सुख प्रदान ,करने ,वाले हैं ,गोपाल की ,
यह, मांग ,अमूल्य है , कि  ,उसे ,ब्रज , का , निवासी ,बना दो ।
प्रभु ,मैं ,आपकी ,नटखट, सांवरी सूरत को, देखकर ,हिय के,
बीच ,नहीं ,समाऊंगा। मेरी ,यही एक ,विनती है ,यही ,आरजू है ।
   मैं ,जीवन के, प्रत्येक ,छन , आपका ,सुमरन ,करता ,रहूँ
,यही कामना है ,गोविन्द गोपाल हरी का ,नाम ,रटता, रहूँ।
हे ,मेरे  , स्वामी , इसे , पूरी , कर , दो ।
 
  [  3    ]
 
 [      गुपाल      श्री गोविंदी   गोविंद  रूपरस माधुरी     ]
थिर ,भये ,नैन ,लखहिं, हरि ,ओरी ।
नील बरन ,सोहत ,अनूप  प्रभु             ,  अधर   लजाबें      रोरी ।
पंचपंखी ,हरि सीस    पंखुरी            ,  बरबस  मन     चित चोरी ।
गोपी ,ग्वाल, दरस कर, हरसें          , कीरत    भानु       किशोरी।
अनुपम अदा , अनूठी ,चितवन      ,  कोटि  , काम ,  सरमावत ।
दरसन कर प्रभु हिय न अघाबत    , निरखत  मन    सुख पावत ।
वारौं , सुकृत , बहु जन्मन के        ,      राखहुँ    दरसन      चाह ।
सूरत, हिय, राखी ,  मनमोहन      ,       गुपाल ‘’  साधून    राह  ।
हिंदी अर्थ  ;——
मेरे ,नयन ,स्थिर ,हो ,गये हैं । तथा, एक ,टक ,प्रभु की, ओर
,देख रहें है। नीले रंग के, कारण, अत्यंत शोभायमान ,हो रहें है।
उनके ,लाल ,होठ ,रोरी को ,भी ,लज्जित ,कर रहे हैं । पांच पंखो
की बनी ,,कलंगी पहन रखी हैं। जो ,बरबस ,मेरे हिरदय को ,चुरा
रही है   ।  सभी ,गोपी, ग्वाल [ ब्रजवासी ] ब्रषभानु व कीर्ति की
बेटी को ,देख कर ,हर्षित ,हो     रहे हैं उनकी ,अनुपम ,अदा है।
उनकी ,चितवन (दैखने से)    ,करोड़ो, कामदेव ,शरमा ,रहे हैं।
उनको ,   देखने से , मन  नहीं  , भरता  है बार बार ,देखने का,
मन करता है ।  मैं ,अपने   , बहुत   से ,जन्मों के ,  पुण्यों को
,देकर , केवल ,एक क्षण, दर्शन , करना , चाहता हूँ  ।  गोपाल
ने  ,इस ,सूरत को, हिय में , बसा लिया  है , जो ,सच्चे ,साधुओं
का, मार्ग है
 
   [  ४   ]
      [     गुपाल    श्री गोविंदी   गोविंद  रूपरस माधुरी     ]
।। नटनागर छबि   मन में बासी ।।
कमलनैन मनहारी चितबन      अन्तर हरै  उदासी ।
बाम अंग राजत श्री राधे            मृगनैनी  सुखरासी।
जन  जन आश्रय दाता हो        ब्रन्दाबन  ब्रज बासी ।
सजल नैन तेरौ मग निरखहिं       गोपीप्रेम पियासी ।
‘’गोपालउ’’ अब टेर सुनौ प्रभु   दीनजनन  अभिलासी।
हिंदी भावार्थ :— –
हे नट नागर आपका सौंदर्य मन में बसा है ।   कमल
जैसे नेत्र मन हरने वाली चितवन मेरे अंदर की उदासी
हर रही है ।   आपके बाँए अंग श्री  वृषभानु  को  सुख
देने वाली राधिका हैं।    हे वृन्दावन मैं वास करने वाले
मोहन आप  तो प्रत्येक  जन  के  सहारे  हो ।  समस्त
गोपियाँ    जो  प्रेम  की   मूर्ति हैं ।    प्रेम   मगन होकर
आँखों    मैं   प्रेमाश्रु  लिये  तेरा    रास्ता  देख    रही हैं । 
  गोपाल   कहते   हैं   हे   दीन    प्राणियों से प्रेम करने
वाले  आप  गोपाल की भी अब   विनय  सुन लीजिये ।
 
  
[        ]
   [     गुपाल      श्री गोविंदी   गोविंद  रूपरस माधुरी     ]
हरी ललाट  पगड़ी  नब   राजै ।
कांति  अनूठी  कौस्तभ  मनि प्रभु        बनमाला   उर     साजै ।
कालिंदी ,घेरे ,मन मोहन                   पूर्न        चंदमा    सोहत ।
गोपिन ,भाग ,अनूठे, अनुपम          निरख स्याम धनि भोमत ।
पीताम्बर  परिहास निरख हरि         ढकत     ,रासश्री , मुख, कूं ।
बैनूं  रस      अमृत    ,बरसामत         मगन    करत तन मन कूं।
तिहूं लोक बारूं  छबि मोहक             जन्म सुफल    जग    होई।
गुपाल  नाम  जुगल  सुखदाई         सुमरहुं     सब   जग  खोई।
हिंदी अर्थ  ;—–
-हरि के सिर पर नूतन कोरी नई पगडी है । कौस्तभमनि की चमक
,अनौखी, है। गले मैं उन्होंने ,वनमाला पहन ,रखी  है। चारो तरफ, से,
जमुनाजी से  घिरे   हुए, मोहन ,पूर्ण ,चंद्रमा से ,लग रहै हैं। गोपियो
,के, भाग्य तो , देखो । श्यामसुन्दर के,रूप,   को, देखकर  वे नारी भो
, रही हैं अपना सब कुछ,भूल, गयीं, हैं ,श्रीकृष्ण ,मय, हो ,गयीं, हैं,। हे ,
सखी ,तुम,पीतांबर  का, हास्य  तो  देखो , वह ,अपने  आप  ,उडकर ,
राधिके    ,जी , के , मुख, को  ,ढॅक , लेता, हैं। मानो ,श्रीकृष्ण ,उन्हें
आवरण  प्रदानकर रहे  हैं। तीनो लोकों को गोपाल इस सुन्दर,सूरत
,पर न्यौछावर ,करता,  है । ताकि ,उसका  ,जनम ,सफल हो, जावै ।
वंशी , से , बरसने वाला, रस ,चारों , तरफ  अमृत वर्षा , कर रहा ,है
।जिससे   तन , मन , प्रसन्न ,होता, है  ।  सभी ,जीवधारियों  का
 मन ,प्रसन्न ,होता ,है।
[     ]
[     गुपाल    श्रीगोविंदी   गोविंद  रूपरस माधुरी     ]
,मोहन  , अदभुत     ,   झांकी ।
मोरमुकुट  ,  पीताम्बर ,सुन्दर            ,        घुंघरारी , लट  ,   बांकी।
कालिंदी ,तट ,पै , बंशीबट                 ,     रस ,     बरसामन      टांकी ।
मगन ,भई , हिय  ,दगध, राधिके              ,        बूंद ,झरी ,झरना की  ।
अधरन ,बैरिन ,नृत्य, करै ,तू             ,      सौतन,   मोर  , सदां,    की।
स्याम मनावत , प्रिया रिझानी          ,      बतख ,हंस बहु      साखी   ।
पुन्य ,अकूते ,जीब, गुपाला               ,  निरखत    जोरि अदा       की ।
हिंदी अर्थ  ;——
श्याम सुंदर अच्छे लग रहे है । झांकी  बडी  मनोरम है ।    मोरमुकुट है
घुंघघ्रारी काली उनकी लटे हैं।  जमुना ,जी   ,के   ,तट परबंशी ,वट, पर
उन्होनें अपनी वंशी को रख दिया है।राधा रानी जो ,वंशी से,बहुत,जलती
है।वंशी, के , रखने ,से , श्रीराधा, जी  को ,बहुत,  ही ,ख़ुश, हो, रही, है ,वे
,प्रसन्न हो रहीं हैं ।  तन, तथा, मन, मैं  ,उनके ,शीतलता ,आयी है। ऐसे,
लग, रहा  है की ,उनके मन ,की  आग,पर झरने कीकोई, बून्द पड़गई है ,
राधा जी सोचती है।,यह मेरी सौतन ,हमेशा प्रभु ,के होठौ  पर नाचती
रहती है। श्याम  सुन्दर अपनी, प्रिया, को ,मना रहे हैं। श्री राधिके खुश ,
हो रहीं हैं बतख ,,हंसोंके ,जोड़े ,सब ,गवाह, हैं । गोपाल, कहते, हैं। जिन
जीवों, ने ,यह  , देखा। उनके ,पुन्यों  ,का ,वर्णन ,नहीं, किया, जा सकता
है ।
                   
   [      ]
 
[     गुपाल      श्री गोविंदी   गोविंद  रूपरस माधुरी     ]
  
।। बंसी मोहन मोहनी  डारी ।।
कमलपुष्प  गुच्छा कर सोहै          कर दूजे  हरि  बैनु प्यारी ।
अष्टधातु कौ  मुकुट   मनोहर   पांख  चक्र  मुनि  मनबा हारी ।
बाजुबंद  गलहार  कनक  प्रभु  अंगुल – अंगुल   मुदरि प्यारी ।
माथे तिलक  मनोहर कुंकम          लाजें  कोटि   मदनमुरारी ।
छबि के बिधि बरनौ  मनमोहन      सुर मुनी  हीऐ  सुखकारी ।
‘’ गुपाल ‘’ आस चरन तोरे की          कीजै न कृपा      सुखारी ।
हिंदी भावार्थ :—- –
भगवान की वंशी ने अपनी मोहकता फैला रखी है।कमल का फूल
गुच्छ लिए तथा दूसरे हाथ मैं मुरली  लिए  हैं।    पांखऔर चक्र
युक्त अष्ट धातु का मुकुट पहना हुआ है।जो मुनियों के मन को
अपने मैं उलझाता है।   हाथों के बाजू बंद तथा गले मैं सोने के
हार हैं। अँगुलियोंमैं सोने की अँगूठियाँ  पहनी हुईं है। माथे पर
मन को लुभाने वाला कुंकम का तिलकलगाये श्रीकृष्ण करोड़ों
कामदेवों     को  लजा  रहे  हैं।   नन्द   आनंद कंद श्रीकृष्ण की
छवि का वर्णन कैसे करूं। जो भगतों को सुख देने वाली है।तथा
  देवताओं औरमुनियों के मन से भय को हरने वाली है । गोपाल
कहते हैं।हे प्रभु गोपाल को तेरेचरणों  का सहारा है। उसके ऊपर
 सुख देनेवाली  कृपा  कर दीजिये ।
 
    
[  ८   ]
 
[     गुपाल      श्रीगोविंदी   गोविंद  रूपरस माधुरी     ]
  
।।  स्याम छबि कोटिन काम लजाबत ।।
नील बरन  पटपीत काछनी पांख मोर  सिर  साजत ।
कनक कोंधनी कटि हरि सोहै  नूपुर  धुनि  खनकाबत ।
बाजू बन्धन अनुपम सोभा मन मन्दिर  उमगाबत ।
आनन की छबि चहूं दिस बगुरत रान्कापति   सरमाबत ।
‘’ गुपाल ’’ बाबा नन्द कौ ढ़ोटा  कालजई   मुस्काबत ।
हिंदी भावार्थ :—:-
मोहन का स्वरूप करोंड़ों कामदेवों को लजा देने वाला है।     नीला रंग,
पीला पीताम्बर, पीरी काछनी तथा सिर पर मोर की पंख लगी है।
सोने की कोंधनी हरि ने कमर मैं पहन रखी है।  सोने के नूपरों से
खनखनाहट की ध्वनि निकल रही है।      बाजू बन्दों की बड़ी
अनुपम शोभा है जो मन के मंदिर को प्रेम से भरे दे रही है।
मुख मंडल की शोभा चारों दिशा मैं फ़ैल रही है।     जिससे चन्द्रमा
भी लजा रहे हैं।   गोपाल कहते हैं यह नन्द जी का गोपाल कालजयी
मुस्कान से सबको मोहित करता हैं।
  
    ]
 
       [    गुपाल      श्रीगोविंदी   गोविंद  रूपरस माधुरी     ]
 
 
                                                      
 ।। धन तुम मुनी मोहक छबि धारी ।।
स्वेतबसन ब्रज चन्द्र मनोहर  नटनागर   मन  हारी ।
बाहु   लम्ब  सुदीर्घ बक्ष कानन  कुन्डल भारी  ।
बनमाला कौस्तभमनि अनुपम ग्रीबा  मोहक  प्यारी ।
धैनुवत्स औ धैनु सबइ मिल  ध्याबें मदन  मुरारी ।
मोरमुकुट हरि सीस सुहावै   बांकी  मूरत प्यारी ।
‘’गुपाल’’ माधब तन मन बारूं   दीनबंधु  गिरधारी ।
 
 
हिंदी भावार्थ :—
मुनियो को मोहित कर देने वाली छवि के गोपाल तुम नट रूप स्वेत
वस्त्र धारी हे बृज चन्द्र कृष्ण तुम मन को हरने वाले हो धन्य हो ।
 लंबी भुजाएँ विशाल मजबूत वक्ष तथा कानो मे कुण्डल शोभाय मान है।
 मन को लुभाने वाली गरदन में वनमाला तथा कौस्तभमनि  धारण कर
रखी हैं।  बछड़े तथा गाय मिलकर सब कृष्ण को ध्यान कर रहे हैं ।
मोर मुकुट की छबी बरनन नहीं की जा सकती है । जो प्रभु के शीश पर है।
   उनकी निर्भयता लिए सूरत प्यारी है गोपाल कहते हैं ये गोपाल अपने गोपाल
की सुंदर मूरत पर अपने जीवन को न्योछावर करता है ।   क्योंकि उसके
प्रभु गिर्राज धारण करने वाले असहायों के स्वामी हैं।
 
                  
                                    
[  १ ० ]
 
        [    गुपाल      श्रीगोविंदी   गोविंद  रूपरस माधुरी     ]
 
  
।। तू बड़भागिनी मोर पंखुरिया ।।
पुरख पुरातन हरि सिर राजइ    फरकइ तोर चंदरिया ।
सखा रौर ते नंद भवन की        अपढर खुली  किबरीया।
गूंथ जटा जननी लाला की            टेरत  जाउ संबरिया ।
कहें कृष्ण हौं गबनूं कैसे            ढीली  मोर  मुकुटीया  ।
प्रमुदित मात संबारत पंखरी     लागै न  लाल  नजरिया।
भगत स्याम ‘’गुपाल ‘’ बिहंस तज  जसुदा  मात अंगुरिया।
 
 
हिंदी भावार्थ :—
हे मोरपंख तू बड़े भागों   वाली   हैं।   तू    पुरूष पुरातन के सिर
पर लगकर तेरी दरिया नाचती रहती है।  बच्चो का शोर बढने से
नंदबाबाके भवन के किवाड  अपने आप खुल खुल जाते है।  माता
जसोदा कृष्ण के बाल संवारती है। और कहती है। कान्हा अब जाओ।
लाला कह रहे हैं।मातामें कैसे जाऊँगा मेरा मोर मुकुट  ढीला हो रहा है।
 माता प्रसन्न होकर दोबारा से मोरपंख को सॅवारती है।    कहती है :
गोपाल तुझे किसी की नजर न लग जाये।गुपाल कहते हैं। स्याम
हॅसकर माता की अँगुली छोडकर  सखाओं की ओर भागते हैं।
                    
       [   १ १   ]
 
                                     [    गुपाल     श्री गोविंदी   गोविंद  रूपरस माधुरी     ]
 
 
।। मोर पंख तू बस हिअ मोरे ।।
तोय निहारत स्याम प्रेमरस मनुआ  लेइ  हिलोरे ।
देख तोर बहुरंग कलेबर  भोऐ  मोहन  मोरे ।
सिब के सीस जाहबनी सोहे  सिबसंकर  अति भोरे ।
सीस निहार परम   प्रभु केसब   याद करत गुन तोरे  ।
तोइ सुमिरन हरि सुमिरन होबत  धन – धन  भाग  हैं  तोरे ।
ध्यान बसौ’’ गुपाल ‘’ पांख हरी  मोहन  निरखत  मोरे ।
हिंदी भावार्थ :—
गोपाल कहते है। हे मोर पॅख तू मेरे हिरदय में बस जा।  तुझे देखने
से मन में प्रेमरस हिलोर लेता है। तेरे बहुरंग कलेवर को देखकर मेरे
स्याम भी भो गये है। तुम स्याम सुन्दर के सिरपर उसी प्रकार
शोभायमान हो जैसे श्री शंकर के सिर  गॅगाजी विराजमान है।
तुम्हें अपने शीश पर देखकर मेरे प्रभु श्रीकृष्ण हमेशा खुश रहते हैं।
 तुम्हारा ध्यान करने से प्रभु का ध्यान अपने आप हो जाता है। हे
मोर पंख तुम बहुत भाग्य शाली हो।   हे हरी की पांख तुम मेरे ध्यान
मैं निरंतर बस जाओ।  जिससे मेरे प्रभु की दृष्टि  तेरे  साथ  साथ
मेरे  ऊपर  भी पड़े ।
             
    [   १ २  ]
 [     गुपाल      श्रीगोविंदी   गोविंद  रूपरस माधुरी     ]
।। को बरनै  रे सोभा नटबर की ।।
मोरमुकुट बनमाला भूसित अदुभुत  पीताम्बर की ।
अंग अंग भूसन फूलन  के  श्री  राधे   प्रियबर  की ।
स्याम कलेबर दिपत अनूठौ  दिब्य हास अधरन . की ।
रतनजडित बाजूबंधन युत  लम्ब बाहु  श्री हरि   की ।
अधरन मुरली नृत्य करै हरि  मधुर  भंगिमा छबि  की ।
‘’गुपाल ‘’मुदित लख बालकृष्ण छबि  मिटी भूख तन मन की।
हिंदी भावार्थ :—-
ऐसा कौन है जो नट नागर की शोभा का वर्णन कर सकें।
मोर मुकुटधारी वनमाला धारण किये हुए सुन्दर पीताम्बर
धारण किये हुए तथा सभी अंगो पर    फूलो के आभूषण
युक्त है। सुन्दर स्याम रंग है।  अधरो पर दिव्य हॅसी है।
रतन जडित  बाजूबॅन्ध  हैं ।   भगवान की लम्बी बाँह है।
जिनके होठों पर मुरली     नाचती  है। जो त्रिभंग रूप में
खडे होते  हैं । गोपाल प्रभु के  इस रूप को देखकर इतने
खुश हैं। कि उनकी तन मन की भूख भी शांत हो गयी है ।
 
[   १ ३   ]
[     गुपाल      श्रीगोविंदी   गोविंद  रूपरस माधुरी     ]
  
  ।। भोरी  सूरत स्याम छबि  बांकी ।।
मनहर मूरत सोहत सुन्दर      हीये बिच  हरि  झांकी ।
रोम रोम गई डूब प्रभु लखि      रचना  श्रीबिधिना की।
दरसन सुख तौ बरन न जाबै     नटखट छटा अदा की ।
मंदिर रूचिर बन्यौ हिये घट         सोहत  बांकी  झांकी।
आस ’’गुपाल ‘’जुगल दरसन की  संतन हिऐ  सदां की।
हिंदी भावार्थ :— – 
श्री कृष्ण की छवि भोरी बांकी  है। मन  कोहरने  वाली  मूरत
ज्यादा सुहाती है।मेंने इसे हिरदय में टांग रखा है।वे इतने सुंदर
है उनके रोम रोम में बह्रमाजी की सारी रचना डूब गई।  दर्शन
के सुख से मेरा मनकभी भरता नहीं हैं। श्री युगल दरसन की
आस गोपालकहते हैं । हिरदय रूपी घड़े मैं सुन्दर मंदिर बना
है  जिसमें मनमोहक झांकी शोभा  देती है  ब्रज  के संतो को
हमेशा रहती है।
    
  [   १ ४   ]
 
                                                            [   गुपाल      श्रीगोविंदी   गोविंद  रूपरस माधुरी     ]
 
 
।। हरी ललाट कसतूरी राजत ।।
कौस्तभ मनि सुंदर बनमाला       बैजंती इतराबत ।
मलियागिरी चंदन प्रभू अंगन  सोंधी महक सुहाबत ।
नासाग्रे गज मोती राजै             मोहन बैनु  बजाबत ।
भुजबंधन पीताम्बर लहरत      कोटि अनंग लजाबत।
मोतीमाल कंठ लपटानी            प्रभा पुंज  ललचांबत ।
‘’गुपाल’’ निरख मोहिनी छबि हरि भबसागर  तरजाबत।
हिंदी भावार्थ :—
मोहन के सिर कस्तूरी का तिलक लगा हुआ हैं कौस्तभ
मनी तथा    सुन्दर     पुष्पों   की   माला   उनके अंक की
[ वक्षस्थल ] कीशोभा बढा रही है।  बैजंती गले में इतरा
रही है। प्रभू के अंगोंपर मलयागिरी का चंदन लगा हुआ   है।
जिसकी मन को अच्छी   लगने   वाली  सुगंध  वातावरण मै
   व्याप्त है ।नासिका के  अग्रभाग   पर  मोती  लगा। मोहन
वंशीबजा  रहे हैं।    भुजाओं  में पीताम्बर  लिपटा   हुआ  है।
भगवान  श्री कृष्ण     रूप    करोडों कामदेव को लुभा रहा है।
मोतियों की माला गले मैं लिपटी हुई है । जिसकीचमक हिये
को ललचा रही है । हे गोपाल तू भी श्रीगोपाल की मोहिनी छबि
के दर्शन करले गोपाल कीइसी मोहनी छबी को देखने से तू भव
सागरसे तर[ मुक्त ] हो जायेगा ।                       
 
[   १ ५   ]
 
[     गुपाल      श्रीगोविंदी   गोविंद  रूपरस माधुरी     ]
 
 
 ।। बाल रूप मोहक छबी प्यारी ।।
मोर किरीट जटाजूटन हरि सीसहार छबि  न्यारी ।
कालिंदीतट तरु बंसी बट राजें कृष्ण मुरारी ।
पीतबसन हरि कन्धन  लहरत  मुरलीरस धुनि  बारी ।
स्याम बरन  भूषण  अति मोहक  सुघड़ स्याम मन हारी ।
कंठमाल  मोतीमूंगन  प्रभु  बैजंती  गल   डारी ।
‘’ गुपाल’’ घिरे हरी गौधन  सौं  मूरत सुघड़ बिहारी ।
हिंदी भावार्थ – सुन्दर बच्चे का रूप है। मनोहर छवि है।
माथे पर मोर की पाँखों से बना मुकुट बालों    में केश
विन्यास की सुन्दरता हैं शीश हार की अनुपम शोभा है
जमुना जी के किनारे वंशी वट के नीचे श्री गिरधारी जी
विराजे हुए हैं । पीताम्बर हरी के कन्धों पर फहरा रहा है ।
रस की धुनि देने वाली मुरली उनके हाथ मैं है । काले रंग
पर सोने के गहने मन को हर रहे हैं। मोती मूंगाओं की
माला बैजयंती मालामोहन ने गले मै डार रखी है।
गोपाल कहते हैं सुन्दर सुघड़ कृष्ण गऊओ से घिरे
हुए सुन्दर लग रहे हैं ।
[   १ ६     ]
[   गुपाल      श्रीगोविंदी गोविंद  रूपरस माधुरी     ]
लाड़ली     मन मंदिर  हुलसाबै।
स्वयं मुग्ध लख रूप अनूठौ     क्यों न  स्याम प्रभु  भाबै।
गोरो रंग धनि चंद्र लजामत      सोभा   बरनि न जाबै।
कनक करधनी पांयन तोरी     दिनकर  किरन   भुलाबै।
सीसफूल गलहार अनूठे       द्युती  दामिन    सरमाबै।
मुदरी पहरी भांति भांती  जिन  निरख  निरख   हरसाबै।
जाकौ रसिक ‘’गुपाल’’ स्वयं हरि    काह   नांहि  इतराबै।
हिंदी भावार्थ ——- –
श्री राधे मनही मन में प्रशन्न हो रही है वे अपने सुन्दर शरीर
को देखकर स्वयं ही मोहित  हो रही है। सोच रही है। यह
श्यामसुन्दर को अति प्रशन्न करता होगा श्रीकृष्ण को
अच्छा लगता होगा । गोरा रंग चंद्रमा की सफेदी (धवलता)
को हराने वाला है। कटि में [कमर में ] सोने की करधनी
तथा पावों में तोडियाँ सूर्य की किरणों को भूला देती है।
केशों  में शीश फूल गले में हार को बिजली की चपलता
भी शरमाती है। भांति भांति की अंगूठी पहने देख देखकर
खुश हो रहीं है। जिसका रसिक स्वयं गोपाल हो वह क्यों
न इतरावै।
 
 
 
 
[     ]
[    गुपाल      श्रीगोविंदीगोविंद  रूपरस माधुरी     ]
मोहनी मूरत रूप रसाला।
तपे स्वरन सी कांति मनोहर       मोहक नैन     विसाला।
अंग अंग भूसन    फूलन     मूंगा   मोती     माला ।
स्याम घटा से केस सुहाने          ज्यों  कारौ  नंद लाला।
जुरिमिल सखी सजाबें राधे           भोरी   सी ब्रज बाला ।
नजर उतारै मात लाडली            निरखै  दास ’’गुपाला ‘’।
हिंदी भावार्थ——– –
स्वामिनी श्री राधे की सुन्दर मोहनी मूरत है। श्री राधे तपे
(गर्म) स्वर्ण के से रंग की कांति वाली मनोहर मोटे नैनों
वाली हैं । तथा अंग अंग पर फूलो के गहने पहने हुए हैं।
वे मोतियों की माला पहने हुए हैं। राधिका के बालों की
कालिमा घनी काली है। जैसे नन्द के श्रीकृष्ण काले हैं ।
सारी सखी इकठठी होकर राधे रानी को सजा रही हैं /
उनका मन भोला है। श्रीराधिके की माता अपनी लाडली
बेटी की नजर उतार रही हैं। क्योंकि राधिका जी का यह
सेवक गोपाल उन्हें देखेगा। जो उन्हें नजर लगा देगा।

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