गुपाल हिय उदगार रस माधुरी

 
            [     ] 
 [  गुपाल हिय उदगार रस माधुरी]
।।  माया मोइ निसदिन नाच नचाबै ।।
मिथ्या चकाचोंध सी कौंधत  मनुआ   गोता  खाबै  ।
पैठत गहरे मैं कबऊ             फिर ऊपर  कूं  आबै  ।
हौं तेरो तात जननि इहि तेरी  भ्राता  प्रिय अति भाबै ।
नारि पराकाष्ठा माया जग ,    अतिसय मोह  बढ़ाबै ।
माया ‘’गुपाल ‘’ मनुज जग जीते  जाऐ स्याम  जिताबै ।
 
हिंदी भावार्थ :—:-
माया मुझे रात दिन नाच नचाती है।  जग की चकाचोंध
मैं मेरा मन गोते खाता है।  कभी अंदर कभी  बाहर निकल
आता है।   माता पिता भाई सभी इसी के रूप हैं।   पत्नी
माया की उच्चावस्था है।  जो अत्यंत मोह बढाती है।
गोपाल कहते हैं इस माया से केवल वही जीत सकता है।
 जिसे   श्यामसुंदर जिताते हैं।   जिस पर प्रभु की किरपा
होती है।
                         
                                    [       ]    
 
                  [  गुपाल हिय उदगार रस माधुरी ]
 
 
       ।।  मोकूं और ना कोउ सहारौ ।।
हौं हूं तेरौ दास पुरातन मोऐ  आन  उबारौ ।
काम क्रोध मद लोभ मोह कौ  स्याह स्याम अंधियारौ ।
माया की गांठन मैं जकरौ छूट न सकूं सुकारौ ।
बिन उजिआरे दुर्गम पथ अति  पामत नांहि  किनारौ ।
पकरौ  बांह ‘’ गुपाल ‘’ उबारौ  मिलहि नेह  तिहारौ।
 
 
 
 
हिंदी भावार्थ :—
मुझे कोई भी सहारा नहीं है।  बचा लो।   मैं तो आपका
पुराना दास हूँ मुझे बचा लो।  काम क्रोध घमण्ड का
काला अंधकार है।    मैं माया की गांठों मैं जकडा हुआ हूँ।
आसानी से छूटने वाला नहीं हूँ।   बिना तेरे प्रकाश इस
दुर्गम पथ पर किनारा ढुंढ़ना कठिन है। गोपाल कहते हैं
, हे  गोपाल कृष्ण मेरी बाँह पकर के मुझे उठाकर अपने
द्वार पर डाल दो।
 
3    ]
  [   गुपाल हिय उदगार  रस माधुरी  ]
 
।।  मनमंदिर   मोइ मोहन   भाबै ।।
जेइ कछु निरखौं  निज नैनन सौ  स्याम   रुप  है जाबै ।
लता  पता  जड़ जंगम अदभुत        मोहक   रुप   लखाबै ।
कांकर, पाथर,  हीरा , मोती,      कन  तिन सब प्रभु पाबै ।
कर-कर दरस  हिए में हुलसू     आनंद    नांइ    समाबै  ।
एसी मति दीजै  मनमोहन  ‘’गुपाल‘’ न  प्रभु  बिसराबै ।
 
 
हिंदी भावार्थ :—
मेरे मन को प्रभु स्वरूप देखना अच्छा लगता है    ।
  मेरे अपने नयनौ से जो भी दिखाई दे।    वह गोपाल
कृष्ण ही हो जाय।     वृक्षों की टहनियो में बेलों में सबमें
यही अदभुत रूप दिखाई दे। कंकर,  पत्थर, हीरा, मोती,
कन कन में कृष्ण नटनागर रूप दिखै।  मैं इनके दरशन
कर प्रसन्न होता रहूं।   मन आनन्द मनाता रहे।  गोपाल
कहते हैं, हे गोपाल मुझे निर्मल बुद्धि प्रदान कर दीजिये
जिससे मैं आपको न भूलूँ।
 
 
 
                                        []
 
    [  गुपाल हिय उदगार  रस माधुरी]
    
   ।। मनवा नटनागर हरी ध्यामत ।।
मोहन छबि  त्रिलोक बिमोहित   मूल ध्यान  बिसरामत ।
स्याम रंग में बोरै सबई  सगरौ जग  भुलमामत ।
हरे बांस अनुपम बांसुरिया  राग अनूठौ  गामत ।
भूख़ प्यास बिसराइ धैनु सब  जड ज्यों  कान लगामत ।
कही ‘’गुपाल’’ अधरनी मीठी  ब्रज मैं नेह लुटामत  ।
 
हिंदी भावार्थ :—
मेरा मन आपके नटवर स्वरूप को ध्यान करता है।
 श्रीश्यामसुंदर की छबी सब कुछ भुला देने वाली  है।
 सबको मूल ध्यान से  हटाकर स्याम रंग में सरावोर
कर देती है।   डुबा  देती है।  हरे बान्स की बासुरिया
अनौखा राग गाती है।  जब यह बजती है।  तो गायें
भी भूख प्यास छोड़कर जड़ होकर  कान लगाती हैं।
 गोपाल कहते है होंठो पर नाचने वाली यह प्यारी
मृदुल वंशी की धुनि ब्रजमंडल मैं प्रेम लुटाती है।
[       ]
[ गुपाल हिय उदगार रस माधुरी   ]
नाथ ,न ,मोहै  ,और  , लजाबऊ ।
बाढ़हि  ,   अहम    , आबरन  ,  दोनों     ,      मोकूं      नाथ        उबारऊ ।
निरखों   ,नाथ    ,  सलौनी    ,  सूरत      , थिर    हौं    पलक   न  ,मारऊ ।
राखों ,हिय,मोहक , छबि  ,प्यारी           ,      संग    ‘’गुपाल’’  ,ठकुरानी  ।
हौं , हूं , सदा ,दास ,चरनन ,कौ               ,     मांगों ,  जेहि  , मन ,  भानी  ।
सहज, पार , हो, तरनि, हमारी             ,      निरखौ  , प्रभु ,  मोई  ,     ओर।
दया  ,   करौ  , दासन, पै,  मोहन       ,      चहुं     ,  दिस   ,  राधे , घोर  ।
हिंदी अर्थ  ;——-  
प्रभु ,मेरे को ,अब ,मत शर्मिंदा करवाऔ। मेरा अहंकार
का ,आवरन ,बढ ,रहा है , हे नाथ ,मुझे ,इससे ,बचालो ।
मैं , सदां  ,सुन्दर ,छवि को, एक, टक ,देखता रहूँ , तथा,
एक भी ,पलक, न ,मारुं । हे स्वामी, मेरे ,हिया में , सदां
,आपकी  ,नट नागर छबि हो तथा,साथ मैं ,श्री राधे, लाड़ली
हों। मैं ,सदां से ,आपका ,चरण ,सेवक हूँ  गोपाल के, मन की
,यही ,मांग ,है   ।  हे स्वामी ,कृष्ण ,मेरी , ओर ,देखने भर
,  से ,मेरी, तरनी ,आसानी से,   पार हो ,जाएगी । हे स्वामी
,मेरी ,ओर, देखौ । गोपाल कहते हैं, स्वामी , अपने ,दासों
पर, कृपा ,करिये , उनके ,चारों ,ओर, श्री राधे की, घोर
[ ध्वनि ] सुनाई, देती, रहे ।
[      ]
[   गुपाल , हिय उदगार रस ,माधुरी  ]
हौं  ,तौ  ,चरनन ,दास ,संवरिआ ।
स्याम  ,कलेबर ,स्याम  लटेबर              ,        सुंदर    , तोर ,   पंखुरिआ ।
बंसीरस ,बरसाबन ,मधुमय                      ,  बारुं  ,    नाथ  ,     उमरीआ ।
प्रेम, उडेलत, भर-भर, झौरी                    ,  खोलै   ,  प्रेम ,       खिरकिआ ।
पीताम्बर ,    नटनागर, अचकन                ,    गोपीन   प्रेम      ,नचइआ    ।
श्री  कृष्ण,       हरे , गोविंद,      हरे       ,         साधक  , साध   , सधईआ ।
करऊ  , कृपा ,निज ,दास ,जान             ,    भगतन ,जग ,        तरबईआ ।
हिंदी अर्थ  ;——
श्री कृष्ण प्रभु ,मैं ,तो ,आपके,  चरणों का ,दास हूं। हे ,श्याम रंग ,, श्याम
लटाओं वाले ,श्याम सुन्दर  तुम्हारे ,सिर पर , सुन्दर , पंखुरिया है।
आपकी ,वंशी से , जो ,मधुर रस, बरसता है उस पर में ,, हे स्वामी ,
अपनी पूरी ,उमर को ,  न्यौछावर ,करता हूँ । प्रभु श्री कृष्ण आप
वंशी मैं भर  भरके ,  प्रेम को उड़ेलते हैं, बहाते हैं  । मेरे हिरदय की ,
प्रेम की, बंद खिड़की ,अपने आप ,खुल जाती है । पीला वस्त्र ,नटो
सी, वेषभूषा ,तथा अचकन ,पहने हुए ,आप ,गोपियों को, नचाने
वाले हो । , हे कृष्ण, हे गोपाल ,तुम ही साधकों के ,साधक  हो।
हे प्रभु! अपना ,दास ,जानकर ,कृपा ,कर दो ताकि, मेरा ,उद्धार
हो ,सके। आप भक्तों के ,तारने वाले हैं। कल्याण ,करने ,वाले हैं।
   ]
         [ गुपाल  बियोगरस माधुरी ]
 
     ।। सुनी स्याम मधुपुरी कूं  जांई ।।
   आकुल ठाडी सगरी जुरिमिल  सुनि बियोग  मुरझाईं   ।
नेह भाब गोपिन भरमाबत  ग्यान गंग   बह जाई ।
मरजादा जग प्यारी राखौ  नाहक जगत  हंसाई ।
खिलखिलाय हांसी ब्रजबासिन  छलिया फिर  बहकाई।
गाढौ   नेह गांठ गुनबारी  खोलें  त्यौं  कस जाई।
प्रेम मूरती  गोपिकुमारीं  ‘’गुपाल ‘’ लीन सुबकाई।
 
 
 
हिंदी भावार्थ :— –
सखियों [गोपियों ] ने सुना स्याम मधुपुरी [ मथुरा ] को जा रहे हैं।
अत्यन्त व्याकुल होकर सब एकत्र हुई।  कान्हा के पास आगयी।
मन में प्रेम भाव रखते हुए गोपियों को ज्ञान की गंगा में बहाने की
 कोशिश कर रहे हैं।  मर्यादा में रहने संसार में जग हॅसाई की बात
कर रहे हैं। ब्रजवासी स्त्रियाँ  लडकियाँ बोलीं अरे छलिया तू हमें
बहका रहा है।  अरे तुझसे हमें गाढ़ा प्रेम हो गया है।  प्रेम गाँठ
ऐसी गुणों से युक्त है। खोलने की कोशिश करते ही उल्टा कस
जाती है।  अर्थात खोलने  से और लग जाती  है।  प्रेमावतार
गोपियों को  प्रेम में लीन देख गोपाल कहते है। श्री गोपाल
कृष्ण को भी आँखों में आंसू आ गये।
  [    ८   ]
        [       गुपाल , हिय उदगार रस ,माधुरी      ]
।।  माया  ठग   मोहि गैल भुलामत ।।
सांचै  पथ  पै चलन न देई मनमें   मोह  जगामत ।
मोह बढत अति   लोभ बढ़ामत   ग्यान  बिबेक  मिटामत ।
चाहत पूरी होइ न   प्रानी  क्रोध   हिऐ  उपजामत ।
अपढारौ मद बढत क्रोध सों  हिंसक  मनुज  बनामत ।
अकरम करम सबइ करि  डारै   सुकरम  नांइ  सुहामत ।
भजि लै हरि ‘’गोपाल ‘’निरंतर   माया  दोस  नसामत ।
 
हिंदी भावार्थ :—
माया  मुझे धोखा  देकर सत्य मार्ग से डिगा  देती है।
 गोविन्द की यह माया जीवन का हर रास्ता भुला देती है।
   मोह जगाकर सत पथ से डिगा देती है।  मोह बढने से
लोभ बढता है।  जो विवेक को  खा जाता है।  प्राणियों की
इच्छा पूरी न होने से क्रोध उपजता है।  घमंड़ और क्रोध
दोनो मिलकर हिंसा को बढाते है।  हिंसक मनुष्य अकरम
करम सब कर देता है।  केवल सुकरम नहीं सुहाता है।
गोपाल कहते है।  हरि के निरंतर भजन से  माया के
सभी दोष नष्ट हो जाते है।
[    ९
     [       गुपाल , हिय उदगार रस ,माधुरी      ]
कन ,कन ,कृष्ण, हौं ,तोइ  ,निहारूं  ।
तोइ  ,अर्चना ,सुमरुं ,तोई                 , चरनन  ,      जीबन ,   बारुं  ।
प्रतिदिन, ध्या बौं   ,स्वामी, मोहन     ,    जग  बिच ,  महान , सुकाज ।
हीऐ   ,अंतर  ,  लेओ, बसाई      ,    कृपाबान   ,             महाराज ।
बिसर, ना  ,जाऐ , लक्ष्य  जीबन        ,    मांगों      , हरी     ,    बरदान ।
चंचल मन रह ,किंकर  ,प्रभु  जी ,       अमर रहै, मोइ  , आन ।
होअ  ,   कृपा, सदां ,मनभाबन    ,    दास    ‘’गुपाल ‘’    अरदास।
बुद्धि, बिमल ,मो ,राखौ ,  मोहन   ,  हौं ,तौ              दासानुदास।
हिंदी अर्थ  ;——
प्रत्येक ,कण में, श्री कृष्ण ,आपको, देखूं  । मैं , तुम्हारी  ,अर्चना  करूँ  ।
तेरा ,ही ,सुमरन करूँ तथा तुम्हारे चरनों में अपने जीवन को न्यौछावर
कर दूँ । आपको, प्रत्येक दिन, प्रत्येक क्षण ,ध्यान करूँ । यह सुन्दर कार्य
,रोज, होवै । हे, कृपा सागर ,हिये, के ,बीच , तुम, हमेशा,  रहो। जीवन ,का
,लक्ष्य ,विसर न, जावे । में ,झोली, फैलाके ,माँगता, हूँ । यह, चंचल मन,
तुम्हारा ,दास ,बना, रहै। तथा, मेरी ,आन, भी, बनी ,रहै। हे ,प्रभु कृष्ण ,
मेरी बुद्धि ,हमेशा ,निर्मल ,बनी रहे । में,, तेरे ,चरणो का ,दास ,बना रहू।
  आपकी ,किरपा की ,बरसा से, मैं , हमेशा ,भीगता रहूँ ,,हे ,प्रभु कृष्ण ,
मेरी बुद्धि ,हमेशा ,निर्मल ,बनी रहे।,हे ,प्रभु ,कृष्ण, मैं ,आपके ,सेवकों
,का, भी ,सेवक, हूँ।
             [  १ ०     ]
[       गुपाल , हिय उदगार रस ,माधुरी      ]
स्यामा ,बुझा  ,स्याम ,कित ,पाबईं  ।
कौन, गांव,  , कौनों ,बन ,  गबनुं        ,   माधब ,   हरी    ,   मिल ,   जाबईं      ।
दरसन ,करऊं  , मुकुंद ,मोहन      ,           मन , भरै  , नांहि ,       लुभाबईं   ।
तनमन  ,बारों ,  लली , लाल, हौं     ,   सुंदर , स्वरूप                ,       सुहाबहीं  ।
स्वामिनी  ,कहा    ,    खेल  ,तेरौ ,                      भटके ,       मनख  ,     भटकाबईं  ।
‘’गुपाल’’  ,  दासानुदास ,  मोहन               ,      छबीली ,       छैल ,    मिलाबईं     ।
हिंदी अर्थ  ;——
हे राधिके, मुझे, बताओ ,कि श्याम सुंदर  ,मुझे ,कहाँ , मिलेंगे।
 में ,किस ,गाँव  तथा किस , ,किस ,बन ,मैं ,जाऊं ,जिससे ,मुझे ,श्री कृष्ण प्रभु ,
मिल जावें,जहाँ पर ,मेरी ,मुलाकात , माधब कृष्ण से ,हो सके ।  हे ब्रजेश्वरी ,
उनके ,दर्शन ,कर ,मेरा ,मन ,नहीं ,भरता, है ।  में ,अपने ,तनमन ,को ,तुम ,
दोनों पर, न्यौछावर ,करता, हूँ , आप , दोनों , का ,  सुंदर स्वरूप , बहुत ,ही ,
अच्छा ,लगता, है हे ,स्वामिनी तेरा ,क्या ,खेल ,है ,जिससे ,आप ,भटके ,हुए
,मनुष्यों ,को ,भटका ,देती, है ,  हे ,छबीली , राधिके , मैं , मोहन , का , दास
,हूं , उनके ,दासों ,का ,भी ,दास , ,हूं ।अत ,मुझे ,श्रीकृष्ण ,मनमोहन ,से ,
मिला ,दीजिये।
[  १  १ ]
[       गुपाल , हिय उदगार रस ,माधुरी      ]
काहे ,ढुंढत, तू ,  नित, नई, ठौर  ।
केवल ,ऐक, सहारौ, मोहन              ,  सततई    , खोली    ,        पौर ।
दया ,सिंधू  ,हरि ,छोड़ ,दूसरौ        ,        और    ,हि तू  ,  कोउ,   नांइ ।
त्राहि  त्राहि , कर ,टेर, बाबरे           ,            दुख ,खोजे, नहिं ,   पांइ  ।
हंसन , हार  ,बहू   ,जग , प्रानी     ,                    टोटौ ,देइ   ,   सहारौ ।
हरदम ,संग ‘’ गुपाल ‘’ कृष्ण  प्रभु   ,          ब्रज  ,कौ,, नैनन, तारौ ।
हिंदी अर्थ  ;——
””तू ,नित ,नई , ठौर, क्यो ,ढूढता हैं। भगवान ,का ,दरवाजा ,तेरे ,लिए
,सदा ,खुला ,रहता हैं। तथा, वे ,तुझ, पर , हमेशा ,कृपा ,बरसाते हैं ।
दयालु ,ईश्वर को, छोड़कर ,दूसरा ,हित ,करने, वाला कोई और नही हैं ।
एक बार ,शरण, शरण, हूँ  ,की ,टेर ,जो ,लगा, के, देख, ये ,दुख ,खोजने
, से  ,भी, नही, मिलेंगे।  संसार, में ,हँसने ,वाले, बहुत, अपमान ,करने
, वाले ,बहुत , हैं  । तथा ,दुख ,को ,समझने, वाला ,आसूं  पोछने वाले
, वाला ,बहुत ,कम, हैं। आपके ,प्रत्येक ,क्षण ,साथ ,देने, वाला, केवल ,
एक, गोपाल ,के, प्रभु कृष्ण ही , हैं। जो, समस्त, बृज, के ,नयनों, के,
तारे ,हैं ।
[  ]
 
       [       गुपाल , हिय उदगार रस ,माधुरी      ]
।।   प्रानी ’मै’’ सगरे काज बिगारै ।।
मैं न रही दसासन  महीपति  काल बुहार   बुहारै ।
परसराम रिसीबर ‘’मैं ‘’  हारी  गंगासुत   सों  हारे ।
धनुस जग्य कोप मुनी कीनों   राम मिलन सुख धारे ।
मैं ना रही बीर पारथ   जिन  भारत   करे करारे ।
भीलन छीन गोपिका लीनी  हाथ   धरन   पै मारे ।
‘’गुपाल ‘’ मैं मैं  सार हीन  सब   माधब   करिबे    बारे ।
हिंदी भावार्थ :—-
हे प्राणी हे मनुष्य यह अहॅंकार समस्त कार्यों को बिगाडने वाला है।
 रावण के अहॅंकार का भी नाश हुआ था । जिसके यहाँ काल भी झाडू
लगाता था । परशु राम के अहॅकार का भीष्म के साथ हुए युद्ध में नाश
हुआ । भीष्म ने सिद्ध कर दिया वे अपने प्रण से नहीं डिगेगें ।  सीता के
स्व्यम्बर मैं श्री राम से मिलकर उन्होंने क्रोध को छोड़ दिया  और वे
सुखी हो गये ।और क्या कहना वीर पार्थ को भी भीलोंसे हारना पडा ।
जो महाभारत के युद्ध के नायक थे ।श्री अर्जुन से भीलों ने गोपियों को
छीन लिया पश्चाताप स्वरूप उन्होंने अपने हाथों को धरती पर पटका ।
गोपाल कहते है मनुष्य वृथा ही मैं मै करता है। यह बिलकुल महत्व हीन
है करने वाले तो श्री हरि हैं।
 
[        ]
 
     [       गुपाल , हिय उदगार रस ,माधुरी      ]
          
।।  मेरौ मन ऊंचौ  उडिबौ चाबै ।।
कबहु ब्यौम मैं चक्कर खाबै  कबहु  अबनि   पै  आबै ।
कबहु बनै पृथ्वी पति छन में  छन में त्याग  दिखाबै ।
गिरी समंदर धरनी नभ जल  पल  मैं  मोइ  घुमाबै  ।
मन आधीन भगे जग जेही   नर सो अधिगत   पाबै ।
धर लै ध्यान ‘’गुपाल ‘’अरे तू    मनवा  तोहि  नचाबै।
 
 हिंदी भावार्थ :—-
मेरा मन ऊंचा उड़ना चाहता है। कभी अंतरिक्ष व  कभी
धरती पर आ जाता है। कभी यह मनुष्य को पृथ्वीपति
बना जाता है। तथा  त्याग भी दिखाता है। एक क्षण में
पहाड़ों समुद्र धरती की सारी सैर करा देता है। इसके
अनुसार चलने वाला मनुष्य अधोगति को चला जाता है।
  अरे मनुष्य तू गोपाल का ध्यान धरिले।  यह  मन तो
तेरे को नचाता है।
  
 
 
 
                       १  ४     ]  
 
       [       गुपाल , हिय उदगार रस ,माधुरी      ]
            
 
।।  काहू  संग  न संपदा  जाबै ।।
अटल सांच  झूंठे  जग मांई  मूरख मनुज भुलाबै।
जगत ख्यात जल महल निहारत   मनबा   घनौ    हिराबै ।
कैसैं बने,  किनन  बना दिऐ  ,खोज  नांइ   अब    पाबै।
जगत जीत मथि  डारौ जिननैं   जोधा   खाली   जाबै।
अरून रंग धरनी जिन    कीनों  मरन    समय   पछताबै।
माया तजि’’ गुपाल ‘’ माधबहरि    क्यों    ना हेत  लगाबै ।
हिंदी भावार्थ :— –
माया किसी के भी संग नहीं जाती है।  यह इस जग का
अटल सत्य है।  फिर भी मनुष्य भूल जाता है।  जगत
ख्यात जल महलों को देखकर मन  हैरान होता है। कि
किसने इन्हैं बनाया तथा कैसे बने।  सारे संसार को
जीतने  वाले योद्धा भी खाली हाथ गये।
धरती का रंग लाल कर देने वाले योद्धा भी मरते समय
पछ्ताते हैं।  अरे गोपाल माया को छोड़कर भगवान से
तू हैतु लगाले। उन्ही का ध्यान कर।
 
[   १  ५  ]   
  
[       गुपाल , हिय उदगार रस ,माधुरी      ]
 
।।  माया चंचल  भरई सरारे ।।
मेरौ भैआ मेरी मैआ     ,  कुटम्ब   बंस  सब   न्यारे  ।
बडी  जात  मेरी बडी   बात , कुलीनन          काज    करारे ।
मान बडाई प्रान  प्रतिष्ठा ,   अहम    बढ़ामन          बारे ।
यासों चाहौ मुकती  आपुन  ,    गोबिंद   टेर               लगारे ।
गैल   सुझाई   सांच ‘’गुपाला ‘’ मन तन सोंहि  अपना रे ।
 
हिंदी भावार्थ :—-
माया जगत में पूरी तरह व्याप्त हैं।  वह बड़ी चंचल है।
 लम्बी कुलांचे लगाकर संसार को आगोश मैं ले रही है।
 मेरी माता मेरा भाई मेरा कुटम्ब सब अनौखे हैं।   सभी
को कुल खानदान बहुत ही प्रिय है। तथा सबसे भारी
लगते हैं। बड़े लगते हैं।  हैं  मेरी जात भी बडी है। इसकी
  बात भी  बड़ी है।  जो जगत में भारी है।   छोटी जात
वालों से अलग है।  मान बडाई प्रान प्रतिष्ठा  गोपाल
सब बात बिगारने वाले है।  अगर इससे छुटकारा पाना
चाहते हो।  तो भगवान से हेत लगा लो।  यह रास्ता
गोपाल ने उत्तम बताया हैं।   यही समस्त अंधकार
को हटाने वाला है। इसे तुम तन मन से अपना लो।

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