गोपाल अलौकिक रस माधुरी

 
         [     ] 
 
 [  गुपाल अलौकिक रस माधुरी ]
 
 
       ।। सांबरे तो सौ नांहि कृपाला ।।
भारत में पारथ रथ हांक्यौ   तुमइ नंद के लाला ।
स्यामा चीर बढायौ केतौ हे प्रभु  दीन दयाला ।
भगत जान भीसम प्रन राख्यौ  चक्र लीन ज्यों काला ।
दीन सुदामा निरख द्रबित भये  जगत बंधु  जग पाला  ।
दई पूतना जननी ज्यौं गति  पी कें जहर कराला ।
भज  ‘’ गुपाल ‘’ गोबिंद गुपाला  गह कर कंठी माला  ।
 
 
हिंदी भावार्थ :–
हे कृष्ण तुम्हारे जैसा दयालू कोई दूसरा नही है।   कृपा
करने वाला कोई नहीं  है।   महाभारत के युद्ध में तुमने
अर्जुन का रथ चलाकर दिशा दी, आपने अर्जुन को
महाभारत का नायक बना दिया ।   आपने द्रोपदी के
चीरहरण करते समय चीर को बढाकर कृपा की ।
 भीष्म के प्रन को अमर करने के लिए रथ का पहिया
निकाल कर आप स्वयं काल बनकर दौड़े, अपने प्रण
को दिया ।  गरीब सुदामा को देखकर आप द्रवित हो
गये।  हे जग के पालनहार आपने जहर पिलाने वाल
पूतना को आपने माता की गति दे दी  गोपाल कहते
हैं, हे गोपाल  तू  माला  लेकर ऐसे   श्री हरी  गोविन्द
गोपाल कृष्ण का भजन करिले।
 [ २]
[  गोपाल  अलौकिक रस माधुरी ]
 
।।   कन्हाई तुम जग  पालन हारे ।।
कृपा  तिहारी   भानु ससि सब   निस  दिन   करहिं उजारे ।
नीलगगन बिच  झिलमिल झिलमिल   कर    रहे  अगनित   तारे।
सस्य   स्यामला धरनी हरि   दृश्य   रुचिर   अती प्यारे ।
सलिला सलिल  सुखारी  बहतीं   प्रानीन    बारे     न्यारे।
सूत्रधार  गोपाल  कृष्ण  जग ‘’गुपाल ‘’प्रभू  मन  प्यारे ।
 
हिंदी भावार्थ :—
हे कृष्ण तुम जगत का पालन करते हो।    तुम्हारी कृपा से
चन्द्रमा सूरज रात और दिन उजाला करते हैं। नीले आकाश
मैं तारे  झिलमिल झिलमिल करते हैं।   सबका पोषण करने
वाली धरा का मेघ सहारा बनते है। इस सुन्दर धरती के सभी
दृश्य बड़े मनमोहक हैं। वन देने वाली नदियां सब जीव
धारियों का कल्याण करती हैं।    हे कृष्ण आप जग के
सूत्रधार हो। गोपाल कहते हैं,  गोपाल के प्यारे प्रभु तुम
बहुत  ही  प्यारे  हो।
 
[ ३]
[ गुपाल अलौकिक रस माधुरी ]
 
।। प्रभु तुम जन जन के रखबारे ।।
                अभय करे सब  भगत  प्रभु जी  कंस  चानूर  संहारे ।
                उग्रसैन नृप राजतिलक  कियौ  अधिकार रखाबन    हारे ।
                अहम पुरंदर ब्रज  नस दीनों   गिरराज उठाबन   हारे ।
                सांदीपनि सुत लाइ दिऔ  हरि   यमराजा  खुले किबारे ।
                जयत कृष्ण जय कृष्ण कृष्ण तुम   कुबजा दुख टारन हारे ।
                            ‘’गुपाल’’ सरन तिहारी लीनी   कारी  प्रभु   कामर बारे ।
 
हिंदी भावार्थ :—
 हे कृष्ण तुम जनजन के रखवारे हो। आपने सभी भगतों को कंस चानूर
को मारकर भयमुक्त कर दिया । आपने उग्रसैन का पुन राजतिलक कर
दिया । और उनके अधिकार की रक्षा की । इन्द्र के अहम[ घमंड ] को
चूर करने वाले आपने गिरराज उठा लिया ।  आपने गुरू सांदिपनी के
पुत्र को यमराज के यहाँ से ला दिया।    हे कुबजा के दुख हरने वाले
आपकी जय हो । गोपाल कहते हैं गोपाल ने भी हे कारी कामर वाले
 श्रीकृष्ण  आपकी शरण ली है
 
 
 
 
 
 
 
[  ४    ] 
 [  गुपाल अलौकिक रस माधुरी ]
 
।। स्याम बिगरी के बनाबन हारे ।।
बिगरी बनाई उग्रसैन की  राजा मथुरा  बारे ।
पांडव बिपदा घोर बिडारी गोबिंद नाथ  सहारे ।
नरसी टेर सुनी हरि  तुमही   बूढ़े  गाढा  बारे ।
झूंनागढ हुंडीन की बरखा  कीन्हीं  मोहन   प्यारे ।
इंदरकोप भयौ ब्रजभूमि नख पै गिरबर धारे ।
तेरीहु बन जायै ‘’गुपाला ‘’ भज लै बंसी बारे ।
 
 
 
 
 हिंदी भावार्थ :— हे गोपाल  हे स्याम आप बिगडी के बनाने वाले हैं।  आपने उग्रसैन की बनाई। जिससे वे दोबारा  मथुरा धीश हो गये। पांडवो की समस्त कठिनाइयों को हर लिया। नरसी का आमंत्रण सुनकर आपने  गाढा को चलाया तथा हुंडीन की वर्षा कर डारी। इंद्रकोप से आपने गिरिराज उठाकर ब्रज को बचालिया।  आप गिरधारी हो गये  गोपाल कहते हैं।  अरे गोपाल तेरी भी बन जायेगी। तू भगवान का भजन कर।
 
[      ]
[ गुपाल अलौकिक लीला  ,रस माधुरी ]
सारें , प्रभु ,दुखियान ,सब, काज ।
कंस ,हन्यौ हरि ,उग्रसैन, निरप               ,         दीनों    ,मधूपुर  ,   , राज ।
भरत , बंश , निरपन   ,रजधानी                    ,            भीसन ,अजऊ  , कलंक ।
रजस्वला ,   सतीत्ब  ,  बिगारन                   ,  फैकत , डंक , पै    ,    डंक  ।
भीसम ,द्रौन ,विदुर ,नर ,ज्ञानी                     ,    चक्षू    ,कीये   ,        पाबंद 
धृतराष्ट  , सुकृत  , निज, जानों                     ,      नैनन  , सौं   , रहे  ,  अंध ।
टेरत ,टेर ,थक, गई,  बानी                           ,  द्रुपद सुता       ,मन   ,      हारी।
               लागी ,   लगन  श्री  गुपाल प्रभू            ,    हारौ       , खैंचत     ,   सारी ।
हिंदी अर्थ  ;——प्रभु ,सब ,दुखियों की, सुनते है। उनके ,सभी, कार्य, पूरे ,करते ,हैं ।  कंस ,को मारकरउग्रसेन जी ,के, लिये, उन्होने ,मथुरा ,का, राज, दे  ,दिया,। भरतवंश , की ,राजधानी ,हस्तिनापुर ,को, महाकलंक ,लगा। रजस्वला ,द्रोपदी ,को, नग्न करने, हेतु, विषैले ,डंक ,[कुतर्क ]चले। । भीष्म, द्रोणाचार्य, विदुर ,जैसे ,महानरों ,ने ,अपने, नेत्र ,बंद ,कर ,लिये, तथा ,वे ,धृतराष्ट, के ,अंधा ,होने ,को ,उनका ,पुण्य ,मान, रहे, थे। पांचाली ,आवाज ,लगा  ,लगाकर ,थक ,गई ,और ,मन , से ,हार ,गयी । तो ,उसने, हे ,गोपाल के, प्रभू ,आपको ,पुकारा ।,आपने ,साडी को ,इतना ,बढ़ाया ,की  ,खींचने ,वाला ,थक ,गया,  और ,महारानी ,नंगी ,होने से, बच गयीं ।
                    
[     ६  ]
[  गुपाल , अलौकिक  लीला ,रस माधुरी ]
बंसी  , कटि , कर, में , दधी ,  रोटी ।
आनन ,माखन , मंडित  सुन्दर        ,  मोर   मुकुट, प्रभु ,   चोटी।
छीन ,छीन कर , भोग ,लगाबै           ,जनक ,जगत ,बुधि ,लोटी।
माया , बस बिधिना हरि ,कीनै         ,  सोच,  रहे , मन ,  खोटी।
धैनू  ,बच्छ ,बाल ,     हर ,लीने         ,   हुंगे ,गिनती ,    कोटी  ।
ब्रह्म  लोक    ,बिधना,  जी, गबने        ,        सब देबन के   ,  चोटी।
प्रभू  ,गुपाल ,  रचे  ज्यों के त्यों      ,धैनु    ,चर    ,  भई ,मोटी ।
बरस ,बीत, जांचन , बिधि, चाले  ,   परे,      धरन,    पग,      लोटी ।
हिंदी अर्थ  ;——
भगवान की ,कमर मे ,,वंशी , ,तथा ,हाथ मैं  ,,माखन,, रोटी है। तथा ,उनका ,सुन्दर मुख, दही से, सना हुआ , बिगड़ा हुआ है ।    सिर ,पर ,मोर, मुकुट है। कृष्ण ,अपने ,सखाओ ,से ,छीनकर ,खा ,रहै ,है। ब्रह्रा जी ,देखकर ,माया ,के ,वश,  मे, हो ,गये ।  गाय ,ग्वाल ,गोप ,बाल बछड़े, को, चोरी, कर,  लिया  तथा  भगवान, को ,छोडकर ,सभी ,देवताओ, मे, श्रेष्ट ,ब्रह्रा जी, ब्रह्रलोक ,चले ,गयें । भगवान, ने , सभी, को ,ज्यो ,की, त्यो ,बना, दिया। ब्रहमा ,का, एक, दिन ,संसार ,की ,एक, साल, बीतने, पर, आकर ,देखा, गाय ग्वाल ,व ,श्री कृष्ण ज्यौं , की , त्यौं , है। ब्रहमा ,जी ,श्रीकृष्ण, के, बारे, मैं ,आस्वस्त ,होकर, उनके ,पैरों मैं, गिर, पड़े ,और ,उनके, चरणों, मैं  , लोट , गये।   तथा ,क्षमा, मांगने, लगे ।
[  7  ]
[  गुपाल ,अलौकिक ,रस ,माधुरी ]
करहूं  , प्रनाम , जोर ,  कर स्बामी  ।
स्तुती, करौं  ,    ध्यान ,निज लीजै                    ,  दीन, हीन,        हौं, कामीं।
जल ,पूरित ,नभ रंग, कलेबर                                  ,  पीतांबर   ,           उदभामी 
नन्द , तनय, कर, देउ,  क्षमा अब ,                         , जान दास      आयामी 
मोर  पंख, कुन्डल, बनमाला                                    ,लकुट, बिगुल ,बहु,  धामी 
‘’गुपाल’’ चरन ,कमल ,उर धारौ                                 ,  बंशी, धर  ,     ब्रजस्बामी ।
हिंदी अर्थ  ;——
में ,आपको, अपने ,हाथ, जोडकर ,प्रार्थना ,करता हूँ । में ,आपकी, स्तुति ,करता हूँ । उसे, आप ,सुन लीजिये।  आप ,मुझ ,तुच्छ ,तथा इच्छा, रखने, वाले ,पर, प्रसन्न ,हो ,जाइए। मेंघो ,से ,,भरे ,हुए, बादल के ,समान ,नीले ,रंग, वाले, पीतांम्बर ,,ओढे हुए ,हैं , नंद ,जी के, बेटे ,अपना ,दास ,जानकर ,मुझे  ,क्षमा ,कर दो । मोर ,की ,पन्ख , कुडल ,वनमाला ,लकुटिया तथा वंशी,  धारण, करने ,वाले, ब्रज ,के ,स्वामी के चरणो, को, अपने, ह्रदय, में, रखूं ।  ऐसी, कृपा, कीजिये।
[      ]
[  गुपाल ,अलौकिक ,रस ,माधुरी ]
कहईं   , मोइ  ,सब , सृष्टा ,जग, कौ।
दूर ,दूर ,तक, सांच  , ना     , एई    ,       सत्य , कृष्ण  ,है ,     सबकौ ।
गंबई   ,सूरत, गोबिंद   ,सुंदर ,       ,   सान्यौ, मुख  , दधि रस कौ ।
कौन ,कहै, एहि, ब्रम्ह, ब्रम्ह ऊ     ,    मानइ ,  नांइ   ,      अंतर, कौ।
चोरी, कीन ,धैनु, धन ,अगिनित     ,    चक्कर , प्रभु     , माया, कौ।
टूटौ, दम्भ , भयौ ,निर्मल , मन  ,       पायौ,  ब्रज सब, ज्यौं , कौ।
गोप,  बाल ,संग, रमें , स्याम जु    ,       कहा ,  काम , अंतर, कौ।
‘’गुपाल’’    ,करै ,बिधि बाबा ,स्तुती   ,      ग्यान , हिरदय,बरनन, कौ।
हिंदी अर्थ  ;——
मुझे  ,सब, सृष्टी ,का, जनक, कहते, है ,पर, यह, बात, सत्य, नही, है । क्योकि ,इसका, सृष्टा, भी, तुम ही, हो। यही ,सत्य, है , कृष्ण ,सबका ,पैदा ,करने ,वाला, है, गांव , वालो ,की ,सूरत , हाथ, में ,रोटी  , टुकडा तथा माखन ,से, सना  , मुख, देखकर ,कौन, कह ,सकता,, है। कि, यह ,ब्रम्हा, का , भी, ब्रहम ,है। तुम्हारी, माया, के ,चक्कर ,में ,मेंनैं ,प्रभु  ,गा यों, की ,चोरी ,कर, ली। लेकिन, अब, मेरा ,अहंकार ,खत्म ,हो, गया, क्योंकि ,मुझे ,सम्पूर्ण, ब्रज, ज्यो, का ,त्यों ,मिला । गोपाल ,कहते,  है। कि ,ब्रहमाजी ,भगवान ,की ,स्तुति कर, रहे, है। यह ,ग्यान ,वर्णन, करने ,योग्य है ।  उनका ,हिरदय ,उनके ,प्रभु ,के ,ज्ञान से ओत प्रोत है।
[        ]
[  गुपाल ,अलौकिक ,रस ,माधुरी ]
भौतिक देह ,   , चिन्मय ,एई 
भेद, न   , तन  , मन ,तोइ   , बिधाता        ,  रोम ,रोम ,   कल , लेई 
कर सौं  ,सुनहिं ,नैन , सौं   , भाखें                   ,  चरन ,कमल ,  चल, देई।
स्बामी ,दोस , छमउ  ,निज सेवक            ,    अखमी, भूल ,सनेई।
परम ,ब्रहम ,तू,    हौं , अग्यानी       ,       , नासौ ,     भरम, सनेई 
सुनि  ,सुन,    सुजस ,तरें  जग प्रानी           ,     त्यागें  , नस्वर    ,देई 
‘’गुपाल’’  ब्रहम ,नैन, सौं  ,पानी                 , बहै,  धार , ज्यौं,     मेई 
हिंदी अर्थ  ;——
हे  प्रभु ,आपकी  , यह ,देह (शरीर) ,भौतिक,  नहीं , है, यह, चैतन्य ,स्वरूप् है। तुम्हारे, तन  ,मन ,हे विधाता कोई भी अंतर , नहीं  है। आप ,शरीर, के ,,रोम, रोम, से , मनचाहा ,कार्य ,करवा ,सकते, हैं  । आप ,हाथ ,से ,देख ,सकते, हैं । नैनो , से ,सुन , सकते,  है। चरण कमलो ,से ,चलते, हो । मेरा , अपराध , अक्षम्य , है ,परन्तु  ,मैं ,  आपका प्रेमी ,दास  ,हूँ  हे ,भगवान ,हमारा ,अपराध, क्षमा ,कर ,दो ।  तुम ही परम ब्रहम ,हो, मैं  , अग्यानी ,हूँ ,मेंरा ,भ्रम ,की ,मैं ,ही, परमात्मा, हूँ ,आपने ,खत्म ,करा ,दिया,। तुम्हारी कीर्ति ,सुनकर, संसार ,के ,प्रानी ,तर ,जाते, है । गोपाल, जी ,कहते, है । ब्रहमाजी ,के ,नेत्रों, से, प्रेम का,  पानी धार ,बनकर , बह , रहा  है । मानो ,,वह ,मेघ , की ,धारा ,  हो ।
[         ]                                                                                                                        [  गुपाल ,अलौकिक ,रस ,माधुरी  ]
कछुक ,कहें ,  तुम , निरगुन , दाता।
निर्गुन , हौ ,तौ ,गुन , कस  , प्रकटे,  भानु  ,       सिंधु ,    नभ ,    जाता ।
गुन  ,रूपी ,संसार ,           आपुनौ,    ,     , है को  ,जनक,   बिधाता ।
निरगुन ,सगुन ,एक ,मोइ  ,  लागै                  ,  एकही ,    भाग्य ,     बिधाता।
   हौं ,तौ ,तोर , दास,     मनमोहन              ,    तुहि , जनक   , गुरू, माता।
        सदां ,रटूं, हरि ,नाम, तिहारो             ,    भय हारी       ,   भय दाता।
     हिये ,बसइ  , मन रूप,रसाला                    , सांच   ,  परत     ,  दिखलाता।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
     हिंदी अर्थ  ;——
 
हे ,प्रभु, कुछ ,ज्ञानी ,लोग , आपको, निर्गुण ,कहते ,हैं । अगर, तुम ,निरगुण, हो ,तो, ये ,गुण ,   कहाँ , से, आये, जैसे, सूर्य ,समुद्र , आकाश , आदि। अपना, सारा ,संसार     , गुण रूपी है। आप, ही ,इसके, पिता हो । और ,इतना ,सामर्थ्य वान ,कौन ,हो ,सकता है । मुझे ,तो ,निर्गुण तथा, सगुण ,एक, ही ,लगता ,है। तथा, एक, ही ,भाग्यविधाता ,है। में ,तो ,आपका, ही,, पुत्र हूँ । तुम , ही,  मेरे ,स्वामी ,पिता ,माता तथा गुरू हो। मैं, सदां ,ही ,तुम्हारा, नाम, रटता, रहता हूँ   ।  में  ,भय दूर ,करने, वाले ,श्री कृष्ण ,को ,याद  ,करता  ,रहूँ । हे ,भय, के दाता  ,ऐसा, करो । आपका ,सुन्दर, रूप ,मेरे ,ह्रदय, में, बसा रहे। ब्रहमाजी ने,, कहा। जिससे ,मुझे ,सत्य ,की ,परतों ,का ,ज्ञान ,हो ,जावे ।
[      ]
[ गुपाल  ,परम सत्य रस ,माधुरी  ]
अमृत ,मूल , तू  ,  ही   जग ,स्वामी।
सास्वत ,  ब्रहा  ,  बेद ,जे ,भासहिं       ,       सारतत्ब ,        सायामी।
कोटि ,सूर्य ,सौ ,तेज ,प्रभू ,तो           , निरमल   ,      भगती ,     कामी।
प्रार्दुभाब, तिरौहन, लीला ,                  ,    ब्रज, मैं     ,     बहु ,  आयामी।
अंतर ,बसौ   ,सबइ  , जीबन  , प्रभु     ,      ,    राधा   ,  माधव , स्वामी।
चरम ,परिनति ,ग्यान ,तपस्या          ,      मोहन                    , अंतरयामी।
 दीन,,दसा, बिधना पहचानी            ,  बिचलित         , हिअगौस्वामी।
 ‘’ गुपाल’’ हरि  भगतन ,प्रतिपालक     , भगतन           , इच्छा ,    कामी ।
 
 
 
 
हिंदी अर्थ  ;——
 
ब्रह्मा जी ,कहते, हैं , हे ,अमृत, के, मूल (जड) , इस, जग ,का, अमृत, मेरे ,स्वामी, तुम, ही, हो । वेद, जिसे ,शाश्वत , ब्रह्म, कहते, हैं ,  जिसे ,वेद ,सार ,तत्व ,कहते है ,मेरे, स्वामी ,तुम ,ही ,हो । तुम्हारा ,तेज ,करोडो ,सूर्य के, समान, है। मे ,तुम्हारी ,निरमल ,भगती ,चाहता ,हूँ । आपका ,प्रार्दुभाव ,तिरोहन लीला रस , बृज ,मैं ,पूरा ,परिलक्षित ,हुआ ,है ,दिखाई ,दे ,रहा है । हे ,राधा, के, स्वामी ,आप ,सबही के ,अंदर ,बसे ,हुए ,हो। तुम ,ग्यान ,ध्यान ,की , तपस्या की ,चरम, परिणति, हो । आप ,ही ,सबसे, बड़े ,ज्ञानी, हो ,आप ,ही अंतर्यामी, हो । विधाता, की ,दयनीय ,स्थिति ,देखकर ,गौस्वामी ,श्री कृष्ण,,विचिलित ,हो ,गये । गोपाल ,कहते हैं , भगवान ,भगतो ,की ,सम्पूर्ण ,इच्छाओं को ,पूरी ,करने, की, पूर्णकाम,[ कोई ,कामना ,नहीं ]  होते ,हुए ,भी , इच्छा ,रखते ,हैं।
 
                                                     
                                                                ]
[  गुपाल ,अलौकिक ,रस ,माधुरी ]

      आकरसन ,तोइ , नाम ,गुंसाई।
जल पूरित ,नभ रंग ,सुहानों                ,      नीलबरन ,       सुखदाई।
पीतांम्बर  ,उदभासित, अनुपम ,            ,     मोर, चंद्र ,    मन, भाई।
बिरथा ,लोग ,कहैं , बिधिना  ,हौं            ,   दासनदास    ,   सुहाई    
मायाबस , भूल भई भारी                     , परखे          ,हरि , जगराई 
परै ,धरन ,ब्रहमा , जी, टेरे               , सरन      , देउ ,    यदुराई।
‘’ गुपाल ,छमउ  ,  हौं ,सेवक, तोहि     ,            ,अमर,  रहै ठकुराईं।
 
 
 
 
हिंदी अर्थ  ;——
हे ,गोपाल  ,जी ,आपका ,नाम, भी, आकर्षक, है ,इसमें ,बहुत ,आकर्षण, है । पानी, भरे ,बादलो ,के ,समान ,नीले, रंग, वाले ,,तुम , सुख, देने, वाले, हो । माथे, पर ,मोरमुकुट ,की ,चंद्रिका ,तथा ,पीले वस्त्र ,धारण ,किये ,तुम ,मन ,को ,भा, रहे, हो । मुझे ,लोग ,व्यर्थ, में, ही, सृष्टीकर्ता ,विधना , कहतेहै। मे ,तो, आपका ,दासानुदास, हूँ ।यही ,नाम ,मेरे ,लिए ,उपर्युक्त, है , माया, के ,कारन ,तुम्हारी ,शक्ति , को ,अपनी ,समझने, से ,मुझे ,अज्ञान ,हो ,गया, था  । मैं ,अपने ,स्वामी, की ,परीक्षा ,लेने ,चला, हे ,संसार पालक ,मैंने, सत्य,जान ,लिया।  धरती ,पर ,लेटकर , बृह्मा ,जी ,पुकार, रहे हैं । ठकुरास ,अमर ,हो जाएगी ,हे ,यदुराज, आप, मुझे, शरण ,दे , दीजिए। हे ,गोपाल ,मुझे, अपना ,दास ,समझकर, क्षमा, कर देना । आपकी, ठकुरास ,अमर ,हो ,जाएगी।
 
[  3  ]
[  गुपाल ,अलौकिक ,रस ,माधुरी ]
स्वामी , जगदाधार     , गुंसाई।
कंस हनन ,अबतरन, धरन, पै      ,   ब्रज  मण्डल ,      प्रभुताई।
तरूबर ,कनकन , बास ,तिहारौ      , अगिनित ,    प्रभु कन्हाई।
हनी , पूतना ,दई जननि  गति    ,    दूजन   , संग ,   भलाई।
फूटै , भांड, कंस ,राक्षस कौ       ,   तोही ,        कर ,  यदुराई।
ब्रहम ‘’गुपाल’’   बोल ,मौन ,भये   ,   भाबुकता ,     हिय, आई।
हिंदी अर्थ  ;——
हे ,कृष्ण, तुम ,यदुवंश, के ,स्वामी ,हो ,तुम ही जगत ,के, आधार  हो, सहारे हो । कंस, को ,मारने ,के, लिए ,आपने ,ब्रज में, अवतार ,लिया ,है। यह ब्र्र्रज की बडाई है। हर ,पौधे ,वृक्ष , तथा कण ,कण , आपका ही ,वास हैं ,श्री कृष्ण अनगिनत रूप हैं । पूतना ,को, मारकर ,भी, आपने ,माता ,की ,गति, प्रदान ,की, यह, आपका ,दुष्टों ,पर ,दया ,करना ,दिखाता, है। इस, कंस ,का, भी, पाप ,का, घडा, भरने ,वाला, है। किसी, दिन ,,ऐसा, अवसर, आयेगा। कि ये ,भी, तुम्हारे, हाथ, से ,मारा, जायेगा ।  गोपाल ,कहते, है, ब्रहाजी, के ,ह्रदय में ,भावुकता ,आ ,गई । उनका, गला ,भर, आया ,वे ,मौन ,हो, गए।
[      4 ]
[  गुपाल ,अलौकिक ,रस ,माधुरी  ]
ब्रहमा , उठऊ , लोक , निज , जाबौ ।
करउ  ,करम ,निज ,पूजा ,जानी               ,       मन, में ,     मोद ,मनाबौ ।
माया ,चंचल, दोस ,न , तोई                 ,एहि ,सब  ,      जाल ,  फंसाबौ ।
केवल , भगति , काट ,माया , हरि              ,हिय ,   मंदिर   ,        उपजाबौ  ।
सहज ,  कल्यान,  सृष्टि  जातक तुम             ,मनबा   ,      नेह        ,    बढाबौ ।
करी  , दंडवत,  ‘’ गुपाल ‘’हरि माधव          ,       बिधना   ,  मोद     , मनाबौ  ।
हिंदी अर्थ  ;——
श्रीकृष्ण, जी ,बोले ,हे  , ब्रह्मा, जी , आप ,अपने ,स्थान ,पर ,जाओ । तथा ,अपना, करम, सृष्टि उत्पत्ति के ,कार्य, को ,ही ,मेरी ,पूजा ,मान ,लो  ,मेरी, पूजा जानकर ,खुशी  ,मनाकर ,करो । माया ,बहुत, ही, चंचल, है। तेरा ,दोष ,नहीं , है। इसने ,चारों ,ओर ,जाल, फॅसा ,रखा है। केवल , मेरी भगती ,ही , मेरी माया ,की, काट, है। हिय मंदिर में ,इसे ,उपजावौ। हे सृष्टि के पालक इससे तुरंत ही आपका कल्याण हो जायेगा , ,तेरा ,सहजही ,कल्याण ,होगा। मन मे, नेह , प्रेम ,बढ़ालो ।  ब्रह्मा ,जी ,गोपाल जी, को ,श्रीकृष्ण ,को ,लेटकर ,प्रणाम ,की, तथा ,मन ,में, ,हर्ष ,से, भर, गये।
      ]                                                                                                                                                                                                                                       [ गुपाल ,अलौकिक   ,रसमाधुरी ]
कातर ,  सखा  , दाबानल , लागत।
कृष्ण , कृष्ण , कह टेरत , सब , जन          ,     आबौ , बेग ,  बुलाबत ।
गौधन, संग , जरें ,मनमोहन                         ,  जमुना , तीरे , भाजत।
कछुक, कहत, क्यों, भीत सखा,  तुम                 ‘, कान्हा , हुंगे,   आबत ।
प्रकटे ,स्याम ,पान  अगनी कर                   ,     बाबा  , धैनु ,जराबत ।
लगै ,लगन ,ज्यौं ,स्याम ,सखा , सों               ,   ढुंढे ,दुख , ना, पावत ।
अगनि,  अंशमात्र, हरी , कृष्णा                          ‘’  गुपाल’’ कहा, बिगारत ।
हिंदी अर्थ  ;——-
वन, में ,लगी, आग ,को ,देखकर ,ग्वाल ,बाल ,घबडा ,,गये ,हैं। सभी ,सखा ,कृष्ण ,कृष्ण ,पुकारते ,नही, थक ,रहै , है। गौधन ,समेत ,जलने, का ,भय ,उन्हें, सता ,रहा, है। कुछ ,कह, रहे ,हैं ,जमुना, के, किनारे ,भाग ,चलो, कुछ ,कह, रहे, हैं ,कि , स्याम सुन्दर, पर ,भरोसा, रखो  ,वे , आते ,ही ,होंगे । तभी ,स्याम सुन्दर ,प्रकट ,हो ,गये ,बोले, हे ,अग्निदेव, गायों, को ,क्यों ,जलाते,  हो , और ,अग्नि का, पान ,कर, गये। अगर ,भगवान ,से ,लगन ,लग ,जाये ,तो ,दुख ,तो ,ढुंढे, नही ,रहते है। अग्नि, भी ,भगवान, का, अंश, ही ,तो, है। गोपाल , कहते ,हैं वह, श्रीकृष्ण ,का ,क्या ,बिगाड़ ,सकती,  है । वह ,प्रभु के अंश ,से ,पैदा ,हुई ,है।
[           ]
दुष्ट संहारक     ,जन ,जन ,नायक ।
मारि ,मारि , ब्रज ,कीन ,सुखानों        ,  प्रभु    , दूजन      ,दुःख   दायक ।
हनी ,पूतना , घनी , भयंकर          ,  बाल         , हते   ,  सुखदायक ।
कृष्ण     ,हनन , कंस, निरप, पागल  ,   महाबली  , जिन ,       पायक  ।
अधम ,करम ,कर, चाह, अमरता         ,  बुद्धि         ,खोट  ,  परिचायक ।
सबै ,मुक्ति     , दें प्रभू हमारे          , धन्य        ,  धन्य    , ब्रजनायक   ।
जय ,जय, घोर ,होत ,   ब्रजमंडल  ,     ‘’ गुपाल’’ ‘ धरम   , प्रतिपालक ।
हिंदी भावार्थ :—- भगवान श्री कृष्ण ,दुष्टों को मारने से ,जन जन नायक ,बन ,गये हैं ।   उन्होंने ने ,दुःख ,देने वाले दुष्ट प्राणियों को ,मार , मारकर ,ब्रज को , सुखी ,कर ,दिया है ।  जो बहुतेरी जनता को  कष्ट देते थे ।   उन्होंने ,भयंकर, दिखने वाली ,पूतना को ,मारा ।   जिसने बच्चों की ,बर्बरता , पूर्वक ,हत्या, की थी ।   कंस, उनको, श्री कृष्ण को  ,मारने के, लिए  , पागल, हो ,रहा है ।   बलशाली ,अपने ,सेवकों को मारने के लिए भेज ।  नीच कर्म ,करके ,वह, अमर ,होना चाहता ,है  ,खुद को  अमर  करने के  लिए  वह  उन्हें  मारना  चाहता है ।   उसे    आकाश वाणी का  भय है।   लेकिन ,मेरे ,गोविन्द ,सभी को, मार ,मार कर, मुक्त ,कर, रहे हैं सबको, मारकर, वे मुक्ति ,प्रदान ,कर, रहे हैं ।   उन ,जैसा , कृपासागर ,कोई ,नहीं है धर्म के ,किये ,गये, कार्यों के कारण ,उनके ,नाम की, घोर ,ब्रज ,मैं व्याप्त है।

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