नारी करुणाकर कीर्तन रस माधुरी

श्रीकृष्ण भजौ श्रीकृष्ण कहो       श्रीकृष्ण माधव सार है ।
श्रीकृष्ण कृपासागर जगत             कृष्ण कृपा संसार है ।
श्रीकृष्ण करुणा दयासागर              दयालू दयावतार है ।
कृष्णा मानव जीत ‘’गुपाला ‘’श्रीकृष्ण बिन सब हार है
श्रीकृष्ण राधे भजौ निश दिन           गोपाल बेड़ा पार है
श्रीकृष्णा महायोगी मही              योगी जनन श्रृंगार है ।
श्रीकृष्ण ध्यानी श्रीकृष्ण ग्यानी  उपदेशक सद विचार है ।
श्रीकृष्ण मानवता सहारे                मानव धर्म आधार है ।
कृष्णा मानव जीत ‘’गुपाला ‘’  श्रीकृष्ण बिन सब हार है
श्रीकृष्ण राधे भजौ निश दिन             गोपाल बेड़ा पार है
श्रीकृष्ण अनुपम इष्ट प्राणी   बिन इष्ट जीवन   ख्वार     है   ।
श्रीकृष्ण पूरण बृह्म  प्यारे      सोलह   कला      अवतार   है    ।
श्रीकृष्ण ध्यावत रहत जे  नर    आवै  नहीं दुख    ब्यार   है      ।
कृष्णा मानव जीत ‘’गुपाला ‘’    श्रीकृष्ण  बिन सब  हार  है  
श्रीकृष्ण  राधे  भजौ  निश दिन      गोपाल   बेड़ा   पार     है    ।    
 
श्रीकृष्ण साँचे  मीत  प्राणी       जगत     मीत   व्यहवहार है    ।
श्रीकृष्ण  द्रोपद सखि  सहारे     सारथ्य  पार्थ    स्वीकार   है   ।
दरिद्रता  दावाग्नी  सुदामा     चुप    भर     दिये    भंडार   है ।
कृष्णा  मानव  जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण बिन सब हार है 
   श्रीकृष्ण  राधे भजौ  निश दिन      गोपाल  बेड़ा  पार  है   ।    
कृष्णा  आनंदकंद   माधव         आनन्द   प्रेम  विस्तार  है ।
श्रीकृष्ण  पावन  प्रेम गंगा          पवित्र    यमुनोत्री  धार  है ।
श्रीकृष्ण प्यार श्रीकृष्ण प्रेमि      श्रीकृष्ण प्रेमावतार      है   ।
 
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘   श्रीकृष्ण बिन सब हार है  
   श्रीकृष्ण राधे भजौ निश दिन       गोपाल   बेड़ा  पार     है  ।    
 
सेवा  कृष्ण श्रृंगार जीवन          नित अरचना  संस्कार    है  ।
जप तप  सुमरन  हवन यग्य  व्रत  अमृतदायिनी  धार   है    ।
श्रीकृष्ण साधुसंत तपस्या        ऋषि मुनीन       तप धार  है ।
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’ श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है 
   श्रीकृष्ण राधे  भजौ निश दिन    गोपाल   बेड़ा  पार     है   
अमर सत्य जग कृष्ण  नाम धन   माया   जगत  बेकार  है   ।
मुठ्ठी बंद ‘’गुपाल’’  आगमन       खोले  कर  गमन यार  है    ।
पाप करम   सब   ब्यर्थ कर्म हैं   रौरव    नर्क   का   द्वार   है  ।
कृष्णा मानव जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है  
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन      गोपाल   बेड़ा  पार     है   
  
नश्वर सुख दुख नश्वर  चिंता         नश्वर    काया   यार  है    ।
चिंता केवल  कृष्ण  नाम जप         चिंता  धर्म    अधिकार  हैं । 
चिंता   चिंतन मुक्त कृष्ण प्रभु    श्रीकृष्ण       चिंतनहार   है   
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’  श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है  
   श्रीकृष्ण राधे भजौ निश दिन        गोपाल   बेड़ा  पार     है   
पर पीड़ा अति घृणित चिंता            परहित  परम उपकार    है   ।
सेवा प्रानिन काज  पुनीता                 हिंसा प्रानीन हार        है  ।
पुण्यकर्म  जीवन  उद्धारक            सहज  वैतरणी    पार    है   ।
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है  
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन       गोपाल   बेड़ा  पार     है   
 करुण  पुकार  सुनी  करुणाकर       भगतन कीने     उद्धार  है  ।
उग्रसेन    वसूदेव  देवकी               विनती  हिरदय  स्वीकार  है ।
कुंती पुकार  द्रोपदपुकार                 रुक्मिन पुकार सों प्यार  है ।
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है  
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन        गोपाल   बेड़ा  पार     है   
धर्मपाथ  जीवन पथ  उत्तम          स्वधर्म  जीवनी धार   है ।
श्रीकृष्णा  धर्मी  धर्म धारक             धर्म पाल  धर्म धार   है  ।
धर्मधुरंधर  धर्म सहारे                 श्रीकृष्ण  धर्मावतार   है    ।
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है  
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन        गोपाल   बेड़ा  पार     है   
परमतत्व   श्रीकृष्ण गुपाला     आत्मतत्व      निर्विकार   है      ।
तत्व दरशी  जग  तत्वमूलक     तत्व ग्यान       तत्वसार    है   ।
तत्वेश्वर प्रभू  कृष्ण कन्हाई       तत्वराम      तत्व    द्वार है   ।
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है  
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन        गोपाल   बेड़ा  पार     है   
 
अर्थ :—
हे   मनुष्य  तू  सदां  कृष्ण  कृष्ण कहता रह ।  क्योंकि कृष्ण
जगत  का  सार  है । इस  जगत  मै  श्री   कृष्ण  ही  प्रेम हैं ।
श्रीकृष्ण  ही     संसार   का   जग  का  आधार   हैं।  श्री कृष्ण
जैसा  कृपालु  देवता  दूसरा   नहीं    है              उनके  बिना
जीवन प्रयोजन विहीन  हैं ।   जो मनुष्य श्रीकृष्ण का भजन
करते  हैं ।  उन  मनुष्यों  को  दुःख की हवा भी नहीं आती है।
श्रीकृष्ण    की    याद   करने   से  मनुष्य  जगत   सागर से
तर जाते हैं ।  संसार  मैं   श्रीकृष्ण  का  नाम  अमर  धन है
। बाकी  संसार  का  धन  साथ  जाने  वाला  नहीं है ।  अत
बेकार है ।   जग  मैं  प्रभु  का  नाम  ही   सच्चा है ।   और
जगत  माया  का  स्वरूप है  एक  व्यवहार है ।   भगवान
श्रीकृष्ण की  सेवा    जीवन  का  श्रृंगार  है तथा  उनकी
नित्य पूजा जीवन का संस्कार है जीवन का अच्छा कार्य
है । श्री धारा है ।श्रीकृष्ण निर्विकार आत्मतत्व् आत्मज्ञानी
हैं  तथा वे ही परमात्मा हैं । श्रीकृष्ण कीर्तिस्वरूप हैं वे ही
कीर्ति  हैं    वे तीर्थ के राजा हैं वे स्वयं तीर्थ हैं ऐसा ऋषि
मुनियों का विचार है कथन है । सब दुख सुख चिंता नष्ट
होने वाले हैं  तथा यह शरीर भी नष्ट होने वाला   है ।श्रीकृष्ण
सभी चिंताओं से तथा  व्यर्थ चिंतन से मुक्त हैं तथा श्रीकृष्ण
ही संसार  में चिन्तनयोग  है मनुष्य को उन्ही की याद करनी
चाहिए । जिस दिन तुम संसार में आए थे तुम्हारे हाथ खाली
थी तुम उस पार संसार के पार जब जाओगे तब भी खाली  हाथ
जाओगे । पाप कर्म सब व्यर्थ ही   हैं   तथा  यही रौरव नर्कों में
ले जाते हैं   हे गोपाल सब कुछ छोड़ तू श्रीकृष्ण का भजन कर
इस संसार से प्यार छोड़ दे । श्रीकृष्ण गोविंद ही सच्चे मित्र   हैं
संसार के सभी नाते झूंठे हैं ।  मेरे माधव श्री कृष्ण महायोगेश्वर
हैं   वे  योगियों  में श्रेष्ठ हैं ।   शास्त्रों का गम्भीर विचार   है  कि
श्रीकृष्ण मानवता के सहारे  हैं ।  मानवता के प्रेमी हैं । श्रीकृष्ण
धर्मवान तथा कर्मशील हैं ।     तथा सोलह कला परिपूर्ण  है ।
कृष्ण का जप करना तपस्या करना उनका हवन करना उत्तम है
गुपाल कहते है   श्रीकृष्ण   ही मनुष्य की जीत है । गोपाल के
गोपाल के अतिरिक्त अन्य सभी संसारी उपलब्धियॉ
सम्पदा सभी बेकार हैं और मनुष्य की हार है।
१    ]
बसन  हीन  कर  देउ द्रोपदी           पाओगे  तुम   उचित   इनाम ।
राज सभा कुरु भई   मुर्दाघर               अंधौ   राजा   अंधे   काम  ।
खींचे सारी  लजें     द्रोपदी              दांतन   पीसै   भीम   सुनाम  ।
कृपाचार्य     राजगुरु     बैठे                द्रोणाचार्य  बड़ौ  अति   नाम ।
अदुभुत व्रती वीर वर भूषन   शांतनू     गंगा        तनय      प्रणाम।
नारि शक्ति कौ बना  तमाशो            पौरष  हीन   समाज   तमाम ।
अविरल   नीर बहे  दिरगन सों            तजी  द्रोपदी    आस तमाम ।
एकही  आस कृष्ण  नट नागर        स्वामी  प्रानन  प्यारे  स्याम    ।
राखो लाज दीन   रखवारे                    कृष्णा  सुमरे तोकूँ  स्याम ।
सुनी  टेर  आगये बचावन              बढ्यो चीर न     होय    विराम ।
खींचे जितनौ  बाढ़े   बितनौ             ‘’ गुपाल’’   लीला मेरे स्याम  ।
जय  राधे जय  राधे   राधे              जय   राधे    जय    जय घनस्याम     ।
जय कृष्णा जय कृष्णा  कृष्णा      जय ‘गुपाल’ प्रभु   राधे  स्याम  ।
भावार्थ :— —:—
दुर्योधन ने दुशाशन को  साम्रागी द्रोपदी को बिना वस्त्र  करने का
 उचित इनाम देने को  कहा । पूरी  कुरु  राजसभा  मानों   लाशों
से  भरी है अंधे  राजा के अंधे  काम हैं।  दुशाशन द्रोपदी की साड़ी
 खेंचने लगा है द्रोपदी को लाज आ रही है।भीम अपने दांतों को पीस
रहा है वचनबद्ध होने के कारण कुछ नहीं कर पा रहा था।कृपाचार्य
राजगुरु भी बैठे हैं  तथा शांतनु व  गंगा के पुत्र भीष्म भी बैठे हैं मैं
उन्हें प्रणाम करता हूँ। नारी शक्ति का तमाशा बना है राजसभा पूरी
तरह पुरसत्व विहीन हो गयी है। द्रोपदी के  नेत्रों से लगातार पानी
बह रहा है द्रोपदी ने संसार की सभी सहायता मिलने की आशा छोड़
दी है उन्होंने  अन्तर्मन से  सभी आशा  छोड़कर  मेरे  प्यारे प्रभु
श्रीकृष्ण  को  पु।प्रभु  उनकी सुनकर आ गये। उन्होंने  साड़ी
को इतना  बढ़ाया।वह खींचता जा रहा था । वह बढ़ती जारही थी
  प्रभु तुम धन्य हो आपकी लीला कितनी अदुभुत है ।आप द्रोपदी
के  लिए  बस्त्र  बन  गये।  प्रभुतुम  धन्य हो गोपाल कहते हैं मेरे
गोविन्द द्रोपदी के लिए  वस्त्र  बन  गये   उनकी लीलाएं बड़ी ही
अदभुत हैं।
[  २   ]
सारी  खींच खींच  कें हारौ         धरन   गिरौ  लग  गयौ विराम ।
जिनने  देख्यौ  ओर तिहारी        सबहि  बन गये बिनके  काम ।
नारी लाज बचावन  बारे                 द्रोपत चीर बढ़ावन  स्याम ।
दीनबंधु सुन लो   जो    मेरी        जीवन सुधरे    प्यारे   स्याम  ।
सबहि आसरे छोड़ जगत मन    आस  प्रभू  मोहन घनस्याम ।
कोय  न आवे काज तिहारे          हार जांय सब  जगती राम ।
कहा कहूँ कीर्ति केशव  हरि              बहुतन  सुमरे आये काम ।
नश्वर  जग जिन  ओर निहारो       दुःख    बरसा हो  आठों  याम।
श्रीकृष्णा  है अमर आसरो            पकरै कर दुःख  लगै विराम ।
अमर सहारो मोहन प्यारो             ढूढें   मैंने    बहुत    मुकाम ।
असरन  सरन  लीन  मैं  तेरी    गुपाल  कीरत राखौ  स्याम ।
जय  राधे   जय  राधे    राधे          जय   राधे जयजय घनस्याम    
जयकृष्णा  जयकृष्णा  कृष्णा    जय ‘’ गुपाल’’ प्रभु राधेस्याम 
 
भावार्थ :— —:—  
दूशासन  द्रोपदी की      साडी  खींच  खींच कर       हार   गया। थक
कर  धरती   पर  गिर पड़ा । तब  भारत माता के माथे पर लगे कलंक
का पटाक्षेप हुआ । जिस किसी ने  भी कृष्ण की  तरफ देखा। उसी के
सब काम बन   गए।हे कृष्ण  तुम स्त्रियों की  लाज  बचाने वाले हो ।
 आपने  महारानी      द्रोपदी केचीर का  अपरिमित  विस्तार  किया ।
खींचते खींचते बलवान दुशासन  थक कर गिर गया । हे असहायों के
 भाई अब मेरी भी सुन लो। जिससे मेरा जीवन सुधर  जायेगा। गुपाल
कहते हैं     श्री घनश्याम   ही   एक   आशा हैं   और  कोई भी  तुम्हारे
काम  नही  आएगा ।  संसार    के  जो  राम  तुम्हें   दिखाई  देते   हैं ।
    वे  सभी  हार  जाते  हैं । प्रभु  की  क्या   बड़ाई   करूँ । उन्हें बहुतों ने
  याद    किया     सबके   काम  कर  डाले ।  श्रीकृष्ण  तो  अमर  सहारा
  हैँ। क्योंकि    मोहन   किसी  को  निराश  नही   करते   हैं। मैंने जगत
की  बहुत  ठौरों  को    देख  लिया है   जिनको कोई सरन नहीं मिलती
है। आप  उनको  भी  सरन  देने  वाले  हो । हे  प्रभु  गोपाल  की लाज
रखना ।
[    ३    ]
कारागार  वास  सुन   आतुर                         नारी     सोलह     सहस      ललाम।
भौमासुर की  जेल तोर  हरि                      कृष्ण       प्रिया    कह लानी  वाम ।
द्रोपत टेरे  तब प्रभु  मेरे                                 लीनों        कुरुन     सभा  विश्राम ।
लाज  बचाई  वसन   बढायो                           सखी    टेर   तज्यौ     निज  धाम।
कुबजा  कूबड़  सुघड़   बनाई                      धन्य   गुपाल      प्रभू   हरि    श्याम ।
राधा    भोगी      विरही  पीरा                            प्रगटे      मोहन     सुंदर श्याम।
मीरा  भगतिन  विष  दै   दीनो .                   देवर      राना       महल        मुकाम  ।
प्यालौ  विष पी   लीनों  मोहन                         नाचत    मीरा     महलन     वाम।
वन  वन  भई  प्रेम  मैं पागल                        पहुँच      गयी          वृन्दावन धाम  ।
जन्मन  आस  करीं   हरि  पूरीं                   रास   रचायो    तुम     घनस्याम   ।
देवकी  रोहिनी  जसुदा  मोही                       पृथा    प्रिय  ‘’ गुपाल’’ घनस्याम    ।
जय  राधे   जय  राधे    राधे                      जय   राधे      जय          जय घनस्याम    
जय कृष्णा  जय कृष्णा    कृष्णा            जय ‘’ गुपाल’’ प्रभु      राधे  स्याम 
भावार्थ :—- —- —
श्री कृष्ण ने  नारियों से  कभी  मना  नहीं  किया ।  सोलह हजार  स्त्रियों को
उनके  कहने पर  अपनी पत्नी  बना लिया । जब सखी द्रोपदी ने  तुम्हें  बुलाया।
तो आप कुरुओं की सभा मैं  पहुँच गए । अपने घर को  छोड़ कर  आपने  द्रोपदी
का  वस्त्र  बढ़ा  दिया ।और  उसे  निवस्त्र होने से  बचा लिया।  कुबड़ी  कुब्जा को
आपने  सीधी  कर दिया । गुपाल के प्रभु  तुम धन्य हो । जब  श्री राधा को  पीरा हुई
तो  आप कोकिलावन मैं  प्रगट हो गए । मीरा को  जब  उसके  देवर ने  जहर दे दिया।
तो  आप  विष को  पी गये ।और  मीरा महल मैं  नाचती रही । वह जंगलों मैं  श्री माधव
को  ढूढ़ती रही।  गुपाल कहते हैं  प्रेम मैं  पागल हो गयी।  आपने  सभी  गोपियों के संग
रास कर  उनकी जन्मों की  साधना पूरी की।  आपने हे  मोहन     देवकी  रोहिणी
जसुदा को मोह लिया। तथा अपनी प्यारी भूआ  कुंती पर  जादू  कर दिया।
[     ४   ]
भौमासुर   को     मार  गिरैया             जेल  तुरैया      प्यारे   स्याम ।
सोलह  हजार  मुक्त  करैया               पानिग्रहन    करवैया   स्याम ।
नारि कलंकन जग मिट्वैया               सबसों  ब्याह    करैया  स्याम ।
लौकिक सोच  करैया  पोची                 सबकी  पीर      हरैया   स्याम ।
कुबजा दुःख   हरिमेटन   हारे              द्रपुद  सुता    रखवारे   स्याम ।
रुकमनि   न्योंतौ  झट से  लीनों           तुमसौ   कौन  साहसी  स्याम ।
कीनौं हरन महल  निज   लाये        पाणिग्रहण    कीनो   तुम  स्याम ।
जब  जब  नारि  याद कर  लीने         नंगे   पायन        धाये     स्याम ।
नाचें  संग  गोपी   ब्रज भूमि               आत्मिक  प्रेम  करैया   स्याम ।
कालिय   नारि  कही     हरि  छोड़ो       पतिपरमेस्वर    दोष   तमाम ।
सदां  संग  अबला   नारिन प्रभु       ‘’ गुपाल’’  मनमोहन हरिस्याम ।
जयराधे   जयराधे    राधे                      जयराधे      जय   जय घनस्याम    
जयकृष्णा  जय कृष्णा    कृष्णा         जय ‘’ गुपाल’’ प्रभु  राधेस्याम 
भावार्थ :–
तुमने भौमासुर को  मारकर  उसकी   जेल से  सोलह हजार  राजकुमारियों
को मुक्त करा लिया। तथा  आपने   सबसे  विवाह  कर लिया ।  महिलाओं
के कलंकों को   मिटाने वाले   सब से विवाह  करने  वाले हे  स्याम  तुम
अदभुत हो ।संसार की सोच को  हीन  सिद्ध  कर दिया। आपने सब की पीरा
को हर लिया । आपने  कुब्जा का  दुख  दूर कर दिया।हे स्याम सुंदर  आपने
द्रोपदी की     लाज को  बचा लिया ।आपने  रुक्मणि का निमंत्रण  स्वीकार
कर लिया। हे स्यामसुंदर तुम जैसा साहसी कौन है ।आपको जब भी नारियों
ने  याद    किया। आप  नंगे पैर  भगे हो । गोपियों को  आत्मिक प्यार करने
वाले  उनके  कहने   पर  आपने  खूब   नाच   किया ।  जब  कालिय नाग की
स्त्रियों   ने    अपने  स्वामी  के   दोष क्षमा  करने को  कहा । तो  आपने  उसे
सुरक्षित   जगह     प्रदान  कर दी । हे   गोपाल   मनमोहन   स्याम  आप
अबला   नारियों   का   बल हो ।
[   ५   ]
गह्यो निमंत्रण  कुण्डलपुर सों        बिना  अनी   चल दीने   स्याम ।
नारि समर्थक   बर चुनवे  हरि
       रुक्मिन देवी    प्यारे        स्याम ।
न  गज  बाज  न  रथी  महारथी        तो   सो   कौन  साहसी  स्याम  ।
रक्तपात ते  दूर  रहैया                        नई राह  दिखवैया    स्याम ।
हरन करैया  मात रुकमनी                     नारी  अभय करैया  स्याम ।
बिना  स्वयंबर   ब्याह   करैया             अदभुत प्यारे  मोहन स्याम ।
क्षत्री धरम  निभायवे     बारे                 शंख   बजैया  मेरे      स्याम ।
दीन   चुनौती   सब  बीरन कूँ                   जरासंध  शिशुपाल तमाम ।
कीनों युद्ध   हराये           मोहन               सुख     दीनों अलबेली वाम ।
बर  मन भावन  चुनें  कुमारी                रुक्मी अहम मिटइया स्याम ।
नारी मुकती   अलख  जगैया             अलबेले मेरे  प्यारे    स्याम ।
जय  राधे   जय  राधे    राधे                      जय राधे  जय  जय घनस्याम    
जयकृष्णा  जयकृष्णा    कृष्णा         जय ‘’ गुपाल’’ प्रभु   राधेस्याम 
भावार्थ :— —
आपने  ब्राह्मण  के  हाथों  भेजा  गया  श्री  रुक्मणि  जी  का निमंत्रण
स्वीकार कर लिया ।तथा  बिना सेना  लिए ही चल दिए।आप रुक्मणि
के प्रिय  तथा नारी के वर चुनने के  समर्थक हो। बिना हाथी घोडा बिना
रथ तुम्हारे बरावर  साहसी कौन है । हमेशा  रक्तपात  से दूर रहने वाले
नई राह दिखाने वाले हो । रुक्मणि का हरण    करने वाले  उनका भय दूर
करने वाले हो । बिना  स्वयंबर  विवाह  करने वाले  हे मोहन आप अदभुत
हो।  क्षत्री धर्म की  अनुपालना करने के लिए  आपने   शंख   बजाया  ।
 तुमने  अकेले    ही रुक्मी  शिशुपाल तथा सम्राट  जरासंध को  चुनौती
दी । तुमने सभी इकठ्ठे हुए राजाओं को  हराकर अपनी नवेली दुल्हन को
  प्रसन्नता  प्रदान की । सब वर  मन से  चुनें  सबको  हरा कर  आपने
रुक्मी का  गर्व  चूर चूर कर दिया  ।   हे  मेरे  अलबेले   अदुभुत  प्रभु
आप  नारीमुक्ति के  अलख   जगाने वाले हो   ।
६  ]
सत्यभाम हरि    मांग   मनैया                   पारिजात     लगवैया    स्याम ।
अहं   मिटैया  देवराज कौ                      युद्ध भूमि     हरवैया       स्याम ।
नरकासुर  कूं  मार   गिरैया                   पुरंदर       छ्त्र    छुडैया  स्याम ।
मात  अदित हरि कुंडल   लाके             गुपाल     स्वर्ग   दिवैया    स्याम ।
रत्तीभर  नहीं  लोभ  प्रभू       तुम      गुपाल’     राह      दिखैया   स्याम ।
गोपाल     छत्र    पुरंदर  छीनों            समरथ        मेरे      प्यारे    स्याम ।
कंस  मार  राज    नहीं   लीनों            लोभ  न   लालच  प्रिय    घनस्याम।
जरासंध  मरवाय   .भीम    हरि            मगध      दीन    राज    सुखधाम ।
राज  गहायो  सुत  वाके कूँ                       भेंट   गही    पांडव    बलधाम ।
मार   भोमासुर     तिलकपुत्र   हरि          धर्मराज जग    सीख   तमाम ।
धरम  स्थापन  लक्ष्य  स्रष्टी  मैं   ‘’ गुपाल’’  नहीं   लोभ   कछु   काम  ।
जय  राधे   जय  राधे    राधे                    जय   राधे  जय    जय घनस्याम    
जय कृष्णा  जय कृष्णा    कृष्णा         जय ‘’ गुपाल’’ प्रभु  राधे  स्याम 
भावार्थ :—- —-  :-
सत्यभामा की  जिद को  आपने  पारिजात वृक्ष  उसके  महल मैं   लगाकर
 पूरा किया ।  आपने  देवराज के  अहंकार को  युद्ध मैं     हराकर  चकना चूर
 कर दिया । नरकासुर को  मारकर  इन्द्र का    छत्र उसे  वापिस  कर वाया।
गुपाल कहते है आपने देवमाता      अदिति के कुण्डल उन्हें वापिस कर
दिए। तुम्हे रत्तीभर भी  लोभ नहीं है । हे प्रभु आप मेरे को राह दिखाने
वाले हो।  कंस को मारकर भी आपने राज्य का अधिग्रहण  नही किया ।
 आपको न  लोभ लालच है ।आपने जरासंध को भीम के द्वारा मरा कर
भी आपने मगध का राज्य नहीं लिया। तथा उसके पुत्र को राज्य दे दिया।
केवल पांडवों ने भेट स्वीकार की। भौमासुर को मार कर उसके पुत्र को
   राज्य दे दिया। आपका लक्ष्य केवल धर्म स्थापना है। राज्य को बढ़ाना
   आपका    प्रयोजन   नहीं ।

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