श्री गुपाल आमंत्रण, रस माधुरी

[  १   ]
‘’ श्री     गुपाल आमंत्रण,   रस माधुरी     ‘’
बूझूं       सूरत   सखी     बनबारी ।
चित्र, बनाबौ   मनमोहन  हरी        रूप   अनूप    कुमारी       ।
मृदुल बैन स्रबन रस भीजे             ललिता  कूंच  निकारी      ।
रुप अनूप लखौ जस कौ तस         हास   भाब  छबि प्यारी    ।
भुज बिसालआनन तेजस्बी      नीलबरन  मन           हारी    ।
पुष्पमाल कौस्तभ,मनि  सोहत    कौंधत    द्युति     असरारी  ।
निरख रुप राधे ह्वै  बिहबल           संतन      सदां      सुखारी  ।
प्रेम, गंग , बन ,धारा ,बहमत         सुख  पामत हिअ भारी     ।
‘’गुपाल’’ अंक, भर , भेंटें      दोउ    निरखत   मदन मुरारी    ।
हिंदी भावार्थ  ;  ————–
राधिका बोली हे मनमोहनी  प्यारी ललिता हरि का रूप
तो बर्णन कीजिये । उनका लावण्य कैसा है उनकी सूरत
कैसी है चित्र बना ,दीजिये , हे ,सुकुमारी ,सखी ,तुम , बहुत
ही कुशल ,चित्रकार ,भी ,हो ।   श्री जी के ,मुखारबिंद से,
मीठी वाणी के, रस से ,श्री ललिता के, कर्ण रंध्र ,गीले हो
गये  कृतार्थ हो गए  भावविभोर होकर ललिता ने अपनी
,  कूँची [ ब्रुश [ निकाली ।  गोविन्द को जैसे उन्होंने देखा
था वैसी छबि उन्होंने बना दी  हास्य भाव से युक्त माधव
के सुन्दर रुप का चित्र बना दिया । जो नीले बरन [रंग ]
वाले   मुख पर तेज वाले ,तथा  मन को   लुभाने   वाले ,
हैं। फूलमाला धारन कियै हुए हैं।तथा कौस्तभ मनि को
धारण किये हुए हैं। जिसकी चमक ऑंखो को चमकती है
,  नेत्रों को     बिबश ,कर    देती है संतों को सुख देने वाले
श्री कृष्ण के चित्र को ,देखकर श्री जी, विहवल हो गयीं।
प्रेम  की  धारा  अश्रु  बनकर  श्री  गंगा  जी  की धारा के
समान बहने लगी ।वे हिरदय मैं ,बहुत ,सुखी हैं गोपाल
कहते हैं, दोनौं ,सखि ,गले ,मिल, रहीं है। तथा दोनो के ,
मन मैं, भगवान की ,मूरत बसी ,हुई है।
[  २  ]
‘’ श्री     गुपाल आमंत्रण,   रस माधुरी     ‘’
लेइ      बुलाबौ   जाबऊ     आली  ।
रिनी  रहूं  सखि जीबन  भर  हौं  , तिरबाचा  बृज    लाली   ।
कहियौ   दरस  परस अति  ब्याकुल  कृपा   करउ  बनमाली  ।
बिरह  पबन  तन मन  झुलसाने     नाथ   करऊ    रखबाली ।
सीतल  चन्द्र   आग  बरसामत    मनउ .निसा . अंसमाली   ।
बदरंग  भई भंबर नटनागर         रूप .  रंग ,  स्याह, काली  ।
‘’ गुपाल ‘’  कृपा  नासऊ  दुख मेरे  .दीन. जनन प्रती पाली।
हिंदी भावार्थ :———-
      प्रिय सखी मेरे प्रिय श्रीकृष्ण को मेरा आमंत्रण पत्र देने तुम
है श्री राधिके बोलीं ,हे गायों  की  रक्षा करने  वाले ,गोपाल
गोविन्द तुम मेरे कष्टों को हर ,लीजिये क्योंकि   आपका
 प्रन दीनों ,की रक्षा  करने का है। चली जाओ ।  मैं    तीन  बार
प्रण कर  रही हूँ  कि मैं तुम्हारी जीवन भर रिनी[कर्जवान ]
रहूँगी । मैं  तीन बार प्रण कर रहीहूँ ।  उस वनवासी से कहना
की राधिके  तुम्हारे दरश व स्पर्श    को ब्याकुल हो  रही है।
उस अपनी प्रेयसी पर कृपा कर दीजिये।   वियोग की गर्म
हवा तन व मन को   झुलसा रही है। शीतल चंद्रमा
भी आग    बरसाता  प्रतीत होता है ऐसे लगता है, कि ,जैसे
चन्द्रमा भी, रात्रि ,का , सूर्य ,हो ।हे मेरे , नटवर , बेश धारी
, मनमोहन  प्रियतम  तुमसे दूर रहने के, कारन मेरा रंग
,काला हो गया है ,मैं ,बदसूरत ,हो ,गयी हूँ। गोपाल कहते
 [  ३    ]
‘’ श्री     गुपाल आमंत्रण,   रस माधुरी     ‘’
कदम्ब तरु  तर स्याम  सुहाने ।
कल कल बारि बहत  कालिंदी    ,  परसत हरि  पद      जाने  ।
लता माधबी  जाल  पुरै     ब्रज    ,    मोहक     बन   हरियाने ।
भ्रमर बोल लागें  अति   नीके    ,       खग जलचर  मन भाने ।
केस खुले पीर पटुका तन   सोहे ,       गौधन घेर     घिराने    ।
स्वांस स्वांस  नित राग बांसुरी          छांडत     नेह      तराने ।
बेसुध ललिता सखी, बाबरी         ,   भूली  कारज          आने  ।
‘’ गुपाल’’ हरि  बूझें को भामिन   ,   आनी    मोहि       सताने ।
हिंदी भावार्थ :———-
घने छायादार कदम्ब के वृक्ष के नीचे श्री बनबारी बैठे हैं। जमुना
का पानी,   उनके पैर छूकर   कल  कल  की  ध्वनि करता   हुआ
,बह रहा है ।ऐसा लगता है ,वह ,जल ,हरी के चरणों के स्पर्श का
महत्व जानता है । माधवी ,लता के    जाल चारों ओर छाये हुए हैं ।  
  हरियाली से परिपूर्ण वन की शोभा नेत्रों को अच्छी लगने वाली है ।
भौंरे के बोल अत्यंत मीठे लग रहे हैं ।  खुले केशों  श्रीकृष्ण  बांसुरी
मुंह मैं लगाये   धुन मैं ,प्रेम का ,संगीत ,छोड़ रहे हैं ।  ललिता,
यह  सब  देखकर    अपने     शरीर की  सुधि  बुधि   भूल  गयी । 
कृष्णानंद मैं लीन हो गयी।  होश आया तो सोचने लगी । श्रीराधे
मुझे  उलाहना  देंगी ।  गोपाल  कहते  हैं ,मोहन  बोले हे  सुन्दरी 
तुम  कौन हो ।  और मुझे सताने यहाँ जमुना पर  क्यों आ गयी
हो । मेरा  ध्यान  बाँटने  किस   प्रयोजन  से  आई  हो।
[  ४  ]
‘’ श्री     गुपाल आमंत्रण,   रस माधुरी     ‘’
ललिता ललित हीऐ   सकुचानी ।
खोलत मूंदत मोटे  नैनन ,          ,निरखत  बोलत   बानी ।
राधे सखि  हों स्याम   सुहाने    ,   प्रीत     पुनीत   पुरानी  ।
ब्रजेश्वरी संदेसक मोहन         ,      चुप मूरत   मुस्कानी ।
बोल सखी नीके प्रभु      लागे     , सोहत ललित  लजानी ।
दास कीर्ति  कुमारी       प्यारी     ,कीरत  मुनिन  बखानी  ।
आस  मिलन  बहु जनमन, लागी   , रूप  राशि  रस  खानी ।
बिहंसी ललिता  दोउ  कर जोरे   ,  ‘’गुपाल’’  बात सुहानी ।
हिंदी भावार्थ :———-
ललिता हिय  मैं  शर्मा  रही है      ।  अपने मोटे नेत्रों को कभी
खोलती कभी बंद करती है सोच रही है श्री राधिके के आमंत्रण
का बखान कैसे करू ,निबेदन कैसे करूँ।  उनकी ओर देखते हुए
वह बोली।बोली   हे श्याम सुन्दर  मैं  राधे की  मित्र हूँ ।  आपसे 
 और  राधिके से  मेरा पवित्र प्रेम है । मैं व्रज की मालिक का
संदेशा लाई हूँ । हे मोहन मैं उनकी दूत हूँ ।  चतुर ललिता प्रभु से
निबेदन कर चुप हो गयी।स्याम बोले तुम्हारा आना, बड़ा अच्छा
है तथा आपका संदेशा भी अच्छा लगा । मैं तो उनका   दास हूँ ।
जिनके  बारे मैं ,मुनिवर, गाते, रहते हैं ।बहुत ,से ,जन्मों से, मुझे ,
सोन्दर्य की  स्वामिनी राधे के दर्शन की इच्छा रहती है ।  दोनों
हाथ जोडकर  सखी हँसने  लगी।  उन्हैं गोबिंद की बात बहुत ही
अच्छी लगीं।
[ ५ ]
‘’ श्री     गुपाल आमंत्रण,   रस माधुरी     ‘’
सात्विक ललित   निरख हरी  ओरी ।
स्तंभित सखी बोल ना     आबत      ,             नैना   बंद    चकोरी ।
अंगुरिन    धरनि  कुरदित ललिता,       ,       निरखत मोहन ओरी ।
ज्यौं  तुम सुघड़  सुघड़   अति राधे      ,      चन्द्रमुखी  सखी गोरी   ।
नेह  भाब  अलि  ह्वै     बौरानी             , लाल      लाड़ली    भोरी  ।
‘’गुपाल’’ मन मन सोचत ललिता         , अप्रतिम    प्यारी  जोरी  ।
हिंदी भावार्थ :—– 
श्रीकृष्ण को  देखकर lललिता सात्विक हो गयी उसकी वाणी अवरुद्ध
हो गयी    । उस कृष्ण प्रेम की चकोरी ने प्रभु की सूरत अपने हिये
,रख कर अपने नेत्र बंद कर लिये  । से  वह  धरती को  कुरेदते हुए
भगवान के रूप को देख रही है  राधा अगर कृष्ण सुघड़ हैं ।  तो राधे
मैं क्या कमी है वे कृष्ण से भी सुघड़ हैं । चन्द्रमा से मुख वाली मेरी
राधिके बहुत गोरी हैं । हे लाला कृष्ण मेरी सखी तुम्हारे परम मैं
पगला गयी है.वह बहुत ,ही, भोरी है । गोपाल कहते हैं कि सखी
,ललिता मन ही मन सोचती है की इन दोनों की जोड़ी असाधारण
रहेगी।
[  ६ ]
‘’ श्री     गुपाल आमंत्रण,   रस माधुरी     ‘’
लखि सखी दसा        कृष्ण  मुस्काने ।
अंतरमन खोलो अलि बोलो              ,  भाब     प्रबल   घुमडाने।
बोली ललिता तोरी  चुप्पी                ,  बिनय  संदेस      सयाने ।
त्यागो अन्न पान  सखि मोरी            , भाबुक   सखि      बरसाने ।
निरखत बाट मिलन  प्रभु    आसा     ,   आबौ     धेनु     चराने   ।
सुघड़ घनी राधे सखि  मोरी            ,    .अप्रतिम हरी     सुहाने ।
‘’गुपाल ‘’निरखत  भोमत ललिता  ,       लाल   लली   पहचाने  ।
हिंदी भावार्थ :——-
सखी   को   देखकर   कृष्ण  मुस्कराने   लगे । बोले,  हे ,मित्र
अपने ,भावों के ,अन्तर्द्वन्द ,को, खोलो ।सुनकर ललिता, बोली
,मेरी मित्र ने बरसाने मैं ,खाना पीना छोड़ रखा है ।आपसे मिलने
की, तथा ,देखने की ,इच्छा है ।आप  गायों को ,लेकर, आ जाओ ।
.हे अनोखे कृष्ण मेरी सखी बहुत सुंदर है।   कृष्ण प्रेम मैं ललिता
जी विह्वल हैं।गोपाल ,कहते हैं ललित, ललिता, देख रही है लाला
कृष्ण व लाली राधिके मैं डूबती जा रही है क्यों की उनने दोनों
को पहचान लिया ।
[   ७    ]
‘’ श्री     गुपाल आमंत्रण,   रस माधुरी     ‘’
वृसभानूपुर ,        माधब  ,     आबौ  ।
नीकी  राधे  नीकी बतियाँ    ,    नीकी     चितबन ध्याबौ   ।
केसर   क्यारी  रजनी गंधा     ,    बृंदा      बृंद       सुहाबौ  ।
बंदन बार  सजे द्वारन  पै      , निरखत   हरि  सुख पाबौ ।
गली गली प्रभु स्वागत बंदन  , जन जन     प्रीत   बढ़ाबौ  ।
जोरी जोर सुहानी ,भाबै       ,कोट          अनंग   लजाबौ  ।
राधा माधब निरखउ , राधे     , ‘’गुपाल ‘’  मन    हुलसाबौ ।
हिंदी भावार्थ :———-
हे ,  मोहन  ,आप ,दरसन, देने ,बरसाने , मैं ,आ ,जाओ ।
श्री राधे अप्रतिम सुंदरी है श्री राधे की अच्छी  मीठी मीठी
, बतियाँ हैं । उनके देखने का ढंग बहुत ही अच्छा है उनकी
दृष्टि बहुत ही प्रेमपूर्ण है। देखने मैं   भी  बहुत  अच्छी है ।
बरसाने मैं केसर रजनी गंधा तुलसी के बनों की बहुतायत
है वहाँ पर केसर की गंध रजनी गन्ध तुलसी की गंध महकाती
रहती है आपको अच्छी, लगेंगी । आपके स्वागत मैं पुरवासियों
ने बंदन बार लगा  रखे हैं आपका हर गली मैं स्वागत होगा।आप
आकर  जन जन की प्रीति को और बढ़ा जाओ।      आप दोनों की
सुन्दर जोड़ी करोड़ों कामदेवों को लजा देने वाली है। हे राधामाधव,
आकर राधे को देखिये और हे गोपाल आप प्रसन्न होइए और अपने
दास गोपाल को भी युगल स्वरूप को देखकर प्रसन्न होने का मौका
दीजिये ।
[    ८  ]
’ श्री     गुपाल आमंत्रण,   रस माधुरी     ‘’
कहहिं गुपाल चतुर  तू  आली ।
प्रेम साधना  प्रेम साध्य  जग          , प्रेम  गैल    सुख बाली ।
श्री जी  स्याम भेद  नहिं  कछुहि  ,       कहियो तू  नखराली ।
सदां सुलभ हौं प्रेम   डगरिया    ,           सुन   बरसाने बाली  ।
ललिता   राधे  बस मन मेरौ        ,      चालौं  संग    सुचाली  ।
हेत   अहेत  दोंन सुख दायक    ,    राधे    जग     प्रति पाली ।
समझें भेद    कहत जग ग्यानी   ,  अज्ञानी  तेइ       लाली ।
”गुपाल ”      श्री जी  सीस ,नबाउं  ,  आबों    देख      सुकाली।
हिंदी भावार्थ :———-
गोपाल कहते हैं श्री कृष्ण बोले सखी ललिता तुम  चतुर हो ।
संसार मैं प्रेम ही साधन प्रेम ही  साध्य तथा प्रेम ही सुख की
राह  है ।मुझमें   तथा  श्री राधे मैं कोई भेद नहीं है। हे नखरे
वाली  तू अपनी राधे से कह  देना।हे बरसाने की रहने वाली
सखी मैं प्रेम के मार्ग से मिलता हूँ   मैं प्रेम से     मिलता हूँ
कहना ।हे ललित ललिता मेरा मन तो श्री राधिके के वश मैं
है   मैं उनके संग कदमताल करता हूँ ,उन्ही के साथ चलता
हूँ । श्री राधे  का प्रेम , मेरा हित ,तथा मेरे से  नाराजी ,मेरा
अहित  दोनों  अवस्था  मुझे  आनंद दायक हैं। वो जगत की
पालनहार हैं ,जो, हम ,दोनों मैं ,भेद ,समझते हैं, ।  वे इस
,संसार के, बड़े ,भारी,अज्ञानी हैं  गोपाल कहते हैं ,श्री कृष्ण
,बोले ,हे ,मित्र मैं उनके लिए अपना सिर झुकाता हूँ । तथा
,समय ,निकाल       कर आऊँगा ।   अच्छा समय देख कर ,
मिलने आऊँगा ।
[    ९   ]
’ श्री     गुपाल आमंत्रण,   रस माधुरी     ‘’
सोचौं निस दिन  श्री   चरन निहारूं ।
चंद्रमुखी म्रग लोचन, चारू          निरखऊं   नैन न हारूं ।
ब्रसभानूपुर गलियन जाबौं        श्री  राधे नाम   उचारूं  ।
मिलहिं नैन  अलि नैन एक छन  सुकरत  सबई उबारूं  ।
जीभर निरखों सुघड़  लाडली         अंतर   हीये   उतारूं  ।
प्रेम  गैल चल  प्रेम बढाबौं             प्रेम    कृपा    हौं पारुं ।
‘’गुपाल’’ ललित सकुच ह्वे बिस्मित  गुपाल लली  स्वीकारूं ।
हिंदी भावार्थ :———-
श्री कृष्णा  बोले हे सखी  मैं  रात दिन  यही सोचता रहता हूँ
, कि एक दिन श्री राधिके के उन चरनों को , देखूंगा जिन्हें मैं
,दिन ,रात, याद करता हूँ, ।परमसुन्दरी मृग जैसे नेत्रों वाली
,तथा चन्द्रमा जैसे मुख वाली श्री राधिके को देखूंगा। बरसाने
की गली ,गली मैं  ,श्री राधे ,राधे ,कहूँगा ।  अगर मेरे नेत्रों से
 राधिके, के,  नेत्र ,एक पल, को,  मिलेंगे ।  अपने समस्त
पुण्यों को ,न्योछावर , कर ,दूंगा । सुन्दर सुघड़ लाड़ली की
छबि को ,जी भर के, देखूंगा । और हिरदय मैं रख लूंगा। प्रेम
मार्ग  पर  चल  उनसे प्रेम  बढ़ाऊंगा  श्रीराधिका का कृपाप्रेम
होते  ही पार हो      जाऊंगा ।  गोपाल कहते है ,श्रीगोपाल की
बात सुनकर श्री ललिता आश्चर्य चकित हो गयी,सकुचा कर
ललिता ने दोनों भाव स्वीकारे। वह दोनों को अपना आराध्य
मानने लगी।
[    १  ०   ]
प्रिया प्रिय मिलन रस माधुरी
दरस दैऊ बरसाने आबौ  ।
नीकी राधे  नीकी बतियाँ   ,   नीक चितब मन ध्याबौ  ।
केसर क्यारी रजनी गंधा         ,   वृन्दा वृन्द  सुहाबौ  ।
वंदन वार सजे द्वारन पै           ,     नेह नगरीया पाबौ  ।
जोरी जोर सुहानी भावे            ,  कोटि अनंग लजाबौ   ।
राधा माधव निरखहु राधे        ,   देखउ अरू  हुलसाबौ ।
हिंदी भावार्थ :———-
हे स्याम आप दरस देने बरसाने आ जाओ। श्री राधे की अच्छी
  बतियाँ हैं वह अच्छी है।उनकी सूरत भी बहुत अच्छी है। उनके
घर केसर रजनी गन्ध ,तुलसी की गंध आती  रहती है।  आपको
अच्छी लगेंगी।आपके स्वागत मैं बंदन बार लगा रखे हैं प्रेमनगरी
मैं आपको भरपूर प्रेम मिलेगा । आप दोनों की जोड़ी बहुतसुन्दर
आकर्षक लगेगी करोड़ों कामदेव आपकी शोभा देख शर्मा जायेंगे हे
राधा माधव हे कृष्ण आप श्री राधे को देखोगे तो आप का हिरदय
प्रसन्नता से भर उठेगा ।
[    १  १  ]
‘’ श्री     गुपाल आमंत्रण,   रस माधुरी     ‘’
आउंगो सखी कहिऔ जाई ।
होंत प्रभात  डुबक कालिंदी       खिरकन  धैनु. खुलाई ।
जसुदा मैया   देहि  कलेबा       जी   भर    दूध  मलाई ।
अंग अंग आभूसन पहरुं      जननि      देइ       सजाई ।
सीस फूल बनमाल कौस्तुभ   बाजूबंद              सुहाई ।
मनिमंडित   अचकन पहनुंगो      कारौ   टीक   लगाई ।
पीताम्बर कंधन पै     डारूं          बैनु   लऊं   रस दाई।
मैया सों आसीस     गहूंगौ          श्री राधे     मिल जाई ।
ब्रसभानूपुर  ’’गुपाल ‘’आगमन    निकट सखी मुस्काई ।
हिंदी भावार्थ :———-
हे ,सखी  ,तुम ,जाकर , श्री राधे से ,कहना, कि ,मैं , बरसाना
,अवश्य ,आऊंगा । सबेरेसबेरे सबेरे  श्री जमुना जी मैं स्नान
कर  खिरकों से ,गाय ,खुलवाऊंगा । माता ,यशोदा से  कलेऊ
,के, साथ ,दूध मलाई,, लेकर , तरह तरह के ,आभुषणों  को
,माँ के, हाथ, पहनूंगा । मनी जड़ी ,अचकन ,पहनकर ,काला
टीका लगाऊंगा । रस ,बरसाने वाली  ,वंशी लेकर पीताम्बर,
कंधों पर ,डाल  ,लूँगा । माँ के ,आशीर्वाद से ,श्री राधे   मुझे
,मिल ,जाएगी, इस कारण माता यशोदा, से आशीर्वाद लेकर
आऊँगा ।  गोपाल ,कहते, हैं ललिता बरसाना यात्रा योजना
सुनकर उनका ,आगमन,निश्चित जान  मुस्कराने लगी ।

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