श्रीगोपाल मथुरा कीर्तन रसमाधुरी

|| गोपाल कीर्तन ||
श्रीकृष्ण भजौ श्रीकृष्ण कहो       श्रीकृष्ण माधव सार है ।
श्रीकृष्ण कृपासागर जगत             कृष्ण कृपा संसार है ।
श्रीकृष्ण करुणा दयासागर              दयालू दयावतार है ।
कृष्णा मानव जीत ‘’गुपाला ‘’श्रीकृष्ण बिन सब हार है
श्रीकृष्ण राधे भजौ निश दिन           गोपाल बेड़ा पार है
श्रीकृष्णा महायोगी मही              योगी जनन श्रृंगार है ।
श्रीकृष्ण ध्यानी श्रीकृष्ण ग्यानी  उपदेशक सद विचार है ।
श्रीकृष्ण मानवता सहारे                मानव धर्म आधार है ।
कृष्णा मानव जीत ‘’गुपाला ‘’  श्रीकृष्ण बिन सब हार है
श्रीकृष्ण राधे भजौ निश दिन             गोपाल बेड़ा पार है
श्रीकृष्ण अनुपम इष्ट प्राणी   बिन इष्ट जीवन   ख्वार     है   ।
श्रीकृष्ण पूरण बृह्म  प्यारे      सोलह   कला      अवतार   है    ।
श्रीकृष्ण ध्यावत रहत जे  नर   आवै  नहीं दुख    ब्यार   है     ।
कृष्णा मानव जीत‘’गुपाला ‘श्रीकृष्ण बिन सब हार  है  
श्रीकृष्णराधे  भजौ निश दिन   गोपाल  बेड़ा   पार     है    ।    
 
श्रीकृष्ण साँचे  मीत  प्राणी       जगत     मीत   व्यहवहार है    ।
श्रीकृष्ण  द्रोपद सखि  सहारे     सारथ्य  पार्थ    स्वीकार   है   ।
दरिद्रता  दावाग्नी  सुदामा     चुप    भर     दिये    भंडार   है ।
कृष्णा मानव जीत ‘’गुपाला ‘’श्रीकृष्ण बिन सब हार है।
   श्रीकृष्ण राधे भजौ निश दिन    गोपाल  बेड़ा  पार  है  ।    
कृष्णा  आनंदकंद   माधव         आनन्द   प्रेम  विस्तार  है ।
श्रीकृष्ण  पावन  प्रेम गंगा          पवित्र    यमुनोत्री  धार  है ।
श्रीकृष्ण प्यार श्रीकृष्ण प्रेमि      श्रीकृष्ण प्रेमावतार      है   ।
 कृष्णा मानव जीत ’गुपाला ‘ श्रीकृष्ण बिन सब हार है 
   श्रीकृष्ण राधे भजौ निश दिन  गोपाल बेड़ा  पार     है  ।    
 
सेवा  कृष्ण श्रृंगार जीवन          नित अरचना  संस्कार    है  ।
जप तप  सुमरन  हवन यग्य  व्रत  अमृतदायिनी  धार   है    ।
श्रीकृष्ण साधुसंत तपस्या        ऋषि मुनीन       तप धार  है ।
कृष्णा मानव जीत ‘’गुपाला ‘’ श्रीकृष्ण बिन सब हार है 
   श्रीकृष्ण राधे  भजौ निश दिन गोपाल  बेड़ा  पार    है   
अमर सत्य जग कृष्ण  नाम धन   माया   जगत  बेकार  है   ।
मुठ्ठी बंद ‘’गुपाल’’  आगमन       खोले  कर  गमन यार  है    ।
पाप करम   सब   ब्यर्थ कर्म हैं   रौरव    नर्क   का   द्वार   है  ।
कृष्णा मानव जीत‘’गुपाला ‘’ श्रीकृष्ण बिन सब हार है 
   श्रीकृष्ण राधेभजौ निश दिन   गोपाल बेड़ा  पार    है   
  
नश्वर सुख दुख नश्वर  चिंता     नश्वर    काया   यार  है    ।
चिंता केवल  कृष्ण  नाम जप    चिंता  धर्म    अधिकार  हैं । 
चिंता   चिंतन मुक्त कृष्ण प्रभु    श्रीकृष्ण   चिंतनहार   है   
कृष्णा मानव जीत ’गुपाला ‘श्रीकृष्ण बिन सब हार है 
   श्रीकृष्ण राधे भजौ निश दिन  गोपाल  बेड़ा  पार है   
पर पीड़ा अति घृणित चिंता   परहित  परम उपकार  है   ।
सेवा प्रानिन काज  पुनीता          हिंसा प्रानीन हार      है  ।
पुण्यकर्म  जीवन  उद्धारक      सहज  वैतरणी  पार    है   ।
कृष्णा मानव जीत ’गुपाला ‘बिन सब हार है  
   श्रीकृष्ण राधे भजौ निश दिन गोपाल बेड़ा पार है 
 
करुण  पुकार  सुनी  करुणाकर  भगतन कीने उद्धार  है  ।
उग्रसेन    वसूदेव  देवकी    विनती  हिरदय  स्वीकार  है ।
कुंती पुकार  द्रोपदपुकार       रुक्मिन पुकार सों प्यार  है ।
कृष्णा मानव जीत ‘’गुपाला ‘’श्रीकृष्ण बिन सब हार है 
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन  गोपाल बेड़ा  पार   है   
धर्मपाथ  जीवन पथ  उत्तम          स्वधर्म  जीवनी धार   है ।
श्रीकृष्णा  धर्मी  धर्म धारक             धर्म पाल  धर्म धार   है  ।
धर्मधुरंधर  धर्म सहारे                 श्रीकृष्ण  धर्मावतार   है    ।
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है  
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन        गोपाल   बेड़ा  पार     है   
परमतत्व   श्रीकृष्ण गुपाला     आत्मतत्व      निर्विकार   है      ।
तत्व दरशी  जग  तत्वमूलक     तत्व ग्यान       तत्वसार    है   ।
तत्वेश्वर प्रभू  कृष्ण कन्हाई       तत्वराम      तत्व    द्वार है   ।
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है  
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन        गोपाल   बेड़ा  पार     है   
 
अर्थ :—
हे मनुष्य तू  सदां  कृष्ण  कृष्ण कहता रह । क्योंकि कृष्ण
जगत  का  सार  है । इस  जगत  मै  श्री   कृष्ण  ही  प्रेम हैं ।
श्रीकृष्ण  ही     संसार   का   जग  का  आधार   हैं।  श्री कृष्ण
जैसा  कृपालु  देवता  दूसरा   नहीं    है              उनके  बिना
जीवन प्रयोजन  विहीन  हैं ।   जो मनुष्य श्रीकृष्ण का भजन
करते  हैं ।  उन  मनुष्यों  को  दुःख की हवा भी नहीं आती है।
श्रीकृष्ण    की    याद   करने   से  मनुष्य  जगत   सागर से
तर जाते हैं ।  संसार  मैं    श्रीकृष्ण  का  नाम  अमर  धन है
। बाकी  संसार  का  धन  साथ  जाने  वाला  नहीं है ।  अत
बेकार है ।   जग  मैं  प्रभु  का  नाम  ही   सच्चा है ।   और
जगत  माया  का  स्वरूप है  एक  व्यवहार है ।   भगवान
श्रीकृष्ण की  सेवा    जीवन  का   श्रृंगार  है तथा  उनकी
नित्य पूजा जीवन का  संस्कार है जीवन का अच्छा कार्य
है । श्री धारा है । श्रीकृष्ण निर्विकार आत्मतत्व् आत्मज्ञानी
हैं  तथा वे ही परमात्मा हैं ।  श्रीकृष्ण कीर्तिस्वरूप हैं वे ही
कीर्ति  हैं    वे तीर्थ के राजा हैं  वे स्वयं तीर्थ हैं ऐसा ऋषि
मुनियों का विचार है कथन है ।  सब दुख सुख चिंता नष्ट
होने वाले हैं  तथा यह शरीर भी नष्ट होने वाला  है ।श्रीकृष्ण
सभी चिंताओं से तथा  व्यर्थ चिंतन से मुक्त हैं तथा श्रीकृष्ण
ही संसार  में चिन्तनयोग  है मनुष्य को उन्ही की याद करनी
चाहिए । जिस दिन तुम संसार में आए थे तुम्हारे हाथ खाली
थी तुम उस पार संसार के पार जब जाओगे तब भी खाली  हाथ
जाओगे । पाप कर्म सब व्यर्थ ही   हैं   तथा  यही रौरव नर्कों में
ले जाते हैं   हे गोपाल सब कुछ छोड़ तू श्रीकृष्ण का भजन कर
इस संसार से प्यार छोड़ दे । श्रीकृष्ण गोविंद ही सच्चे मित्र   हैं
संसार के सभी नाते झूंठे हैं ।  मेरे माधव श्री कृष्ण महायोगेश्वर
हैं   वे  योगियों  में श्रेष्ठ हैं ।   शास्त्रों का गम्भीर विचार   है  कि
श्रीकृष्ण मानवता के सहारे  हैं ।  मानवता के प्रेमी हैं । श्रीकृष्ण
धर्मवान तथा कर्मशील हैं ।     तथा सोलह कला   परिपूर्ण  है ।
कृष्ण का जप करना तपस्या करना उनका हवन करना उत्तम हैगुपाल  कहते है   श्रीकृष्ण  ही   मनुष्य  की  जीत है । गोपाल केगोपाल   के  अतिरिक्त अन्य सभी संसारी उपलब्धियॉ  सम्पदासभी बेकार हैं और मनुष्य की हार है।
१  ]
अक्रूर संग    चले श्री मोहन          जग कल्यान    करैया स्याम  ।
जमुना जल  दरसन   दिववैया          सुरथ  बिराजे प्यारे स्याम ।
सब संसय   मन मेटन हारे              ख़ुशी करैया   काका   स्याम ।
लेन चलो ना  दोस   तिहारो             मधुपुर    मोहि   जरुरी काम ।
श्रीअक्रूर भयऊ मन निर्मल             जाने  कृष्ण  त्रिलोकी  राम  ।
सब कछु होय  इनहि  मनचेतो         उपजत  बाढ़त  होंत  विराम ।
कुब्जा धनि कूबर   मिटवैया            सुन्दर    रूप  दिवैया  स्याम ।
धनुष तोर संकेत दिवैया                      कंस  हनें  केसव बलधाम ।
नर नारी मधुपुर हरि निरखत         आयुस  देवत  करत  प्रणाम  ।
सुंदर सुत वसुदेव देवकी                 नीकी सूरत      नीके  काम   ।
वाह ‘’गुपाल ‘’वाह बलदाऊ         सुख  दीनों    मधुपुरी तमाम ।
जय  राधे  जय  राधे   राधे         जय   राधे     जय   जय घनस्याम ।
जय कृष्णा जय कृष्णा   कृष्णा       जय ‘गुपाल’ प्रभु राधेस्याम
भावार्थ :—–
श्री कृष्ण  अक्रूर जी  के   संग   चले  ।वे   संसार के  कल्याण  करने
 वाले हैंउनके   मन मैं  अक्रूर जी    के   अपराधबोध  को  मिटाने की
इच्छा है ।काका  को  उन्होंने   जमुना जल मैं  स्नान  करते  समय
अपना  स्वरुप  दिखायाजिससे  उनके  मन से  यह  निकल  गया ।
कि मैं इनको  कहाँ   ले  जा रहा हूँ  उनके  मन मैं  विश्वास  हो गया ।
कि इनकी.इच्छा   के  विरुद्ध  कुछ  नहीं  होता।इनसे  सब  पैदा  होते
हैं । इनमें   मिल जाते हैं ।  हे स्यामसुंदर  आपने  कुब्जा कोकुरूप से
 सुंदर नारी बना  दिया।  तथा कंस को धनुष  तोड़ कर संकेत दे दिया।
कि  तेरा  काल    आ गया है।  नर  नारी  सब  कृष्ण बलराम के  सुंदर
रूप को  देखरहे हैं  । सभी नगर वासी नर नारी दोनों को आशीर्वाद दे
रहे हैं  और उन्हें प्रणाम भी कर रहे हैंवे   दोनों  सुन्दर होने के साथ
 अच्छे कार्य करने वाले हैं । हे गुपाल  बलराम तुमको धन्यवाद तुमने
मथुरा  की  प्रजा को  सुखी कर दिया
२   ]
मथुरा  ज़नपद कुश्ती प्रेमी       मल्लभूमि    मल्लन    जग  धाम ।
कंस  काल ज्यों निरखत  मोहन       पापी  भूल्यौ    राग  तमाम    ।
बोल मल्ल सब लीने   अपने       मारौ   कृष्ण     संग       बलराम ।
मल्लमरे  घबरानों  मूरख              हरि     सोहे      संग  बलराम   ।
कुश्तीकला  सीख   कब   लीनी                भारी अचरज  बाबाराम  ।
सोचत बाबा कृष्णा   छोटौ               महाकाज    करता  अविराम  ।
मान बढो गोकुल जग  लाला         रंगभूमि    जै   जै   हो   स्याम   ।
पकर  केश वध कियो कंस प्रभु          मधुपुर  सभा   बंद   कोहराम  ।
दुर्जन भगे  छुपे निज बिल मै       धरमी     सुखी   भये जय स्याम  ।
उग्रसेन हरी राज दिवैया                निजकर   तिलक  करैयास्याम ।
लोभ न लालच कछु मन तेरे          ’ गुपाल’’ मनमोहन  घनस्याम  ।
जयराधे जय  राधे राधे              जय   राधे   जय         जय घनस्याम    
जयकृष्णा जयकृष्णा    कृष्णा        जय ‘गुपाल’प्रभु  राधेस्याम 
भावार्थ :—-
गोपाल  कहते हैं  कि  मथुरा  जनपद  पहलवानो  का  इलाका है
कंस को  मोहन मैं  अपना काल दिखाई देता है  वह भय के कारण
समस्त भोगों को भू गया।  उसने अपने सभी मल्लों को बुलाकर
श्रीकृष्ण व बलराम को मारने का आदेश  दे  दिया।अपने मल्लों को .
मरते ही वह मूरख घबरा गया तथा श्री कृष्ण व बलराम रंग भूमि
मैं शोभायमान हो गये। नन्द बाबा सोचने लगे इन बच्चों ने यह
मल्ल कला  कहाँ  सीख ली । ये  छोटा सा  बड़े  बड़े  काम  कर
डालता है।  वेसोचने  लगे  कृष्ण  बलराम ने  गोकुल का  मान  बढ़ा
  दिया।श्री कृष्ण ने  कंस के  बाल   पकड़ कर  उसका  बध  कर दिया ।
मथुरा की  राज्य  सभाशांत हो गयी। दुष्ट लोगभाग गए धर्मवान
  ख़ुशी  हो गये।भगवान ने  अपने  कर कमलों से  उग्रसेन का  पुन
  राज्याभिषेक  कर  दिया।  गोपाल के  मनमोहन  प्रभु के  मन मैं
लोभ  लालच  नहीं है।
[  ३    ]
भगतन  मुक्ति दिवैया मोहन   मुक्त रूप  माधव  घनस्याम ।
हरस रहे   मातापित   दोनों    सुखपामत लीला  धर स्याम  ।
बेटा  नन्द  जसोदा  कैसै कैसो     गौधन     गोकुल     गांव   ।
मरेहु  पुत्र सब लाय दिवैया    जमराजहु  पै  भारी      स्याम ।
सातों   वीर जिवाए  तुमने    काज  अलौकिक    तेरे   स्याम ।
अल्पकाल विदया सब  सीखी   संदीपनी  ऋषि प्यारे स्याम ।
गुरुकुल व्रत अनुशासन  राखे    लकडी  बीनी   मेरे    स्याम  ।
निरधन  धनी पढ़ें  सब  गुरुकुल   भेदभाव नहिं कछु   काम ।
गुरुसुत  लाय  मिलायो  मैया   अदुभुत दक्षिणा दीनी स्याम ।
अदुभुत काज  करे  हरि तुमने   गोपाला माधव  घनस्याम    ।
दियौ अशीष संदीपनि ऋषिवर ‘गुपाल’’विजय सदां संग्राम  ।
जयराधे   जयराधे राधे     जयराधे  जय         जय घनस्याम    
जयकृष्णा  जयकृष्णा  कृष्णा   जय ‘गुपाल’’ प्रभु राधेस्याम 
भावार्थ :—
भगतों को    हरी  तुम  मुक्ति  देने  वाले हो।  गोपाल  कहते हैं
आप  स्वयं  मुक्त हो    दोनों  माता  पिता  देवकी  वसुदेव  ख़ुशी   हो  रहे हैं।
उनको        देखकर  लीला  करने वाले  श्री स्याम सुंदर सुख  पा रहे हैं ।
वसुदेवजी  जसोदा  नंद जी  के बारे मैं   पूछ  रहे हैं । गोकुल के हाल
पूछ रहे हैं । कंस के द्वारा  मरे गये  अपने  सातों भाइयों को  तुमने   लाकर
  दे  दिया । तेरे समस्त कार्य  अलौकिक हैं।  थोड़े   समय मैं  समस्त ज्ञान
  सीख   लिया । गुरु संदीपनी के प्रिय हो । गुरुकुल मैं  आपने समस्त  नियमों
का  पालन   किया।  गुरुमाता के  लिए  लकड़ी  तक  बीनी । हे  प्रभु  आपके
समय  भेद    भाव  गुरुकुल मैं  नहीं था । राजा और रंक  दोनों  बरावर है ।
गुरु माता    को  उनका  प्रिय पुत्र  मरा हुआ  जीवित  लाकर दिया।   आप
जैसी  गुरु   दक्षिणा  आज तक  किसी ने  नहीं दी । आपके  कार्य  अलौकिक हैं
। आपने  बलराम जी के  साथ  मिल  अदुभुत कार्य  किये  हैं ।   गोपाल   कहते
हैं   आपको   संदीपनी मुनि ने  जीवन के  हर  संग्राम मैं  विजयी होने का
आशीष   दिया ।
[   ४  ]
जरासंध  बहु   बार हरैया                         मगध     भगैया          मेरे      स्याम ।
चढ़  चढ़  आवै   बार  बार  वह                    घटत  भार     रण    मरें     तमाम   ।
वर  पाये  वह  मरे  न  मारे                     मधुपुर  आवत        लै   हरि     नाम   ।
भार घटा मत  मार मार प्रभु                       मगधराज    बहू     सैनिक   स्याम ।
प्यारी   न्यारी   मथुरा  भूमी                       लरिवे      झगड़े    नांहैं        काम  ।
दुःख पावत  सब ब्रज  वासी                         निरख     दुखी  हों   मेरे  स्याम ।
शौणित   सनी  पुण्य  भूमि  बृज                   नित्य    होय  युद्ध    कोहराम  .   ।
त्यागन हरि   निश्चय कर लीनों                  सुंदर        और       बसावों   गाम ।
कालयवन   अब  फिर   लै   आयो            गुपाल   अदुभुत     प्यारे      स्याम ।
मारन प्रभु      तरकीब   निकारी             मोहन      भागे    तज    निज   धाम ।
मुचकुंद   नृप     मुक्त    करैया                कालयवन          जरवैया           स्याम ।
एक  तीर  सों   घने   निशाने                 ‘’ गुपाल  ‘’         संधाने      हरी    स्याम ।
जय  राधे   जय  राधे    राधे                      जय   राधे      जय          जय घनस्याम    
जय कृष्णा  जय कृष्णा    कृष्णा            जय ‘’ गुपाल’’ प्रभु      राधे  स्याम 
भावार्थ :—-
जरासंध  बहुत  बार  हरा कर  मगध  भगाने वाले  मेरे स्याम  तुम
ही  हो ।     वह  फिर  सेना  लेकर  बार  बार   आता था । बहुत  दुष्ट श्री  कृष्ण
के  हाथों  मारे   जाते हैं।   उसे  भीम के  हाथ मरने का  वरदान  मिला  हुआ है।
लेकिन  वह    भी   से  लड़ने  मथुरा  आता  है । श्री कृष्ण  संग  आये  जरासंध
के  सैनिकों  को मार  कर  पृथ्वी  का  बोझ कम  करते हैं । मथुरा  प्यार  प्रेम की
  भूमि है।  यहाँ लड़ने   झगड़ने का  क्या  काम है।  बृज वासियों को  दुखी  देख
श्री कृष्ण ने  मथुरा को     छोड़ने का  संकल्प  लिया ।और  नगर  बसाने की  मन
मैं  प्रेरणा हुई। जरासंध     का  अभी  काल    न था । वह  कालयवन को  लेकर
फिर आ गया  गुपाल  कहते हैं ।प्रभु ने  उसे  मारने की  युक्ति  निकाली । मोहन
 मथुरा  छोड़  भागने  लगे ।उन्होंने राजा  मुचकुंद का  उद्धार  कर दिया।  उनके
 द्वारा  कालयवन को  जलवा दिया।एक तीर से  गुपाल  कहते हैं। प्रभु ने  कई
निशाने  साध दिए।  मेरे  गोविन्द तो अलौकिक हैं ।

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