श्री गोपाल धर्म कीर्तन रस माधुरी

|| गोपाल कीर्तन ||
 
श्रीकृष्ण भजौ श्रीकृष्ण कहो     श्रीकृष्ण माधव सार है
श्रीकृष्ण कृपासागर जगत            कृष्ण कृपा संसार है
श्रीकृष्ण करुणा दयासागर           दयालू दयावतार है
कृष्णा मानव जीत ‘’गुपाला ‘’श्रीकृष्ण बिन सब हार है
श्रीकृष्ण राधे भजौ निश दिन         गोपाल बेड़ा पार है
 
श्रीकृष्णा महायोगी मही            योगी जनन श्रृंगार है

कृष्णा ध्यानी कृष्णा  ग्यानी उपदेशक सद विचार है

                                                      ज्ञानेश्वर ध्यानेश्वर कृष्णा    ध्यानी ध्यानावतार है   
श्रीकृष्ण मानवता सहारे             मानव धर्म आधार है
 
कृष्णा मानव जीत ‘’गुपाला ‘’  श्रीकृष्ण बिन सब हार है
श्रीकृष्ण राधे भजौ निश दिन             गोपाल बेड़ा पार है
 
श्रीकृष्ण अनुपम इष्ट प्राणी   बिन इष्ट जीवन   ख्वार     है   
श्रीकृष्ण ध्यावत रहत जे  नर    आवै  नहीं दुख    ब्यार   है     
श्रीकृष्ण पूरण बृह्म  प्यारे      सोलह   कला      अवतार   है   
कृष्णा मानव जीत ‘’गुपाला ‘’    श्रीकृष्ण  बिन सब  हार  है  
श्रीकृष्ण  राधे  भजौ  निश दिन      गोपाल   बेड़ा   पार     है        
 
श्रीकृष्ण साँचे  मीत  प्राणी       जगत     मीत   व्यहवहार है   
श्रीकृष्ण  द्रोपद सखि  सहारे     सारथ्य  पार्थ    स्वीकार   है  
दरिद्रता  दावाग्नी  सुदामा     चुप    भर     दिये    भंडार   है
कृष्णा  मानव  जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण बिन सब हार है 
   श्रीकृष्ण  राधे भजौ  निश दिन      गोपाल  बेड़ा  पार  है       
 
कृष्णा  आनंदकंद   माधव         आनन्द   प्रेम  विस्तार  है
श्रीकृष्ण  पावन  प्रेम गंगा          पवित्र    यमुनोत्री  धार  है
श्रीकृष्ण प्यार श्रीकृष्ण प्रेमि      श्रीकृष्ण प्रेमावतार      है  
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘   श्रीकृष्ण बिन सब हार है  
   श्रीकृष्ण राधे भजौ निश दिन       गोपाल   बेड़ा  पार     है      
 
सेवा  कृष्ण श्रृंगार जीवन          नित अरचना  संस्कार    है 
जप तप  सुमरन हवन यग्य      व्रत  अमृतदायिनी  धार   है  
श्रीकृष्ण साधुसंत तपस्या        ऋषि मुनीन       तप धार  है
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’ श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है 
   श्रीकृष्ण राधे  भजौ निश दिन    गोपाल   बेड़ा  पार     है   
 
अमर सत्य जग कृष्ण  नाम धन   माया   जगत  बेकार  है   
मुठ्ठी बंद ‘’गुपाल’’  आगमन       खोले  कर  गमन यार  है   
पाप करम   सब   ब्यर्थ कर्म हैं   रौरव    नर्क   का   द्वार   है  
कृष्णा मानव जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है  
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन      गोपाल   बेड़ा  पार     है   
  
नश्वर सुख दुख नश्वर  चिंता         नश्वर    काया   यार  है    
चिंता केवल  कृष्ण  नाम जप         चिंता  धर्म    अधिकार  हैं  
चिंता   चिंतन मुक्त कृष्ण प्रभु    श्रीकृष्ण       चिंतनहार   है   
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’  श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है  
   श्रीकृष्ण राधे भजौ निश दिन        गोपाल   बेड़ा  पार     है   
 
पर पीड़ा अति घृणित चिंता          परहित  परम उपकार    है   
सेवा प्रानिन काज  पुनीता               हिंसा प्रानीन हार        है  
  
 
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है  
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन       गोपाल   बेड़ा  पार     है   
 
 करुण  पुकार  सुनी  करुणाकर       भगतन कीने     उद्धार  है 
उग्रसेन    वसूदेव  देवकी               विनती  हिरदय  स्वीकार  है
कुंती पुकार  द्रोपदपुकार                 रुक्मिन पुकार सों प्यार  है
 
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’       श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है  
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन             गोपाल   बेड़ा  पार     है   
 
 
धर्मपाथ  जीवन पथ  उत्तम          स्वधर्म  जीवनी धार   है
श्रीकृष्णा  धर्मी  धर्म धारक             धर्म पाल  धर्म धार   है 
धर्मधुरंधर  धर्म सहारे                 श्रीकृष्ण  धर्मावतार   है   
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है  
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन        गोपाल   बेड़ा  पार     है   
 
परमतत्व   श्रीकृष्ण गुपाला     आत्मतत्व      निर्विकार   है      
तत्व दरशी  जग  तत्वमूलक     तत्व ग्यान       तत्वसार    है  
तत्वेश्वर प्रभू  कृष्ण कन्हाई       तत्वराम      तत्व    द्वार है   
कृष्णा  मानव जीत ‘’गुपाला ‘’   श्रीकृष्ण   बिन   सब हार है  
   श्रीकृष्ण  राधे  भजौ निश दिन        गोपाल   बेड़ा  पार     है   
 
 
अर्थ :—
हे   मनुष्य  तू  सदां  कृष्ण  कृष्ण कहता रह   क्योंकि कृष्ण
जगत  का  सार  है  इस  जगत  मै  श्री   कृष्ण  ही  प्रेम हैं
श्रीकृष्ण  ही     संसार   का   जग  का  आधार   हैं।  श्री कृष्ण
जैसा  कृपालु  देवता  दूसरा   नहीं    है              उनके  बिना
जीवन प्रयोजन विहीन  हैं    जो मनुष्य श्रीकृष्ण का भजन
करते  हैं   उन  मनुष्यों  को  दुःख की हवा भी नहीं आती है।
श्रीकृष्ण    की    याद   करने   से  मनुष्य  जगत   सागर से
तर जाते हैं   संसार  मैं   श्रीकृष्ण  का  नाम  अमर  धन है
 बाकी  संसार  का  धन  साथ  जाने  वाला  नहीं है   अत
बेकार है    जग  मैं  प्रभु  का  नाम  ही   सच्चा है    और
जगत  माया  का  स्वरूप है  एक  व्यवहार है    भगवान
श्रीकृष्ण की  सेवा    जीवन  का  श्रृंगार  है तथा  उनकी
नित्य पूजा जीवन का संस्कार है जीवन का अच्छा कार्य
है  श्री धारा है ।श्रीकृष्ण निर्विकार आत्मतत्व् आत्मज्ञानी
हैं  तथा वे ही परमात्मा हैं  श्रीकृष्ण कीर्तिस्वरूप हैं वे ही
कीर्ति  हैं    वे तीर्थ के राजा हैं वे स्वयं तीर्थ हैं ऐसा ऋषि
मुनियों का विचार है कथन है  सब दुख सुख चिंता नष्ट
होने वाले हैं  तथा यह शरीर भी नष्ट होने वाला   है ।श्रीकृष्ण
सभी चिंताओं से तथा  व्यर्थ चिंतन से मुक्त हैं तथा श्रीकृष्ण
ही संसार  में चिन्तनयोग  है मनुष्य को उन्ही की याद करनी
चाहिए  जिस दिन तुम संसार में आए थे तुम्हारे हाथ खाली
थी तुम उस पार संसार के पार जब जाओगे तब भी खाली  हाथ
जाओगे  पाप कर्म सब व्यर्थ ही   हैं   तथा  यही रौरव नर्कों में
ले जाते हैं   हे गोपाल सब कुछ छोड़ तू श्रीकृष्ण का भजन कर
इस संसार से प्यार छोड़ दे  श्रीकृष्ण गोविंद ही सच्चे मित्र   हैं
संसार के सभी नाते झूंठे हैं   मेरे माधव श्री कृष्ण महायोगेश्वर
हैं   वे  योगियों  में श्रेष्ठ हैं    शास्त्रों का गम्भीर विचार   है  कि
श्रीकृष्ण मानवता के सहारे  हैं   मानवता के प्रेमी हैं  श्रीकृष्ण
धर्मवान तथा कर्मशील हैं      तथा सोलह कला परिपूर्ण  है 
कृष्ण का जप करना तपस्या करना उनका हवन करना उत्तम है
गुपाल कहते है   श्रीकृष्ण   ही मनुष्य की जीत है  गोपाल के
गोपाल के अतिरिक्त अन्य सभी संसारी उपलब्धियॉ
सम्पदा सभी बेकार हैं और मनुष्य की हार है।
 
 
 
  ]
जरासंध सम्राट हँसत मन  मिलन  काल  तुम  आये  स्याम।
खोजत फिरों बहुत दिन तोही  काल   धाम   मैं  आये  स्याम।
मैंने कायर  समझो  तोकूँ        तेरे   तौ    वीरन ज्यों    काम
युद्ध दान  याचक  मतवारे  ,    मरन  वरन   अब  तेरौ  काम  
योधा   दौन  संग मैं  मेरे        भीम  बली अर्जुन  जग   नाम
दवनंद  युद्ध अवसर मैं चाहत      देहुँ   औसर    तीनों    नाम
कृष्ण  छोड़ रन  भाग चुके तुम    धर्म   हार  लडबे में  स्याम।
अर्जुन नहिं  मोर जोरी  कौ     अधिकार एक   भीमबलधाम 
करी घोषणा निर्णायक   हरी  द्वंद   होय  पूरण     अविराम
श्री कृष्ण कही अब शुरू करो    द्वंद  युद्ध    महा    कोहराम 
बिना रक्त पात  मरवा   दियौ  प्रभुगुपालहरि अदुभुत काम।
 
जय   राधे जय राधे  राधे           जय  राधे   जय      जय घनस्याम ।
जय कृष्णा जय कृष्णा कृष्णा     जयगुपालप्रभु राधेस्याम
 
 
भावार्थ     :—- —
 
 
श्री कृष्ण को सामने देख सम्राट जरासंध मन मैं प्रसन्न हुआ।
उसने सोचा यह मरने के लिए यहाँ क्यों आया है। मैं तुझे कई
दिनों से ढूँढ रहा  था ।तू मरने  यमलोक  मैं   गया     मैं
 तो  तुझे  कायर समझता था  तू  तौ   वीर है ।मैं  तो    युद्ध का
याचक हूँ  आपकी  मृत्यु  किस हाथ से  हो   मैं  तुम्हे  अवसर
दे रहा हूँ    दो योद्धा  मेरे  साथ  खड़े हैं   वे सम्राटपांडु के  पुत्र
महाबल भीम और अर्जुन हैं।तीनों मैं से आप किसी एक को चुन
लो।जरासंध  बोला कृष्ण तुम तो लड़ाई छोड़ कर  भाग चुके हो।
तुम्हारे से लड़ना मेरे   लिए अधर्म  है   तथा अर्जुन  मेरे  जोड़
नहीं है। हाँ मैं  भीम से युद्धकरूँगा।कृष्ण बोले दो[मनुष्यों का युद्ध ]
निर्णायक होगा कृष्ण के    कहने से युद्ध शुरू    हुआ    जिसका
भीषण शोर हुआ ।बिना खून खराबा  किये जरासंध को मरवा दिया।
गुपाल लिखते   हैं।मेरे प्रभु अदुभुत अनौखे कार्यों को अंजाम देते है
 जिसमें    मानवता  का   कल्याण छुपा  रहता है
 
 
 
   ]
जय जय धुनी मगध माधव  हरि   संग    भीम   अर्जुन  बलधाम
कछु युधिष्ठर नृप जय  बोलें      राजसभा     के     प्रमुख  तमाम
जरासंध सुत चरण गहे  हरि      घबरावत    मन    छमहू  स्याम
दाह  कार्य जनक     युवराजा         पहले    सुनौ    वीर  बलधाम
निवृत होय  पास मैं   आवो          राजकाज  पीछे    कौ      काम
पूरा  आदर शत्रू प्रदाता          जगत विलक्षण गोविंद स्याम  
राज गहायौ  लोभ   मन मैं      दियौ  निमंत्रण माधव   स्याम
इंद्रप्रस्थ  तुम राजन     आवौ         जोरि  बंधु   
निवास  तमाम  
आशीर्वाद  दै  चले    इंद्रपुर        राज  युधिष्ठर  सभा   मुकाम  
मगध  प्रभू  स्वागत जुरि आयौ    प्रजजन   मंत्री    संत तमाम    
धन्य   करम तेरे बंशी वारे        ’’गुपाल ‘’माधव   कोटि प्रनाम    
 
 
जय राधे जय राधे  राधे        जय   राधे     जय          जय घनस्याम    
जय कृष्णा जय कृष्णा  कृष्णा      जयगुपालप्रभु   राधेस्याम 
 
 
 
भावार्थ     :—- —
जरासंध  के  मरते  ही  मगध  मैं  माधव   की   जय  जय
की धुनि गूंजने लगी।श्री अर्जुन भीम की भी जय जैकार
हो रहा है ।राज सभा के  प्रमुख     सम्राट  युधिष्ठर की जय
जय कार  कर रहे हैं ।जरासंध के पुत्र ने भगवान   श्रीकृष्ण
के चरण पकड़ लिये  घबराकर प्रभु से  क्षमा  मांगने  लगा
  श्रीकृष्ण बोले युवराज पहले  अपने पिता की  देह का क्रिया
कर्म करो। इसकी पहल करो राज काज की बात बाद मैं
करिंगे शत्रु को पूरा आदर देने की विलक्षणता आप   जैसी
कहीं भी  नहीं है   युवराज को आपने राज्य देकर इंद्रप्रस्थ
यज्ञ मै आने का  निमंत्रण दिया। उसको  राज्य  करने का
आशीर्वाद देकर सम्राट युधिष्ठर केपास  चले। मगध के मंत्री
प्रजा संत सब आपका  स्वागत करने लगे।हे  वंशी वाले  आपके
कार्य  एैसे    हैं।  हे  हरी  ये गोपाल आपको कोटिन   [करोड़ों ]
प्रणाम  करता  है
 
 
 
 
[                 ]
धरमराज   जय  जय  जयकारे        भारत धरा करावें  स्याम   
जय कीने पृथ्वीपति  सारे                    इंद्रप्रस्थ बढ़ायौ      नाम   
उत्तर  पूरब   पश्चिम  दक्षिण          जय    कीने  महा    बलधाम
भीम   नकुल   सहदेव  वीरवर              महा  धनुर्धर पार्थ सुनाम  
बलकर अश्व युधिष्ठर रोकत                हार गये  भूपती  तमाम   
दीन निमंत्रण  हिय  आमंत्रण         ऋषिवर   मुनिवर  विप्र प्रणाम।
आर्यावर्त  नृप श्रेष्ठ आगमन          लाये  सब   धन    भेंट तमाम   
रोज खबर सुन इंद्रप्रस्थ की                कौतुक  भारी  जलन तमाम
उथल पुथल दुर्बुद्धि मंडली                    शकुनि कर्ण दुर्योधन   नाम
दियौ निमंत्रण हस्तिनपुर  अब           पिता पितामह कीन प्रणाम   
‘’गुपाल ‘’ सँभारो यज्ञ व्यवस्था           कीर्ति बढेगी   वंश  प्रणाम   
 
जय  राधे   जय  राधे    राधे               जय   राधे      जय    जय घनस्याम    
जय कृष्णा  जय कृष्णा    कृष्णा         जय ‘’ गुपाल’’ प्रभु  राधे  स्याम।
 
 
भावार्थ     :—- —
धर्मराज युधिष्ठर की जय श्रीकृष्ण पुरे भारत वर्ष मैं करना चाहते हैं उन्होंने
इंद्रप्रस्थ मैं पांडवों को राजसूय यज्ञ करने को कहा ।उसके माध्यम इंद्रप्रस्थ
राज्य की कीर्ति चारों दिशाओं मैं फ़ैल गयी    भीम  अर्जुन  नकुल सहदेव
चारों भाइयों ने चारों दिशाओं को जीत लिया।  यज्ञ के निमंत्रण सभी ऋषि
 मुनि  साधु सन्यासी  सभी विप्र तथा पृथ्वी के अनेक राजाओं को भेजे गए
सभी राजा सम्राट युधिष्ठर के यज्ञ मैं आने के लिए भारी भेंट सामग्री  लेकर
आये      दुर्योधन की दुर्बुद्धि मित्रमंडली को इंद्रप्रस्थ से जलन होने लगी
युधिष्ठर ने अपने पिता तुल्य ध्रतराष्ट्र  पितामह श्री भीष्म को आदर सहित
आकर यज्ञ सम्पूर्ण करने मैं सहयोग करने को कहा
 
 
[         ]
राजसूय   प्रभु प्रथम पूज्य तुम               पांडव        प्यारे      मेरे   स्याम
चक्र  सुदर्शन  अँगुली धारे                        धीरज        धारी      भारी  स्याम
सौ  सौ  गारी तुम   झिलवैया                    शांत रहैया              मोहन स्याम
फिरहु    मानी  दंड दियो    तुम        शिशुपाल         मरवैया        स्याम
महा शांति  नृप दूत  कृष्ण तुम          धर्मराज              संदेशक        स्याम
पाँच गाँव  माँगे  हरि    कैसे            शांती  .    मूल्य     लगैया     स्याम
बिना नयन   राजा कहा     करहि      निरखहि     नहिं     काल  .      पाम
दुरयोधन  ’’ गुपाल ‘’  यों  बोला                पांडव  देउँ       एकहु  गाम
सुई   छेद  भूमी   ना  दंगो                     केशव   चाहे    कहो         तमाम
कही ’’ गुपाल’’  ठीक   नहिं   एही       युधिष्ठर  नृप     धरा      तमाम  
 
जय  राधे   जय  राधे    राधे             जय   राधे      जय          जय घनस्याम  
जय कृष्णा  जय कृष्णा    कृष्णा       जय ‘’ गुपाल’’ प्रभु      राधे  स्याम
 
 
भावार्थ :— —:—  —-
हे मेरे कृष्ण तुम राजसूय के प्रथम पूज्य हो ।आप पांडवों के   अत्यंत
प्रिय हो   चक्र को अपनी अंगुली पर धारण करने वाले आपका धैर्य
बहुत है।सौ सौ गाली सुनकर   भी  आप   चुप रहे  जब फिर  भी नहीं
माना तो आपने सिसुपाल को मार  गिराया। शांति के  लिए आप दूत
बन गये  धर्मराज  का  सन्देश लेकर  धृतराष्ट्र के  पास गये  शांति
के लिए  आप पांच गाँव     पर  सहमत   होगये  बिना  नेत्र का राजा
क्या देखता। उसे काल दिखाई नहीं दिया  दुर्योधन श्री कृष्ण से बोले कि
हे  केशव  मैं पांडवों  को  एक भी गांव  नही  दूंगा।  सुई  के छेद बरावर
भूमि भी इन्हे नहीं दूंगा। आपने निडर होकर कहा    हे दुर्योधन  यह
ठीक नहीं है  समस्त भूमि तो सम्राट युधिष्ठर  की है  तुम्हारा  तो
कुछ  भी  नहीं है। उनकी  भूमि आप  उन्हें  नहीं  दे  रहे  हो
 
 
[        ]
धरम राज   अमर    सहारे                कुंती   प्रानन    प्यारे  स्याम
पग  पग  पथ  रोशन  करवैया                मेरे   प्यारे  मोहन      स्याम
अधरम  भयो  सभा  हस्तिनपुर              पांडव    हारे      राज   तमाम
धन हार  निज   भ्राताहु  हारे                   दाव     लगाई  प्यारी  वाम
वारे  पासे   खेलन  वारे     विस्मय भारी राजा काम              
नेत्र हीन  राजा को   कहनो   तात   मान    हारी निज वाम
इन्द्रप्रस्थ  धन धान्य  हरायो                 प्यारे     बंधु    वाम    सुखधाम
धरम धुरंधर    जूआ  खेलें                    धरमराज  जग   अदभुत    काम
पाय राज  बुधि  है   बौराई                    दुरजन   करे    नाश  के   काम
आयुष    तुरत  दीन  निज   बांधव        है        दूशासन   जाको      नाम
साम्रागी  द्रोपत  को  लाओ               नंगी     करहु       परै           आराम  
 
जय  राधे   जय  राधे    राधे                      जय   राधे      जय   जय घनस्याम  
जय कृष्णा  जय कृष्णा    कृष्णा            जयगुपालप्रभु     राधेस्याम
 
 
 
भावार्थ :— — —
तुम  धर्म राज के  अमर  सहारे हो कुंती को  प्राणो से
प्रिय हो   हर कदम पर रास्ता दिखाने वाले हो  पांडवों के साथ  धृतराष्ट्र
 सभा मैं धर्म के नाम  जुआ खेल  सब कुछ हरण कर लिया   गया धर्म
राज ने  अपने  भाइयों  तथा  सामाग्री द्रोपदी को  भी दांव  पर लगादिया
गया धर्म की रक्षा के लिए  युधिष्ठर  जुआ  खेल रहे है  इसे  वे  अपने
वृद्ध अंधे   पिता  की  आज्ञा  का  पालन मान रहे हैं    राज पाकर  दुष्ट
दुर्योधन की  बुद्धि का  नाश हो   गया।  तथा  अपने  नाश को  बुला रहा है
 उसने  अपने  छोटे भ्राता  दुशासन को  द्रोपदी को  नंगी करने  का आदेश
दिया।  बोला  पकड़कर      लाओ  तथा  नंगी  कर दो।   मेरे  आराम  पड़े
 मेरा  उसने  जो  उपहास किया है  उसका प्रतिशोध  पूरा हो।
 
 
[      ]
महासमर  कुरु राज  होय  अब            गिरा      उचारी      मेरे       स्याम
विवश   युधिष्ठर    युद्ध    करेंगे       कुल  विनाश      होय    कुरु     राम  
काल   शीश  दुरयोधन  रोके             बाँधौ  कृष्ण         गवने       गाँव  
अहंकार की  मति  अति    पोची      मूरख    का     बिधि .   बाँधे    स्याम
भक्त  विदुर  ठाडे  कर  जोरे          विनती    सुनलै         यदुवर     स्याम
कछु    भोजन  गृह   लेउ  रुचिकर          तजौ   क्रोध   चल     मेरे    धाम  
चिर  परचित  मुस्कान  बखेरी            विदुर    विला  जिन    परही  पाम
धन्य  धन्य   मेरे   वन्शीवारे                 धन्य   तिहारे   सुखकर     काम
सूखी  रोटी  खाई       रुचिकर              त्यागौ   भोजन      स्वाद   तमाम
काकी  कहिन  धन्य  तू मोहन                  कुंती बोली       करौ     विश्राम
बोले  विदुर  जान दो  भाभी                     होय     युद्ध  अब  कहाँ   विश्राम
बोली   ’’ गुपाल’’ कहियो माधव              पांडव   करें   समर   अविराम  
 
जय  राधे   जय  राधे    राधे                      जय   राधे      जय    जय घनस्याम  
जय कृष्णा  जय कृष्णा    कृष्णा            जय ‘’ गुपाल’’ प्रभु   राधे  स्याम
 
 
भावार्थ   :-
 हे राजा  धृतराष्ट्र  सुनो  अब  महाभारत  होगा सम्राट युधिष्ठर
धर्म युद्ध के लिए  विवश हो गए हैं ।मैंने  इसकी  घोषणा  कर  दी है। अहंकारी
की  बुद्धि  अत्यंत कम  होती है दुष्ट दुर्योधन    भगवान को बांधने के  लिए
 पुकारने  लगा ।छोटी बुद्धि के     कारन  सर्वव्यापी को  बांधने चला है। भक्त
विदुर हाथ जोड़कर   घर पर  कुछ खाने को  कहने लगे ।मेरे  बंशी वाले  तुम
धन्य हो     गुपाल  कहते हैं   कि  आपके  काम भी  धन्य हैं। काकी  की सूखी
  रोटी  प्रसन्नता से  खा रहे हैं। कुंती भुआ  बोली  मोहन    आज     घर रुक
जाओ  थोडा आराम कर लो। विदुर जी  बोले  हे भाभी  इन्हे जाने  दें। अब
युद्ध की घोषणा हो गयी ।पूरा नहीं होने तक  विश्राम नहीं है कुंती  बोली
हे माधव   सम्राट युधिष्ठर को  कहना  पहला लक्ष्य  युद्ध जीतने को  बना
ले। कहीं ये  अधर्मी    उसे धर्म मैं  उलझा लें। जब तक  जीत हो तब
तक  लड़ना है।
 
    ]
पूरे  देस   घोसना  गूंजी                          राज  सभा  सब   चिंतन    काम
कुरु  राज  को  बनै  बतावो                     प्रसंन    घोर    गूँजत   अविराम
धरम राज हैं   धर्म      पुजारी                रीति     नीति      सब  धर्मप्रनाम
दूजन  सजें  संग   दुरयोधन                   जिनने      खायौ       सदा हराम
अधरम  धर्म  एकही  रहेगो                      होय    युद्ध    भारी      परिणाम
बाँटे   द्रव्य     भारी            दुर्योधन          जोरत   अनी  निरप  बड़ नाम  
सिरहाने  बैठे  जा  हरि  के                      मांगवे       यादव   अनि  तमाम
चरन  हिये  धर  बैठे     अर्जुन                  करम   धर्म  ही     जाकौ   काम
जागे  हरि   पार्थ     जिन   देख्यौ             कुशल    पूछ   रहे  सबहि   राम  
दुर्योधन  कही   पहले   आयो                 सुनो      कृष्ण    जदुकुल के   राम
देउ     मोय   मांगन  आयो   मैं              अर्जुन     पीछे    आयौ      स्याम  
 
 
जय  राधे   जय  राधे    राधे                      जय   राधे      जय      जय घनस्याम    
जय कृष्णा  जय कृष्णा    कृष्णा            जय ‘’ गुपाल’’ प्रभु      राधे  स्याम 
 
भावार्थ   :—
 
 
भगवान की  यूद्ध घोषना की  गूँज सारे भारत बर्ष की  राजसभाओं
मैं  व्याप्त हो रही कुरुओं  का  राजा कौन हो। युधिष्ठर  या दुर्योधन
अधिकतर लोग  युधिष्टर  कि रीती निति की   प्रशंशा    कर रहे हैं
जो  धर्म को बल देती हैं दुष्टों   को   दुर्योधन  प्रिय है   क्योंकि
उन्होंने सदां पाप  का खाया है युद्ध मैं  अधर्म या धर्म मैं से एक ही
 रहेगा।  युद्ध का  यही  परिणाम होता।दुर्योधन  धन बांटकर  सेना
इकट्ठी   कर रहा है। भगवान के सिरहाने की  ओर  वह  अहंकारी
 दुर्योधन बैठा है। जबकि  भक्त वीरवर अर्जुन भगवान के चरणो
की  ओर   बैठे हैं   दुष्ट और  सज्जन का यही फक्र है भगवान
की निद्रा टूटी ।उन्होंने  अर्जुन को  देखा और प्रसन्न  होकर  बोले
सब भुआजी  धर्मराज बड़ेभाई भीम  नकुल  सहदेव  तथा साम्रागी
कृष्णा  द्रोपदी खुश तो हैं। दुर्योधन बोलाहे यदुपति पहले मैं आया हूँ
और मांगने आया हूँ।  अर्जुन पीछे आया है। दुष्टप्रवर्ती के लोग  जैसे
दुर्योधन भिक्षा मांगने मैं भी झगड़ते हैं
 
      ]
धर्म   कर्म   पारंगत    अर्जुन              बोले   वन्दन   करहों    स्याम
यूद्ध जग्य हों    आहुति    चाहूँ             सम्राट   धरमराज कौ      काम
कृष्ण कही    मोहि   सेना   भारी          महा धुरंधर    वीर      तमाम   
सस्त्र  हीन    प्रन   सुनहु   हमारौ         केवल     सारथि   मेरो      काम
अनी   मांग   हरसे    दुरयोधन          ग्यानी    अर्जुन   गहके     स्याम
गुपाल         भिक्षुक      भाई  दोनों     सौदा    सांचौ       लैवो      स्याम
धरम   ध्येह   जे  लरें  धरम    हित    उनकूँ    गुपाल      करै     प्रणाम
धन्य   धन्य   अर्जुन   तपधारी           धन्य   तिहारे        पार्थ    काम
धन्य    जनक    महतारी   तेरे           महारथी   तेने        मांगे   स्याम
दुष्ट   निरप    कूड़ौ लै     लीनों          कुरुकुल   अपयश   जाकौ   काम  
मोती  गह की   जीत   सुनिश्चत     धरमराज   के        दूत        प्रणाम
 
 
जय  राधे   जय  राधे    राधे            जय   राधे      जय          जय घनस्याम    
जय कृष्णा  जय कृष्णा    कृष्णा     जय ‘’ गुपाल’’ प्रभु      राधे  स्याम 
 
भावार्थ   ::——
श्री अर्जुन जो धर्म तथा कर्म दोनों मैं पारंगत थे  बोले हे योगेश्वर
मैं आपकी वंदना करता हूँ तथा आपको प्रणाम करता हूँ। धर्मराज
युधिष्ठर धर्म केलिए  जो युद्ध रूपी यज्ञ करने वाले हैं  उस यज्ञ में
 आपकी  भागीदारी  चाहता हूँ। श्रीकृष्ण  बोले  एक  तरफ  तो  मेरी
नारायणी  सैना है तथा दूसरी तरफ मैं केवल निहत्था सारथि का
 कार्य करूँगा। दुर्योधन ने  सैना  मांग ली  तथा अर्जुन ने  भगवान
श्रीकृष्ण को सारथि के रूप मैं  मांग लिया  भगवान ने  दोनों  भीख
 मांगने वाले भाइयों को  संतुष्ट कर दिया  ।जो धर्म के लिए लड़ते हैं
 उनको  गोपाल  प्रणाम करता है।श्री अर्जुन के  माता  पिता  धन्य हैं
तथा  उनके  कार्य भी  प्रशंशनीय हैं   उन्होंने     सेना    मांगकर
श्रीगोविन्द  को   माँगा   दुष्ट   दुर्योधन  ने   सोना      छोड़कर
कूढ़ा करकट रूपी  सैना को ले लिया।      इधर   धर्मराज के  दूत
महावीर अर्जुन ने  अनमोल मोती श्री कृष्ण को ग्रहण कर अपनी
जीत   तय कर ली
 
 
      ]
चाचा   ताऊ   मातुल  मिंतर              साले   सुसरे   प्यारे वाम      
पुत्र बालवय बली  बीर सब                लड़बै खड़े  सुनों यदु राम      
राजभोग   कुल द्रोही  कौरव             मरिबै रण  ठाड़े     मेरे  स्याम 
मूढ़ अधर्मी  नीच नराधम                   दुर्योधन       शंका  काम    
गुरु  भाई  गुरु         कुलगुरु                   संग जुड़े अधर्मी   स्याम 
 बनबासी हो तपें    भ्रात   सब                 बंद होय भावी संग्राम     
ज्ञानी होकर पाप करम क्यों                  शोणित बृथा बहाबें स्याम 
भांति भांति बहु तर्क सुनामत                 महा धनुर्धर पार्थ प्रणाम
अदभुत क्षण    सेना दोऊ आतुर              महाशांति  बंद  कोहराम
‘’गुपाल ‘’पृष्ठ भाग बैठे              देख रहे एक टक मेरे स्याम
 
जय  राधे   जय  राधे    राधे      जय   राधे      जय       जय घनस्याम    
जयकृष्णा  जयकृष्णा कृष्णा   जय ‘’ गुपाल’’ प्रभु     राधे  स्याम 
 
भावार्थ   ::——
हे कृष्ण माधव   मेरे चाचा  ताऊ  मामा  अनेक मित्र  पत्नी के
भाई  पिता  संबंधी रन मैं खड़े हैं ।सभी पुत्र    जो अभी   खेलने
की उम्र हैं मरने  के  लिए गए हैं।  इन राज्य भोगने वाले
दुर्योधन जो नीच प्रवत्ति का है उसे युद्ध मैं होने वाला विनाश
नहीं दीखता है ।अनेकानेक  सम्बन्घियों  को लेक  रमरने को
आगया है। गुरु  कुलगुरु गुरुपुत्र भी इस अधर्मी के साथ खड़े है
मेरे पूज्य पितामह पर इन अन्य  गुरुजनों  का  तन  मैं  घाव
मैं कैसे दे पाउँगा ।यह संभव नहीं है ।हम सभी भाई मिलकर
तपस्या करने वन चले जाते हैं जिससे यह भावी संग्राम अपने
आप रुक जायेगा ।ज्ञानी होकर बृथा ही हम खून क्यों बहाएं 
बिभिन्न प्रकार के तर्कों से नरोत्तम अर्जुन स्वयंको सही सिद्धि
करने लगा   रण  मैं  अचानक  ही  बड़ा भयंकर अनोखा प्रसंग
उपस्थित हुआ।पूरी नीरवता छा गयी ।सभी प्रकार का कोलाहल
बंद हो गया ।ऐसा कहकर वह वीर उदास होकर रथ के पिछले
भाग मैं बैठकर केशव की ओर देखने लगा
 
 
[       ]
शिथल गात  रन  भूमि   निहारत         कृष्णा   यूद्ध   पाप  कौ  काम
केसव   नहिं राज अब  इच्छा               छोड़   राज  बसहिं   वन धाम
दियो ज्ञान गीता  हरि अर्जुन             कर्म धरम  तुम     मेरे    स्याम
जगमोहन  कल्यान    करैया            उपदेशक  को    तो   सो   स्याम
रणभूमी ज्यौं गंगा धारा             अविरल   निरमल   जग   सुखधाम
अजहु तृप्त करती जनमानस       निरमल   ज्ञान     धार    निष्काम
न्यारे  न्यारे  धर्म  बनाये                पंथ    घने    मनुजन  प्रभु स्याम
मूल  बात  गीता   कह दीनीं         पढौ बढौ    और      पावौ        राम
सार जगत कौ  प्रभु कह दीनों        गुपाल ‘’धरम मरम जग  स्याम
गूढ़ग्यान  दै  दीनो मनुज          गुपाल’’            अमर  सहारे  स्याम
प्राण फूंक दीने  अर्जुन हरि         धन्य   धन्य     मोहन   घनश्याम  
 
जयराधे   जयराधेराधे                 जय    राधे      जय   जय घनस्याम    
जयकृष्णा  जय कृष्णाकृष्णा     जय ‘’ गुपाल’’ प्रभु  राधे  स्याम 
 
 
 
   — –भावार्थ
महावीर  अर्जुन  शिथिल गात से  रन भूमि  देखने  लगा ।बोला
 श्रीकृष्ण लड़ाई ठीक  नहीं है इससे पाप बढ़ता है। हे केशव हमें
 राज नहीं  चाहिए हम  वन मैं  चले  जायेंगे आपने महारथी
अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया। कर्म धर्म के  उसके भ्रम मिटाक़र
 उसे जग का भला करने के लिए युद्ध करने के लिए खड़ा कर दिया
कुरुक्षेत्र की पावन भूमि मैं  ज्ञान की   निर्मल गंगा  बहा दी वही
ज्ञान की पवित्र  धार आज भी समस्त  ज्ञानियों   को  तृप्त  कर रही
है ।अर्जुन जैसा ज्ञान पिपासु  हे माधव आप जैसा उपदेशक हो  ही
नहीं सकता   आज मनुष्य ने अपने अपने अनेक धर्म बना लिए हैं।
आज के गुरुओं    स्वयभू भगवानो ने  मानव को अनेक पंथों मैं
विभाजित कर दिया है ।आपने  मूल बात को  गीता मैं  कहदिया
धर्म क्या है  सब सटीक  बताया  है ।मरे हुए अर्जुन   मैं प्राण फूंकने
वाले  ये  गोपाल  तेरे पैर पकड़ता है ।हे  सबके  अमर सहारे आपने
 मनुष्यों को  गूढ़ ज्ञान  दे दिया   आप  तो  मुझ  गोपाल के   अमर
सहारे हो 
 
      ]
भारत   अर्जुन  रथ   हकवैया          बिना   शस्त्र        गिरिधारी    स्याम
प्रण कर    अर्जुन  कौ  रथ  चालन     धरम  राज  जग     सहारे     स्याम
रन  सब  लरें  करे  प्रण  भारी                 सबके     बेरी    बंदिश       पाम
भीष्म   प्रतिज्ञा  कुरु   सेनापति             अंतर  नहिं     युद्ध     परिणाम
भीम  प्रन    निज  याद  करै  नित          धृतराष्ट्र   सुत     हनूं   तमाम
दूशासन     की         भुजा    उखारों             दुरयोधन   क़े   तोरुं    पाम
रक्त  स्नान  केश  महारानी                  घाव     भरैगो  प्यारी       वाम
गिन  गिन  बदलौ  लऊँ  दुष्ट सों            मोदक  जहर   बरनाबत धाम।
कर्ण    अभय  कर  दीनी     कुंती                प्रन कीनों  जननी गह पाम  
केवल  मारों   मैं  अर्जुन       कूँ                  बहुत    पुरानी  बात विराम  
प्रानन ते   निज   प्रण   हैं    प्यारे             केन्द् बिंदु  कुलभूषण स्याम
 
जय  राधे   जय  राधे    राधे               जय   राधे      जय     जय घनस्याम    
जयकृष्णा  जयकृष्णा  कृष्णा            जय ‘’ गुपाल’’ प्रभु    राधेस्याम 
 
 
भावार्थ   ::— —- —
महाभारत मैं  श्री अर्जुन के  रथ को  चलाने वाले   शस्त्रविहीन   गोपाल
कृष्ण तुम  मुझ  गोपाल को अत्यंत प्रिय हो। हे युधिष्ठर के अमर सहारे
 आपने भी  शस्त्र     उठाने का    प्रण  कर  फिर रथ का  संचालन किया।
लड़ाई लड़ने वालों   ने भारी प्रन किये आपने  सबके  प्रण की  बेड़ियां
 डाल  दीं ।भीष्म पितामह की    प्रतिज्ञा  कि  वे शिखंडी  पर हथियार
नहीं  उठाएंगे। भीम की प्रतिज्ञा  सारे धृतराष्ट्र  के पुत्रों का वध  करेंगे
 जिन भुजाओं से  दुशासन ने    महारानी  द्रोपदी की  साड़ी को खींचा था।
उनको  उखाड़     फेंकूंगा    तथा      उसके  रक्त से मैं अपनी  प्यास
   बुझाउंगा उसके   रक्त  से     महारानी द्रोपदी के  बालों को  स्नान
कराउंगा। जिस जांघ पर दुष्ट दुर्योधन ने   पांचाली    को    बैठाने को
कहा  उस जांघ को  मैं तोड़ दूंगा। दुष्ट दुर्योधन ने  मुझे    बचपन
   मैं जो जहर दिया। वर्णावत मैं       हमारे पुरे परिवार को जलाने का
 प्रयास किया ।सबका  इस युद्ध मैं बदला लूंगा। दानी कर्ण ने अपनी
माँ कुंती को वचन दिया कि वह अर्जुन  के सिवाय  किसी  पांडव को
नहीं मारेगा   इनको  अपने  प्राणो से भी  अधिक अपने अपने   प्रतिज्ञा
की  चिन्तां है   युद्ध परिणाम  कुछ भी हो।
 
 
 
    ]
 
 
 
सारथि    बने   धर्म हित  चिंतक      तुरग  नचावत    मनकर   स्याम
माधव  कही   शीश    धर  लीनी       धरम वीर    अर्जुन    जिन    नाम
शस्त्र  गहुँ मीत  सुनि मेरी                अर्जुन  लीनों   फ़िर    श्रीस्याम।
जिद  कीनी  तोरण  प्रन माधव            शस्त्र गहादऊँ   भीष्म       नाम।
महाघोर  रन  भोर   होंत  ही              भीषम मारी     अनी         तमाम।
प्रनपूरण कीनों  भीषम हरि          निज  जन की   पत राखै    स्याम   
चकृ निकारो अस्त्र  बनायो            धाये     मारन       मेरे   स्याम     
रोके  अर्जुन  रूके    मोहन                   वृद्ध पितामह  पकरे    पाँव  
प्रन  बंधन  जग  मानव  बंधन           भई  बुद्धि जिनकी      जरकाम
निज हित जीवें  तुच्छ मनुज सब    ‘’गुपाल ‘’ जगत  हेत  श्री स्याम
निज  प्रण  छोड  भीष्म प्रन साधा         संत  भगत   प्रणपाली  स्याम
 
जय  राधे   जय  राधे    राधे              जय   राधे      जय      जय घनस्याम    
जय कृष्णा  जय कृष्णा    कृष्णा        जय ‘’ गुपाल’’ प्रभु राधे  स्याम 
 
 
हिंदी अर्थ :—-  
भगवान ने  अधर्म को     मेटने    के   लिए  धर्म  स्थापना के
लिए वे धनुर्धारी  अर्जुन के    सारथी   बन गये ।रथ मैं  जुते
घोड़ों को  उन्होंने खूब  नचाया। अर्जुन ने  श्री कृष्ण  की   हर
बात  मानी। वे वीर के साथ धर्म के  हित  प्राण त्यागने वाले थे
 भगवन  कृष्ण  बोले  हे सव्यसाची मैं  हथियार  नहीं उठाउंगा
फिर भी  उन्होंने प्रभु को लिया। प्रभु की प्रतिज्ञा    को तोड़ने की
भीष्म ने ठान  ली    वो अपने को श्री कृष्ण से भी श्रेष्ठ सिद्ध
करना चाहते है ।सबेरे होते ही उन्होंने महाघोर लड़ाई शुरू कर दी।
तथा युधिष्ठर की  सेना को मारने  लगे   श्रीकृष्ण तो बड़े है
उनने ने अपनी बात    छोड़ अपने भगत भीष्म की बात को
मान लिया। वे रथ का चक्र निकल    मारने     दौड़े अर्जुन  उन्हें
 शस्त्र  उठाने से  रोक रहा है। वे     जब  रुके  जब  भीष्म ने     पैर
 पकड़  लिये।  गुपाल कहते हैं    प्रनों के  बंधन तो  मनुष्य के
 लिए हैं।जिनकी  बुद्धि मैं बंध लग गया है तुच्छ मनुष्य
अपने लिए जीता है  लेकिन प्रभु सबका  ध्यान रखते   हैं
हे प्रभु  आप धन्य हो।   आपने    प्रण के  बंधन  मैं  बंधे
 अपने  भक्तको बचा लिया आप भक्तों के प्राण पालने हो
 
 
[        ]
 
 
अधरम जग तुम   नाशन   हारे         लीकन   जग   तुरवैया   स्याम
को प्रन  बाँधे  मधुसूदन  हरि             बंधन  जनम     दिवैया  स्याम
निजता के  तजवैया   मोहन               जगता   गहन   करैया  स्याम
निज प्रन  छांड  भीष्म पन  राख्यो    भगतन  मान  दिवैया   स्याम 
धरम  राज ही  ध्येह  तिहारो           दुष्ट  राज कौ    काम    तमाम  
जो पथ  आयो  हटा  दियो  वो              बन्धु  बांधव    गुरुजन राम 
सब सों  पहले  मातुल   मारो                  
अधरम जग मिट्वैया स्याम
उग्रसेन  निरप  मुकुट  धरैया             राजलोभ तनिक   नहिं  स्याम
मांगी  भिख्या  ‘’ गुपाल ‘’ प्यारे            जुगल  युद्ध   दीजौ  अविराम
जरासंध  सुन अचरज कीनो              गुपाल   स्वयं    कृष्ण कू  जान
 
जय  राधे   जय  राधे    राधे                  जय   राधे जय    जय घनस्याम  
जय कृष्णा  जय कृष्णा    कृष्णा     जय ‘’ गुपाल’’ प्रभु  राधे स्याम 
 
 
भावार्थ     :—-
हे प्रभु  तुम  अधर्म के  नाश करने  वाले हो    सभी  परिपाटियों
के    तोड़ने  वाले हो    हे कृष्ण  आपको  कौन  प्रण  बांध  सकता है।  क्योंकि
   सभी  बंधनों को  आपने ही  जन्म दिया है ।आप ही तो   बन्धनों   के   पिता
हो।  तुम अपनी  निजता को त्यागने वाले हो  सांसारिकता मैं विश्व कल्याण
को  स्वीकार करते हो। हे भगतों के  सम्मान  रखने वाले  आपने  अपना  प्रण
त्याग दिया भीष्म का  प्रण रख दिया जो आपके रास्ते मैं  आया।  आपने
उसे     हटा दिया ।चाहे भाई गुरुजन  बड़ा कोई भी हो सबसे पहले आपने
अपने मामा को मारा अधर्म को हटाया आपके मन राज्य  का  लोभ नहीं
था।  धर्मराज के लिए आप मगध गये   संग मैं कुंती के बलवान  पुत्र अर्जुन
भीम थे। हे गोपाल आपने जरासंध से द्वन्द युद्ध[ दो योद्धाओं का युद्ध   ]की
भिक्षा  मांगी ।गोपाल कहते हैं कि जरासंध श्री कृष्ण को पहचान कर बहुत
चकित हुआ
 
 

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