गुपाल प्रेम रस माधुरी

[ १ ]
[  गुपाल प्रेम रस माधुरी]
।।  मोहन    मधुबन  धैनू चराबत ।।
पीत बसन लहरत हरि कंधा   मोर पंख सिर छाबत ।
प्यारी बंसी प्रभु प्यारी धुन      बन बेलउ  लहराबत ।
नील गगन दामिन सी सोभा   दंतपंक्त  मन भाबत।
कान्हा की  सोभा को  बरनै  रति  देबउ  सरमाबत।
‘’ गुपाल ‘’ नट खट  छबि प्यारी  मोहै  घनी  लुभाबत ।
हिंदी भावार्थ :– –
मोहन मधुवन में गाय चरा रहे हैं।
माथे पर मोरमुकुट तथा पीताम्बर कंधो पर लहरा रहा
है।  वंशी की धुनि  वंशी जितनी ही बहुत ही प्यारी है।
जिससे जंगल की वनस्पतियाँ भी हिल रहीं हैं आनंद
मना रहीं हैं ।     नीले आकाश मे बिजली के जैसे आपके
दांतों की शोभा है।   जो मेरे मन को अच्छी लगती है।
प्रभु की सुंदरता का वर्णन कौन कर सकता है।   जिसे
देखकर रति के पति कामदेव [ जो सुंदरता के देवता हैं ]
भी लजाते हैं। गोपाल कहते हैं,   प्रभु की यह नट खट
छवि मुझे भी [ गोपाल ] को बहुत भाती हैं।
[  २  ]
[  गुपाल प्रेम रस माधुरी]
।। माधब मधुबन रास रचाबै ।।
छुनक छुनक पग नूपर बाजहिं   मुरली धुनि मन भाबै ।
निरख मनोहर नटनागर  छबी  मुनि मन गोता  खाबै ।
सोलह कला ब्रहम अवतारी   गोपीन  नाच  नचाबै ।
राधे राधे मोहन गाबहिं   राधे   मन सकुचाबै ।
जड जंगम ब्रज मंडल फूले  सोभा  कौन बताबै ।
काल चक्र थम गयौ नेह लख ‘’गुपाल ‘’   कहा सुनाबै ।
हिंदी भावार्थ :—-
श्यामसुन्दर मधुवन [ मथुरा के निकट
एक जंगल ]  मैं रास रचा रहै हैं। छुनक छुनक उनके नूपर
बज रहे हैं।  मुरली की धुनि मन को भा रही है।  मनोहर
नटनागर छवि को देखकर मुनियौं को भी उनके ब्रहम
होने पर संदेह  है।   सोलह कलाओ से अवतार श्रीकृष्ण
गोपियों कोनाच नचा रहे हैं।    राधे राधे गाकर मोहन श्री
राधिके को बुला रहे हैं।  पर राधे पास  नहीं आ रही हैं।
ब्रज के जंगल फल फूल गये हैं।  तथा रास के कारण समय
का चक्र थम गया है।   प्रेम देखकर गोपाल भी सुख पा  रहा है।
उन सबका प्रेम देख समय चक्र थम गया गोपाल कहते हैं।
गोपाल इसे कैसे बर्णन कर सकता है।
[  ३ ]
[गुपाल प्रेम रस माधुरी]
।। बंसी  कान्हा मधुर बजाबै ।।
मधुर मधुर सुर बजा बजा  हरि   हिअ    में नेंह  जगाबै।
सुनकें प्रमुदित होबै मनुआ    तान   सरस   उपजाबै ।
सुरदुरलभ  बैनू  रस बरसइ  मन   आनंद   मनाबै।
ब्रजमन्डल    आनंदसिंधु  में   मुनिमन  गोता   खाबै।
आपुन सुधि बिसराइ  ‘’गुपालहु’’  मोहन  मोहन  गाबै।
हिंदी भावार्थ :— –
कृष्ण मधुर वँशी  बजा रहे हैं।  वे वँशी
को मधुर मधुर बजाकर हिरदय मैं प्रेम पैदा कर रहे हैं।
उसकी राग सुनकर मन प्रसन्न हो जाता  है।   क्योंकि
उसकी तानें रस से भरी हुईं हैं।   देवताओं को अप्राप्त
बंशी रस से मन आनंद मना रहा है।   ब्रजमण्डल आनंद
सिंधु में मुनियो का मन भी प्रेम मैं डूब जाता है।  गोपाल
कहते हैं।  अपनी हालत को विसारकर गोपाल भी मोहन
मोहन गाने लगा है।  भगवान के प्रेम मैं डूब गया है।
[  ४  ]
[गुपाल प्रेम रस माधुरी]
।।  जित देखहिं तित स्याम दिखाबहिं ।।
मोहन  रूप  धरे     बहुतेरे     मन  आनंद    मनाबहिं  ।
कृष्णा संग रमत प्रिय गोपी    भय मन  छांडि  न जाबहिं ।
जनम जनम के प्यासे नैना   अपलक  रूप लखाबहिं ।
लागै सबै  हरी हौं पाने  तन  मन  प्रभू  रिझाबहिं ।
गोपी   राधे  कान्हा सुन्दर  ‘’ गुपाल ‘’   रास  रचाबहिं ।
हिंदी भावार्थ :— –
आंखे जिधर देखती हैं। उधर ही
गोपाल गोविन्द दिख रहे हैं।  मोहन ने अपने आप
को अनेक रूपों में विस्तार कर लिया है।  वे अलग
अलग  गोपियो के साथ दिख रहे है। गोपियां उनके
साथ नाच रही है।   तथा मन में भय है।  कि कहीं
मोहन छोड़कर न चला जावे।  जन्मों की आस और
साधना की प्यास पूरी हो रही है।  वे बिना पलक
झपकाये श्री मोहन को देख रहीं हैं। उनको ऐसा
लग रहा है।  कि मोहन केवल उन्ही के साथ है।
वे अपने शरीर से मन से श्री गोविन्द को रिझा
रहीं हैं।  गोपाल कहते हैं।  गोपियो के साथ सुन्दर
गोपाल  मोहन सुन्दर राधे  मिलकर रास कर  रहे  हैं।
[  ५  ]
[गुपाल प्रेम रस माधुरी]
।। जुगल रूप सखि तरनि बिराजईं ।।
अपलक नैन खिलन अधरन पै   राधे   स्याम लखाबईं ।
अंगुलि उठा  कहत श्री राधे   मोहन चित मैं  लाबहीं   ।
सुधि बुधि खो निहार रईं सब  तनक न  मन में लाजईं।
मूदहिं तौ अपढारे खुलहिं  करि करि   दरस   लुभाबईं ।
तरनि मध्य    सखि ताता थैया  ’’गुपाल’’ हिअ  हरसाबईं  ।
हिंदी भावार्थ :— –
राधा कृष्णा जुगल रूप सखियों के साथ
नाव में बैठे हुए हैं।  नैन स्थिर हैं। अधरों पर हास्य है। एक
दूसरे को देख रहे हैं।  हाथ की अंगुली से इशारा कर श्री
राधिके कुछ कह रहीं हैं। श्री गोविन्द ध्यान पूर्वक सुन
रहे हैं।  शरीर का श्रीकृष्ण व श्री राधिका जी को होश
नहीं है।   तथा सभी सखी प्रेम मैं सरावोर होकर श्रीकृष्ण
को देख रहीं हैं।  मन मैं लाज का भाव प्रेम के भाव से दब
गया है।  नयनों की दशा ख़राब है।   अपने आप खुल
जाते हैं।  अपने आप बंद हो जाते हैं एक दूसरे के दरशन
कर रहे हैं । दोनो एक दूसरे को परस्पर देख रहे हैं। तथा
प्रसन्न हो रहे हैं।   नाव के बीच मैं शास्त्रीय संगीत बज
रहा है। गोपाल कहते है। प्रभु गोपाल मन मैं हर्षित हो
रहे हैं।
[   ६    ]
[गुपाल प्रेम रस माधुरी]
।। महारास बृज रचौ बिहारी ।।
राधे संग मुरारी मोहन जूथ जुरै  सखी   न्यारी ।
नैन मूंद प्यारी सखि  लीऐ   निरख स्याम छबी प्यारी ।
पीअ नेह आंसू बन टपकत  धन  धन  कीर्ति कुमारी ।
स्याम बंसुरिआ  राधे गाबत   लाड़ली  कृष्ण   मुरारी ।
भगत कौन आराध कौन प्रभु  मुनी मन  मांहि  बिचारी ।
रास धुनि ब्रजमन्डल पूरहिं ‘’ गुपाल’’ दास  बलिहारी।
हिंदी भावार्थ :—
ब्रज में बिहारी श्रीकृष्ण ने महारास शुरू
कर दिया है।   इसमें राधे के संग मोहन की शोभा प्यारी
लग रही है।   राधा ने अपनी आखे बंद कर  ली हैं।   श्री
राधिका जी  ने भगवान की सूरत मन में बसा ली है।
राधे की आंखो से प्रियतम के नेह आँसू टपक रहे है।
स्याम सुन्दर की बंसुरी राधे तथा राधे भव से पार करने
वाले कृष्ण को सुमर रही है।   भगत व आराध्य कौन है।
भगवान कौन ने मुनि यहा अपने हिरदय मैं विचार कर
रहे हैं।   रास की धुनि पूरे ब्रजमन्डल को गुंजायमान कर
रही है।    भगवान का दास ये गोपाल इस रास पर स्वयं
न्यौछावर है।
[ 7  ]
[गुपाल प्रेम रस माधुरी]
।।। लाल प्रिया संग करहिं ठिठोली ।।
चंचल नैना मनहर सैंना मोहक  छबि मधुबोली ।
कर न तंग मोऐ चढ़ौ रंग हौं  प्रभु  नबज टटोली।
संग असंग दौन पीराप्रद  हे   चित्त  चोर अमोली ।
बढत  नेह बरसत होरी रस  भींजत तन मन चोली ।
अंग अंग तुम मोर बसत हौ   तुम  संग गोपि टोली ।
सुन ‘’गुपाल’’ बतियां  प्रिय राधे   अंतर  गांठ  न  खोली ।
हिंदी भावार्थ :— –
श्री कृष्ण राधिका जी से विनोद [हास्य ]
कर रहे हैं।   भगवान के नेत्र चंचल उन्हैं सैंनों से मटकाकर
मधुर बोली से राधे से बाते कर रहे हैं। श्री राधिका प्रभु को
तंग न करने की हिदायत दे रही है।   और कह रहीं हैं।   हे
मोहन आपका संग व असंग दोनों ही पीराप्रद है।  हे
चितचोर नेह के बढने से इस होरी के रस से मेरा शरीर
मन तथा चोली भी भीग गयी है।  स्याम मैं बहुत
भोली हूँ। तुम मेरे अंग अंग में निवास करते हो।
तथा तुम गोपियाँ की टोलियाँ रखते हो गोपाल
कहते हैं।  राधिका जी का ताना सुनकर भी राधे
की बात का श्री कृष्ण ने प्रत्युत्तर नहीं दिया।
[   ८    ]
[गुपाल प्रेम रस माधुरी]
।। स्याम सखिन सौं खेलहिं होरी ।।
फाग उमंगन धाइ परीं सब केसर   गगरीन  घोरी ।
स्याम सखा ब्रजरज  अबीर गुल  आपुन  भरलईं   झोरी।
धूम मची फागुन रस भारी   मरजादाउ  जिन    बोरी ।
नाच रही हैकें बिभोर  अलि   कोऊ    सांबरी    गोरी।
होरी रस ‘’गुपाल ‘’सुख दाई  राधे   चंद्र   चकोरी ।
हिंदी भावार्थ :— –
स्याम सखियों से होरी खेल रहे हैं ।
उमंगो से भरी हुई बृज ललिनाएं नये नये मटकों में केसर
घोरने के लिए दौड पडी है। स्याम सुन्दर के मित्रो ने
ब्रजरज अबीरव गुलाल की अलग अलग झोली भरली
हैं। होरी की धूम एसी मची हैं।  जिसमैं सब रीति रिवाज
भी भी टूट गयी । जिसने समस्त मर्यादाओं को अपने
रंग मैं डुबा दिया है । सब कुछ होरी से सराबोर हो गया है।
सब कुछ भूलकर सखियाँ नाच रही हैं। जिनमे कुछ
चन्द्रमा की जैसी स्वेत गोरे रंग की हैं कुछसांवरी
सलौनी हैं।गोपाल कहते हैं इस होरी का रस गोपाल
कोबहुत ही सुख दाई हैजिसमें बृज चन्द्र श्री कृष्ण
की चकोरी श्री राधिके आनंद ले रहे हैं आनंद दे रहे हैं ।
[    ९   ]
[ गुपाल प्रेम रस माधुरी ]
।। राजहिं माधब कदम्बन छांई ।।
बाम बिराजत भानु तनूजा जमुना जल परछांई ।
सूरसुता परसत गुपाल पद सुन्दरतम  सुखदाई ।
बहूरंगी   प्रसून सुहाने  ब्रज बसुधा   महकाई ।
एकटक   मोहन लखें राधिका  रंक  सम्पदा  पाई ।
करत निनाद थमत जमुना जल लाला  बैनु बजाई ।
स्वामी स्वामिनी रूप अनौखौ  मूढ़  ‘’गुपाला ‘’ भाई
हिंदी भावार्थ :— – माधव  कदम्ब  के  नीचे   बैठे हैं।
उनके बगल में बाँयी ओर राधिके है।   तथा दोनों की
परछाई जमुना जी में पड रही है।   तथा जमुना जी
उनके पैंरो को छूकर बह रही हैं।  कृष्ण राधे को एक
टक इस  प्रकार देख रहे मानों गरीब को अपार
सम्पदा मिल गई हो।  जब श्री कृष्ण नें  वेणु बजाई
तो जमुना जल की कल-कल  ध्वनि भी बंद हो गयी।
स्वामी  व स्वामिनी की अद्भुत छवि  इस मूर्ख गुपाल
को अच्छी लग  रही है ।
[  १ ०   ]
[   गुपाल प्रेम  रस माधुरी   ]
भोऐ  ,स्याम ,बंद , भऐ, नैना।
मैं  , जानी , हरि ,श्री रस , डूबे         जुगल , नेह , रस  , देना ।
मात , ,जान   हिऐ ,गती  , मेरी    ,  बोली ,    बैनु ,  जरै , ना ।
हरि ,ओठन, पै, नाचत, निसदिन  मोहन   , दूर  ,    करै ,ना ।
प्रेम , बांटनी ,औरन , बैनू              मनुआ     ,पीर  , हरै, ना।
‘’गुपाल ‘तात ए,बात,मरम,सुन   ,सौतन  ,डाह   ,घटै  ,ना ।
हिंदी अर्थ  ;——
श्यामसुंदर,  के ,नेत्र ,बंद ,हो, गये, हैं  । वे ,आनंद, मैं , मग्न , हैं ,
मैने , समझा, भगवान, श्रीराधिके, के ,रस मे ,डूब ,गये, हैं । इन
,दोंनो ,के, प्रेम , का ,क्या, कहना , इनका ,आत्मिक प्यार ,है ।
माता ,ने ,मेरे ह्रदय की, बात ,समझी , और बोलीं  जो ,तुम, सोच
, रहे ,हो, एैसा, नहीं, है।  गोपाल यह वंशी जलकर ,भी नष्ट नही,
होती, है । यह ,भगवान ,के ,ओठो पर प्रतिक्षण नाचती है। औरो,
की ,प्रेम ,वासुरी, मेरी ,व्यथा ,दूर ,नही ,करती, है। हे गोपाल यह
,बात ,ज्ञान ,की ,है। औरत ,को ,सौतन ,से ,बुरा ,कुछ ,नही होता
है। यह, एक, , सौत, की, तरह, मुझे ,जलाती ,रहती ,है।    इसकी
,जलन ,घटती ,नहीं ,है ।
[  १ १   ]
[ गुपाल प्रेम  रस माधुरी ]
।। बंसुरीआ  राग अनूठौ छेडत ।।
द्वेस भाब बिसरात  हिऐ  मन  उपजे  संसय  भेदत  ।
नेह बढामत   सहज लुटामत  भर  भर  तान   उडेलत ।
स्याम रंग लिपटांत जीब  जन  हिरदय  परत  उधेडत    ।
गौधन  दसा  निरख  हो बिस्मय   मनऊ  स्याम   जु हेरत ।
‘’ गुपाल ‘’ राग  बैनु  बस  कान्हा  कछु  भाब  नहिं  देबत ।
हिंदी भावार्थ :—- मनमोहन की वंशी अनूठा राग सुनाती  है।
मन के समस्त द्वेष भावों को विसार कर [ भुलाकर ] हिय
के संशय[ मन के सभी कुतर्कों को सुलझा देती  है।  नष्ट कर
देती है। यह बाँसुरी तान में नेह बढाती है। सभी को सहजता
से बाँटती हैं। सुरों को पूरी गति से फैलाती है। यह मोहन रंग
में सबको रंग देती है।   इसके मनभावन स्वरों से हिरदय
आनंद से भर जाता है। वह सीधी हिरदय मैं घुस जाती है।
गौधन दशा एसी विचित्र है। मानो कृष्ण उन्हें देख रहे है।
गोपाल कहते हैं। इन वंशी की तानो के बश में श्री श्याम
सुन्दर हो जाते हैं ।  इसलिए और किसी को उस समय
भाव नहीं देते हैं। गोपाल पूरी तरह  बैनु मय  हो जाते  हैं ।
[  १ २   ]
[ गुपाल  प्रेमरस माधुरी ]
II निज  कर  स्याम  सजाबहिं प्यारी ।।
सूर सुता जमुना कूलन पै राजत श्री बनबारी ।
मोहन  मनुआ सुख  बरनें ना   राधे  केसन  बारी ।
फूलन  बाजूबंद  बनाबत बिहंसी  भानु  दुलारी ।
करनफूल सिरहार मनोहर  तोड़ी  चरनन न्यारी ।
गूंथ गुलाब ओढनी अनुपम सीस प्रिया  हरि  डारी ।
‘’गुपाल ‘’सोभा रती कोटीन  श्रीजी  चरनन  हारी ।
हिंदी भावार्थ :— –
श्रीकृष्ण  अपने हाथों से राधिका
कों सजा रहे है।  सूर्य सुता जमुना जी के तट पर श्री
राधिके श्री बनबारी बैठे हुए हैं। श्री श्यामसुंदर के
सुख का बर्णन करने की सामर्थ मुझमैं नहीं है।
जो कीर्ति की लाड़ली के बालों पर न्योंछावर हो
रहे हैं फूलों के बाजूबंद श्रीकृष्ण बना रहे हैं ।
राधिके उन्हें देख हँस रहीं हैं।  करनफूल सिरहार
चरनहार पायजेब तथा गुंलाब के फूलों की
ओढनी बनाकर प्रिय ने प्रियतमा राधे जी को
पहनाई है। कोटन  रतियों की शोभा श्रीराधे के
चरनो से हार गई है। उनके चरणों की सुन्दरता
के बराबर नही
[  १   3  ]
[ गुपाल प्रेमरस  माधुरी ]
।। जुगल   रूप हरी   सोभा   न्यारी ।।
बृन्दाबन  कदम्बद्रुप   खंडी  गोबिंद   कृष्ण  मुरारी ।
बंसीबट कालिन्दी  कूलन  मोहन   मोहिनी    प्यारी ।
बैनू  कर  मनमीत  सुहामत   पीतबसन  छबी  प्यारी।
पहुंचत  प्रभु चरन    जमुना जल   संग मैं   राज  दुलारी।
सदां निरख’’ गुपाल ‘’ गुपाल हरि   न हो   जीबन  ख्बारी ।
हिंदी भावार्थ :— –
श्री राधे श्यामसुंदर के युगल स्वरूप की
शोभा न्यारी है श्री मोहन मोहिनी राधे के साथ जमुना जी
के तट पर मोहित कर देने वाले कदम्बक्षेत्र मैं कदम्ब के
नीचे शोभा दे रहे हैं । वंशी वट का सुन्दर स्थान  है मोहित
करने वाले श्यामसुन्दर और राधिका बैठे हुए हैं मोहक
सुंदरता के धनी श्री स्याम सुंदर ने हाथ मैं वंशी ले रखी
है ।पीला वस्त्र धारण कर रखा है श्यामसुन्दर और राधे
के चरन जमुना जी में पहुंच रहे है स्वामी स्वामिनी की
यही छवि गोपाल तू देखते रह  तेरा जीना बेकार नहीं
होगा क्यों अपने जीवन को अन्य कामों मैं     व्यतीत
करता है ।
[  १ ४ ]
[ गुपाल  प्रेम  रसमाधुरी ]
।। कृष्ण  राधिका  छबी  अति न्यारी ।।
बृन्दाबन  कदम्ब तरु मोहक       राजे   गिरबर   धारी ।
पुन्य प्रदायिन जमुना तट  पै    जोगी  जोगिन  प्यारी ।
बैनु रस पीबै हरी ओठन            कबहु  राधिका प्यारी ।
स्याम चरन जमुना जू परसत   बहत  लहर  असरारी ।
पीबहिं रस नैना राधे जु           मौन   कृष्ण   अपढारी ।
निरख निरख एहि जोरि अनूठी गुपाल ‘प्रभु बलिहारी ।
हिंदी भावार्थ :— – स्याम सुंदर स्यामा के साथ अलग ही
लग रहे हैं । एैसी सुन्दर जोड़ी संसार मैं अन्यंत्र नहीं है
वृन्दावन मैं श्री गिरिराज उठाने वाले श्री कृष्ण श्रीराधिके
के साथ कदम्ब के नीचे खड़े हुए हैं। पुन्य देने वाली
जमुना जी के पास परम योगी श्रीकृष्ण तथा  जोगिनी
श्री राधे खड़े  हुए हैं । बांसुरी [वंशी ] दोनों  के होठों का
बारी बारी से रस पी रही है । श्री जमुना जी की लहरें
असामान्य रूप से आ रहीं हैं । प्रभु के चरन छूकर
वापिस निकल जाती हैं  । श्रीकृष्ण  राधिके के रूप
माधुर्य का पान कर रहे हैं । श्री राधे मौन हैं । इस अनोखी
जोरी को देख देखकर   ये गोपाल अपने आप को अपने
प्रभु पर न्यौछावर करता है । उसके जीवन का प्रयोजन
यही है ।
[  १  ५  ]
[ गुपाल प्रेम रसमाधुरी ]
।। तरनि  बिराजें ब्रज चन्द्र  किशोरी ।
नाबिक सखी सहज सुखदैनी       चम्पून  कर  बरजोरी।
म्रग साबक ज्यों नैन मनोहर           सखियां राधे भोरी ।
बिखरत हास रसिकश्री ओठन         बंसुरी अधरन गोरी।
दसा अनूप लली भानूबर               पौढी  चन्द्र  चकोरी ।
नेह समंदर तन मनप्रभुदित        भींजी   नैनन   कोरी ।
स्यामा जल स्तबध लखत हरि   समय  चक्र  गति तोरी ।
‘’गुपाल  निरख सखी सुख पाबैं   अदभुत पाबन   जोरी ।
हिंदी भावार्थ :— –
नाव मैं  युगलस्वरूप युगल जोड़ी श्रीकृष्ण व श्रीराधिके
बैठे हैं।  नाव  चलाने के लिये श्री राधिके की सहज ही
सुखदेनी कोमलांगी सखियाँ हैं। जो अपने कोमल हाथों
मैं चम्पू लिये नाव जमुना जी मैं चलाने के लिये जोर
लगारहीं हैं।  हिरणी के बच्चे के से चंचल नेत्रों वाली
श्री राधिके की सखियाँ बहुत भोली हैं।  ब्रज के रसिक
कन्हैया के ओठों पर हास्य तथा वंशी भगवान के
मुलायम होठों की नायिका है। भानू की छोरी [ श्रीराधिके ]
की  दशा अदभुत  है।  वे प्रभू की ओर पलकें झपका
रही है।  श्री कृष्ण की गोदी मैं सिर रखकर सो रहीं हैं
।  उनका हिरदय प्रेम के परिपूर्ण सागर मैं आनंद ले
रहा है। उनकी पलकें प्रेम के कारण गीली हो गयीं हैं।
जमुना जी का जल स्तब्ध होकर परम मनोहर दृश्य
को देखकर हर्षित हो रहा है। कहते समय का चक्र भी
थम गया है उसका स्वभाव बदल गया है गोपाल
कहते है कि
[  १    ६  ]
[ गुपाल प्रेम  रसमाधुरी ]
कदम्ब तरू राजहिं बनबारी ।
गोप ग्बाल लुक गये बिरछ बन    हेरत     गौरस      बारी ।
रोक दगरिया मांगइ  माखन       ग्बाल   बाल       बनबारी ।
बूझत श्रीदामा सखि सुन्दर        काह   नात        गिरधारी ।
गूढ ग्यान चंद्राबली भासै          श्रीदामा          बलिहारी  ।
जन्म जन्म कौ नातौ हरि  सौं    हों हूं   दास          मुरारी ।
तत्ब ग्यान की बतिआं सखि सुन    बिहंसे      जोग    बिहारी ।
‘’गुपाल’’  न कोरी नारी गोपि    बहु जन्मन   हरि      प्यारी ।
हिंदी भावार्थ
– कदम्ब के पेड के नीचे श्री बनवारी बैठे हुए हैं ।
सभी गोप ग्वाल  वन के बृक्षों मैं छुप गए हैं । माखन लेकर आने वाली
बृज बालाओं की राह को देख रहे हैं अचानक वे मार्ग को रोककर माखन
मांग रहे हैं ।  सखी कहने लगीं पहले ये  बताओं श्रीकृष्ण कहाँ है।
श्रीदामा कह रहे है। ये बताओ ये गिरधारी तुम्हारा क्या लगता है।
इस गोपाल से तुम्हारा क्या रिश्ता चॅद्रावली गूढ ज्ञान कह रही है।
अरे श्रीदामा तू तो बुद्धि से हारा हुआ है ।तेरे हमारा नाता समझ
नहीं आयेगा है। हमारा भगवान से जन्मों का नाता है।
हम उनकी दास हैं और वे हमारे स्वामी है। सखियों की तत्वज्ञान की बात
सुनकर योगेश्वर हॅसने लगे। गोपाल कहते हैं । कि ये गोपियाँ साधारण नहीं है।
इन्होने कृष्ण प्रेम के लिए  शरीर धारण किया है। ये प्रभु को बहुत प्रिय हैं।
[१      ]
[ गुपाल प्रेम  रसमाधुरी ]
तरूबर मादकता अंगडाई ।
भांति भांत  बन कुसुम घनेरे         नंदनबन        ललचांई।
कदम बनी अराध अराध्या           घिरे     धैनु   समुदाई।
मोर बृंद चरनन छू कोंकत          मनहु  जुगल जस गाई।
सुरिभित सुरभिबहत ब्रज सीतल             नाम  धुनी  फैलाई।
मोहक छटा  गुपाल मनोहर          मन  अदुभुत  सुख पाई।
हिंदी भावार्थ ——–
– वृक्षों में मादकता हैं वे प्रशन्न होकर अंगडाई ले रहे है।
विभिन्न प्रकार के पुष्पों को देखकर नंदन वन भी ललचा
रहा है। कदम्व खण्डी [ कदम्ब बृक्षों के बिशाल वन मैं ]
में मेरे आराध्य श्री गोपाल हरि तथा अराध्या श्री राधे
गायों के झुण्ड में घिरे हुए हैं । मोर इकठठे होकर भगवान
के चरण छूकर आवाज कर रहे हैं कोकं रहे है। मानहु वे
श्रीराधे कृष्ण के जुगल स्वरूप् का गान कर रहे है।
सुगंधित वायु श्रीराधे स्याम  नाम को फैला रही है।
गोपाल  कहते हैं कि गोपाल की दिव्य मोहक छवि को
जो देखेगा वह सुखी हो जायेगा ।  क्योंकि गोपाल के
दर्शन मन को प्रसन्न करने वाले हैं ।
[ १     ८    ]
[ गुपाल प्रेम  रसमाधुरी ]
हरखत स्याम सखीन ललचांई ।
अगनित रूप धरे हरि  सोहें            गोपिन   बृंद    रिझाई।
मादक पवन बढामत निज पग     थिरकत  सखी  लुभाई ।
बहुरंगी केचुक तन धारी                 चटक  रंग    घघराई ।
तनमन अरपन करे सबहिं धनि       महारास  निस   आई।
जीव जन्तु संग  बनहु  थिरकै       जमुना   जल   कथकाई।
मूढ ‘’गुपाल’’ कहा एहि बरनै           कोट   शेस  ना  गाई ।
हिंदी भावार्थ ——–
श्यामसुन्दर प्रशन्न हैं । तथा गोपियों  को संग मैं ललचा रहे हैं ।
भगवान ने अगिनत रूप धारण कर रखे है। तथा गोपियों को सखियो
को प्रशन्न कर रहे हैं । पवन वायु की मादकता ने अपने पग बढा दिये
हैं । जिससे सखियों का समुदाय हर्षित हो रहा है। सखियों ने विभिन्न
रंगो के कैचुकी (ब्लाउज)तथा चटक रंग के घाघरा धारण कर रखे हैं।
वे सब अपने शरीर मन को श्यामसुन्दर को अर्पित करेंगी। क्योंकि
महारास की रात्रि आ चुकी है। जीव जन्तु तथा जंगल नृत्य कर रहा है ।
तथा जमुना जी का जल कत्थक कर रहा है।यह मूर्ख गोपाल क्या कह
सकता है। करोडों शेष जी मिलकर भी इसका वर्णन नहीं कर सकते हैं।
[ १ ९ ]
[  गुपाल , प्रेम   ,रसमाधुरी ]
बिहंसे , हरि  ,चरन  ,पलोटत ,  बामा  ।
कोमल ,चरन ,अनूप  ,  मनोहर                परसत,  स्याम  मान  न   भामा ।
मोहक , स्याम, बदन ,पुलकित , अति      श्रीमुख    ओठ  ,हलें    न   कामा ।
भींगी  ,पलक ,, बोझ ,अति ,भारी          ,   नैन, बंद    सकुचाइ        स्यामा ।
सिकुरी ,कीरत  ,     भानु , दुलारी          ,  उमडो   नेह,     अश्रु     अभिरामा  ।
बारों ,जग , इहि ,अदभुत ,जोरी            ,  रुचिर  लाड़ली    प्रभु  घनस्यामा   ।
अदभुत , छबि ,श्रीकृष्ण  , राधिके          दरस   परस    ‘’ गुपाल ‘’  सुकामा  ।
हिंदी भावार्थ ——–
””भगवान ,राधे, जी, के, चरन ,दबा ,रहे, हैं। हँस , रहे, है । श्री लाड़ली जी
,के, चरणकमल ,अत्यंत ,कोमल,, मनोहर ,हैं।,जिन्हे , श्री कृष्ण ,दबा ,रहे
,है  राधिका जी ,मन मैं प्रसन्न ,हो ,रहीं ,हैं , मुदित ,हो ,रही, है। उन्हें ,
अभिमान, नहीं ,है । श्याम सुन्दर ,बहुत ही, मोहक  ,हैं ,उनका ,शरीर ,
पुलकित ,हो ,रहा, है  । राधिका जी ,इतनी ,प्रसन्न ,हैं , कि ,उनके ,मुंह
से ,बात ,नही ,निकल ,रही ,है ।  ‘फिर ,उनके ,होठ ,किस ,काम ,से ,
हिलेंगे ,उनका ,सुंदर ,मुख ,बंद ,है । उनकी ,पलक ,गीली ,हो ,गई, है ।
उनपर, पानी ,का ,बोझ, भी, है । उन्होंने ,आँखे ,बंद कर लीं  , मन  के ,
अन्दर ,सकुचा, रही है वह ,लाजवन्ती, सी , छोटी, हो गयीं हैं  श्री वृषभानु
,तथा ,कीर्ति, माँ ,की , लाडली, के ,ह्दय में ,प्रेम नही , समा ,रहा, है ।उनके
,नेत्रों, से, प्रेमाश्रु ,लगातार ,,बहने ,लगे हैं गोपाल, कहते ,है। संसार, में ,इस
,जीवन, में, श्रीकृष्ण ,  राधिके ,    दोनों ,की अनौखी ,छवि ,के, दर्शन , पर ,
अपना ,जीवन ,न्योछाबर ,कर , दे ,अपने ,हाथ से ,उनके ,सुन्दर ,चरण
कमलों ,मैं ,प्रणाम करे ,तो ,जीवन ,सुधर ,जायेगा ,श्री राधे ,कृष्ण ,के ,
चरणो ,मैं ,समर्पण ,कर, दे  ।  उनका ,दर्शन ,उनकी ,पूजा ,दोनों ,इस ,
संसार, के ,उत्तम ,कार्य ,हैं ।
[    २  ०  ]
[  गुपाल , प्रेम   ,रसमाधुरी ]
झूलें ,  प्रभू ,अरु  ,ब्रज ठकुरानी  ।
रेसमडोर ,कदम्ब तरु ,  बांधी           ,    निरखत       ,      नंग    , लुभानी   ।
पटरी  ,चन्दन ,    ,  डारयौ  ,फंदा           ,     , रेसम , डोर             ,  सुहानी  ।
हौलै , हौलें ,दीजौ ,झोटा                ,        घबरामत             ,    अलि ,स्यानी ।
जमुनानीर ,बहै, ध्वनि ,कलकल      ,            गंध,    सुगं ध               बहानी ।
‘’गुपाल’’  निरख , जुगल ,छबि, सुंदर    ,  प्रमुदित , तन          , ,  हुलसानी  ।
हिंदी भावार्थ ——–
भगवान, ने, झूला ,डाल ,दिया, है, संग, में ,राधिका ,रानी ,है। वे ,वृज की ,रानी
हैं, उनको, श्रीकृष्ण ,  झूला ,पर ,बैठा ,झुला ,रहे ,हैं  रेशम ,की ,डोरी ,उन्होने ,
कदम्ब ,के ,पेड़ ,पर ,लटका, दिया, है, ।  सब ,रस, के ,स्वामी, श्रीकृष्ण ,को
,राधिका ,जी ,की ,सेवा ,करते ,देख ,कामदेव ,की ,पत्नी ,रति, लुभा, रही ,है
,मुग्ध ,हो, रही, है  , श्री .राधे ,अचरज .से . श्रीकृष्ण ,को ,देख. रही, है। श्री राधे
,की ,सखियों ,ने, रेशम ,की ,डोरी, मैं ,चंदन ,की ,पटरी ,डाल ,दी है। तथा ,उस
पर ,मखमल  , और  ,अनेक ,रंग के, फूलों ,से,  बना  ,    सुन्दर, बिछौना डाल
,दिया, है।  श्री राधिका ,जी, कह ,रहीं ,हैं ,सखियो ,झूला, की ,गति ,धीमी ,रखो
,मेरा, मन ,घबरा ,रहा है  श्री जमुना, का, जल ,कल ,कल की ,ध्वनि के, साथ
, बह ,रहा है । उससे ,सुगन्ध ,फैल ,रही है ,जो, हिरदय ,को ,खुशबू , और ख़ुशी
,प्रदान ,कर रही है  ।   अरे ‘’गोपाल ‘’मोहन ,और ,राधिका, की ,प्यारी ,छबि
को ,देख , सभी ,गोपों की, स्त्रियां , अपने, तन ,मन ,और, हिरदय मैं ,प्रसन्न
हो रहीं हैं । तू ,भी ,उस दृश्य ,को ,याद ,कर ,प्रसन्न , जा।
[    २ १   ]
[  गुपाल , प्रेम   ,रसमाधुरी ]
बैनु ,बजी, जग ,रस, बरसामत ।
कबउ , बिरहरस  ,लहरी ,छोडत            कबऊ     नेह     उमगामत ।
गोप ,बाल ,दौरत , इकठौरे                  , कृष्ण     कन्हैआ , भामत ।
सुध , बुध, छांडी , भाजत,  गौधन       ,   कान्हा  , मनऊ , बुलामत ।
भूख ,प्यास ,बिसराई  ,सबही              , अमरत  , ,बैनू     पिबामत ।
‘’ गुपाल’’ नटबर ,भेस , अनूठौ             , प्रानीन    घनौ    सुहामत ।
हिंदी भावार्थ ——–
””वंसी ,बज, रही , है। संसार,  में ,उसका , रस ,बरस, रहा है । यह
,कभी ,विरह की, तरंगे ,छोड, रही है। कभी, प्रेम, जगा ,रही , है। ग्वालो
,  के, बालक ,इधर ,उधर, दौड, रहे,  है। क्योकि ,उन्हें, कृष्ण , बहुत
,लुभाते है। अपने ,शरीर का ,होश ,खोकर ,गायें, वंशी  ,बजने  के,
स्थान की ,ओर ,दौड ,रही है।, उन्हें ,ऐसा ,लगता है ,जैसे, श्रीकृष्ण
,उन्हें, बुला ,रहे,  हैं । भगवान के, प्रेम में, भूख प्यास सब मिटगई
, है। सभी ,बैनु का, अमृत ,पी , रहे हैं। गोपाल , के,   स्वामी ,कृष्ण
का ,नटवर,भेष ,अनौंखा है। जो,  बहुत , ही  ,लुभावना,  हैं।
जो ,सभी ,जीव धारियों , को ,बहुत, सुहाता , है, अच्छा , लगता , है    ””
[  २  २ ]
[     गुपाल ,प्रेम रस ,माधुरी  ]
कालिंदी ,पुलिन ,स्याम ,अति ,सोहहिं  ।
कनक, कसीदी  , रुचिर,  पादुका              ,   चरन , विश्व  ,    मन,  मोहहिं ।
पीतबरन ,  हरि ,बसन ,सुहाने                  ,    स्वर्न       करधनी   सोहहिं    ।
नीलबरन ,त्रिभुवन जय, चितबन              ,    ब्रज   जन    मधुरस  ,बोरहिं ।
दिरग ,चंचल ,  मनउ , हरि ,चंचल             ,    चंचल       सखी   पमोदहिं    ।
बंशी बजै ,तान अति, समुधर        ,           ,   गोपग्वाल, प्रभु     ,    खोबहिं ।
‘’गुपाल’’ रुप ‘’गुपाल’’  मनोहर          ,    ,   ,अपढारी        , अलि भोमहिं,।
हिंदी अर्थ  ;—— ”” यमुना जी के ,किनारे ,श्री कृष्ण ,अति, शोभा दे, रहे हैं  ।
सोने से, जड़ी हुई ,जूतियां उनके ,सुन्दर चरणो मै ,शोभित हैं ,जो पूरे,   विश्व
के मन को, मोह रहीं हैं । हरी के ,पीले वस्त्र , बहुत सुहाने हैं। वे , सोने की ,
कोंधनी ,पहने हुए हैं  नीले रंग के, मोहन ,तीनो लोको को ,जीतने वाली ,
मुस्कान के साथ ,मित्र व महिला मित्रो के, साथ है। तथा, उन्हें ,अपने ,मीठे
व्यवहार से ,सबको प्रेम मैं, बोर दिया है ।  उनके ,नयन, चंचल  हैं   ,प्रभु का
,मन भी ,चंचल है तथा चंचल ,सखियों के साथ ,प्रमोद ,हास परिहास ,कर रहे
हैं वंशी की, समुधर ,ताने ,बज रही है सुनकर  ,सभी ,गोप ग्वाल ,,अपना, होश
खो बैठे हैं  , । गोपाल कहते है   । गोपाल का, मन भावन रुप ,बहुत ही ,,मनोहर
है, जिसे ,देखकर ,सखियां ,आप ही ,मोहित हो ,जाती हैं ।
[  २ 3   ]
[गुपाल,प्रेमरस,माधुरी]
फागुन रागिनी          ,ब्रज  , बरसानी  ।
ललिना   , ललिता ,  ,सखिअन    ,टेरत         ,             फ़ाग   ,  पूर्निमा    ,  भानी    ।
मनमन, भामत, मूंड  ,हलामत               ,        रसिआन  ,  ,मिलन  ,    सिहानी  ।
गांव   ,गली ,श्रृंगार  ,   बहत ,    ब्रज           ,           जोबन ,  रस   ,      अंगडानी ।
नृत्य करैं , थिरके ,ब्रज, बसुधा                  ,           रस ,   छंदी,     कबीतानी     ।
हास भरे , संबाद  , सुआमत                         ,    सखिन,       संग   ,   ब्रज   रानी  ।
’गुपाल ‘’ खेलत  ,सदां  ,  हुरन्गा                  ,     कृष्ण  ,,    राधिका       ,   जानी।
हिंदी अर्थ    ;——    
फागुन लगते ही ,””ब्रज मैं , रस का ,मौसम, आ गया । गांवों  की ,गली गली में
श्रृंगार रस  ,   बढ़, गया हैं। , लली ,ललिता ,सभी ,सखियों को , होरी    आने की
,बात ,बता रही है। सखियाँ ,ललिता की ,बात ,सुनकर, प्रसन्न ,हो गयी है इस
बहाने ,श्री कृष्ण व् अन्य रसिक मित्रों से, वे मिल ,सकेंगी  । ब्रज के गांवों की
,कुञ्ज गलियों मैं ,श्रृंगार बढ़ गया है   बृज  मैं ,मानो ,जवानी आ गयी हो    ।
ब्रज  बासियों के, संग ,ब्रज वसुधा भी, नृत्य कर रही हैं।  एक दूसरे को ,प्रेम से
,चिढ़ाने वाले , संवाद ,सभी को, अच्छे ,लग रहे हैं   श्री कृष्ण भी ,मन मैं ,बहुत
ही ,हर्षित हो रहे हैं । ब्रज  बासियों के संग ,ब्रज वसुधा भी नृत्य कर रही हैं।
प्यार प्रीत की ,हवा बह रही है ।  गोपाल ,ब्रज में ,सदा ही नंद नंदन व राधे
लाड़ली जी ,होरी, खे
[ २ ४   ]
[     गुपाल ,प्रेम रस ,माधुरी  ]
सखा ,संग ,खेलहिं , प्रभु , होरी ।
रंग बिरंगौ ,झंगा, ढीलौ                                    निरखत  ,    राधा   ,  गोरी ।
छांड़ी ,लोक लाज, सबरे ,जुरि                              करैं    , हास    , बरजोरी  ।
ताल ,बजाबें करैं , इसारे                                  सखी  , राधिका ,      भोरी  ।
‘     बहुरंगी रस,  बरसै,   बसुधा                         खेलें         छोरा       छोरी।
फागन   रस  , पीबें  ,सब जुरिमिल                   सखा, संग , सखि ,जोरी    ।
टेरत राधे,सुनि, मन ,माधब                                धीरज   ,धरौं  ,   बहोरी   ।
कह’ ,गुपाल ‘’  रंगीली , आबों                           औसर     ,नीकौ ,     होरी  ।
हिंदी अर्थ  ;——         
””मित्रो के साथ ,श्री कृष्ण ,होली ,खेल  ,रहे हैं। रंग बिरंगो, ढीलौ  कुर्ता [झंगा
पहन रखा है। राधा जी ,उन्हैं  ,ध्यान से ,देख रही हैं। सभी ने संसार की परवाह
न करते हुए ,लोक लाज छोड़ दी है और ,,हॅसने ,हँसाने में  , मन लगाया हुआ हैं।
ताली बजाते है। इशारे भी कर रहे है। और राधा जी की ,सखियाँ भोली, भाली हैं।
,वे स्वयं भी भोली हैं ,ब्रज में श्रंगार आगया है। फागुन के ,बहुत ,सारे, रंग ब्रज मैं
, बरस ,रहे हैं । बच्चे ,तथा बच्चियाँ ,होरी ,खेल रहे हैं ।मैंने ,बहुत ,धीरज, रखा है
सभी ,सखियाँ फागुन मैं फ़ाग ,रस ,पी रहीं हैं उन्होंने ,अपनी ,जोड़ियाँ ,अपने,
मित्रों के ,साथ, बना रखीं हैं। श्री राधिका बोलीं, ,हे माधव, आप ,मेरे मन की भी
सुनो , मैंने, बहुत, धीरज ,रखा है।  आप भी, होली ,खेलने आ जाओ ।  इस पर,
गोपाल  के ,प्रभु श्री कृष्ण ,बोले ,,सभी, ,मिलकर ,,आ जाओ ,, होरी का ,अवसर
,बहुत ही अच्छा है, बहुत ,,सुन्दर है
[२ ५   ]
(गुपाल,प्रेमरस,माधुरी]
बाजें, ढप ,ढोल, मास ,रस  ,आनों    ।
प्रीति, पुरातन ,प्यारी, रस रितु        ,  पीताम्बर     ,ब्रजेश  , सुहानों    ।
पीरी ,पटकन ,पीरी ,लटकन               ,पीरौ    रंग , मुख  ,   लपटानों  ।
पीरी फ़टतइ ,  पीरी,     बरखा      ,     पीरी, भूमि      ,    पीरौ  ,बानों  ।
पीरी ,पोखर ,पीरे, तरूबर                , पीरौ    सखि  ,आज   बरसानों  ।
पीरे ,लाल ,राधिका ,पीरी                   पीरी    सखि   पीरौइ  खानों   ।
हेर, थके न’’ गुपाल’’  हुरन्गा     ,      पीरौइ   जो   मनबा      भानों ।
हिंदी अर्थ  ;——
ढप, तथा, ढोल , बजने , से,  ब्रज,  मैं,  फागुन, आने , का,  संकेत ,मिल
रहा , है  ढप,  बजने,  से, बृजरस , मैं, डूब , गया , है ।      कृष्ण, को, पीले
वस्त्रों, से ,बहुत ,ही ,प्यार है इसमें, उन्होंने,अलौकिक पीला वस्त्र ,धारण
,कर, रखा ,है   । यह रस ऋतू ,प्रीति ,का ,पुरातन अवसर, है, पीरी लटकन
[स्वापी,  गले मैं लट काने ,का ,वस्त्र ] है ,पीरी ,पोशाक , उसे पीला अच्छा
,लगता,  है पीला रंग , लिपटाने , से  ,मुंह   ,  भी , पीले , हैं ।  भोर ,की बेला
,  मैं ,पीली बरसात ,हुई, है  ।धरती, सब, पीली ,हो ,गयीं ,है । सब ,पोखर
पेड़ ,पौधे ,सब ,पीले ,हो ,गये ,हैं । एसा, लगने, लगा   ,मानों, धरती, ने
,पीले, कपड़े ,पहने, हैं । श्री कृष्ण   ,राधिके, सखियाँ ,सब पीले ,लग ,रहे ,
हैं  । गोपाल  ,का ,मन, होरी ,के, इस, द्रश्य, को ,देखकर ,थकता ,नहीं ,है।
गोपाल को ,भी ,पीला, रंग, अच्छा, लगता ,है।
[ २    ६  ]
[  गुपाल , प्रेम , रसमाधुरी ]
झूलत ,राधे , देंइ  , हरि , झोटा ।
निरखत , छटा , मुदित, मन ,प्यारी                  मनहर   , नन्द ,जू   , ढौटा ।
निरमल,नीर , बहै   ,   कालिंदी                        निनाद   ,  प्रकम्पित छोरी  ।
हौले , स्याम ,गात ,अलि ,कोमल                         टूटै     न     रेसम  डोरी ।
म़ोहन ,  कही , संग    , झूलेंगे                             सुनऊ   ,राधिका ,  मोरी ।
सखिन ,सबै , निज ,आयुस, दीजै                       गायकी      छंदी      होरी ।
मौन ,स्वीकृति   प्रिये  , राधिके                          प्रभू      रसराज   चकोरी  ।
ललिता ,ललित, दै, रही, झौटा                      ‘’गुपाल’’   सखी,  मन   भोरी।
हिंदी अर्थ  ;——राधा रानी ,झूल रही है । तथा श्री कृष्ण भगवान ,उन्है ,झोटा
, दे रहे  हैं । सभी ,  जसोदा जी के, मन, को, हरने वाले  पुत्र ,को ,,देखकर अति
,हर्षित , हो, रहे, हैं ।उनकी ,छटा को ,देखकर, श्रीराधिके ,और, उनकी ,प्यारी
,सखियाँ ,मोहित ,हो ,रहीं, हैं । नीचे ,यमुना ,जी ,का,, ,निर्मल ,नीर ,,बह ,रहा
,है । जिसे ,देखकर जिसके ,प्रवाह के शोर से ,सभी छोरियां, डर, रहीं हैं। सखियाँ
,बोली, हे, मोहन ,हमारी, सखी श्री राधिके, का, शरीर ,अत्यंत, कोमल है, अत,
तुम, धीरे ,धीरे, ,झोटा ,दो,  , तेजी से,   ,रेशम, की, डोरी न, टूट ,जाये।।  मोहन
,कह रहे हैं , सखियौ मैं श्री राधिके के संग,  में ,झूलता हूँ । आप ,सब ,भय, से  ,
मुक्त, हो ,जाओगी । हे राधिके ,अपनी प्रिय ,सभी सहेली को, आप आज्ञा दीजिये।
कि वे ब्रज की होरी के रस छंद गावें। श्री राधे  जी की बिना बोले ही स्वीकृति, है।
जो, रस ,की, सागर ,हैं ,तथा सभी रसों के राजा श्रीकृष्ण की प्रेमिका हैं । उनके
साथ बैठ गए सुन्दर ललिता उन्हैं झौटा देने लगी। जो मन की अति भौरी हैं। वे
,  श्रीकृष्ण रूपी ,चकोर ,की ,चकोरी , हैं।
[ २ ७   ]
[  गुपाल प्रेम रस  माधुरी
मुंदे , नैन, हरी  ,रस, बरसाबहिं।
सैन, बैन, दौन, संग ,फरकत            जड ,   चेतन, मचलाबहिं।
नेह ,अंध ,ब्रज चली ,अनूठी                 धराकास       पुरबाबहिं।
दौरे ,दौर , पांय, नांय , धरनी                नेह समुद    बहजाबहिं।
धैनु ,गोप ,भोरी ,ब्रजबासिन              ,   टोल टोल  प्रभु    पाबहिं ।
सूखे, तरूबर ,     हरे ,उगाने            ,         हरे ,हरे ,हरि ,गाबहिं ।
‘’गुपाल’’  ,कदम्ब , डार , बिराजे      ,बैनू ,          मधुर ,बजाबहिं
हिंदी अर्थ  ;——
भगवान ,के ,नयन ,बंद हैं । तथा, बांसुरी, से ,रस ,की ,वर्षा ,कर, रहे
, हैं । उनके ,नेत्र ,तथा, वंशी  दोनो ,साथ ,साथ, फरक रहे, है। जिससे
,जड चेतन ,मचला ,रहे हैं।   ब्रज, में, प्रेम ,की ,आंधी ,आ ,गयी है।
जिससे धरती तथा आकाश व्याप्त है।लोगं ,दौड रहे है। वे हर्षातिरेक
से, दौड़े, जा रहे हैं ऐसा ,लग रहा है ,जैसे ,उनके पैर ,धरती ,पर नहीं हैं
मानो, प्रेम के, समुद्र में ,बहे ,जा रहे हों ।गाय ,ग्वाल ,गोपियाँ वृन्दावन
की ,ओर जा रहे है। जो, पेड ,सूख गये थे वे ,हरे ,होकर हरे  हरे गा रहे हैं।
कदम्ब, की, शाखा, पर ,आसन, लगाये, गोंपाल ,वंशी  ,मधुर ,बजा,
रहे, है।
[ २  ८   ]
[     गुपाल , प्रेम रस , माधुरी ]
परम , जोग ,हरी ,  रस ,बरसामत।
रत्न ,जडित , हरी ,हरि , बांसुरिया      ,       मनमोहन,      हरि  ,    भामत।
सुधि ,बुधि, बिसरी ,तान, मुरलिया   ,     रोग ,    सोक, जर , खामत ।
ब्रजमंडल ,आनंद ,भूमि, जग ,             ,      आनंद ,     खैर,    मनाबत  ।
चित्रलखे , गंधर्ब , गांधरबी            ,  मोहक ,राग ,         सुनाबत      ।
जन्मन ,सोइ, बैरागी ,जोगी        ,    अंतर ,  भाब ,      जगामत ।
‘’गुपाल’’ दौरी ,प्रेम, पियासी               ,       औसर ,मुश्किल , आबत।
हिंदी अर्थ  ;——
योगेश्वर , श्रीकृष्ण ,प्रेमरस, बरसा ,रहे, हैं ।  हरे , बाँस , की , रतन ,
जडित ,बाँसुरिया , योगेश्वर ,को, लुभा रही ,है। शरीर ,का ,होश,नही,
है। मुरलिया ,की ,तान ,से ,रोग, व ,शोक, जड, से  ,जल ,गये है।
ब्रजमंडल ,संसार ,की ,आनंद ,भूमि  है । जहाँ  ,आनंद ,भी ,अपनी,
कुशल , मनाता  है। देवता, तथा, गंधर्व ,भी ,इस राग को ,सुनने
ऐसे ,लगे है कि मानो ,वहाँ  ,उनके ,चित्र लगे हो। जन्मों से वैरागी
,साधू भी, ह्रदय में, भाव ,जगा ,रहै है।  ऐसा, अवसर, कहाँ  ,मिलता,
है। यह, सोचकर, प्रेम, की ,प्यासी ,लडकियां  ,दौड ,पडी। क्यों  ,ऐसा ,
अवसर बडी ,मुश्किल,  से ,मिलता, है। जन्मों , के , पुण्य कर्म , से ,
मिलता,  है।
[ २   ९   ]
[ गुपाल ,प्रेमरस ,माधुरी]
अष्टसखी , संग  ,राधे ,रानी ।
मनिमय ,जडित ,तरनि  ,मनमोहक   ,       जल,  बिहार , मन, जानी  ।
बहूरंगे ,प्रसून , सुआमत            ,                साजत ,   नाब, सुजानी ।
पुष्प ,आबरन, काठ, चढानौ           ,      ललिता ,   निरख   ,   रिझानी।
सुधि, बुधि ,निज ,सरीर ,बिसरानी         ,         टेरत , मीठी ,     बानी ।
राधे  ,बढ़ा ,रुचिर ,पग, दीने ,               ,         उत्सुक ,सखियन ,जानी।
आसन ,ग्रहन ,करौ ,तरनी,  मैं            ,       जमुना      , जी ,हुलसानी ।
”गुपाल ” मूढ़ , कहा  ,छबि ,बरनैं  ,          शेष    कोटि , ना        जानी ।
हिंदी अर्थ  ;——
राधिके रानी आठो सखियो संग में है। मणियों से जडी हुई नाव अत्यंत
मोहक है। उसे राधा जी द्वारा देखने पर सखियों ने उनकी जल विहार
करने की इच्छा को पहचान लिया ।  भाति भाति के फूल इकटठे करके
सखियाँ नाव को फूलों से सजा रहीं हैं । उन्होंने , लकड़ी,  की ,नाव को,
सुन्दर ,बना, दिया ।  ललिता देख कर खुश हो रही है ।   सुन्दर नाव
को ,देख कर ,वह अपना ,होश, खो बैठी ,तथा श्री राधे से ,मीठी बानी
,बोली ।  श्री राधिके ने , उनकी बात सुनी तथा अपने सुन्दर पैर नाव
की ओर बढ़ा दिए। सखियों की ,उत्सुकता ,देख ,वे ,नतमस्तक ,
हो गयीं  ।  उन्होंने नाव मैं आसन ग्रहण कर लिया,, यह देख
जमुना जी प्रसन्न हो गयीं।  यह गोपाल मूर्ख क्या बरनन कर
सकता है ,क्योंकि, इसका ,करोड़ों शेष भगवान , बर्णन, नहीं,
कर, सकते , हैं ।
[   3  ०  ]
[ गुपाल ,प्रेमरस ,माधुरी ]
आनंदमग्न   , हरी, रस बरसामत ।
मारूत ,नेह , बहत ,ब्रजमण्डल                       ,  ढूंढे ,भेद  ,  , न ,  पामत  ।
नर ,नारी ,औ, बालक  , बूढे                        ,  बैनु , धुनी  ,   मचलामत  ।
हिंसक , जीब, स्बभाब, छांड  ,निज             , केहरि  , मृग   ,    बतरामत  ।
घ्रणित  भाव  शून्य  बृजबासी                        ,   मनमंदिर       ,     मुस्कावत  ।
सांत  ,लहर  जमुना मनमोहक                       , ”गुपाल ”    स्याम  ,    सुहावत  ।
हिंदी अर्थ  ;——
भगवान ,के, नेत्र , आनंद, से, बंद, हैं  ।  वे ,प्रेम रस ,वितिरित ,कर ,रहे , हैं ।
पूरे ,बृज ,मैं, प्रेम, की आंधी ,चल, रही है कही, वैर ,नहीं , है। न ,कहीं ,भेद, है ।
नर ,नारियो तथा बूढ़े ,लोगों , को ,भी , वंशी, की ,.मधुर, ध्वनि .,मचला ,रही
है। ,तथा ,वे ,भी ,श्री कृष्ण ,कृष्ण ,पुकार, रहे, हैं ,श्री गोपाल जी ,कदम्ब की
शाखा पर ,बैठे ,प्रेम ,लुटा ,रहे है। हिंसंक ,जीव भी,अपने ,स्वभाव ,को ,छोडकर
, ,   हिरन ,और ,सिंह ,भी , बाते ,कर ,रहे, हैं। सभी ब्रजवासी घृणा के विचारों से
मुक्त हो गए हैं, तथा मनमंदिर मैं हर्ष का अनुभव कर रहे हैं ।  यमुना जी की
लहरें बिलकुल शांत हो गयीं हैं ,   मानो वे श्याम सुंदर को अच्छी लग रहीं हों।

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