बृज यात्रा दर्शन

श्रीराधेकृष्ण शरणम              राधे सर्वेश्वरी जयते   वृंदावनविहारिणे नमः  श्री कृष्णाय गोविन्दाय नमः  
   श्री लाडलीलाल जयते      श्री ब्रजभूमि जयते     श्री  ब्रजेश्वरी जयते

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्‍वरः ।

गुरु साक्षात्‌ परब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नमः ॥

 

 श्री राधागोविन्द की शरण लेकर सर्वेश्वरी राधिके ,के प्रभुत्व वाले ब्रजमंडल क्षेत्र ,की  ,मैं
 रामगोपाल [ राधे  राधे ] ज्ञान की देवी श्री सरस्वती के सुस्मरण से प्रथम पूज्य . श्री
गणपति जी से बुद्धि आशीर्वाद लेकर ,समस्त गुरुजनों ,विद्धानों ,समस्त भक्तों ,समस्त
वैष्णवों,एवम  अपने पूर्वजों  के आशीर्वाद युक्त होकर ब्रजमंडल  यात्राओं  का अपनी ,
क्षुद्र बुद्धि से बरनन करता हूँ ।     गुरु  ज्ञान , प्रदान मार्ग , बताये साधन ,उनके अनुभूत
मंत्र ,निसंदेह ,प्रभु नंदनंदन श्री कृष्ण की प्राप्ति के अनमोल साधन हैं ।    ,उस ,सरल ,
अनुभूत ,मार्ग को मैं आपको प्रस्तुत करने का  अपनी क्षुद्र बुद्धि से प्रयास कर रहा हूँ ।   
 ,अनेकानेक संत ,भक्तों को भगवान इसी मार्ग से मिले हैं ,प्राप्त हुए हैं ।    यही सगुन
भक्ति का निष्कर्ष है ,संसारी जीवन मैं ,हम जिसे प्राप्त करना चाहते हैं ।    ,हमें उसका
मनसा वाचा ,कर्मणा ध्यान करना पड़ता है ।    ,चाहे वह ,वस्तु जड़ चेतन कुछ भी हो ,
जितना हम उसकी ओर चलते हैं।     मंजिल भी ऊतनी  ही नजदीक होती जाती है ,।   
 इसी सिद्धान्त को हम श्रीकृष्ण की प्राप्ति मैं अनुसरण कर सकते हैं ।    कृष्ण से जुड़ने
हेतु ,उनसे जुडी उनसे अभिन्न वस्तुओं ,स्थान ,भूमि मनुष्य ,साधू संतों  से,जुडना
आवश्यक है ।     प्रभु श्रीकृष्ण को अपने भक्त ,साधुसंत बहुत ही प्रिय हैं ।    ,इनके
 साथ  से,    इनसे,   प्रेम करने से ,  इनके  संगत करने से अनायास ही श्रीकृष्ण ,मैं
आसक्ति बढ़ने लगती हैं ।      श्रीकृष्ण को  गायें बहुत प्रिय हैं ।    ,गौ सेवा हमें प्रभु की
ओर ले जाएगी ,श्रीकृष्ण को धर्म प्रिय है अत धर्म पर चलने वाले व्यक्ति को श्रीकृष्ण
प्राप्ति  सुगमता से होगी अत धर्मवान व्यक्ति प्रभु की अनुभूति हो  जायेगी ।    
श्रीकृष्ण को वेदमार्गी ,तपोनिष्ठ ब्राह्मण प्रिय हैं ,ब्राह्मणों का कल्याण करने वाला ,
सेवा ,आदर करने वाला भी उनका प्रिय है।     ,इनका सानिध्य भी आपको प्रभु कृष्ण
की और ले जायेगा ,श्रीकृष्ण को गीता भागवत बहुत ही प्रिय है ।    ,इनका पठन पाठंन
,श्रवण सब श्रीकृष्ण प्राप्ति की ओर ले जाने के साधन हैं परिपूर्णतम ,ब्रह्म श्रीकृष्ण की
,ओर अग्रसर होने का ,प्राप्त करने का बेजोड़ ,नायब तरीका है।     ब्रज मंडल ,ब्रजभूमि
 यह भूमि सनातन है गोलोक का एक खंड है यह दिव्य भूमि ,यहां स्वयं आनंद आनंद
लेने आता है ।    ,क्यों न हो यह ब्रज आनंद की अक्षय श्रोत श्रीराधिके एवम परमानंद
स्वरूपा श्रीकृष्ण की लीला भूमि हैं ।     इस भूमि मैं आनंदेश्वरी राधिके ,तथा
परमानंदस्वरूप श्रीकृष्ण को भी आनंदित करने की क्षमता है।       यहाँ श्री यमुना हैं
,श्री गिर्राज हैं ,गौएँ हैं ,बन हैं कुंड हैं सरोवर हैं सभी श्रीकृष्ण को प्रिय हैं ।    
इसकी गवाही महाकवि सूरदास ,अपने आराध्य से कहलवा रहे हैं ।    दिलवा रहे हैं ।
उधौ मोहि ब्रज विसरत नांही  ।    
सुरसुता की सुन्दर कगरी और कुंजन की छाई ।    
इस भूमि का विनाश प्रलय काल मैं भी नहीं होता है।     ,यह दिव्य भूमि अमर भूमि हैं
बृज की यह भूमि ,आनंद से परिपूर्ण ,रस उल्लास प्रदायिनी ,भक्ति प्रदायिनी श्री गोविन्द
एवम गोविंदी श्री राधिके को लुभाने वाली है ।    यहाँ का कण कण युगलस्वरूप की अलौकिक
लीलाओं ,का साक्षी है।     यहां के वन ,उपवन ,नदी कुंड सरोवर जीवजंतु ,पक्षी सब
कृष्णमयी है ।    श्री राधिका की कृपा से परिपूर्ण ओत प्रोत हैं ।    
मथुरा जाते समय जब श्री बाबा नन्द तथा प्रेममूर्ति श्री यशोदा अति अधीर होकर कृष्ण
कृष्ण कहने लगे ,तबश्रीकृष्ण ने अपने मातापिता श्री नन्द और यशोदा को ढाढस बंधाया
,और कहा ,पूर्णरूप से आश्वश्त किया ।    ,
ब्रजबासी   बल्लभ      सदां ,      मेरे   जीवन प्राण ।    
इन  न कबहु  विसारों        ,    मोहि  तिहारी आन।    
ब्रजमंडल   प्यारौ  घनौ  ,जसुदा  मां  सी  भूमि     ।     
”गुपाल”  गौ  ग्वाले इहा      ,कदम्तरु  ब्रजधूम   ।        
शीतलता तन ब्रज बसै    ,      दगध हिया ब्रज छांड  ।    
 गुपाल  रूप  ब्रज में   रहूँ     ,    खाबों माखन   खांड ।      
 
 
 
 
भावार्थ :——–
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं बाबा बृज के वासी सभी प्रकार से श्रेष्ठ हैं ,
तथा वे  ही मेरे प्राण हैं , उनसे मेरे शरीर मैं प्राणऊर्जा का संचार है ।      मैं इन्हें कभी
भी नहीं भूल सकता ,मुझे तुम्हारी  दोनों की सपथ है।     ,  सौगंध है   मुझे यह
ब्रजमंडल अत्यंत प्रिय है ।    ,तथा यह भूमि ,यशोदा मैया जैसी लगती है ,अर्थात
यह भी मुझे ऐसे ही प्यार करती है ।    जैसे मैया ,   यहाँ मैं गोपाल ,गायें ,तथा
ग्वाले बहुत हैं , तथा बृक्षो मैं ,कदम्बों की प्रचुरता है ,अधिकता है,  बृज मैं रहता हूँ
तो मैं ठंडा  रहता हूँ तन मैं शीतलता रहती है , मन भी शीतल रहता है ,बृज को छोड़ते
ही मन मैं उष्णता  का अनुभव होता है ,सो मेरे बाबा मैं गोपाल रूप से ब्रज मैं रहूंगा ,
तथा यहीं माखन खांड खाता रहूंगा ।     
बाबा श्री नन्द ने कन्हैया ध्यान रखना ,कन्हैया ने कहा बाबा हम एक रूप से हमेशा
ब्रज बास करेंगे।       जब नंदबाबा ,और माता यशोदा वृद्धावस्था को प्राप्त हुए ,तो
उनके मन मैं चारों धाम सहित समस्त तीर्थों की यात्रा का मन हुआ ।      श्रीकृष्ण
जी ने अपने मैया बाबा की इच्छा पूरी करने को सभी तीर्थों को आदेश दिया।    
 
नन्द यशोदा पुण्य  हित   ,   प्रभु दीनों  आदेश  ।    
चारों धाम ब्रज आ गये    ,   महिमा बढ़ी ब्रजेश  ।    
 
 कि वे ब्रजमंडल मैं वास करें ,तथा उनसे आदेश दिया जो भी मनुष्य ब्रज की यात्रा
करेगा ।      उसे वे समस्त पूण्य प्रदान करें जो उनकी वास्तविक यात्रा पर प्राणियों
को प्राप्त होते हैं।     तबसे ,ब्रज की महिमा और भी बढ़ गयी ,ब्रज की यात्रा करने से
ही समस्त तीर्थो का पूण्य लाभ तीर्थ यात्रियों को मिलने लगा ।    श्रीकृष्ण के काल
से अभी तक अनेकानेक यात्रियों ने पूण्य भूमि से पूण्य अर्जित कर भगवान श्रीकृष्ण
का सानिध्य प्राप्त किया है ।    
साक्षात् श्री गोविन्द से मिला देने वाली पूण्य भूमि ,की यात्रा आपके जीवन
[  लौकिक पारलौकिक ] को चिरकल्याण प्रदान करायेगी ।    आपका जीवन धन्य हो
उठेगा ,आपके मन मैं भक्ति के सहस्त्रों छंद अंकुरित होंगे ।    ,आनंद की वर्षा से जीवन
ओतप्रोत हो जायेगा ।     ऐसा मेरा विश्वास है शाश्त्रो का वचन है आओ मेरे साथ करो
ब्रज  यात्रा का आगाज ,करो मेरे जीवन को धन्य अपने आगमन से ,तथा अपने जीवन
को भी धन्य बना लो ।    
आओ ब्रजमंडल मैं बिखरे भक्तिरस माधुर्य , पुण्य सागर ,आनंद का अवलोकन करने
का संकल्प करें ।    
आवौ   बृज मंडल        की    ओर       ।    
कोंकत ,नाचत    मोरनी         मोर     ।    
कृष्ण सुमरता   हो  जहाँ      भोर       ।      
राधे राधिका        , होता  शोर          ।    
गोविन्द छोर      राधिका       ओर    ।    
राधे  चकोरी            कृष्ण  चकोर    ।    
मन तन हो जाय  आत्म बिभोर        ।    
झालर घंटान    शंखन     घोर          ।    
ब्रज यात्रा  बृज  चंद्र       निचोर        ।    
”गुपाल” बुलामत  निज कर   जोर    ।    
नेह निमंत्रण सब जनन            ,   हिरदय प्रभु आभार   ।    
ब्रजमंडल यात्रा  करौ                ,   होय पुण्य अधिकार  ।    
पाबन सुख ब्रज विचरण प्यारे         ,      लोक ,परलोक ,सुधारण   ।    
कण ,कण राजत लाल लाडली        ,   रास रचत         ,गौचारण    ।    
गोकुल ,  मधुबन ,जमुना कगरी    ,   अनुपम   महा वृन्दावन         ।    
नंदगांव   गोवेर्धन , मोहक           ,       बरसानों  , ब्रजपावन         ।    
लीलाधाम  ,कामवन उत्तम          ,    जतीपुरान   , लौठावन        ।    
राधाकुंड         ,        कोकिलावन ब्रज  , भोजन थारीउ   , भोजन  ।    
चरण पहाड़ी ,       विमलकुण्ड   हरि    , मानसी गंगा     ,भावन   ।    
बाल चरित   ,हरि साख  सुहाने             ,   नर लीला नारायण      ।    
केहि बिधि शब्दन   हौं  बाँधूँ        ।      अनंत कीरती         केहि बिधि साधूँ ।    
निज मुख स्याम कीरती  गावै      ।      केहि  बिधि”   गुपाल ” मूढ़ समझाबे ।    
बृज के महत्व को  दर्शाता  महत्वपूर्ण प्रसंग प्रबुद्ध पाठको हेतु विशेष रूप से यहाँ
उल्लखित है ।    ,यह स्वयं द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण एवं श्री उद्धव  [ ऊधौ  ] के
बीच का है।      जिसमे ,श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम मुझे यहाँ द्वारिका मैं देख रहे
हो ,और मुझे समझने ,जानने का प्रयत्न कररहे हो , तो मैं अपने बारे मैं बताता हूँ ।    ,
ब्रजमंडल मैं बसत हैं         , ऊधौ   मेरे    प्राण     ।    
कृष्णरूप” गुपाल” ब्रज      , प्रेम ,कृष्ण कौ ज्ञान  ।    
बृज मैं मेरे प्राण रहते हैं ,बृज मेरा ही रूप है ,और मुझे जानना ,हो तो बृज को जानो
    ,और उनको बृज की यात्रा करने के लिये प्रेरित किया ,और ऊधौ जी ने इस ब्रजमंडल
की यात्रा की।    जहाँ वे महाज्ञानी उद्धव गोपियों से निरुत्तर हो गये ,और गोपियों को
अपना गुरु मान  लिया, उन्हें इस यात्रा से प्रेम ,कृष्ण का साक्षात्कार हुआ ।  उन्होंने
निराकार ,ज्ञान मार्ग ,चिल्लाना बंद कर दिया , और कृष्ण रूपी सगुन भक्ति के
महासागर मैं डूब गये ,निमग्न हो गये । 
जब उद्धव से महाज्ञानी के मन मैं श्रीकृष्ण की  प्रेम भक्ति अंकुरित हो गयी तो ,
निश्चित ही आपका हिरदय ,ब्रजयात्रा उपरांत श्रीराधाकृष्ण के प्रेम से सराबोर हो
उठेगा  । ऐसा कृष्ण प्रेम भक्ति का आकर्षण , इस बृज बसुंधरा के कण कण मैं है  । 
भारतीय संस्कृति मैं सम्मान प्रदान करने के बहुत तरीके हैं ,हाथ जोड़कर अभिवादन
[ संस्कृत करबद्ध प्रणाम  ] , ढोक लगाना ,साष्टांग दंडवत ।     इनमें अगर हम
सम्मान प्रदान करने वाले की परिक्रमा जिसे प्रदक्षिणा कहा जाता है जोड़ देते हैं ,तो
सम्मान प्रदान करने का यह सर्वोत्कृष्ट प्रकार है ,तरीका है ,बिधि है । ,इसप्रकार
सम्मान पाने वाला गद गद हो जाता है और वह सम्मान देने वाले से अतीव प्रसन्न
होता है ,और अगर वह समर्थ है तो वांछित मनोरथ की पूर्ति कर देता है । बृज भूमि
अत्यंत पुण्यप्रदायिनी ,युगल भक्ति दायिनी ,आनंद दायिनी है , तो इस भूमि को
प्रसन्न करने  से ,श्रीराधाकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है ,इसकी प्रदक्षिणा प्रारम्भ हो गयीं । 
देवताओं  की   परिक्रमा का विधान भी हमारे यहाँ अलग अलग है ,हमारे ईश्वर भी अलग
अलग परिक्रमा से खुश होते हैं उदाहरणत  भगवान श्री महादेव भोलेश्वर  तीन परिक्रमा
से खुश होते हैं वह भी आधी परिक्रमा देने से खुश होते हैं  । शिवलिंग पर चढ़ाया जल दूध
घृत दही तथा अन्य रस जिस मार्ग से निकलते हैं उस स्थान को लाँघना उचित नहीं हैं इसे
माता पार्वती का स्थान माना जाता है अतः पूरी परिक्रमा करना निषेध है आधी आधी
परिक्रमा कर पूरी तीन प्रदक्षिणा करनी चाहिए 
 विष्णु भगवान चार परिक्रमाओं से खुश होते हैं  । 
  अयप्पा भगवान की पाँच परिक्रमा का  विधान बताया गया है  । 
  परिक्रमा पीपल  की    सात  का विधान है ,
तथा सूर्य भगवान की दो परिक्रमा का  विधान बताया गया है  । 
 देवी दुर्गा मां की चार   परिक्रमा यात्रा का बिधान है  । 
हमारे यहाँ गुरु परिक्रमा ,देव परिक्रमा , जन्मभूमि परिक्रमा ,गाँव बस्ती परिक्रमा ,
ब्रज मैं सक्रिय है।    यों तो बृज मैं भक्त गण ,अपने २ मन से परिक्रमा करते हैं ,
शास्त्रों और महापुरुषों द्वारा निम्न परिक्रमा भक्त वैष्णव लगा रहे हैं  । 
१ –   सम्पूर्ण ब्रजमण्डल   परिक्रमा यात्रा         [  चौरासी  कोस  परिक्रमा यात्रा         ]
२ –  श्री गिरिराज गोवर्धन परिक्रमा यात्रा         [   सात     कोस   परिक्रमा  यात्रा       ]
३ – श्री मथुरा ब्रन्दावन     परिक्रमा यात्रा        [    सात     कोस   परिक्रमा  यात्रा       ]
४ -श्री मथुरा                   परिक्रमा यात्रा        [      तीन   कोस   परिक्रमा  यात्रा       ]
५  -श्री          ब्रन्दावन     परिक्रमा यात्रा        [       चार   कोस   परिक्रमा  यात्रा       ]
६ – श्री आदि वृन्दावन कामवन      यात्रा        [      पंच कोसी     परिक्रमा यात्रा        ]
७ – श्री         कोकिला वन       यात्रा              [        एक  कोस    परिक्रमा यात्रा       ]
८ – श्री मानसी गंगा परिक्रमा  यात्रा             [  गुरु  पूर्णिमा  मुंडिया पूनों गोवर्धन   ]
१ –   सम्पूर्ण ब्रजमण्डल   परिक्रमा यात्रा         [  चौरासी  कोस  परिक्रमा यात्रा         ]      ;   ———-  
 
 ऐसी मान्यता  व् शाश्त्रोक्त प्रमाण हैं कि मनुष्य जीवन को धन्य करने वाली ,जीवों 
को पापों से मुक्त करने वाली बृज की इस यात्रा की शुरुआत भगवान श्रीकृष्ण ने अपने
 वृद्ध माता पिता यशोदा नन्द जी को प्रथम बार कराई थी उनकी यात्रा से पहले उन्होंने
 सभी तीर्थों को बृज मैं चातुर्मास की आज्ञा दी थी ताकि उनके बाबा नन्द व् मैया
 यशोदा सभी तीर्थों की यात्रा का पूण्य      ब्रजमंडल की यात्रा कर प्राप्त कर सकें ।   
ऋषिमुनि साधुओं बैरागी ,योगियों ,      सद्गृहस्थों ने बाबा नन्द द्वारा लगाई गई 
यात्रा के पथ का अनुसरण किया।           इसके बाद कालांतर मैं श्रीकृष्ण चैतन्य 
महाप्रभु ने अपने शिष्यों के साथ यह        यात्रा की ,तदुपरांत यह यात्रा एक लोक 
यात्रा के रूप मैं चलती रही ।   ,     अनेकानेक संत भक्तों ने ब्रजबासियों ने लोक 
कल्याणिनी इस यात्रा से पूण्य         अर्जित किये और अपना जीवन धन्य किया ।   
 
विस्तार   :——-
चौरासी कोस ,या एकसौ अड़सठ मील [   आज की इकाई किलोमीटर मैं यह
विस्तार २६८ किलोमीटर है ] प्रमुख स्थानों मथुरा ,वृन्दावन ,गोकुल गोवर्धन
,बरसाना नंदगांव संकेत ,अडींग ,डीग कामां ऊंचागांव पारसौली आदिबद्री
करहला अजनोख ,पिसाया कोकिलावन सांवई ,कमई ,जतीपुरा ,बहज ,परमदरा
,केदारनाथ ,शेक सायी, कोसीकलाँ ,पैगाम ,मलबा ,मानागढ़ी ,टैंटीगांव  ,लालपुर
,हिंडौन सिटी राया ,बलदेव हथौड़ा रमणरेती ब्रह्माण्ड घाट ,गोकुल ,कोयला अलीपुर
,टाउनशिप ,अडूकी ,आन्यौर पूंछरी ,कोंथरा खोह दिदावली पसोपा ,विलग सतवास ,
ऐंचवाडा  ,विछोर सोंध वनचारी दयाकौर हसनपुर ,शेरगढ़, लोहवान महावन रावल
विश्राम घाट 
परिक्रमा मार्ग   : —-
मथुरा के चौबे ब्राह्मणों द्वारा यह परिक्रमा मथुरा के विश्राम घाट से शुरू करती
है ,फिर माहौली मधुवन ,सरोहा ,वाटी ,कुसुमसरोवर ,महमदपुर ,जतीपुरा डी
परमदरा कामां आदिबद्री केदारनाथ ,कमई ,नंदगांव ,पैगाम शेरगढ़ चीरघाट ,
वृंदावन लोहवान महावन रावल विश्राम घाट
चैतन्य महाप्रभु इसे मथुरा के विश्राम घाट के स्थान पर      वृन्दावन से शुरू
]करते हैं तथा ब्रजवासी तो परम् स्वतंत्र हैं वे इसे ब्रज के किसी भी स्थान से
शुरू करते हैं और उसी जगह पर पूरी कर लेते हैं ।   
ब्रज के संत महात्माओं द्वारा वृन्दावन से शुरू करने का महत्व है ,इसमें
वृन्दावन ,माहौली मधुवन ,सतोहा ,वा टी ,कुसुमसरोवर  गोवर्धन ,आन्यौर
पूंछरी कोंथरा सामईखेड़ा ,बहज डीग दिदावली कामां ,[ आदिबद्री टांकौली
खोह खोह ,परमदरा पसोपा केदारनाथ बिलग चरणपहाड़ी भोजनथाली
सतवास ऐंचवाडा नोनेरा ] बिछोर [नई पुरानी ] सोंध वनचारी डकौरा
हसनपुर मारव मानागढ़ी ,पारसौली लालपुर मीरपुर सुरीर टेंटी गांव
नसीटी हिंडौन राया करब दाऊजी बलदेव हथौड़ा रमणरेती ब्रह्माण्ड
घाट गोकुल अलीपुर टाउनशिप विश्राम घाट
राधा रानी जहाँ की साम्रागी है जहाँ के कण कण मैं श्री बृजेन्द्र बिहारी
माधव श्रीकृष्ण की उपस्थिति झलकती है ,वहाँ के भाव ,वहाँ की वायु
,मैं श्रीकृष्ण की सुगंध आती है ,बृन्दावन आनंदेश्वरी श्री राधिके व
ब्रजमंडल की राजधानी स्वरूप हैं वे यहाँ अपनी अष्ट सखियों के साथ
 आनंदमूर्ति श्री राधिके  आनंदसाम्राज्य चलाती हैं।     अतः योगेश्वर
,प्रेम परमेश्वर श्रीकृष्ण भी वृन्दावन मैं निवास करते हैं इसलिए समस्त
ब्रज यात्रियों को ब्रज के केंद्र बृन्दाबन से ही ब्रजयात्रा की  शुरुआत करने
को श्रेयस्कर ,श्रेष्ठ शुरुआत मान लेना चाहिए  ।    यही बृन्दावन से
चौरासी कोस की यात्रा करना सर्वोत्तम शुरुआत मानना चाहिये ।   
आओ  चलें   श्री बृन्दाबन ओर ।   
जहाँ ,विराजत लाल लाडली     ,अदभुत ,आनंद भोर        । 
पूजा सेवा ,भजन ,कीर्तन         , राधे लाडली     घोर        ।   
अनुपम कगरी सूरसुता  ब्रज     , फूल ,फलन द्रुप  जोर     ।   
पीपल बरगद नीम सुहाने         , कदम्बखंड घनघोर       
गिरि गिरराज आदि बृन्दाबन  , सगुन भक्ति अति जोर  ।   
मुक्ति मुक्त   हौंन जंह आवै   , दरसहु   ,आत्म बिभोर  ।   
अपढारे  ,अघ नाश ”,गुपाला  ”   ब्रजयात्रा    अघछोर    ।   
हिंदी भावार्थ   : —-
 आओ हम वृन्दावन धाम की तरफ चलें ,जहाँ से हम पापों का क्षय करने
वाली ,आनंद प्रदायिनी ,श्रीराधाकृष्ण की भक्ति से सराबोर कर देने वाली
चौरासी कोस  ब्रज यात्रा की शुरुआत वृन्दावन धाम से पतितपावनी कालिंदी
मैं स्नान कर प्रारम्भ   करें ।  जहाँ बृज के लाला श्रीकृष्ण तथा बृज की लाली
श्रीराधिके रहती हैं ।   जहाँ उन दोनों की पूजा सेवा भजन कीर्तन हमेशां होती
है।    यमुना जी के  अनौखे  किनारों पर विभिन्न प्रकार के फूलों के पौधे लगे
हैं ।  पीपल बरगद नीम के विशाल बृक्ष ,तथा सुन्दर कदंब बृक्षों की बहुतायत है । 
आदि ब्रन्दावन कामां ,श्री गिरिराज गोवर्धन ,जहाँ सगुण भक्ति साकार हो
रही है ।   मुक्ति जहाँ स्वयं मुक्ति की इच्छा लेकर आती हो उस कल्याण
करने वाली भूमि को हे ब्रज की यात्रा करने वाले महानुभावो ,महान आत्माओं
,तुम आत्म बिभोर होकर देखो
।  जो कुछ भी आँखों से दर्शनीय है वह पूजनीय भी है ,श्रीकृष्ण स्वरूप हैं
,भाव से परिपूर्ण रहो   ।  ये यात्रा स्वयं ही समस्त पापों का अंत करने
वाली हैं  ।  गोपाल   [ रामगोपाल राधे कृष्णा ]  कहते हैं कि जो इस यात्रा
को करते हैं उनके पापों का अंत आया हुआ ही समझो ।    उनका अंतिम
शिरा, अंतिम क्षण   आ  गया है । 
 
प्रमुख नगर  एवं  दर्शनीय स्थान :——-
 
वृन्दावन  :— यमुना जी  , श्री बांकेबिहारी  ,
श्रीगोपेश्वर महादेव ,वंशीवट ,रंगजी मंदिर
,निधिवन ,पागल बाबा मंदिर ,अंग्रेजों का
मंदिर शाह जी मंदिर ,रंग जी मंदिर  ,
केशी घाट , अक्षय पात्र मंदिर ,राधारमण
मंदिर , कृष्णा प्रमाणि पीठ ,सेवाकुंज ,
कात्यानी पीठ
 
मथुरा      :—- जन्मभूमि  , द्वारिका धीस  मंदिर
,कंस टीला ,भूतेश्वर महादेव , विश्राम घाट कालिंदी,
 जयगुरुदेव मंदिर ,दुर्वासा ऋषि मंदिर ,गायत्री तपो
भूमि , बिड़ला मंदिर ,
गोवर्धन   : – मानसी गंगा ,चकलेश्वर महादेव ,
महाप्रभु मंदिर ,मुखारबिंद दसविसा ,दानघाटी
हरदेव जी मंदिर  , कुसुमसरोवर  
डीग   :—- लक्ष्मन मंदिर , जलमहल , डीग फोर्ट ,
लाला वाला कुंड ,रूपेश्वर महादेव मंदिर , संचारेश्वर
महादेव मंदिर ,हनुमान जी महाराज ,महाराज ब्रजेन्द्र सिंह
कामां  :—- चंद्रमा जी , मदनमोहन जी ,बृंदा जी ,
विमल कुंड ,चौरासी खम्बा ,चरण पहाड़ी , भोजन थाली
पुरानी गोकुल   [  महावन  ] :- चौरासी खम्बों का मंदिर
 , नंदेश्वर महादेव ,मथुरा नाथ मंदिर ,द्वारिका नाथ
मंदिर वंशी वट ,नंदा  भवन
गोकुल                :—- गोविन्द घाट    , गोकुल नाथ जी का
बाग ,वाजन टीला , यशोदा घाट ,रमणरेती ,काष्र्णि गुरु शरणानंद ,
दाऊजी[बल्देव ]   :—– बलराम जी ,माता रेवती मंदिर
बरसाना  :—-  राधा रानी मंदिर ,मान मंदिर , प्रेम मंदिर ,
भानु सरोवर ,पीरी पोखर ,दानबिहारी मंदिर  आदि
नंदगाँव :—- नंदराय मंदिर , नन्द भवन , नंदीश्वर मंदिर ,
पावन सरोवर , भजन कुटीर सनातनगोस्वामी ,नरसिंह
,बराह मंदिर ,गुप्त कुंड ,यशोदा कुंड
 
 
 –  श्री गिरिराज गोवर्धन परिक्रमा यात्रा      
  [   सात     कोस   परिक्रमा  यात्रा       ]                         :—————   
 
प्रारम्भ     : —  इस परमपुण्य दायिनी यात्रा का प्रारम्भ भी बहुत ही प्राचीन है।   
, यह भगवान श्री कृष्ण द्वारा इंद्र का पूजन रोकने तथा श्री गिरिराज पर्वत के
पुजवाने के कारण शुरू हुई ।  ब्रजबासियों को इंद्र के क्रोध से बचाने श्री कृष्ण ने
इसी गिर्राज पर्वत को अपनी अंगुली पर धारण कर लिया ।   सभी गौएँ ग्वाले
सात दिन गिर्राज जी के संरक्षण मैं रहे    श्री गिर्राज जी  को श्रीकृष्ण का
स्वरूप ही इन्हें माना जाता है  ऐसी मान्यता है।    ,कि यहाँ परिक्रमा करने
वालों की समस्त कामनाओं को [  ,इच्छाओं को ] श्री गिर्राज महाराज  पूरा
करते हैं । 
पहुँच मार्ग  :_——-
मथुरा जंक्शन से २१ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है गोवर्धन क़स्बा ,
यह उत्तर प्रदेश के मथुरा जंक्शन तथा राजस्थान के अलवर ,रेल मार्ग
से   जुड़ा हुआ है ।   सड़क मार्ग से भरतपुर ,मथुरा ,ब्रन्दावन बरसाना
डीग से जुड़ा है , गोवर्धन परिक्रमा के लिए निकटस्थ विमानतल आगरा
,व  दिल्ली हैं यहाँ वार्षिक करोड़ों लोग परिक्रमा करने आते हैं । 
परिक्रमा यात्रा  की शुरुआत       :– परम भक्त वैष्णवों ,  बृज के साधुसंतों
द्वारा , छोटी परिक्रमा गोबर्धन से राधाकुंड , राधाकुंड   से     गोबर्धन मार्ग
को शुरुआत माना गया है / यह परिक्रमा तीन कोस  [ ९ किलोमीटर ]  की
मानी गयी / और अभी यह परिक्रमा नए नए मंदिर ,परिक्रमा क्षेत्र मैं ,जुड़ने
के ,कारण अनुमानित ,दस किलोमीटर हो जाती है 
।  इसमें ,श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर , श्री हरदेव मंदिर बड़ा बाजार , श्री गोपाल
जी मंदिर बड़ा बाजार ,भजनाश्रम गोवर्धन  ,  चूतर टेका ,दक्षिण मुखी हनुमान
जी , उद्धव कुंड , वेद मंदिर , भगौसा ,,नीमगांव मार्ग , चैतन्य महाप्रभु मंदिर ,
श्री राधा दामोदर मंदिर , साक्षी गोपाल मंदिर राधाकुंड , श्री     ——– बैठक ,
श्री जगन्नाथ भगवान मंदिर ,श्री सनातन दास गोस्वामी मंदिर , गोप कुंआ ,
अष्ट सखी मंदिर ,चैतन्य  महाप्रभु बैठक ,श्री राधा कुंड ,श्री कृष्ण कुंड ,
श्री महाप्रभु मंदिर ,महादेव मंदिर ,श्री भजनाश्रम राधाकुंड , मां दुर्गा मंदिर
, ग्वालियर महाराज मंदिर , श्री हनुमानजी मंदिर कुसुम सरोवर , कुसुम
सरोवर ,श्री बनबिहारी मंदिर ,नारद कुंड , कान वाले गिर्राज जी ,दसविसा
ब्राह्मण मंदिर , मुखारबिंद ,मानसी गंगा ,दानघाटी श्री गिर्राज जी ,श्री राधा
कृष्ण मंदिर ,श्री राम मंदिर ,महादेव मंदिर ,श्री सांचौली वाली मैया मंदिर ,
कहते हैं ,यहीँ यह छोटी परिक्रमा प्रदक्षिणा पूरी हो जाती है।   ,और फिर
घाटी उतर कर बड़ी परिक्रमा शुरू हो जाती है ।  
 
इसके उपरांत श्री आनंदकंद श्री कृष्ण एवम किशोरी श्री राधिके जी को
सुमरते हुए बड़ी परिक्रमा के लिए आन्यौर के लिए प्रस्थान करते हैं ।  ,
पंडित श्री गयाप्रसाद की गिर्राज तलहटी मैं स्थित समाधी स्थल से
परिक्रमा मार्ग दो मार्गों मैं बिभाजित हो जाता है ।  ,अंदर का मार्ग
कोमल ब्रज रज से आच्छादित है ,मार्ग के दोनों और छायादार बृक्ष
लगे हैं ,बिभिन्न किस्म के फूल श्री गिर राज की तलहटी की शोभा
मैं चार चाँद लगा देते हैं ।  चलते समय पैरों को मुलायम गद्दे पर
चलने का अहसास होता है।   हारा थका परिक्रमा करने वाले को
थकान नहीं होती है । 
दूसरा मार्ग तलहटी के बाहर पक्की सड़क है जिसके किनारे पर कच्ची
सख्त मिटटी की पग डंडियां हैं।    आप अपनी सुबिधा के अनुसार मार्ग
चुन सकते हैं ।  पड़ने वाले ब्रज के गांवों को छोड़ पूरी बड़ी परिक्रमा जो
४ कोस की बताई जाती है ।  , अगर तलहटी के अंदर चलो तो यह दूरी
अब भी ४ कोस यानी या १२ किलोमीटर ही है।    लेकिन अगर बाहर के
सड़क मार्ग को चुनते हैं तो यह दूरी ४.५ कोस है यानि १४ किलोमीटर
लगभग  अंदर की परिक्रमा प्रकृति से साक्षात्कार करती आपको ले
चलती है ।   तथा बाहर की बिभिन्न मंदिरों के दर्शन तथा कुंडों की
परिक्रमा के साथ लोगों से साक्षात्कार करता है।   गोबर्धन  मैं जहाँ से
 परिक्रमा शुरू की, वहीं पूरी कर देते हैं । 
रिक्रमा मैं पड़ने वाले  गाँव  :——— गोबर्धन ,राधाकुंड
,आन्यौर ,पूंछरी कौ  लौठा , जतीपुरा प्रमुख है इनमें बिभिन्न
प्रकार के मंदिर हैं अनेक पूण्य प्रदायी कुंड सरोवर हैं ,आन्यौर
मई गोबिंद कुंड ,अप्सरा  कुंड ,सुरभि कुंड ,मानसी गंगा ,
उद्धव कुंड ,राधाकुंड ,कृष्णकुण्ड ,कुसुम सरोवर पोतरा कुंड
,किलोल कुंड आदि प्रमुख हैं /
गोवर्धन परिक्रमा की विधियां   :——-
१  –    नंगे पैर परिक्रमा , इस प्रकार की परिक्रमा बिना जूते ,नंगे पैर
श्रद्धालु करते हैं , इसमें कोई बाध्यता नहीं है , कोई कीर्तन कर करते
चलते हैं ,कुछ भजन करते चलते है , कोई सत्संग करते हुए चलते हैं
,तथा कुछ यों ही गिरराज जी की   २१   कोस की फेरी लगाते   हैं जो
जितना कष्ट ,आनंद ले पाता है उसीप्रकार से परिक्रमा 
लगाते  हैं  परिक्रमा का स्वरूप बिधान अपनी मान्यता पर निर्भर है
,कई भक्त श्री गिर्राज की दूध परिक्रमा लगाते हैं ।     कोई परिवार के
साथ व्रत रखकर , कोई कीर्तन करते हुए ,कोई जप करते हुए ,कोई
भजन करते हुए ,अपने संकल्प करके परिक्रमा करते हैं लोग अपनी
माँग श्री गिर्राज जी से रखते हैं मनौती पूरा होने पर वे ,उनकी
परिक्रमा उसी प्रकार से करते हैं जैसा उन्होंने मन मैं विचार किया था  । 
2 -दंडवती परिक्रमा :———
यह परिक्रमा एक सम्पूर्ण समर्पण का प्रतीक है ,इसमें श्रदालू भक्त
श्रीगिर्राज जी को साष्टांग नमन करते हैं ,फिर खड़े होते हैं ,फिर अपने
शरीर को दंड के जैसे धरती पर लेटकर साष्टांग नमन करते हैं।   ,
इसप्रकार की परिक्रमा पांच से दस दिनों मैं पूर्ण होती है ।  ,इसमें
एक छोटा गिर्राज होता है उसे रखते
जाते हैं ,कई साधु ११ ,२१ ,५१ ,१०१ ,दंडवत परिक्रमा एक साथ करते
हैं ।  ,उन्हें बर्षों निकल जाते हैं कई कई साल लग जाते हैं  उसे पूर्ण
कर पाते हैं ।   आस्था का ऐसा सैलाब कि सब कुछ समर्पित ,अपने
इष्ट को अनुकरणीय अदुभुत अकल्पनीय है  । 
3 —    साधनों से परिक्रमा  :——–
इसमें परिक्रमा करने वाले साईकिल रिख्शा , मोटर रिक्शा , कार मोटर
,पुराने समय मैं रथ आदि मैं बैठकर श्रदालू परिक्रमा करते हैं । 
परिकृमा का क्रम अन्य परिक्रमा की तरह ही रहता है ।
३ – श्री मथुरा ब्रन्दावन     परिक्रमा यात्रा      
 [    सात     कोस   परिक्रमा  यात्रा       ] :——–
 
४ -श्री मथुरा                   परिक्रमा यात्रा    
   [      तीन   कोस   परिक्रमा  यात्रा        ]:——–
मथुरा भारत का एक बहुत ही पुराना नगर है , इसका
 पुराना नाम मधुपुर था यहीं के राजा उग्रसेन थे ,जिनके
पुत्र कंस ने उन्हें सिंहासन से हटाकर खुद सिंहासन पर
अधिकार कर लिया।    और अपने पिता को कारागार
मैं डाल दिया ।   उनके अत्याचारों से जनता त्रस्त हुई। 
वे श्रीकृष्ण के मामा थे ,उन्हें मारकर श्रीकृष्ण जी ने
राज्य  अपने नाना को    उग्रसेन को दे दिया   मथुरा
की परिक्रमा लंबाई कुल तीन कोस, यानि ९ किलोमीटर
 है यह परिक्रमा भी यमुना जी के विश्राम घाट से शुरू
होती है इसमें रंगेश्वर महादेव  मंदिर , भूतेश्वर महादेव
मंदिर , कंस किला , चामुण्डा देवी मंदिर ,कृष्ण जन्म भूमि
५  -श्री          ब्रन्दावन     परिक्रमा यात्रा      
 [       चार   कोस   परिक्रमा  यात्रा       ]:———
बृन्दावन परिक्रमा की लम्बाई कुल ४ कोस , यानी १२ किलोमीटर है
 इसमें प्रमुख निम्न स्थान ,   रामकृष्ण मिशन मंदिर ,  कात्यायिनी
मंदिर ,  इस्कान  मंदिर ,   कृष्ण बलराम मंदिर ,गौतम ऋषि मंदिर ,
कालिय घाट        ,श्री मदन मोहन जी मंदिर ,टेकरी रानी मंदिर ,
चैतन्य मंदिर , केशी घाट , वंशी वट ,टाटिया स्थान ,रमणरेती मंदिर ,
, जगन्नाथ मंदिर , यह परिक्रमा एकादशी से शुरू होती  है जहाँ से
परिक्रमा की शुरुआत करते हैं वहीं पर परिक्रमा का अंत होता है   
बृन्दावन की परिक्रमा अपने अनुसार सदैव फलदायी है जब भक्त
चाहें लगा सकते हैं 
६ – श्री आदि वृन्दावन कामवन      यात्रा    
   [      पंच कोसी     परिक्रमा यात्रा        ]:————–  
 [   प्रथम दिन –  ]———  
   कामां आदि ब्रन्दावन के नाम से प्रसिद्ध है ।   यहाँ पर श्रीकृष्ण के दो प्रसिद्ध
पीठ चन्द्रमा मंदिर ,श्री मदन मोहन  मंदिर ,श्री विमल कुंड ,श्री विमला देवी
मंदिर है / यह पंचकोशी परिक्रमा दशमी तिथि से शुरू होती है । यह परिक्रमा
वृन्दादेवी मंदिर से शुरू होती है पहले दिन मंदिर मैं कथा होती है ।    यहां से
तलैया ,नारद कुंड नरसिंह मंदिर ,तथा वृन्दादेवी मंदिर पर समाप्त होती है। 
   यह पूरी दूरी एक कोस अर्थात तीन किलोमीटर पड़ती है ।   इस दौरान भजन
कीर्तन कथा
का पूण्य लाभ होता रहता है ।  
दुसरे दिन फिर वृन्दा देवी मंदिर से शुरू होती है ,फिर काबड़िया मंदिर ,विमल कुंड
पर  [  विश्राम करते हैं ] उपवास आधार फलाहार लेते हैं ,फिर सेढ माता ,चंडी माता
,लंका माता ,गया कुंड फिर वृन्दादेवी पर शाम को विश्राम होता है ।  
तृतीय दिन   :—– वृन्दादेवी मंदिर से रवाना होकर ,नला बाजार ,चरण पहाड़ी ,
पहाड़ पार कलावता ,मनसा देवी ,वृन्दा  देवी विश्राम
चतुर्थ दिन  : ——वृन्दादेवी ,चौरासी खम्बा ,गोपीनाथ जी ,श्रीकुण्ड ,कलावता ,
भोजन थाली ,भोजन ,शाम वृन्दा देवी
पंचम दिन  :— वृन्दादेवी मंदिरों के दर्शन  ,दक्षिणा समापन
७ – श्री         कोकिला वन       यात्रा              [        एक  कोस    परिक्रमा यात्रा       ]
 
 
८ – श्री मानसी गंगा परिक्रमा  यात्रा             [  गुरु  पूर्णिमा  मुंडिया पूनों गोवर्धन   ] 
देवताओं  की   परिक्रमा का विधान भी हमारे यहाँ अलग अलग है ,हमारे ईश्वर भी अलग
अलग परिक्रमा से खुश होते हैं उदाहरणत  भगवान श्री महादेव भोलेश्वर  तीन परिक्रमा
से खुश होते हैं वह भी आधी परिक्रमा देने से खुश होते हैं   ।   विष्णु भगवान       चार
परिक्रमाओं से खुश होते हैं ।     अयप्पा भगवान की पाँच परिक्रमा का  विधान बताया
गया है।   पीपल की सात परिक्रमा का विधान है ,तथा सूर्य भगवान की दो परिक्रमा
 तथा देवी दुर्गा मां की चार यात्रा का बिधान है  । 

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