घर का अवतार

                घर   का   अवतार 
                             —————————-
मोहन की माँ देखो मैं अपने लिए खददर की मंहगी कमीज तथा ब्रासलेट की धोती लाया हूँ /
 सुनकर बुद्धो दांतो मैं पल्लू दबा हंसने लगी / कहने लगी का हमारे गांव जाओगे /उसकी इस ,
 हंसने के अंदाज पर मंगतू अपने सारे दुःख भूलता आया था /बोली पहली बार जब हमारे गाँव ,
  गये थे /   तब भी ऐसी धोती व कमीज नहीं थी /
                                                                      क्या विचार है /मेरी खैर तो है /बुढ़ापे मैं कहीं ,
मेरी सौत लाने का विचार तो नहीं /खिलखिलाके हंस पड़ी /अरे नही तुम्हारी ये शक करने की ,
आदत नहीं गई / दोनों की हंसी का शोर हवेली से आँगन तक एक सुर ताल से गूंजने लगा /
कितना सामजस्य कोई किसी तरह का विलगाव नहीं /    
 दूध मैं पानी जैसे विलीन हो जाता है /उसी प्रकार मंगतू व बुद्धो दोनों के  विचार एक ,
                  हो गये थे /       पूरा सामजस्य ,कहीं भी कोई दुराव न था /  प्रेम का ,
पारावार न  था /बोली अब तो बताओ कहाँ जा रहे हो  /मैं तेरे गांव रामपुर तो तेरे बिना नहीं जाउंगा /
फिर समझले  कहाँ जाउंगा /अच्छा तू बता और कहाँ जाऊँगा /पहेली मत बुझाओ मुझे बताओ बुद्धो 
ने जोर देकर पूछा /मंगतू ,से अपनी बुद्धो की अधीरता देखी नहीं गई /बोला मैं लाडले मोहन के पास 
जैपुर जाऊँगा/बहुत बड़ा ओहदेदार है/ गांव के कपड़ों मैं सरम लगेगी /
बुद्धो ख़ुशी से चहचहाने लगी /मैं तैयारी करती हूँ /नवयौवना सी शीघ्रता से   ,एक डिब्बे मैं ,गाय का ,
पाँच किलो घी रखा/तथा अपनी नातिन राधा ,नाती राम के लिए घी के पराँठे तैयार करने लगी /
तथा रास्ते मैं अपने प्रिय मँगतु के लिए चार ,तथा बच्चों के लिए चार साफ कपड़े मैं बांध दिए /
मटके का ठंडा पानी की बोतल थैले मैं रखकर बोली /बहू को ,बच्चों को मेरी ओर से प्यार करना /
तथा मोहन को कहना ,समय निकाल कर मुझसे मिल जाये / बहू बच्चों को भी साथ लाये /अब 
 आप निकल जाओ /जल्दी आना मेरा यहाँ कौन है /कितना प्यार ,कितनी सादगी ,न कोई लाग ,
लपेट ,निष्कपट भाव एक साँस मैं सब कह गयी /मंगतू मंत्रमुग्ध सा सुनता रहा /
आज कल जीवन ,    के इस पवित्र रिश्ते मैं ,ढेर सारा आवरण ,अवसाद ,कुंठा       गयी    है /
हो भी क्यों न आवश्यकताओं का अम्बार मानव ने जो लगा लिया है ,
मनुष्य  ने जरुरी व गैर जरूरी सामान का ढेर लगा रखा है /            
देखौ जी देख कर चलना ,मोहन कह रहा था /वहाँ मोटरे चींटी की तरह ,तथा दोपहिया गाड़ी बरसात , 
मैं   होने वाली  गिजाई की तरह चलती हैं /रेल धरती के अंदर ,बाहर व ,धरती और आकाश के बीच
 मैं  चलती हैं /मुझे ,
बड़े शहर मैं बहुत अशांति होती है /अच्छा मैं तेरी हर बात ध्यान रखूंगा /तूने तो मेरी माँ से भी अधिक ,
हिदायते देना सीख ली/मंगतू सोच रहा था /अल्हड़ सी बुद्धो माँ से दादी माँ बनते कितनी बदल गयी है /
बालिका ,नवयौवना ,प्रोढ़ा ,वृद्धा नारी के सारे रूप अभिनय की जीवन्तता लिए हुए थे /दोनों ने हाथ जोड़े ,
और मंगतू थैला लेकर चल दिया /
 
अपने गाँव से सवारी के लिए चार किलोमीटर जाना पड़ता है /
वहाँ तक जाने के लिए केवल स्वयं का साधन ,मोटर साईकिल ,
साईकल ,बैलगाड़ी काम आते थे /अपने नाती पोतों से मिलने    ,
बच्चे बहू से मिलने का भारी चाव उसे किसी साधन का इंतजार ,
नहीं करने दे रहा था /उसके पैर सुगमता से हाईवे [मुख्य मार्ग की ,
तरफ उठ रहे थे /अपनों से मिलने के लिए मनुष्य बहुत ही उतावला ,
हो जाता है /
 
उधर बुद्धो आँगन मैं लगे नीम के पेड़ के नीचे चारपाई   पर बैठी थी /उसकी 
आँखे नीले आसमान की तरफ टकटकी लगाये ,मानो संसार की निसारता देख रही थी /
सहसा ख्यालों के झुण्ड के झुण्ड यायावर की तरह उसे उद्वेलित करने ,
लगे /पहली बार जब इस घर मैं आई थी /तो यह पक्का घर न था /कच्चा ,
सा एक छोटा घर था /चार ससुर ,चार सासें नन्द ,दौरानी ,जिठानी ,देवर ,
जेठ भरा पूरा परिवार था /वर्षा काल या खराब मौसम मैं ,सब औरतें उस ,
छोटे कच्चे कोठे मैं समां जाती /फिर शुरू होता ,लोकगीत ,नाच हंसी ठहाके ,
वह छोटा    कमरा      प्यार का बड़ा सागर हो  जाता था  /धीरे धीरे सभी सम्पन्न होते ,
गये /और दिलों मैं दरार पड़ने लगीं / एक दूसरे के घर झाँक न सकें  इसलिए पक्की ऊँची     
दीवारे खड़ी हो गयीं /  बड़ा सा परिवार छोटे छोटे       चार परिवारों मैं बंट गया /
आत्मीयता जाती रही /उसका स्थान आज औपचरिकता ,
ने  ले लिया था /अब परिवार के नाम पर वो दोनों रह गये थे / उसके जिगर के ,
टुकड़े मोहन का छोटा सा परिवार जयपुर मैं था /तथा लाड़ली ,
 माधुरी  का परिवार उसकी ससुराल मैं था /आई थी तब भरा ,
पूरा परिवार ,आज वे दोनों पति पत्नी ही रह गये थे /
      मैं कभी बीमार  हो जाती थी /तो ससुर सास ,डॉक्टर को   ,
    बुलाने को ,     धरती ,आकाश एक कर देते थे / 
मोहन बहू बीमार हो गयी जल्दी      कर /
सुनकर मन प्रसन्न हो जाता था /   
बुढ़ापे मैं हम दोनों ने उनकी बहुत सेवा की थी / 
मोहन के पिताजी तो खाट के पास ही बैठे रहते थे /
तुरंत दवा देना ,उठाना ,लिटाना ,नहाना धोना करते ,
रहते थे /  और  मौत तो आनी थी /आज वे दोनों ही चले गये /
हमारा मोहन तो बाहर नौकरी करता है  /
अपने बुढ़ापे का ख्याल आते ही वह सिहर 
 उठी थी /
         यादों मैं खोई बुद्धो की अश्रु धारा रुकने का नाम न ले रही थी /
         घर मैं आज कोई न था /
         उधर मंगतू जयपुर जाने के लिये बस का इंतजार कर रहा था /
मोहन मन मैं सोचने लगा चाहता तो ,मैं भी ऐसा था /परन्तु ,
मालती की इच्छा नौकरी करने की थी /वह बोलती थी /ये बताओ ,
क्या मेरे माता पिता ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई इस लिए   ,
कराई थी /कि मैं अपनी दादी अम्मा वाला काम चूल्हा फूंकने ,
करूँ / मैं मालती को आज तक न समझा पाया था /कि ,
पढाई काम मैं भेद नहीं करती है /और नौकरी  ,
करना तो उसका छोटा उद्द्देश्य है /बल्कि पढ़ाई ,
व ज्ञान की सार्थकता जीवन मैं सुख शांति तलाशने मैं है /
मालती हमारे दो फूल से बच्चे हैं /उनको अगर तुम्हारे  ,
हाथों से बना खाना मिल जाये /तो कितना अच्छा रहे /मालती ,
फुफकारती हुई बोलती थी /अगर खाना तुम ,बना दोगे तो बच्चे ,
खुश हो जायेंगे /
 नारी इतनी बदली है कि उसकी सोच इसे अपने लिए हीन भावना ,
का कार्य मानती है /रोज मर्दों के हाथ का खाना ,खाने से उसकी   ,
पेट की भूख के साथ , अहम की झूंठी भूख भी शांत होती थी /मेरे ,
लिए घर ,कार, फ्रिज ,कूलर आदि जुटा  पाओगे /तुम्हारी तन्खाव्ह ,
से किश्तें दे पाओगे /रोज रोज की तकरार से मैं और बच्चे तंग आ ,
गये थे /एक दिन मन मारकर बोले मालती तुम नौकरी कर लो /
और वह खुश हो गयी /दादा तुम्हें कैसे बताऊँ ,कि सम्बन्ध अब ,
पहले जैसे नहीं रहे /सभी इन्हे ढो  रहे हैं /
मालती की नौकरी लगे पूरे छह महीने हो गये हैं /
उसकी पगार बीस हजार रूपये मासिक है /सुबह ,
जल्दी उठना ,तैयार होकर काम पर निकल जाना ,
बच्चों को मैं तैयार करता हूँ /वो भी पढ़ने निकल ,
जाते हैं /फिर मैं भी निकल जाता हूँ /फिर शाम को ,
आठ बजे आकर हम बच्चों से मिलते हैं /मालती,
थककर चकनाचूर आती है /वो कभी मेरे से कभी ,
बच्चों से एक गिलास पानी की आकांक्षा रखती है /
मैं उसकी दयनीय दशा को देख द्रवित हूँ / वह भी ,
सब समझती है, लेकिन अहंकार और आवश्यकताओं ,
के बोझ ने उसे दबा रखा है / उसका हंसना ,चलना हमे ,
सब बनावटी लगता है /
कहती है ,अगर मैं नौकरी न करती तो ,कैसे यह घर ,
खरीदते , काका /  एक की आमदनी से इस मकान की,
किश्त निकल जाती है न/दूसरे से घर खर्च चल जाता है /
 पूरे पेंतीस लाख का है /जिसमें २५ लाख कर्ज है /कर्ज ,
का नाम सुन मंगतू के पैरों तले जमीन खिसक रही थी /
मोहन ऐसे कह रहा था /जैसे कर्ज लेना सामान्य प्रक्रिया हो /
क़र्ज़ ने भी आज विकास कर लिया था /मंगतू सुनता था /
टाटा ,बिड़ला ,अम्बानी ,सब के ऊपर सरकार का  कर्ज था /
सरकार पर दूसरी सरकारों का कर्ज था /बिड़ले ही लोग थे ,
जिन्होंने इस युग मैं कर्ज न लिया हो /मंगतू ने कभी न ,
लिया था /तो उसके बेटे बहू ने कर्ज न लेने की उसकी  ,
कसम को तोड़ दिया था /मंगतू के हिसाब से इसकी कोई ,
आवश्यकता नहीं थी /
कर्ज के कारण उसके होश उड़ गये थे /फिर भी बेटे का मन ,
रखने के लिए मंगतू मकान को निहारे जा रहा था /

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *