पतिदेव

पतिदेव :———जालोर का मुख्य डाकघर शहर के बीचों बीच स्थित था । मोहन की यहाँ नई नौकरी लगी थी ।उसकी उम्र अभी बीस साल की  ही थी  ।युवा मन यहाँ की नैसर्गिक सुंदरता में रीझा रहता था ।दिन भर डाकघर के  कार्य को करने के बाद वह भृमण हेतु कुछ समय निकालता रहता था ।सुन्दर  निर्मम पत्थर से बनी पहाड़ी पर पत्थर का किला बनाने वालों की जीवटता को जीवंत किये था ।पहाड़ियाँ और रेत बस पानी का नाम न था ।न सरताएँ न तालाब सब सूखे ।
तीन महीने यों ही गुजर गये । पता ही न चला । युवा मन मयूर हर स्थिति में श्रृंगार खोज ही लेता है ।यौवन जीवन का रस ही तो है । सोमवार का दिन जैसे ही मोहन ने डाकखाना में प्रवेश किया ।और अपने काम की शुरुआत की
तभी उसे पोस्टमॉस्टर साहब का उच्चस्वर सुनाई दिया । मोहन मेरे पास आओ । उनके सामने मोहन जाकर खड़ा हो गया ।लेकिन पोस्टमॉस्टर  साहब अपनी फाइलों में उलझते रहे । एकदम सन्नाट्स पसरा था सहसा उन फिर मुझे पुकारा
मोहन बोला सर मैं आपके पास ही खड़ा हूँ ।वे बोले तुम्हें सायला जाना है ।जाकर बड़ेबाबू से मिल लो अपना आदेश ले लो ।
 बड़े बाबू ने मुझे आदेश थमा दिया तीन दिन तुम्हे सायला कार्य करना है ।
सायला के आदेश ले मोहन वहाँ जाने की उधेड़बुन में लग गया। सहसा मंगलवार की सुबह बजरंगबली के हाथ जोड़ भोर कर साढे छह बजे जालोर के बस अड्डे की ओर चल पड़ा । बस अड्डा का भूखण्ड बहुत बड़ा था टूटी फूटी बाउंडरी से इसका अनुमान लगाया जा सकता था ।बस के  नाम पर ट्रक नुमा एकाध साधन खड़े थे । जिसके पीछे की साइड मा ढोने  की जगह लकड़ी की बेंच लगीं थी । खिड़कियों पर कपड़े के पर्दे टँगे थे । मोहन को किसी ने बताया कि यही बस सायला जाएगी।
यह साढ़े सात बजे प्रस्थान करेगी । इंतजार के सिवा कोई और रास्ता न था।
फौजी ट्रक से बनाई पुरानी गाड़ी जिसमें लकड़ी की खिड़कियां लगीं थी लेकिन उपलब्ध साधनों को ही मानव सर्वश्रेष्ठ मान लेता है । जैसे ही गाड़ी खड़ी हुई ।परिचालक का ठेठ मारवाड़ी स्वर सुनाई दिया सायला वाले हा लौ ।।रंग बिरंगी पोशाकों से सुसज्जित ग्रामीण पूरे उत्साह से उसमें चढ़ रहे थे । मोहन भी अपनी सीट की तलाश में था।उसने मध्य भाग मैं अपने लिये जगह बना ली थी ।मुश्किल से कुछ पल बीते होंगे कहने को बस लेकिन जुगाड़ जिसको माल वाहक ट्रक से बनाया गया था  ये  हमारे गांव गांव बैठे इंजी नियर  का कमाल था ।जब कल कारखाने नहीं थे तब जीवनोपयोगी साधन प्रदान करना उनकी ही जिम्मेदारी थी । पोशाकें पगड़ी सभी  अलग अलग फिर भी एक साथ रहना यही तो विभिन्नता भी एकता थी स्वयं मोहन भी ग्रामीण अंचल से ही था ये भारत के भिन्न रूप थे। जब मार बाड़ी चरवाहे अपने पशुधन को लेकर पानी चारे की कमी के कारण गंगा जमुना के मैदानों तक चले आते थे ।बाल मन को हमेशा प्रतीक्षा रहती थी उत्सुकता के साथ भेड़ बकरी ऊंट आदि देखने को मिलेंगे । बिना घर के रहते स्त्री पुरुष बच्चे जब उसके गांव आते तो उसे बहुत आनंद आता था उसके खेतों में एक रात्रि रुकने के लिए उसके बड़े उन्हें दाल आटा आदि भी उपलब्ध करा ते थे ।बदले में उनके खेतों में गोबर का खाद ही खाद हो जाता था। कोई केमिकल खाद जब उपलब्ध नहीं था । हवा पानी भोजन सब शुद्ध था।
दूर तक फैले रेत के समुद्र के बीचों बीच से उसकी गाड़ी चली जा रही थी हरियाली  का   नामो निशान वहां न था कहीं कही दिखते खेजड़ी के बृक्ष ऎसे प्रतीत होते थे जैसे वो ही मरुधरा के श्रंगार मरुधरा निवासियों के पशुओं के लिये  भोजन प्रदान करते थे ।तभी तो उन्नत मस्तक कर वे खड़े थे । केवल बरसात पर  निर्भर । जीवन  की आस से ।
भारतीय भाषाओं मैं मारवाड़ी भाषा का जीवंत स्थान है । शब्दों की उत्पत्ति ऐसा प्रतीत होता है एक ही भाषा से हुई  है ।केवल उच्चारण में बिबिधताएँ हैं । तभी तो ब्रजभाषी मोहन जो ब्रजभाषा  हिंदी संस्कृत का अल्पज्ञाता था ।बोले जारही भाषा का आशय निकाल पाता था ।
विकास के नित नये सोपान चढ़ता भारत औऱ अपनी पूरी पूरा त
न ता को ओढ़े मारवाड़ जहां अभी मूलभूत सुविधाओं का भी पूरा अभाव दिखाई देता था ।न बसें न सड़कें न बस अड्डे सब कुछ राम भरोसे मोहन के मन को समाझा रहा था ।देश कोविकास करने में पचासों साल लग जाएंगे ।
सहसा कंडक्टर का स्वर उच्च हो रहा था सायला वाला हलौ जोधन वालो टिक रो । जबदमी अपनिएक मंजिल प्लेट है तो उसे  संतुष्टि है  उसका ही तो यह फल था बस स्टॉप रेत कबाड़ा मैदान था ।जिसके एक ओर पंचायत समिति बनी थी उसके पास ही डाकघर था । भकय ओर  ढंकरों की बा डगई थी एक ओर महाजनों के मकान थे ।कहने भर को शहर मोह न को अत्यंत पिछड़ा लगा । दिल्ली सरकार जयपुर सरकार के ऑंकड़ों के मायाजाल मरुधरा के समुद्र में धूल धसरित हो रब्ब तबे मोहन डाकघर की ओर चला । उपस्थित कर्मचारी यो ने भवभीना स्वागत किया । पहली बार वह यहां जो आया था । मारवाड़ी लोगों की आत्मीयताबचपन से ही उसे लुभाती रबी थी । ट्रक की दुर्गम यात्रा उपरांत आत्मीय स्वागत से मोहन अंतर त म तक मोहन को प्रसन्नता हुई ।वह अपने कार्य निपटने में लगा । उसके लिए नॉकरी काम ईश्वर पूजा से कम नहीं था ।
शुद्ध भारतीय संस्कृति से सराबोर यहां आधुनिकता की बातभी बेमानी थी । यहां के महाजन लोग बम्बई मद्रास कलकत्ता ब आवर ब्यबसाय तक जाते थे  कुछ लोग को वे अपने साथ काम करने के लिए ले जाते थे ।यहां मुख्य व्यवसाय बरसात में खेती और साल भर पशु पालन से ही गुजारा चलता था
छह बजे थे ।अंशुमाली अपना तेज खो रहे थे। डाकघर बंद कर वे साथियों के साथ बस स्टेंड के झोंपड़ी नुमा ढाबे पर बैठे थे । वातावरण एक दम शांत था । सहसा थोड़ा कोलाहल ब ढा सभी लोग एक ओर देखे जा रहे थे । पता लगा वे एक अनिंद्य सुंदरी महिला को देख रहे थे । बड़ी बड़ी मूंछों वाले बड़ी पगड़ी अपने सिर पर रखे एक दादा कुछ बुदबुदा रहा था । मोहन से न रहा गया वह बोला बा साहब क्या हुआ । बोला बेटा इस बे हया औरत को दे खौ तो कैसे कपड़े है इसके पास आधी नङ्गी कैसा कलियुग  आया । गुस्से से  थूककर वह चुप गया ।
धीरे धीरे वह गजगामिनी गली से बस स्टैंड के मैदान में खड़ी थी ।
तभी एक बस का भोंपू बढ़ती आवाज में सुनाई देने लगा।लग रहा था कोई बस आ रही थी ।
सबकी नजरें आधुनिक महिला की ओर लगीं थीं क्योंकि यहां के ग्रामीणों  के लिए तो लाख के  चू ढों से ढकी चांदी सोने के आभूषण पहने हुए लम्बे घुघट भारी लं हगा पहने औरत भातीं थीं ।उनके लिए यह नारी अजूबे से कम न थी ।
बस में से सवारी उतरने लगीं । छोटी सी प्यारी सी बालिका को लेकर एक युवक आया था ।नवयौवना को मानो मन की मुराद मिल गयी थी । वह नन्ही परी सी बालिका पर नेह उड़ेलने लगी । और प्रगट हुआ नारी का सर्वमान्य महारूप मां जहाँ पूरी स्रष्टि नतमस्तक होती है ।और नारी वन्दनीय होती है ।
कन्या को अपने अंक में लिए वह खड़ी थी ।इतनी देर में बस का जाने का वक्त हुआ । महिला ने युवक बच्ची को अश्रुपूरित विदाई दी ।औऱ अपने मुख पर आये मोती जैसी बूंदे टपकाते घर की ओर चली गयी थी ।
शाम का धुंधलका छाने लगा था ।रात्रि बिताने के लिए लोग अपने आ सरों की ओर चले ।लेकिन मोहन का आसरा भी अपने साथी का कमरा था।तभी दो अन्य कर्मचारी उधर आये ।और बोले हमें मधुलिका मैडम के यहा जाना है ।दूकान दार ने गली की  ओर इशारा कर दिया । ढाई सौ तीन सौ ग्राम का बाजरे का टुककड खाकर करीब आठ बजे जब मोहन अपने सहकर्मी के साथ उसके कमरे पर पहुंचा ।
सोने की तैयारी में थे वे दोनों लेकिन पास के रूम से महिला पुरुष के हंसी मजाक के स्वरों ने उनका ध्यान अपनी ओर खींचा ।ये वही लोग थे जो अभी पता पूछकर वहां आये थे । एक और एक और का स्वर सुनाई दे रहा था बहक ती आवाज बता रही थी कि वे लोग सुरापान कर रहे थे । मैडम की मदमस्त हंसी साथिओ  को मदमस्त किये दे रही थी । नशे में चूर एक बोला मैड़म आज तो आपके पतिदेव आये थे ।पतिदेव पतिदेव पतिदेव कहते उसकी जबान लड़खड़ा रही थी ।।
सन्नाटा छा गया ।मैंने विदा कर दिया आप जो आने वाले थे ।
स्वर बंद हो गए थे मोहन के मन मस्तिष्क पर पतिदेव पतिदेव छा गया ।।उनीदी पलकें कब भारी हुंई पता न  चला।।

 

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