रोजगार

धर्मशाला की खिड़की खुली थी ।   भोर की पावन बेला की सुरभित पवन ,
तन व मन को आलस त्याग कर उठने का आमंत्रण दे रही थी ।   पलकों के ,
आवरण तहत दबे नयन खुलने की असफल कोशिश कर रहे थे।    सुनाई दे
रहा था महाशिव ,महाशक्ति के पुत्र गजानन गणेश जी की आरती का
जय जय गणेश देवा ,माता जाकी पार्वती पिता महादेवा तुमुल घोष   ,
ब्रज वासियों की कतारे मंदिर के अंदर और बाहर भी लगीं थी ।   सड़कें
सूनी  पड़ी थी ।   प्रकृति का सुरम्य वातावरण अपने यौवन पर था ।   कर्ण
रंध्र अर्ध चेतन अवस्था मैं आरती का आनंद ले रहे थे ।   मन मैं ब्रज की
जो धारणा  हरी ने बना रखी थी ।   साकार होती देख सुनकर मन हर्ष से
प्रफुल्लित हो रहा था ।
 
प्रात भ्रमण के लिए अब उपर्युक्त समय था ।      हरी   उठा   और        तैयार ई
होकर चल दिया ।   सड़क पर  हरी    चले जा रहा था ।      सामने से कुछ लोग ,
घूमकर आ रहे थे  ।    उसके    पास   आते      ही     उन्होंने  जय   श्री   राधे ,  
जय   श्री    कृष्णा ,   का अभिवादन किया  ।        वो  उसके   कोई    नहीं थे ।    
एक दम अपरिचित,एक दम   अनजान    हरी  ने उन्हें पहली बार ही देखा था ।   
वे    चले गए थे  ।        लेकिन    वे    हरी    को अंतरतम तक झकझोर गये  थे ।   
शायद यह   ब्रज की संस्कृति का विराट रूप था ।  जिसमें कण ,कण  मैं ब्रज बासी 
अपने प्रभु श्री गोविन्द   देखते है ।  या  वे  लोग  हरी  में   भी गोविन्द  को खोज 
रहे थे ।
 हरी     अचंभित था ।      नागरी संस्कृति हमे केवल यह सिखाती है परिचित को ,
ही अभिवादन करिये ।   अपरिचित आपके अभिवादन का अन्यान्न अर्थ
समझ सकता है ।     हो सकता है  कि वह उद्देलित होकर आपसे कहे कि
आप कौन हैं ।   अत शहरों मैं सभी    मनुष्य    संकुचित हुए    जा   रहे है ।
इस   अनुभव   ने  हरी  को   झकझोर दिया था  ।   
अपने आप उठते पग सामने विश्व प्रसिद्ध जल महलों की ओर   हरी  को  लिए 
जा रहे थे ।   विश्व प्रसिद्ध जल महलों का सिंह पोल गेट जो अतीत के पलों
को ,अपने आँचल मैं समेटे हुए था ।     उसकी शिल्प कला को देख कर हरी
अचम्भित हो रहा था ।   उसके कदम ठिठक गए थे ।    अनायास मुख से
निकला वाह रे हरी आज तो तू सही जगह आया है ।   पर्यटन के लिए यहाँ
 पर अपार  सम्भावनाये थी ।   दिल्ली के एक दम नजदीक बहुत कुछ हो
सकता था ।   गेट के  बाहर पुरातत्व बिभाग का बोर्ड लगा था।  यह स्मारक
 भारत सरकार द्वारा संरक्षित था ।
हरी शासन की  छाप के रूप   , वहाँ    लगे    बोर्ड    को        देखते
 हुए ,अंदर घुस रहा था ।    मन मैं विचार उठ रहे थे  ।    कहते है पत्थर
बे जुबान होते हैं ।    लेकिन ये शिल्प बैभव से युक्त  भवन  ऐसा लग रहा
था ।    जैसे हरी का स्वागत कर रहे थे ।     और  उसे अंदर आने  का 
आमंत्रण दे रहे थे।     ऐसा लग रहा था।    जैसे हरी   का
तन ,मन एकाकार होकर उन्हें सुन रहे थे ।      हरी    मंत्र मुग्ध सा चले जा 
रहा था ।
बृज बासियों के झुण्ड के झुण्ड वहाँ पर योगासन व कसरत कर रहे थे ।   
अपनी विरासत को उन्हने  ही संभाल  कर रखा  जो था     दूनियाँ  के
कौने कोने से लाये गए वृक्ष यहाँ बगीचे में लगे थे पत्थर की बड़ी  बड़ी
 रासें  देख हरी चकित था ।   सब कुछ सुन्दर अदभुत अविस्मरणीय,
 अबर्चनीय ।    इसे शब्दों मैं ढालना असंभव सा था ।   सन्नाटे को
चीरता हुआ नारियों का कोलाहल एवं पायलों की रुन झुन का
शास्त्रीय संगीत वातावरण को मह्का रहा था हरी ने देखा कि औरतें
लम्बी लम्बी कतारो में खड़ी हुई  अपनी बारी का इंतजार कर रही थी ।
तालाबों मै हैड पम्प लगे थे ।    अपने घड़े भरे और मानो उन्होंने ने 
आज की जंग जो जीत ली हो ।
अपने घर की ऒर  आ गई थी   धन्य रे इनकी जीवटता
चेहरे पर शिकन तक नहीं लाती थी ।    स्वतंत्र भारत मैं
हँसते   गाते मध्य युगीन मध्युगीन नारी सी पानी ढोती रहती  ।
एक कवि की ,दो पक्तियाँ उन पर चरितार्थ हो रही थी ।
सहनशीलता शिला सी ,पग   पग ज्यों पाषाण ।
नारी जग करती  रही   ,गुपाल   काज महान   ।
हारी कबहु ये नहीं    ,हार    गई    जाते     हार ।
करम जगत गुपाल सब ,जग की  सिरजनहार ।
हरी भारतीय नारी की सहनशीलता तथा कर्म की ,
प्रतिमूर्तिता के आगे नतमस्तक था ।     भारतीय
समाज से भी यही अपेक्षा रख रहा था।   कि सभी ,
उसको ,आदर ,सम्मान   प्रदान करते रहें ।
 जिसकी वह पात्र है ।
शायद यहॉँ खारे पानी की गंभीर एक समस्या थी ।  
इसी के चलते हुए ,ब्रज बालाएं,नवयौवनाएं ,प्रोढ़ायें ,
बृद्धा ,सभी प्रकार की नारियों के झुण्ड के झुण्ड महलों ,
के तालाबों के किनारे लगे हैड पंप से पानी भरने के लिए 
आये थे ।   क्योंकि इन हैड पम्पों का पानी तालाब में लगे 
होने के कारण मीठा हो गया था ।  
वाह नारी शक्ति घंटों अपनी बारी का इंतजार ,
करके भी धैर्य पूर्वक अपने परिवार वालों के लिय्रे ,
मीठा पानी खींचती थी ।   फिर उसे अपने सिर पर ,
रख कर ,अपनी साथिन पनहारिनों के साथ स्वेद ,
कणों को अपने मुंह पर झिलमिलाती लोक गीतों ,
की सुमधुर तान गाती हुई जा रही थीं उनके बोल ,
बड़े ही मीठे लग रहे थे।    हरी ध्यान से सुन रहा था ।  
सुन ले रै बलम बजमारे      ।  खैचत   पानी कर मेरे हारे   ।  
मीठौ पानी सजन मंगारे    ।    नायें तो जावों बाबुल द्वारे ।  
काहे कूँ हम डीग मैं डारे     ।  पानी ला ला       बाबुल हारे ।  
पानी ढोनो हमें खूब सता रे।   अब न काउ कौ ब्याह करा रे ।
गाती और मुस्काती जाती थीं ।  कई तो घड़े सिर पर रखकर ,
नाचने लग जाती थी ।   हरी ने कैमरा निकाल कर उनका पोज़ ले
लिया था ।   अभ्यास की महिमा तो देखो एक बून्द भी पानी नहीं टपकता था ।  
कईयों को बच्चों का ध्यान आते ही ,घर चलने की उतावली होती थी ।  
मीठे पानी की भयावहता की जीवंत तस्वीर थी ।   वह बिना खींचे ही हरी 
के मानस पटल के प्रभु प्रदत्त कैमरे में कैद हो गयी थी  सत्ता की बदलती 
जमातों का फीलगुड ,स्वतंत्र भारत का विकास ,सभी तो औंधे मुंह पड़े थे ।  
स्वंतंत्र भारत अनवरत विकास गाथा ,वास्तविकता के चरणो मैं गेंद की ,
तरह लुढ़क रहे थे ।   आजादी के पचासों साल मैं बुनियादी मूल आवश्यकता 
पेयजल भी उपलब्ध न करवा पाना राज नेताओं के विकास के दावे की पोल 
खोल रहा था ।  
कब उसका एक घंटा निकल गया उसे पता न चला था ।  
पत्थर की पग बीथियों    की शिल्प कला  तथा  चारों और खड़े अदभुत महलों के 
नजारे ,बीच मैं मिटटी पर घास ,फूलपत्ती ,सुन्दर पेड़ों के बगीचे सभी कुछ ,
अदभुत हरी को बार बार गोल गोल चक्कर लगाने को बाध्य कर रहे थे ।  
पूरब और पश्चिम की ओर बड़े बड़े तालाब सुन्दर घाटों से आवृत मानो 
जनता को राजशाही की सौगात थी ।   हो सकता है राजाओं के समय यहाँ 
जन साधारण के आने पर रोक रही होगी।    परन्तु अब यह जनता की 
सुबिधाओं के केंद्र थे ।
 
 
बडा  तालाब जो किले की तरफ था।    सुंदरता देखते ही बनती थी ।  
कहते है  इसके नीचे से   किले और  जल महलों के बीच संपर्क के लिए एक 
बड़ी सुरंग थी ।   सुरंग  इतनी वृहद थी कि राजा तथा  उसके परिवारी 
जन ,उस जमाने मैं घुड़सवारी कर जाया करते थे ।   इस सुरंग के ऊपर
 ५०० मीटर लम्बा  सुन्दर बगीचा था तथा बड़े तालाब की लम्बाई इससे भी ज्यादा 
थी।    किस मेहनत किस कारीगरी से इस अदभुत संरचना को बनाया गया 
होगा ।   अबर्णनीय  ,प्रशंशनीय था।    बड़े तालाब मैं एक पतली पगडण्डी द्वारा 
मारुती नदन के मंदिर को जोड़ा गया था ।   हरी  की उत्सुकता बढ़ी ।  
वह  हनुमान जी  के दर्शन के लिये लालायित था ।     देखना  चाहता था।    पर 
वहां उपस्थित वानरों ,
जिनमें ,साधारण व् लंगूर दोनों किस्म के थे ।  वह जाने का साहस नहीं कर 
 पा  रहा था ।   तभी उसने महिला  भक्तों   को जाते देखा।   जिनके हाथ में 
पूजा के लिए सामान था ।     कुछ फल रोटी ,कच्ची सब्जी तथा चने भी थे  ।  
उन्होंने वह सामान   वहीं खड़े होकर सभी बंदरों मैं  अपने हिसाब से  बाँट 
दिया  था   ।    और पूजा हेतु मंदिर मैं घुस गयीं ।   सभी बन्दर बाँट बाँट कर 
खाने लगे। फिर दरवाजे के बाहर झुंडों मैं बैठ गए ।    ऐसा लग रहा था मानो  वे
प्रसाद की प्रतीक्षा कर रहे थे।    महिला निकली और उनको हाथ मैं 
लेने को कहा  सभी बंदर बैठ गए थे जैसे बच्चे अपनी माँ का कहना मानते हैं ।  
 
 
सभी के हाथों पर वे प्रसाद रखती जा रही थी  ।  बड़ी भारी  श्रद्धा से वे सभी खा 
 रहे थे /वे निकलती जा रही थीं ।   उन महिलाओं ने बोला ,हम जा रहीं हैं कल 
फिर आएंगी  ।  मानो  वे बंदर उनकी सारी  बात सुन और समझ रहे थे ।  
एक लंगूर ने हाँ मैं सर हिलाया ।  लाल मुंह वाले बंदर ने हद करदी उसने 
अपनी मातृ तुल्य महिलाओं को हाथ हिलाकर विदा किया ।  हरी के 
आश्चर्य का ठिकाना न था ।   कैसे एक प्राणी इतना समझदारी से व्यवहार 
कर सकता है ।   बहुत ही निराला था  ।  क्या वे पूरी तरह सात्विक हो गये थे ।  
 वह फिर भी वहां  मंदिर मैं अंदर जाने    की    हिम्मत   नहीं   कर सका  ।  
वह वहाँ  से  चला   था /   सामने एक बिल्डिंग थी जिस पर सावन भादों लिखा था ।  
देखने मैं एक दम  साधारण चारों ओर से पिलरों पर एक छत सी थी ।  
छत के ऊपर जब बरसात होती तो पत्थरों की संरचना इस प्रकार थी ।  
की पानी के बहाब की कारीगरी इस तरह की गई थी ।   कि उसके नीचे ,
बैठने वाले को बादलो की गड़गड़ाहट सुनाई देती थी।    और रियासत के 
जमाने मैं राजा उस मैं पानी भरवाकर भर गर्मी मैं बादलों की गड़ गड़ाहट 
को सुनते थे /उस से सावन भादों के महीने का दृश्य उपस्थित हो जाता ।  
बरसात के दिनों मैं अब सभी शैलानी इसका आनंद लेते हैं ।   इस 
हिंदुस्तान मै शिल्प के कैसे कैसे साधक हुए हैं जिन्होंने अथक श्रम से 
इन बेजोड़ इमारतों को मूर्त रूप दिया ।   ताजमहल भी एक ऐसी  बेजोड़
इमारत हैं ।  हरी का सीना अपने देश के शिल्पकारों पर    गर्व   कर रहा था ।  
 
 
वहाँ से हरी बेलबूटे ,वृक्षों,फूल पत्तियों  को देखते हुए 
चला जा रहा था ।   पार्कों के बीच मैं छोटी छोटी पक्की 
नालियां बनी थी ।  उनके बीच मैं हजारों की संख्या मैं 
फब्बारे लगे थे।   जिन्हें विशेष अवसरों पर चलाया 
जाता था ।   इनका कंट्रोल विशाल महल के ऊपर बना 
विशाल सरोवर था ।  सब पर नंबरिंग पड़ी हुईं हैं ।   कैसा 
अदभुत कंट्रोल जिस एक फब्बारे को चलाना होता था  ।   
उसी को चला सकते हैं ।  अलग अलग रंगों के फब्बारे 
अदभुत समां बनाते होंगे ।   सरोवर का अवलोकन कर 
हरी ऊपर से नीचे उतर रहा था ।   सोचता चला जा  रहा था ।  
विशाल सभाभवन बना था  उसका फर्श आज भी इतना 
चिकना था ।  क़ि आज की तकनीकी से बना टाइल्स का 
फर्श भी कुछ न था  ।  बगीचे और सभा भवन के बीच 
बहुत बड़ा आकार का विशाल चबूतरा था ।  जिस पर 
विशाल पत्थर की शिला स्थापित थी  ।  
न जाने कैसे कैसे स्थापित की होंगी ।  शायद वह गणमान्य 
लोगों के बैठने के काम आती होगी ।  यहाँ बैठकर कुछ 
महत्वपूर्ण फैसले लिए जाते रहे होंगे जिसमे हजारों लोग 
शामिल होते होंगे ।  हरी बीते हुए  काल को देख रहा था ।  
 
 
सामने मखमली घास मैं ,लोग योगासन कर रहे थे 
हरी की इच्छा हुई ,कि वह भी देखे और इस विधा को 
सीखे भी ।   शहरों मैं तो   इसके   सीखने के   भी पैसे 
लगते हैं ।  यहाँ तो यह बिना पैसे के भी  सीखा जा सकता है।  
जो योग करा रहे थे वे एक हट्टे ,कट्टे युवा सन्यासी थे ।  
उनकी वाणी मैं बड़ा ओज था ।   वह मंत्र मुग्ध कर देने वाली थी ।  
 
हरी वहाँ खड़े होकर देख रहा था।    बाबा बोले हे   
अनजान युवक आओ यह क्रिया तो मनुष्य जाति 
के लिए एक वरदान है ।  इसका किसी धर्म ,जाति ,
कुलीन , अकुलीन किसी से कोई सम्बन्ध नहीं है।    
यह स्वस्थ रहने के लिए एक अदभुत विद्या है ।  आप 
इसे सीख लो ।  ये जीवन दायिनी है आपके काम आएगी।  
बहुत दिन से हरी की  बड़ी तमन्ना थी ।  कि किसी ,
योग्य गुरु से मैं यह सीखूं।   आज अनायास ही पूरी 
होते देख वह बहुत खुश था ।  सभी लोग मखमली 
घास के आसन पर बैठे थे ।  हरी भी एक पक्ति मैं 
नमन कर आराम से बैठ गया था ।  कोई सुखासन मैं ,
कोई सिद्धासन मैं ,कोई कोई तो आलथी पालथी मार 
कर बैठा था।  
बाबा ने पंजों से लेकर ,घुटने ,कमर ,गर्दन ,हाथ ,नेत्र 
सबकी आसान सी लगने वाली क्रिया कराई ।  फिर 
उन्होंने भस्त्रिका प्राणायाम कराया ।  इसके उपरांत 
 कपाल भारती   ,बंध ,अग्निसार क्रिया ,अनुलोम विलोम,
भ्रामरी गुंजन ,ओंकार का नाद ,महा मृत्युंजय मंत्र आदि 
का सरल अभ्यास कराया ।  फिर संसार के सभी प्राणियों के 
सर्वमंगल के लिए कामना की ।  फिर सभी ने जय राधे जय 
श्री कृष्णा का अभिवादन किया ।  
 
 
सभी लोग अलग अलग चलने को उद्यत हुए ।  हरी भी पिछले 
गेट की तरफ जा ,रहा था ।  क्योंकि उसे सामने खड़ा एक सफेद 
संगमरमर महल दिखाई दे रहा था ।  दूर से उसकी भव्यता उसे 
खींचे जा रही थी।   सहसा एक बच्चे की रोने की आवाज उसे 
सुनाई  दी   ।  बच्चे का  क्रंदन बहुत ही ह्रदय विदारक था।   वह 
बचाओ बचाओ चिल्ला रहा था ।   उसके रोने मैं बहुत ही  भारी 
तड़फ थी ।  उपस्थित जन समुदाय उसी ,आवाज की ओर खिंचा 
चला जा रहा था।   हरी भी उसी ओर तेज कदमों से चलने लगा ।  
बच्चे  पास एक बुड्ढा व्यक्ति पड़ा था।      वह ठोकर खाकर गिर
 गया था ।  गिरने से उसका सिर एक पत्थर से टकराया ।  जिसमें
 गंभीर घाव हो गया था।   खून रुकने का नाम नही ले रहा था।   
पास मैं पड़ा था बाँस जिसके दोनो ओर चमड़े के चरस टंगे रहते है ।   
कुछ पानी फ़ैल रहा था कुछ उसमें भरा था।    हरी ने पूछा ये क्या है ।
  भीड़ मैं से एक जना बोला 
यह पानी ढोने का साधन  है  चरस   ।  
लोग चिल्ला रहे थे डॉक्टर को बुलाओ ।  ये भोला है पानी वाला ,एकदम 
मेहनती ईमानदार इसका खून रुकना जरूरी है ।   उप खंड लेवल का
 शहर ,स्वतंत्रता से पहले आज से ज्यादा आबाद लेकिन यहाँ के लोग 
दिल्ली ,मथुरा जयपुर ,भरतपुर चले गये ।  
क्योंकि यहां पानी का इंतजाम नहीं हो पाया था ।  
 
 फिर भी लोग एक दूसरे को पहचानते थे एक बुजर्ग मुझे बता रहा था 
तभी कुछ लोग डाक्टर को बुलाने दौड़ लिये थे  ।   हरी ने कहा  भैया 
जाकर ऍमबुलेंस लेकर आओ  ।   इसकी हालत 
बहुत ही नाजुक है ।  
 
 
 
 
भोला बोला अरे किसी डाक्टर को मत बुलाओ ।  अब कुछ होने ,
वाला नहीं है ।  आप तो मेरे गोपाल को बुला दो ।  उसकी सांसों 
का आवागमन बीच बीच मैं उखड़ने लगता था।   जैसे ही होश आता 
वह गोपाल गोपाल चिल्लाया ।  लड़के ने उत्तर दिया दादा मैं तुम्हारे 
पास ही हूँ।   शायद भोला को दिखाई नहीं दे रहा था ।   मेरे सीने से लग 
जा ।  गोपाल दादा से लिपट गया था ।  परन्तु भोला शांति महसूस कर 
रहा  था।  
गोपाल को याद आया दो तीन वर्ष पहले जब उसके पिता की मौत 
हुई थी।    तब दादा ने मुझे अपनी गोद मैं बैठाकर कितने प्यार से बोला था ।  
गोपाल अभी मैं जिन्दा हूँ।   और अपने पूर्वजों की विरासत यह चमड़े से 
बना चरस है न।   जैसे यह चरस न होकर ,कामधेनु गाय हो ।   कितना 
भरोसा था   पीढ़ी दर   पीढ़ी के अपने रोजगार पर ,स्वयं की मेहनत पर भी ।   
और दादा ने वही चरस दोबारा उठा लिया था ।  जिसे उन्होंने ने अपने बच्चे 
को संभला दिया था ।  गोपाल की स्कुल की  पढ़ाई उन्होंने बंद नहीं होने दी  
थी ।  
गोपाल  के अश्रु  बढ़ते  जा  रहे थे ।  वह अपने दादा के प्यार ,त्याग और पूरे ,
परिवार के लिए किये गए श्रम मैं आकंठ डूबता जा रहा था ।  
लोग भी उसके दादा भोला के बारे मैं ही बात कर रहे थे   कितना ही आंधी
  तूफान हो।  पर वह मीठा पानी लाकर देता था ।  पैसे समय पर ही लेता 
था ।  बड़ा ही समय का पाबंद था ।  गोपाल की विचारों की तन्द्रा एक दम 
से टूटी ।  और वह अपने दादा की दशा देखकर एक 
दम घबरा रहा था ।  
 
 
 
 
दादा मेरे दादा ,मेरे जग के सहारे, मेरे दादा ,गोपाल जोर से चीखा।  
और उसकी हिचिकियां बंध गयीं   थी ।  मरते हुए भोला ने मानो 
उसकी पुकार सुन ली थी ।  भोला बोला अब बजरंगवली तेरी पार ,
लगाएंगे ।  लोग आपस मैं बातें कर रहे थे ।   कि बेटा गणेश जी के 
मंदिर के सामने मरा था ।  और बाप भोला ने बजरंगवली और 
 देवाधिदेव महादेव के मंदिर के सामने अपने प्राण छोड़ने का 
मानस बनाया है ।  कैसे भाग्यशाली हैं तभी तो भगवान के स्थान 
के सामने मरते हैं ।   गोपाल बिलखने लगा दादा ,ये तुम्हारे मरने की 
कह रहे हैं ।  तुम इनको कहो कि मैं तो गोपाल के साथ ही रहूंगा।  
चुप हो जाओ मेरे दादा नहीं मरेंगे ।  और ये बताओ संसार मैं अकाल 
मृत्यु मरने वाला भी क्या भाग्य शाली होता है।   जो अपने परिवार को 
को अनाथ छोड़कर बिना उम्र पूरी किये मर जाता है  ।    
या पूरी उम्र सौ साल जीने वाला भाग्य शाली होता है ।  
जिसके नाती पोते ,सब कमाने खाने लायक हो जाते हैं ।  और कामगारों ,
मजदूरों के क्या भाग्य अच्छे हो सकते हैं ।  उन्हें तो काम करेंगे तभी तो ,
पैसा मिलेगा।       भाग्य से तो उन्हें पैसा मिलने से रहा  ।   गरीब तो   
केवल दुःख देखने के लिए ही पैदा हुआ है।  
तभी भोला की कराह निकली ,उसने गोपाल को और पास बुलाने को 
कहा / मरणासन्न अवस्था मैं अपने सारे जीवन का निचोड़    मनुष्य  अपनी 
संतान को बताना चाहता है ।      अत बुजर्गों से सीख जरूरी है ।     सभ्यता 
की अक्षुण्ड़ता का यही रहस्य है ।     हर गुरु जाने से पहले अपने प्रिय 
शिष्य को अपनी   गूढ़   विद्या का हर  अंश सिखाना चाहता है ।  हर पिता 
मरने से पहले अपनी संतान को गूढ़ विषय की जानकारी देता है ।  
भोला बोला भैया गोपाल तुम कान लगाकर सुनो ।  मैं जैसा कहूँ   
वैसा ही  तू  मेरे   मरने के बाद करना ।   बेटा तेरे पास दो खेत हैं ।  उनमें से 
एक को बेच देना ।   जिससे तू अपनी पढ़ाई करते रहना ।  पानी वाले ,
अपने परम्परागत धंधे में अब बोतल बंद पानी ,तथा थैली आ गयी 
है ।   इस पर बड़े लोगों की निगाह जो पड गयी है ।  उनके बड़े बड़े 
कारखाने लगे हैं ।  उस स्थित मैं तेरे चरस का क्या मूल्य है।   और 
सरकारों को भी जनता के प्रति जवाब दार होना पड़ेगा ।  नहीं तो 
वह दूसरी सरकार भी ले आएगी ।  सरकार के हाथ बहुत लम्बे होते है ।  
अगर वह चाहती तो अब तक मीठा पानी आ जाता ।  लेकिन उसकी 
मंशा ही न रही होगी ।  कोई भी इच्छाशक्ति वाली सरकार कभी भी 
घर घर मैं पानी पहुंचा सकती है।   फिर अपना धंधा नही चलेगा ।  
अगर तैने बढ़िया तरह पढाई कर ली तो निश्चित रूप से तेरा 
रोजगार लग जायेगा ।  और ये बाप दादों की विरासत अपने चरस 
को छप्पर मैं टाँग देना ।  मेरे सर पर हाथ रखो और कहो  तुम ऐसा 
करोगे ।  हाँ दादा में तुम्हारी बात मानूंगा ।  गोपाल के हाँ शब्द के साथ 
ही भोला अपने शरीर को छोड़ अनंत की यात्रा पर निकल चूका था ।  
गोपाल अर्धविक्षिप्त सा रोये जा रहा था /उसकी समझ मैं पढाई से रोजगार 
समझ न आ रहा था ।     चरस के रोजगार को  तो वह बखूबी जनता था ।  
गोपाल अपने दादा की मृत्यु से अपने आपको एक दम अकेला असहाय 
महसूस कर रहा था ।  उसकी अवस्था तेरह चौदह साल की रही होगी ।  
दादा की असमय मृत्यु से उस पर परशानियों  का पहाड जो टूट पड़ा था।  
सभी उपस्थित लोग उसे ढाढ़स बंधा  रहे थे।   हरी भी समझा रहा था बेटा 
अब रोने से दादाजी वापिस नहीं आएंगे।   अब तुझे उनको मुखाग्नि देनी 
पड़ेगी ।   और हम सबको मिलकर उनका अंतिम संस्कार करना पड़ेगा।  
 
 
 
 
भोला का  निधन सुन उसके मौहल्ले से औरत ,आदमी , बच्चे   भी सब
 महलो मैं  आते   जा रहे ,थे ।  महिलाएँ    अलग कुछ दूर बैठी रो रही थीं ।  
गोपाल की दादी माँ का तथा उसकी माँ का रोकर ,बुरा हाल था ।  धीरे धीरे 
उसके कुटुंब के सारे लोग इकट्ठे हो गए थे ।  कुछ लोग भोला की स्थिति को ,
जानते हुए अंतिम क्रिया का सारा सामान लेकर ,आये थे ।   जिसमें बांस 
की काठी ,कफ़न ,मटकी ,रस्सियाँ घी ,लकड़ी ,उपले आदि थे ।  परिवार   
के ताऊ जी ने एक जलता हुआ ,उपला मटकी मैं रस्सी बांधकर गोपाल
 के हाथ मैं पकड़ा दी थी ।  कुछ लोगों ने भोला को बांस की काठी पर 
लिटाकर वे श्मसान की ओर चल दिए थे ।  राम नाम सत्य है।  
सत्य बोलो गत्य हैं ।  कहते लोग बढ़े चले जा रहे थे।  गोपाल मटकी
 को पकड़े हुए यंत्रवत चले जा रहा था ।  
सूरज  अकेले चलते चलते आकाश के बीचों बीच आ 
गया था।   गोपाल आकाश की तरफ देखता अपने 
रोजगार ”को तलाश कर रहा था ।  ‘सोच रहा था उसे 
भी भगवान भास्कर की तरह अपने भविष्य की राह अकेले 
तलाशनी होगी ।  तभी पीछे से किसी ने आवाज दी ।  गोपाल 
संभल के चलो ,  राह बड़ी दुष्कर है ।   इसमें कंकड़ व पत्थर हैं ।  
 तुम्हें कहीं ठोकर न लग जाये।   गोपाल एक दम से देखकर 
चलने लगा ।  
 
    शमशान मैं लोग उसके दादा की चिता तैयार कर रहे थे ।  
गोपाल को स्नान करा कर चिता मैं आग लगाने को कहा ।  
गोपाल ने अपने दादा को हिन्दू परम्परा के तहत मुखाग्नि 
दे दी थी ।   वह अपने प्यारे दादा की चिता के चारों ओर परिक्रमा 
कर रहा था ।  लोगों ने कहा ,कि गोपाल अपने दादा को आवाज 
लगाओ ।  गोपाल के अंदर कोई शक्ति जाग्रत हो रही थी।   वह 
जोर से चिल्लाया ।  दादा मैं तुम्हे दिया वचन निभाउंगा ।  मैं चरस 
का रोजगार छोड़ दुँगा ।  पढूंगा फिर रोजगार बदल दूंगा ।  उसकी
 आवाज व्यौम मैं गूँज रही थी ।   रोजगार उसके दिल दिमाग पर 
छा गया था ।  
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
धर्मशाला की खिड़की खुली थी ।   भोर की पावन बेला की सुरभित पवन ,
तन व मन को आलस त्याग कर उठने का आमंत्रण दे रही थी ।   पलकों के ,
आवरण तहत दबे नयन खुलने की असफल कोशिश कर रहे थे।    सुनाई दे
रहा था महाशिव ,महाशक्ति के पुत्र गजानन गणेश जी की आरती का
जय जय गणेश देवा ,माता जाकी पार्वती पिता महादेवा तुमुल घोष   ,
ब्रज वासियों की कतारे मंदिर के अंदर और बाहर भी लगीं थी ।   सड़कें
सूनी  पड़ी थी ।   प्रकृति का सुरम्य वातावरण अपने यौवन पर था ।   कर्ण
रंध्र अर्ध चेतन अवस्था मैं आरती का आनंद ले रहे थे ।   मन मैं ब्रज की
जो धारणा  हरी ने बना रखी थी ।   साकार होती देख सुनकर मन हर्ष से
प्रफुल्लित हो रहा था ।
 
प्रात भ्रमण के लिए अब उपर्युक्त समय था ।      हरी   उठा   और        तैयार ई
होकर चल दिया ।   सड़क पर  हरी    चले जा रहा था ।      सामने से कुछ लोग ,
घूमकर आ रहे थे  ।    उसके    पास   आते      ही     उन्होंने  जय   श्री   राधे ,  
जय   श्री    कृष्णा ,   का अभिवादन किया  ।        वो  उसके   कोई    नहीं थे ।    
एक दम अपरिचित,एक दम   अनजान    हरी  ने उन्हें पहली बार ही देखा था ।   
वे    चले गए थे  ।        लेकिन    वे    हरी    को अंतरतम तक झकझोर गये  थे ।   
शायद यह   ब्रज की संस्कृति का विराट रूप था ।  जिसमें कण ,कण  मैं ब्रज बासी 
अपने प्रभु श्री गोविन्द   देखते है ।  या  वे  लोग  हरी  में   भी गोविन्द  को खोज 
रहे थे ।
 हरी     अचंभित था ।      नागरी संस्कृति हमे केवल यह सिखाती है परिचित को ,
ही अभिवादन करिये ।   अपरिचित आपके अभिवादन का अन्यान्न अर्थ
समझ सकता है ।     हो सकता है  कि वह उद्देलित होकर आपसे कहे कि
आप कौन हैं ।   अत शहरों मैं सभी    मनुष्य    संकुचित हुए    जा   रहे है ।
इस   अनुभव   ने  हरी  को   झकझोर दिया था  ।   
अपने आप उठते पग सामने विश्व प्रसिद्ध जल महलों की ओर   हरी  को  लिए 
जा रहे थे ।   विश्व प्रसिद्ध जल महलों का सिंह पोल गेट जो अतीत के पलों
को ,अपने आँचल मैं समेटे हुए था ।     उसकी शिल्प कला को देख कर हरी
अचम्भित हो रहा था ।   उसके कदम ठिठक गए थे ।    अनायास मुख से
निकला वाह रे हरी आज तो तू सही जगह आया है ।   पर्यटन के लिए यहाँ
 पर अपार  सम्भावनाये थी ।   दिल्ली के एक दम नजदीक बहुत कुछ हो
सकता था ।   गेट के  बाहर पुरातत्व बिभाग का बोर्ड लगा था।  यह स्मारक
 भारत सरकार द्वारा संरक्षित था ।
हरी शासन की  छाप के रूप   , वहाँ    लगे    बोर्ड    को        देखते
 हुए ,अंदर घुस रहा था ।    मन मैं विचार उठ रहे थे  ।    कहते है पत्थर
बे जुबान होते हैं ।    लेकिन ये शिल्प बैभव से युक्त  भवन  ऐसा लग रहा
था ।    जैसे हरी का स्वागत कर रहे थे ।     और  उसे अंदर आने  का 
आमंत्रण दे रहे थे।     ऐसा लग रहा था।    जैसे हरी   का
तन ,मन एकाकार होकर उन्हें सुन रहे थे ।      हरी    मंत्र मुग्ध सा चले जा 
रहा था ।
बृज बासियों के झुण्ड के झुण्ड वहाँ पर योगासन व कसरत कर रहे थे ।   
अपनी विरासत को उन्हने  ही संभाल  कर रखा  जो था     दूनियाँ  के
कौने कोने से लाये गए वृक्ष यहाँ बगीचे में लगे थे पत्थर की बड़ी  बड़ी
 रासें  देख हरी चकित था ।   सब कुछ सुन्दर अदभुत अविस्मरणीय,
 अबर्चनीय ।    इसे शब्दों मैं ढालना असंभव सा था ।   सन्नाटे को
चीरता हुआ नारियों का कोलाहल एवं पायलों की रुन झुन का
शास्त्रीय संगीत वातावरण को मह्का रहा था हरी ने देखा कि औरतें
लम्बी लम्बी कतारो में खड़ी हुई  अपनी बारी का इंतजार कर रही थी ।
तालाबों मै हैड पम्प लगे थे ।    अपने घड़े भरे और मानो उन्होंने ने 
आज की जंग जो जीत ली हो ।
अपने घर की ऒर  आ गई थी   धन्य रे इनकी जीवटता
चेहरे पर शिकन तक नहीं लाती थी ।    स्वतंत्र भारत मैं
हँसते   गाते मध्य युगीन मध्युगीन नारी सी पानी ढोती रहती  ।
एक कवि की ,दो पक्तियाँ उन पर चरितार्थ हो रही थी ।
सहनशीलता शिला सी ,पग   पग ज्यों पाषाण ।
नारी जग करती  रही   ,गुपाल   काज महान   ।
हारी कबहु ये नहीं    ,हार    गई    जाते     हार ।
करम जगत गुपाल सब ,जग की  सिरजनहार ।
हरी भारतीय नारी की सहनशीलता तथा कर्म की ,
प्रतिमूर्तिता के आगे नतमस्तक था ।     भारतीय
समाज से भी यही अपेक्षा रख रहा था।   कि सभी ,
उसको ,आदर ,सम्मान   प्रदान करते रहें ।
 जिसकी वह पात्र है ।
शायद यहॉँ खारे पानी की गंभीर एक समस्या थी ।  
इसी के चलते हुए ,ब्रज बालाएं,नवयौवनाएं ,प्रोढ़ायें ,
बृद्धा ,सभी प्रकार की नारियों के झुण्ड के झुण्ड महलों ,
के तालाबों के किनारे लगे हैड पंप से पानी भरने के लिए 
आये थे ।   क्योंकि इन हैड पम्पों का पानी तालाब में लगे 
होने के कारण मीठा हो गया था ।  
वाह नारी शक्ति घंटों अपनी बारी का इंतजार ,
करके भी धैर्य पूर्वक अपने परिवार वालों के लिय्रे ,
मीठा पानी खींचती थी ।   फिर उसे अपने सिर पर ,
रख कर ,अपनी साथिन पनहारिनों के साथ स्वेद ,
कणों को अपने मुंह पर झिलमिलाती लोक गीतों ,
की सुमधुर तान गाती हुई जा रही थीं उनके बोल ,
बड़े ही मीठे लग रहे थे।    हरी ध्यान से सुन रहा था ।  
सुन ले रै बलम बजमारे      ।  खैचत   पानी कर मेरे हारे   ।  
मीठौ पानी सजन मंगारे    ।    नायें तो जावों बाबुल द्वारे ।  
काहे कूँ हम डीग मैं डारे     ।  पानी ला ला       बाबुल हारे ।  
पानी ढोनो हमें खूब सता रे।   अब न काउ कौ ब्याह करा रे ।
गाती और मुस्काती जाती थीं ।  कई तो घड़े सिर पर रखकर ,
नाचने लग जाती थी ।   हरी ने कैमरा निकाल कर उनका पोज़ ले
लिया था ।   अभ्यास की महिमा तो देखो एक बून्द भी पानी नहीं टपकता था ।  
कईयों को बच्चों का ध्यान आते ही ,घर चलने की उतावली होती थी ।  
मीठे पानी की भयावहता की जीवंत तस्वीर थी ।   वह बिना खींचे ही हरी 
के मानस पटल के प्रभु प्रदत्त कैमरे में कैद हो गयी थी  सत्ता की बदलती 
जमातों का फीलगुड ,स्वतंत्र भारत का विकास ,सभी तो औंधे मुंह पड़े थे ।  
स्वंतंत्र भारत अनवरत विकास गाथा ,वास्तविकता के चरणो मैं गेंद की ,
तरह लुढ़क रहे थे ।   आजादी के पचासों साल मैं बुनियादी मूल आवश्यकता 
पेयजल भी उपलब्ध न करवा पाना राज नेताओं के विकास के दावे की पोल 
खोल रहा था ।  
कब उसका एक घंटा निकल गया उसे पता न चला था ।  
पत्थर की पग बीथियों    की शिल्प कला  तथा  चारों और खड़े अदभुत महलों के 
नजारे ,बीच मैं मिटटी पर घास ,फूलपत्ती ,सुन्दर पेड़ों के बगीचे सभी कुछ ,
अदभुत हरी को बार बार गोल गोल चक्कर लगाने को बाध्य कर रहे थे ।  
पूरब और पश्चिम की ओर बड़े बड़े तालाब सुन्दर घाटों से आवृत मानो 
जनता को राजशाही की सौगात थी ।   हो सकता है राजाओं के समय यहाँ 
जन साधारण के आने पर रोक रही होगी।    परन्तु अब यह जनता की 
सुबिधाओं के केंद्र थे ।
 
 
बडा  तालाब जो किले की तरफ था।    सुंदरता देखते ही बनती थी ।  
कहते है  इसके नीचे से   किले और  जल महलों के बीच संपर्क के लिए एक 
बड़ी सुरंग थी ।   सुरंग  इतनी वृहद थी कि राजा तथा  उसके परिवारी 
जन ,उस जमाने मैं घुड़सवारी कर जाया करते थे ।   इस सुरंग के ऊपर
 ५०० मीटर लम्बा  सुन्दर बगीचा था तथा बड़े तालाब की लम्बाई इससे भी ज्यादा 
थी।    किस मेहनत किस कारीगरी से इस अदभुत संरचना को बनाया गया 
होगा ।   अबर्णनीय  ,प्रशंशनीय था।    बड़े तालाब मैं एक पतली पगडण्डी द्वारा 
मारुती नदन के मंदिर को जोड़ा गया था ।   हरी  की उत्सुकता बढ़ी ।  
वह  हनुमान जी  के दर्शन के लिये लालायित था ।     देखना  चाहता था।    पर 
वहां उपस्थित वानरों ,
जिनमें ,साधारण व् लंगूर दोनों किस्म के थे ।  वह जाने का साहस नहीं कर 
 पा  रहा था ।   तभी उसने महिला  भक्तों   को जाते देखा।   जिनके हाथ में 
पूजा के लिए सामान था ।     कुछ फल रोटी ,कच्ची सब्जी तथा चने भी थे  ।  
उन्होंने वह सामान   वहीं खड़े होकर सभी बंदरों मैं  अपने हिसाब से  बाँट 
दिया  था   ।    और पूजा हेतु मंदिर मैं घुस गयीं ।   सभी बन्दर बाँट बाँट कर 
खाने लगे। फिर दरवाजे के बाहर झुंडों मैं बैठ गए ।    ऐसा लग रहा था मानो  वे
प्रसाद की प्रतीक्षा कर रहे थे।    महिला निकली और उनको हाथ मैं 
लेने को कहा  सभी बंदर बैठ गए थे जैसे बच्चे अपनी माँ का कहना मानते हैं ।  
 
 
सभी के हाथों पर वे प्रसाद रखती जा रही थी  ।  बड़ी भारी  श्रद्धा से वे सभी खा 
 रहे थे /वे निकलती जा रही थीं ।   उन महिलाओं ने बोला ,हम जा रहीं हैं कल 
फिर आएंगी  ।  मानो  वे बंदर उनकी सारी  बात सुन और समझ रहे थे ।  
एक लंगूर ने हाँ मैं सर हिलाया ।  लाल मुंह वाले बंदर ने हद करदी उसने 
अपनी मातृ तुल्य महिलाओं को हाथ हिलाकर विदा किया ।  हरी के 
आश्चर्य का ठिकाना न था ।   कैसे एक प्राणी इतना समझदारी से व्यवहार 
कर सकता है ।   बहुत ही निराला था  ।  क्या वे पूरी तरह सात्विक हो गये थे ।  
 वह फिर भी वहां  मंदिर मैं अंदर जाने    की    हिम्मत   नहीं   कर सका  ।  
वह वहाँ  से  चला   था /   सामने एक बिल्डिंग थी जिस पर सावन भादों लिखा था ।  
देखने मैं एक दम  साधारण चारों ओर से पिलरों पर एक छत सी थी ।  
छत के ऊपर जब बरसात होती तो पत्थरों की संरचना इस प्रकार थी ।  
की पानी के बहाब की कारीगरी इस तरह की गई थी ।   कि उसके नीचे ,
बैठने वाले को बादलो की गड़गड़ाहट सुनाई देती थी।    और रियासत के 
जमाने मैं राजा उस मैं पानी भरवाकर भर गर्मी मैं बादलों की गड़ गड़ाहट 
को सुनते थे /उस से सावन भादों के महीने का दृश्य उपस्थित हो जाता ।  
बरसात के दिनों मैं अब सभी शैलानी इसका आनंद लेते हैं ।   इस 
हिंदुस्तान मै शिल्प के कैसे कैसे साधक हुए हैं जिन्होंने अथक श्रम से 
इन बेजोड़ इमारतों को मूर्त रूप दिया ।   ताजमहल भी एक ऐसी  बेजोड़
इमारत हैं ।  हरी का सीना अपने देश के शिल्पकारों पर    गर्व   कर रहा था ।  
 
 
वहाँ से हरी बेलबूटे ,वृक्षों,फूल पत्तियों  को देखते हुए 
चला जा रहा था ।   पार्कों के बीच मैं छोटी छोटी पक्की 
नालियां बनी थी ।  उनके बीच मैं हजारों की संख्या मैं 
फब्बारे लगे थे।   जिन्हें विशेष अवसरों पर चलाया 
जाता था ।   इनका कंट्रोल विशाल महल के ऊपर बना 
विशाल सरोवर था ।  सब पर नंबरिंग पड़ी हुईं हैं ।   कैसा 
अदभुत कंट्रोल जिस एक फब्बारे को चलाना होता था  ।   
उसी को चला सकते हैं ।  अलग अलग रंगों के फब्बारे 
अदभुत समां बनाते होंगे ।   सरोवर का अवलोकन कर 
हरी ऊपर से नीचे उतर रहा था ।   सोचता चला जा  रहा था ।  
विशाल सभाभवन बना था  उसका फर्श आज भी इतना 
चिकना था ।  क़ि आज की तकनीकी से बना टाइल्स का 
फर्श भी कुछ न था  ।  बगीचे और सभा भवन के बीच 
बहुत बड़ा आकार का विशाल चबूतरा था ।  जिस पर 
विशाल पत्थर की शिला स्थापित थी  ।  
न जाने कैसे कैसे स्थापित की होंगी ।  शायद वह गणमान्य 
लोगों के बैठने के काम आती होगी ।  यहाँ बैठकर कुछ 
महत्वपूर्ण फैसले लिए जाते रहे होंगे जिसमे हजारों लोग 
शामिल होते होंगे ।  हरी बीते हुए  काल को देख रहा था ।  
 
 
सामने मखमली घास मैं ,लोग योगासन कर रहे थे 
हरी की इच्छा हुई ,कि वह भी देखे और इस विधा को 
सीखे भी ।   शहरों मैं तो   इसके   सीखने के   भी पैसे 
लगते हैं ।  यहाँ तो यह बिना पैसे के भी  सीखा जा सकता है।  
जो योग करा रहे थे वे एक हट्टे ,कट्टे युवा सन्यासी थे ।  
उनकी वाणी मैं बड़ा ओज था ।   वह मंत्र मुग्ध कर देने वाली थी ।  
 
हरी वहाँ खड़े होकर देख रहा था।    बाबा बोले हे   
अनजान युवक आओ यह क्रिया तो मनुष्य जाति 
के लिए एक वरदान है ।  इसका किसी धर्म ,जाति ,
कुलीन , अकुलीन किसी से कोई सम्बन्ध नहीं है।    
यह स्वस्थ रहने के लिए एक अदभुत विद्या है ।  आप 
इसे सीख लो ।  ये जीवन दायिनी है आपके काम आएगी।  
बहुत दिन से हरी की  बड़ी तमन्ना थी ।  कि किसी ,
योग्य गुरु से मैं यह सीखूं।   आज अनायास ही पूरी 
होते देख वह बहुत खुश था ।  सभी लोग मखमली 
घास के आसन पर बैठे थे ।  हरी भी एक पक्ति मैं 
नमन कर आराम से बैठ गया था ।  कोई सुखासन मैं ,
कोई सिद्धासन मैं ,कोई कोई तो आलथी पालथी मार 
कर बैठा था।  
बाबा ने पंजों से लेकर ,घुटने ,कमर ,गर्दन ,हाथ ,नेत्र 
सबकी आसान सी लगने वाली क्रिया कराई ।  फिर 
उन्होंने भस्त्रिका प्राणायाम कराया ।  इसके उपरांत 
 कपाल भारती   ,बंध ,अग्निसार क्रिया ,अनुलोम विलोम,
भ्रामरी गुंजन ,ओंकार का नाद ,महा मृत्युंजय मंत्र आदि 
का सरल अभ्यास कराया ।  फिर संसार के सभी प्राणियों के 
सर्वमंगल के लिए कामना की ।  फिर सभी ने जय राधे जय 
श्री कृष्णा का अभिवादन किया ।  
 
 
सभी लोग अलग अलग चलने को उद्यत हुए ।  हरी भी पिछले 
गेट की तरफ जा ,रहा था ।  क्योंकि उसे सामने खड़ा एक सफेद 
संगमरमर महल दिखाई दे रहा था ।  दूर से उसकी भव्यता उसे 
खींचे जा रही थी।   सहसा एक बच्चे की रोने की आवाज उसे 
सुनाई  दी   ।  बच्चे का  क्रंदन बहुत ही ह्रदय विदारक था।   वह 
बचाओ बचाओ चिल्ला रहा था ।   उसके रोने मैं बहुत ही  भारी 
तड़फ थी ।  उपस्थित जन समुदाय उसी ,आवाज की ओर खिंचा 
चला जा रहा था।   हरी भी उसी ओर तेज कदमों से चलने लगा ।  
बच्चे  पास एक बुड्ढा व्यक्ति पड़ा था।      वह ठोकर खाकर गिर
 गया था ।  गिरने से उसका सिर एक पत्थर से टकराया ।  जिसमें
 गंभीर घाव हो गया था।   खून रुकने का नाम नही ले रहा था।   
पास मैं पड़ा था बाँस जिसके दोनो ओर चमड़े के चरस टंगे रहते है ।   
कुछ पानी फ़ैल रहा था कुछ उसमें भरा था।    हरी ने पूछा ये क्या है ।
  भीड़ मैं से एक जना बोला 
यह पानी ढोने का साधन  है  चरस   ।  
लोग चिल्ला रहे थे डॉक्टर को बुलाओ ।  ये भोला है पानी वाला ,एकदम 
मेहनती ईमानदार इसका खून रुकना जरूरी है ।   उप खंड लेवल का
 शहर ,स्वतंत्रता से पहले आज से ज्यादा आबाद लेकिन यहाँ के लोग 
दिल्ली ,मथुरा जयपुर ,भरतपुर चले गये ।  
क्योंकि यहां पानी का इंतजाम नहीं हो पाया था ।  
 
 फिर भी लोग एक दूसरे को पहचानते थे एक बुजर्ग मुझे बता रहा था 
तभी कुछ लोग डाक्टर को बुलाने दौड़ लिये थे  ।   हरी ने कहा  भैया 
जाकर ऍमबुलेंस लेकर आओ  ।   इसकी हालत 
बहुत ही नाजुक है ।  
 
 
 
 
भोला बोला अरे किसी डाक्टर को मत बुलाओ ।  अब कुछ होने ,
वाला नहीं है ।  आप तो मेरे गोपाल को बुला दो ।  उसकी सांसों 
का आवागमन बीच बीच मैं उखड़ने लगता था।   जैसे ही होश आता 
वह गोपाल गोपाल चिल्लाया ।  लड़के ने उत्तर दिया दादा मैं तुम्हारे 
पास ही हूँ।   शायद भोला को दिखाई नहीं दे रहा था ।   मेरे सीने से लग 
जा ।  गोपाल दादा से लिपट गया था ।  परन्तु भोला शांति महसूस कर 
रहा  था।  
गोपाल को याद आया दो तीन वर्ष पहले जब उसके पिता की मौत 
हुई थी।    तब दादा ने मुझे अपनी गोद मैं बैठाकर कितने प्यार से बोला था ।  
गोपाल अभी मैं जिन्दा हूँ।   और अपने पूर्वजों की विरासत यह चमड़े से 
बना चरस है न।   जैसे यह चरस न होकर ,कामधेनु गाय हो ।   कितना 
भरोसा था   पीढ़ी दर   पीढ़ी के अपने रोजगार पर ,स्वयं की मेहनत पर भी ।   
और दादा ने वही चरस दोबारा उठा लिया था ।  जिसे उन्होंने ने अपने बच्चे 
को संभला दिया था ।  गोपाल की स्कुल की  पढ़ाई उन्होंने बंद नहीं होने दी  
थी ।  
गोपाल  के अश्रु  बढ़ते  जा  रहे थे ।  वह अपने दादा के प्यार ,त्याग और पूरे ,
परिवार के लिए किये गए श्रम मैं आकंठ डूबता जा रहा था ।  
लोग भी उसके दादा भोला के बारे मैं ही बात कर रहे थे   कितना ही आंधी
  तूफान हो।  पर वह मीठा पानी लाकर देता था ।  पैसे समय पर ही लेता 
था ।  बड़ा ही समय का पाबंद था ।  गोपाल की विचारों की तन्द्रा एक दम 
से टूटी ।  और वह अपने दादा की दशा देखकर एक 
दम घबरा रहा था ।  
 
 
 
 
दादा मेरे दादा ,मेरे जग के सहारे, मेरे दादा ,गोपाल जोर से चीखा।  
और उसकी हिचिकियां बंध गयीं   थी ।  मरते हुए भोला ने मानो 
उसकी पुकार सुन ली थी ।  भोला बोला अब बजरंगवली तेरी पार ,
लगाएंगे ।  लोग आपस मैं बातें कर रहे थे ।   कि बेटा गणेश जी के 
मंदिर के सामने मरा था ।  और बाप भोला ने बजरंगवली और 
 देवाधिदेव महादेव के मंदिर के सामने अपने प्राण छोड़ने का 
मानस बनाया है ।  कैसे भाग्यशाली हैं तभी तो भगवान के स्थान 
के सामने मरते हैं ।   गोपाल बिलखने लगा दादा ,ये तुम्हारे मरने की 
कह रहे हैं ।  तुम इनको कहो कि मैं तो गोपाल के साथ ही रहूंगा।  
चुप हो जाओ मेरे दादा नहीं मरेंगे ।  और ये बताओ संसार मैं अकाल 
मृत्यु मरने वाला भी क्या भाग्य शाली होता है।   जो अपने परिवार को 
को अनाथ छोड़कर बिना उम्र पूरी किये मर जाता है  ।    
या पूरी उम्र सौ साल जीने वाला भाग्य शाली होता है ।  
जिसके नाती पोते ,सब कमाने खाने लायक हो जाते हैं ।  और कामगारों ,
मजदूरों के क्या भाग्य अच्छे हो सकते हैं ।  उन्हें तो काम करेंगे तभी तो ,
पैसा मिलेगा।       भाग्य से तो उन्हें पैसा मिलने से रहा  ।   गरीब तो   
केवल दुःख देखने के लिए ही पैदा हुआ है।  
तभी भोला की कराह निकली ,उसने गोपाल को और पास बुलाने को 
कहा / मरणासन्न अवस्था मैं अपने सारे जीवन का निचोड़    मनुष्य  अपनी 
संतान को बताना चाहता है ।      अत बुजर्गों से सीख जरूरी है ।     सभ्यता 
की अक्षुण्ड़ता का यही रहस्य है ।     हर गुरु जाने से पहले अपने प्रिय 
शिष्य को अपनी   गूढ़   विद्या का हर  अंश सिखाना चाहता है ।  हर पिता 
मरने से पहले अपनी संतान को गूढ़ विषय की जानकारी देता है ।  
भोला बोला भैया गोपाल तुम कान लगाकर सुनो ।  मैं जैसा कहूँ   
वैसा ही  तू  मेरे   मरने के बाद करना ।   बेटा तेरे पास दो खेत हैं ।  उनमें से 
एक को बेच देना ।   जिससे तू अपनी पढ़ाई करते रहना ।  पानी वाले ,
अपने परम्परागत धंधे में अब बोतल बंद पानी ,तथा थैली आ गयी 
है ।   इस पर बड़े लोगों की निगाह जो पड गयी है ।  उनके बड़े बड़े 
कारखाने लगे हैं ।  उस स्थित मैं तेरे चरस का क्या मूल्य है।   और 
सरकारों को भी जनता के प्रति जवाब दार होना पड़ेगा ।  नहीं तो 
वह दूसरी सरकार भी ले आएगी ।  सरकार के हाथ बहुत लम्बे होते है ।  
अगर वह चाहती तो अब तक मीठा पानी आ जाता ।  लेकिन उसकी 
मंशा ही न रही होगी ।  कोई भी इच्छाशक्ति वाली सरकार कभी भी 
घर घर मैं पानी पहुंचा सकती है।   फिर अपना धंधा नही चलेगा ।  
अगर तैने बढ़िया तरह पढाई कर ली तो निश्चित रूप से तेरा 
रोजगार लग जायेगा ।  और ये बाप दादों की विरासत अपने चरस 
को छप्पर मैं टाँग देना ।  मेरे सर पर हाथ रखो और कहो  तुम ऐसा 
करोगे ।  हाँ दादा में तुम्हारी बात मानूंगा ।  गोपाल के हाँ शब्द के साथ 
ही भोला अपने शरीर को छोड़ अनंत की यात्रा पर निकल चूका था ।  
गोपाल अर्धविक्षिप्त सा रोये जा रहा था /उसकी समझ मैं पढाई से रोजगार 
समझ न आ रहा था ।     चरस के रोजगार को  तो वह बखूबी जनता था ।  
गोपाल अपने दादा की मृत्यु से अपने आपको एक दम अकेला असहाय 
महसूस कर रहा था ।  उसकी अवस्था तेरह चौदह साल की रही होगी ।  
दादा की असमय मृत्यु से उस पर परशानियों  का पहाड जो टूट पड़ा था।  
सभी उपस्थित लोग उसे ढाढ़स बंधा  रहे थे।   हरी भी समझा रहा था बेटा 
अब रोने से दादाजी वापिस नहीं आएंगे।   अब तुझे उनको मुखाग्नि देनी 
पड़ेगी ।   और हम सबको मिलकर उनका अंतिम संस्कार करना पड़ेगा।  
 
 
 
 
भोला का  निधन सुन उसके मौहल्ले से औरत ,आदमी , बच्चे   भी सब
 महलो मैं  आते   जा रहे ,थे ।  महिलाएँ    अलग कुछ दूर बैठी रो रही थीं ।  
गोपाल की दादी माँ का तथा उसकी माँ का रोकर ,बुरा हाल था ।  धीरे धीरे 
उसके कुटुंब के सारे लोग इकट्ठे हो गए थे ।  कुछ लोग भोला की स्थिति को ,
जानते हुए अंतिम क्रिया का सारा सामान लेकर ,आये थे ।   जिसमें बांस 
की काठी ,कफ़न ,मटकी ,रस्सियाँ घी ,लकड़ी ,उपले आदि थे ।  परिवार   
के ताऊ जी ने एक जलता हुआ ,उपला मटकी मैं रस्सी बांधकर गोपाल
 के हाथ मैं पकड़ा दी थी ।  कुछ लोगों ने भोला को बांस की काठी पर 
लिटाकर वे श्मसान की ओर चल दिए थे ।  राम नाम सत्य है।  
सत्य बोलो गत्य हैं ।  कहते लोग बढ़े चले जा रहे थे।  गोपाल मटकी
 को पकड़े हुए यंत्रवत चले जा रहा था ।  
सूरज  अकेले चलते चलते आकाश के बीचों बीच आ 
गया था।   गोपाल आकाश की तरफ देखता अपने 
रोजगार ”को तलाश कर रहा था ।  ‘सोच रहा था उसे 
भी भगवान भास्कर की तरह अपने भविष्य की राह अकेले 
तलाशनी होगी ।  तभी पीछे से किसी ने आवाज दी ।  गोपाल 
संभल के चलो ,  राह बड़ी दुष्कर है ।   इसमें कंकड़ व पत्थर हैं ।  
 तुम्हें कहीं ठोकर न लग जाये।   गोपाल एक दम से देखकर 
चलने लगा ।  
 
    शमशान मैं लोग उसके दादा की चिता तैयार कर रहे थे ।  
गोपाल को स्नान करा कर चिता मैं आग लगाने को कहा ।  
गोपाल ने अपने दादा को हिन्दू परम्परा के तहत मुखाग्नि 
दे दी थी ।   वह अपने प्यारे दादा की चिता के चारों ओर परिक्रमा 
कर रहा था ।  लोगों ने कहा ,कि गोपाल अपने दादा को आवाज 
लगाओ ।  गोपाल के अंदर कोई शक्ति जाग्रत हो रही थी।   वह 
जोर से चिल्लाया ।  दादा मैं तुम्हे दिया वचन निभाउंगा ।  मैं चरस 
का रोजगार छोड़ दुँगा ।  पढूंगा फिर रोजगार बदल दूंगा ।  उसकी
 आवाज व्यौम मैं गूँज रही थी ।   रोजगार उसके दिल दिमाग पर 
छा गया था ।  
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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