नौकरानी मालकिन

 मनोरमा दर्द की पीड़ा    से कराह रही थी स्तन के जानलेवा कैंसर ने उसके तन को हड्डियों का ढाँचा बना दिया था , बार बार असाध्य सी  बीमारी के उपचार ने उसके स्वास्थ को निरंतर गिरा दिया था    ।    वह जीवन से निराश होकर ईश्वर से   ही किसी   चमत्कार की उम्मीद मैं बैठी थी ।   न जाने किस दिन वह सामान्य जीवन जी सकेगी और पतझड़ हुए वृक्ष की तरह नई नई पत्तियों से युक्त होकर दोबारा जीवन का आनंद ले सकेगी  ।
उनके बच्चे तथा परिवार के अन्य लोग तो एक तरह से उनकी रुग्णता के कारण उनकी जिंदगी से निराश हो गये थे ।
उसके   खुद  के   पति  मोहन       भी  उसकी ओर कनखियों से देखकर चले जाते । कभी कभी वह सोचने लगती इस संसार मैं सम्बन्ध सब दैहिक है एक आकर्षण विहीन देह से भला देह लोलुप पति को क्या   ।   वह सात जन्मों का प्रेम सात जन्मों के लिए फेरे सब कुछ समाज की धारणाओं की उपज थी जो जो एक पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही थी अभी तो मृत्यु शय्या पर भी न थी चाहे वह स्वस्थ न थी लोगों का बेरुखापन उसे सालता है । मोहन उसकी तरफ  देख   कैसे झल्लाता था अपने प्यारे प्रीतम की झुंझलाहट उसको वितृष्णा  से भर देती थी । क्योंकि वह उन्हें अपना प्राणाधार , प्राणप्रिय मानती आई थी और मोहन भी उसे अपने प्राणो से प्रिय बताते थे ।
रोग  पर हुये खर्चे को  वे जोर जोर से गिना रहे थे अपने यहाँ घर आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को वे सुनाते थे एक दिन तो कह रहे थे मनोरमा के इलाज पर इतना खर्च हो रहा अगर ये ऐसे ही चलता रहा तो हम कंगाल हो जायेंगे  ।  मोहन की कंजूस आदतों को वह अरसे से  जानती थी किस तरह उसने गरीब मजदूर अपने मातहतों का शोषण कर धन इकट्ठा किया था कभी  सोचने लगती  उनकी बददुआओं से उसे यह पीडा प्राप्त हुई हो । पर यह कहने से डरती थी  मन मसोसकर रह जाती ।
 
इतनी देर मैं दादी दादी कहती उसकी पोती लाड़ली आ गयी थी  एक वही थी जो एक दम अनजान थी क़ि उसकी दादी मां असह पीड़ा के दौर से गुजर रही है । जब भी आती तो मनोरमा को एक सुखद एहसास मैं नहला कर चली जाती हवा का सुखद झोंका सी ।  तुम कहाँ हो उसकी माँ बोली ,दादी बीमार है  वहां न जाओ।   अपनी मां के डर से  मंदिर जाने मैं असमर्थ मनोरमा का भगवान अंतर्ध्यान   हो जाता । निश्छल प्रेममूर्ति सी लाड़ली उसको निस्वार्थ प्रेम करने वाले भगवान सी ही लगती थी । और बहू अस्पर्श्यता का भाव लिये मनोरमा को पीड़ा से भर देती।
मनोरमा मोहन को कई बार अपना स्थानांतरण कराने की कह चुकी थी।  पर अभी २ जिले के अधिकारी बने मोहन को उसकी बात रास नहीं आती  थी उन्होंने उसे नौकरानी रामकली को सौंप दिया था।  मनोरमा के अहो वाक्य की तुम्हें देख मेरी पीड़ा कम होगी का अब मोहन को रुचिकर नहीं लगता  और अपना ब्रीफकेश लिए बुदबुदाते वे हेडक्वॉर्टर की ओर चले गये  । उनकी    पदचाप  की  आहटों   की   धुनि   मैं    अपना आनंद तलाशने वाली मनोरमा दर्द मैं भी उसी सुख की अनुभूति को भी  अपने से अब   दूर जाते देखकर जडवत हो गयी है ।
मनोरमा की मालिक अब पूरी तरह   उसी की नौकरानी  रामकली बन गयी थी।  मनोरमा जब एक कली से फूल बन रही थी तो यही भ्रमर मोहन उसकी देह सुगंघ लेने उसके आसपास कैसा मंडराया करता था और  जब फूल बनी मोहन के घर आई थी तो तो उसने पूरे  परिवार को अपनी सुगंध से सरावोर कर दिया था आज मनोरमा  मोहन  का   परिवार भरा  पूरा बगीचा था । कैंसर  से  देह खुशबू चले जाने पर देह भंवरा मोहन धन भँवर बन धन कमाने चला गया  अनायास मुंह से निकला कैसा तेरा न्याय कैसा तेरा प्रेम कैसी तेरी दुनियाँ ———-रामकली के हवाले बगिया मोहन की  । और नौकरानी

रामकली उसकी मालकिन बन गयी  ।

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