Dheeraj Utkarsh धीरज उत्कर्ष

कट जायेंगे ये भी सभी जैसे कट गये हैं और भी ।
मिल जायेंगे फिर क्षण हंसी के होगी सुहानी भोर भी।
न धैर्य खो न धर्म खो विचलित न होना और भी ।
जैसे कुछ न हो घटित विस्मृति दुखों का दौर भी ।
निशां घावों के भी मिटेंगे ढूंढे मिलेगी न ठौर भी ।
याद कर उसको ही तू वही सच्चा सिरमौर भी ।
जिंदगी एक खेल है कभी जीत भी कभी हार भी ।
अपघात करना कायरों की बात कायराना कार भी ।
जिंदगी तो बंदगी प्रभु प्यारे उनके गल पुष्पहार भी ।
याद कर हर क्षण उसे ही वह श्रृंगार का श्रृंगार भी ।
सुर दुर्लभ कर्तव्य पथ मनुज सहज गलहार भी ।
गुपाल कहता सांच सांच नाविक वही पतवार भी ।

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