कृष्णा जय श्री कृष्णा

आज का पुरुषार्थ ही तो कल का तेरा भाग्य है ।

प्रमाद आलस्य अकर्मता  हर हाल में त्याज्य है ।
साधना की राह गुपाल  नर
 डूबते  केवल  वही ।
ताक में रहते हैं जो शायद उगल देगी   मही ।
लक्ष्य प्रति समर्पण होता है जिनका नहीं ।
दिग्भ्रमित अस्थिर भ्रमित सौ फीसदी असफल वही ।
पुरषार्थ कर  मनुष्य  आंखों में आंखें डाल दे ।
लक्ष्य से कर मित्रता  गाढ़ी और  सब  विसार दे ।
हर कोण से पहचान कर  तय करो मानक अपने।
ओझल न होने दे उन्हें    मिल जायेंगे
सपने ।
क्रम अनवरत अगर   रहा साकार होंगे जान ले ।
गुपाल सब तेरे लिये ही बस एक बार ठान ले ।
हर कदम मुश्किल  घटें मंजिलेंआती करीब हैं ।
पुरुषार्थी पुरषार्थ कर बना देती नसीब हैं ।

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