मैदान मत छोडो

मैदान कभी भी मत छोडो यह कायरता का लक्षण है।
कर्म क्षेत्र मैं डटना ही तो  जीवन कला विलक्षण है।
जब राहें ऊबड़ खाबड़ हों।
दुरगम हो चढ़ना मंजिल पै।
हो सुख सुबिधा की नाकाफी
दुखों का जोर हो वृद्धि पै। १।
जब चिंता तुमको खाती हो
मुस्कराते संगी साथी हो।
लेकिन निज आह निकलती
तेरे सीने को छलती हो।
झूम ख़ुशी से करो सामना मानों घडी विलक्षण है।२ ।
हार शब्द का जिनके जीवन होता है निश्चित अभाव ।
सदा देखते रहते हैं जो केवल अपनी ही जीत ख्वाब ।
सब कुछ जग में प्राप्त करें उनके संग नारायण है
दुख आते हैं दुख जाते हैं
 दुख बाद तो सुख आते हैं ।
सुमर सुमर हरि दुख भी जाते हैं ।
सुखानुभूति जग में पाते हैं ।
कर्मक्षेत्र में डटना ही तो जीवन भारत का रण है ।
शंकाओं को दूर करो ।
हो सर्वश्रेष्ठ गरूर करो ।
अंतिम बाधा  पार करो।
मनचाहा साकार करो ।
परिस्थितियों पर विजय प्राप्ति मनुजों का आभूषण है ।
मैदान मत छोड़ो कायरता का लक्षण है ।

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