ओजवान

योद्धा घबराये ना करते खोजा करते निज मंजिल को   ।
क्यों विजय श्री का वरण नहीं बारीकी देखें प्रतिपल को.।
रणभूमि मैं नुकसानों की  भरपाई सब करने को।
तत्पर मचलाया करते    रणचंडी रंग भरने  को।
लालायित वो रहते हैं निज इतिहास बदलने को।
प्रबल पराक्रमी बन कर प्रबल पराक्रम करने को    ।
प्रज्वलित करते सदा ओज से बुझी हुई करमाग्नि ।
एकाग्र चित्त हो पा लेते सारे लक्ष्य  इस सृष्टि के  ।

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