कृष्ण

नन्हे से प्यारे कृष्ण तू एक साल सयाना हो गया।
छोड़कर निज कर्म अन्यंत्र सुत तू भो गया।
ललचा रहे जग मैं तुझे सब सच नहीं सब झूंठ है।
तलवार नहीं है वह क्षत्रिय की केवल उसकी मूंठ है।
बिना खड्ग धारण किये रण किसने जीता है।
ख्वाब देखना  भ्रम है पूरा करना गीता  है।
गीता कहती सुनो कुँवर मेरा ज्ञान उचित है।
जिसने जीवन अपनाया होता नहीं भ्रमित है।
केवल कर्म करो खुलेंगे उन्नति द्वार।
पग पग स्वागत लग जाएगी बड़ी कतार।
सफल मनुज को सभी पूजते अर्पित करते हैं गलहार।
घंटों कठिन प्रतीक्षा रत हो कोशिश करते बारम्बार।
मिली सफलता पुत्तर स्वजन बढ़ा देती है।
इसी से बीज अंकुरित होते नव खेती है।
देखो खोलो दृष्टि आ पनी मची बूढी बल
वैभव घोर।
पुरष युक्त तीनों गुण से उनका ही है जग शोर।
अपने २ क्षेत्रों मैं जिसने मंजिल पाई।
वो ही हो गये अमर जन जन देत बधाई है।
उठो बढ़ो कमर कसो गौरव दो धरती को।
जन्म दिवस आशीष वत्स एकाग्र करो निज युति मति को।
हीरे पन्ने मोती कंचन भर जायेगी झोरी।
यश से बढ़कर नहीं है बात एकदम कोरी।

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