krishna prena punj

बहुत कह दिया जानकर निज गूढ़ज्ञान सार गह  लो इसे।
बुरा लगे तो त्याग प्रिय जान अनर्गल प्रलाप भी  इसे।
निश्चित नापते हैं मंजिल को वही जान लेते जीवन यही।
कुशल तैराक पार लगते ही हैनहीं  डूब जातेमँझधार वही।
काल भी किसी का मीत नहीं प्रबंधन से जीत लो इसे।
स्वार्थ मानव का ज्वलंत स्वभाव है बना लो परहित इसे।
सफल हो जाओगे कर्म करते रहे अनवरत तुम ।
जीवन फूलों की सेज नहीं है जान लो इसे तुम।
सजग रहे कर्मवीर रहे मिल जायेगा लक्ष्य सही ।
रोक नहीं सकता तुमको दाता जग  भी सत्य यही।
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