prerak preran प्रेरक प्रेरण

नहीं कठिन कुछ भी इस जग में तेरे हित निर्मित संसार ।
कर्मवीर कर कर्म अनूठे डलवाते निज गल में हार ।
अभिनंदन वीरों का होता एवम जग में वंदन भी ।
असफल लोग ढूंढते बहाने करते व्यर्थ में क्रंदन भी ।
छोटे छोटे कदम साध कर जो नर बढ़ते जाते हैं।
बाधाओं को हटा हटा जो नित आगे बढ़ जाते हैं।
लक्ष्य सुगम होता जाता बढ़ती जाती कठिनाई।
साधन को दोष नहीं देते मंथन करते निज करताई।
दूनी शक्ति लगा देते हैं समय लगाते फिर ज्यादा।
झंडा देते गाढ शिखर पर विजय वीर लेते फायदा।

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