मानसी पावन उदगार

            [ १  ]
  असँख्य अनगिनी अनगिनत  सलवट  ,
बिम्ब   ब्रह्मांड   ललाट तना  हो 
टेढ़ी मेढ़ी    उकृत लकीरें
  श्रृंगार चौथापन   बना हो । 
   अर्थ  :—- 
चेहरे पर खिंची  जिनकी संख्या किसी
ने गणना नहीं की है जो गिनी नहीं जा
सकती झुर्रियाँ सलवटें ऐसी लगतीं हैं ।
मानो पूरे  ब्रह्माण्ड का नक्शा वृद्ध व्यक्ति
के मस्तक पर खिंच रहा हो।
 ये चेहरे की लकीरें सभी प्रकार की 
हैं । लगता  है मनुष्य जीवन की 
जरावस्था को अनुभव का प्रतिबिम्
बना देती है। 

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