वंदनीय भारत भूमि

       वंदनीय     भारत भूमि  शश्यश्यामला भारत भूमी                 ,  अनुपम  छटा मनोहर । उन्नत शैल  शिखर मनमोहक          , कल कल झरते निर्झर   । आँख मिचौली करतीं सलिला          ,   पुलकित करती जीवन  । संपूरण    धन …

घर का अवतार

                घर   का   अवतार                               —————————- मोहन की माँ देखो मैं अपने लिए खददर की मंहगी कमीज तथा ब्रासलेट की धोती लाया हूँ /  सुनकर बुद्धो दांतो मैं पल्लू दबा हंसने …

रोजगार

धर्मशाला की खिड़की खुली थी ।   भोर की पावन बेला की सुरभित पवन , तन व मन को आलस त्याग कर उठने का आमंत्रण दे रही थी ।   पलकों के , आवरण तहत दबे नयन खुलने की असफल कोशिश कर रहे थे।    सुनाई दे रहा था महाशिव ,महाशक्ति के पुत्र गजानन गणेश …

मैं बाट देख रही तेरी

मेरे घर , आना रे , घनश्याम ,  प्रभु मैं , बाट, देख  रही ,तेरी ।    मैं तो बाट देख रही तेरी             ,      मैं याद कर रही तेरी  ।    गऊअन ,तू , खिरकन कर, अइयौ  ।     ,   मैया जसुदा से,    कह …

पतिदेव

पतिदेव :———जालोर का मुख्य डाकघर शहर के बीचों बीच स्थित था । मोहन की यहाँ नई नौकरी लगी थी ।उसकी उम्र अभी बीस साल की  ही थी  ।युवा मन यहाँ की नैसर्गिक सुंदरता में रीझा रहता था ।दिन भर डाकघर के  कार्य को करने के बाद वह भृमण हेतु कुछ …

सद्गुरु वंदन स्तुति महिमा

                                        [ १ ]   प्रणमामि गुरु प्रणाम  प्रभु ,   नमामि गुरु     नमन प्रभू    । स्मरामि गुरू स्मरण प्रभू    ,भजामि गुरू    भजन प्रभू     । पूजा गुरू  पूजन प्रभु      …

बृज यात्रा दर्शन

श्रीराधेकृष्ण शरणम              राधे सर्वेश्वरी जयते   वृंदावनविहारिणे नमः  श्री कृष्णाय गोविन्दाय नमः      श्री लाडलीलाल जयते      श्री ब्रजभूमि जयते     श्री  ब्रजेश्वरी जयते गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्‍वरः । गुरु साक्षात्‌ परब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नमः ॥    श्री राधागोविन्द की शरण लेकर सर्वेश्वरी राधिके ,के …

प्रिया प्रिय प्रथम मिलन रस माधुरी

[  १   ] 
प्रिया प्रिय प्रथम मिलन रस माधुरी
स्वपन  न   अलि   हौं    स्याम    तिआरौ     ।
गली सांकरीन चलि हौं आनौं       ,    प्रेम लाड़ली  भारौ       ।
जीनों  प्रिया  भयऊ  ब्रज आपद  ,   जप  तप कीनों  भारौ    ।
कीरत   कीरत  सुता  अनूपा    ,     रूप गुनन    ,मन धारौ  ।
मात   तात  धैनू  मित   छांड़े      गह्यौ  आन  निरप   द्वारौ ।
भानुनंदिनी   लखि  सुखपाबौं          बूढूं   देउ      किनारौ   ।
”गुपाल”  चरन   राधिके     दासा       मोहन  नाम   हमारौ   ।
हिंदी  भावार्थ  : —
 हे सखियौ मैं  तुम्हारा स्यामसुंदर कृष्ण  हूँ ये वास्तविकता  है यह
कोई स्वप्न नहीं है।मैं बरसाने की संकरी [ कम चौड़ी  ] गलियों
से श्रीराधिके  और आप सभी के प्रेमवश मोह के वशीभूत होकर
आया हूँ। प्रिय सखीयौ  ब्रज मैं श्रीराधिके  की तपस्या जप के
कारण मेरा   जीना कठिन हो गया है ।  कीर्तिकुमारी  की कीर्ति
बहुत ही शुभ हैं उनके रूप गुणों को अपने मन मैं धारण कर मैं
उनकी तरफ आकर्षित हो गया हूँ। मैंने अपने माता पिता मित्र
गायों को छोड़कर राजा ब्रषभानु के दरवाजे पर आ गया हूँ। मैं
      श्री वृषभानु की लाडली बेटी श्री राधिके के  प्रेम मैं डूबा जा रहा हूँ
  हे सखीयौ मुझे डूबने से बचालो। मेरा नाम मोहन है मैं राधिके
के चरणों का सेवक हूँ ।

 

गुपाल उद्धार रस ,माधुरी

[  १   ]   [    गुपाल  उद्धार  रस  माधुरी ]   धैनुका निरखत     रूप   सुहानों    । गौरस्याम  सुन्दर  अति जोरी           मनही         मन  मुस्कानों। दाऊ   गुपाल ग्वाल मित  बिहरत          बृन्दाबन           ललचानों। कंस नृसंस काल एइ …